आचार्य रामचंद्र शुक्ल – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

आचार्य रामचंद्र शुक्ल, जिन्हें “आचार्य शुक्ल” के नाम से भी जाना जाता है, ये 20वीं सदी के एक प्रमुख हिंदी लेखक, विद्वान और साहित्यिक आलोचक थे। इन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य के अग्रदूतों में से एक माना जाता है और इन्होंने भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जीवन परिचय” (Aacharya Ramchandra Shukla biography in Hindi) के बारे में बताया है। इसमें हमने शुक्ल जी का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचना एवं कृतियां, निबन्ध, आलोचना, भाषा शैली और हिन्दी साहित्य में स्थान को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है।

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इसके अलावा, इसमें हमने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप शुक्ल जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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आचार्य रामचंद्र शुक्ल का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने रामचन्द्र शुक्ल जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जीवनी –

पूरा नामआचार्य रामचन्द्र शुक्ल
उपनामआचार्य शुक्ल
उपाधिआचार्य
जन्म तिथि04 अक्टूबर, 1884 ई. में
जन्म स्थानउत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना नामक ग्राम में
मृत्यु तिथि02 फरवरी, 1941 ई. में
मृत्यु स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश
पिता का नामश्री चन्द्रबली शुक्ल
माता का नामश्रीमती निवासी देवी
पत्नी का नामश्रीमती सावित्री देवी
व्यवसायलेखक, विद्वान, निबंधकार, इतिहासकार, सम्पादक, आलोचक
साहित्य कालआधुनिक काल (शुक्ल युग)
सम्पादनकाशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका
लेखन विधाआलोचना, निबन्ध, कहानी, इतिहास
भाषासंस्कृत मिश्रित खड़ी बोली
शैलीविवेचनात्मक, आलोचनात्मक, गवेषणात्मक, भावात्मक
प्रमुख रचनाएंचिन्तामणी (दो भाग), विचार-वीथी, रस-मीमांसा, हिंदी साहित्य का इतिहास, सूरदास, जायसी, त्रिवेणी आदि।
हिन्दी साहित्य में स्थानशुक्ल जी हिन्दी-साहित्य के मूर्धन्य आलोचक, श्रेष्ठ निबंधकार, निष्पक्ष इतिहासकार, महान् शैलीकार एवं युग-प्रवर्तक साहित्यकार थे।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल की जीवनी

आचार्य रामचंद्र शुक्ल (Aacharya Ramchandra Shukla)-(1884 – 1941) एक भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध लेखक, निबंधकार, इतिहासकार, कहानीकार, भाषा-विद्वान एवं समालोचक थे। ये हिंदी साहित्य के अग्रगण्य व्यक्तियों में से एक थे और इनका योगदान आधुनिक हिंदी रचना एवं साहित्य की उन्नति में महत्वपूर्ण रहा है। इन्हें “आचार्य” के तौर पर सम्मानित किया जाता है, क्योंकि इन्होंने अपने विद्वत्ता, लेखनी और भाषा कौशल के साथ समाज को प्रेरित किया और उसे उन्नति की राह पर अग्रसर किया है।

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आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जीवन परिचय

हिन्दी के प्रतिभा सम्पन्न मूर्धन्य समीक्षक एवं युग-प्रवर्तक साहित्यकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 04 अक्टूबर, सन् 1884 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना नामक ग्राम के एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री चन्द्रबली शुक्ल था, जो कि एक मिर्जापुर में कानूनगो थे। तथा इनकी माता का नाम श्रीमती निवासी देवी था इनकी माता अत्यंत विदुषी और धार्मिक महिला थी। आचार्य शुक्ल जी की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अपने पिता के पास जिले की राठ तहसील में हुई और इन्होंने मिशन स्कूल से 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण की। गणित में कमजोर होने के कारण ये आगे नहीं पढ़ सके। ईन्होंने एफ० ए०, इंटरमीडिएट की शिक्षा इलाहाबाद से प्राप्त की, किंतु परीक्षा से पहले ही विद्यालय छूट गया।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जीवन परिचय

इसके पश्चात् आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने मिर्जापुर के न्यायालय में नौकरी आरंभ कर दी। यह नौकरी इनके स्वभाव के अनुकूल नहीं थी अतः ये मिर्जापुर के मिशन स्कूल में चित्रकला के अध्यापक हो गए। अध्यापन का कार्य करते हुए इन्होंने अनेक कहानी, कविता, निबन्ध, नाटक आदि की रचना की। शुक्ल जी ने लेखन का शुभारम्भ कविता से किया था। नाटक लिखने की और भी इनकी रुचि रही पर इनकी प्रखर बुद्धि इनको निबन्ध-लेखन और आलोचना की और ले गई। निबंध लेखन और आलोचना के क्षेत्रों में इन्होंने जो सर्वोपरि स्थान बनाया, वह आज तक बना हुआ है। इनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर इन्हें “हिन्दी शब्द-सागर” के संपादन कार्य में सहयोग के लिए श्यामसुन्दर दास जी द्वारा काशी नागरी प्रचारिणी सभा में सम्मान पूर्वक बुलवाया गया था।

अतः आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने 19 वर्ष तक “काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका” का सम्पादन भी किया। और कुछ समय पश्चात् इनकी नियुक्ति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्राध्यापक के रूप में हो गई और श्यामसुन्दर दास जी के अवकाश प्राप्त करने के बाद ये हिन्दी विभाग के अध्यक्ष भी हो गए। स्वाभिमानी और गंभीर प्रकृति का हिंदी का यह दिग्गज साहित्यकार 02 फरवरी, सन् 1941 ईस्वी में स्वर्गवासी हो गया।

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आचार्य रामचंद्र शुक्ल का साहित्यिक परिचय

आचार्य शुक्ल जी का साहित्यिक जीवन काव्य रचना से प्रारंभ हुआ था और इस क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का अधिक उपयोग नहीं कर सकें। इन्होंने गद्य के क्षेत्र में ही अधिक कार्य किया और एक संपादक, निबंधकार, अनुवादक एवं आलोचक के रूप में अपूर्व ख्याति अर्जित की। शुक्ल जी ने ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ और ‘आनन्द कादम्बिनी’ जैसी सुविख्यात पत्रिकाओं का प्रभाव पूर्ण सम्पादन किया। इनके द्वारा ‘हिंदी शब्द सागर’ का संपादन भी किया गया। एक निबन्ध-लेखक के रूप में इन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा का परिचय दिया।

हिन्दी-साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के द्वारा लिखे हुए साहित्यिक एवं मनोविकार संबंधी निबंधों का अपना विशिष्ट महत्व है। इन्होंने शैक्षिक, दार्शनिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विषयों से संबंधित कृतियों का अनुवाद भी किया। एक आलोचक के रूप में भी शुक्ल जी ने हिंदी साहित्य की बहुमूल्य सेवा की। इन्होंने अपनी महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृतियों के द्वारा आलोचना के क्षेत्र में युगान्तर उपस्थित किया और एक नवीन आलोचना-पद्धति का विकास किया।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध की विशेषता

शुक्ल जी को सबसे अधिक ख्याति निबंधकार के रूप में मिली। ‘काव्य में रहस्यवाद’ और ‘काव्य में अभिव्यंजनावाद’ आदि साहित्यिक निबन्धों तथा करुणा, क्रोध, घृणा आदि मनोविकारों पर लिखे विचारात्मक निबंधों के आधार पर इन्हें हिंदी का सर्वश्रेष्ठ निबन्धकार कहा जा सकता है। हिंदी में विवेचनात्मक निबंधों को जन्म देने का श्रेय शुक्ल जी को ही प्राप्त है। समालोचना के तो ये सम्राट ही थे। ‘विचार-वीथी’ तथा ‘चिंतामणि’ (दो भाग) शुक्ल जी के उच्च कोटि के मनोवैज्ञानिक, विचारात्मक तथा साहित्यिक निबंधों के संकलन हैं। सूरदास, रस की मीमांसा एवं त्रिवेणी आदि इनके आलोचना ग्रन्थ हैं।

इसके अतिरिक्त आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी ने चिन्तामणी निबन्धों के अलावा कुछ अन्य निबंध भी लिखे हैं जिनमें मित्रता एवं अध्ययन आदि निबन्ध सामान्य विषयों पर लिखे गए हैं। मित्रता जीवन उपयोगी विषय पर लिखा गया उच्च कोटि का निबंध है जिसमें शुक्ल जी की लेखन गत विशेषताएं झलकती हैं।

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आचार्य रामचंद्र शुक्ल की प्रमुख रचनाएं

शुक्ला जी एक प्रसिद्ध निबन्धकार, निष्पक्ष आलोचक, श्रेष्ठ इतिहासकार और सफल सम्पादक थे। इनकी रचनाओं का विवरण निम्नवत् है-

  • निबन्ध ⇒ चिन्तामणी (भाग 1 व 2) तथा विचार-वीथी ।
  • आलोचना ⇒ रस-मीमांसा, त्रिवेणी, सूरदास ।
  • इतिहास ⇒ हिन्दी-साहित्य का इतिहास ।
  • सम्पादन ⇒ जायसी ग्रन्थावली, तुलसी ग्रन्थावली, भ्रमरगीत सार, हिन्दी शब्द-सागर, आनन्द कादम्बिनी और काशी नागरी प्रचारिणी पत्रिका का कुशल सम्पादन किया।
  • कहानी ⇒ ग्यारह वर्ष का समय ।
  • काव्य रचनाएं ⇒ अभिमन्यु-वध, बुद्ध चरित ।
  • अनुदित रचनाएं (अनुवाद) ⇒ मेगस्थनीज का भारतवर्षीय विवरण, आदर्श जीवन, कल्याण का आनन्द, विश्व प्रबन्ध आदि।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की भाषा शैली

आचार्य शुक्ल जी भाषा के विविध रूपों के धनी हैं। इनकी भाषा संस्कृत मिश्रित शुद्ध प्रौढ़ एवं परिमार्जित खड़ीबोली है। इनकी भाषा में शब्दों की प्रधानता है इन्होंने प्रचलित उर्दू, फारसी तथा अंग्रेजी भाषा के शब्दों को भी सहायता पूर्वक अपनाया है। भाषा को और अधिक गतिशील एवं प्रवाहपूर्ण बनाने के लिए मुहावरों एवं लोकोक्तियों का भी प्रचुर प्रयोग किया है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी की भाषा शैली सुगठित है इसमें कहीं कोई शब्द व्यर्थ का दिखाई नहीं देता है। इनकी कृतियों में वाक्य सुगुम्फित है। और कम से कम शब्दों में विचार एवं भाव भरना शुक्ल जी की शैलीगत विशेषता है। यत्र-तत्र सूत्रात्मकता भी है और साथ ही वे उस सूत्र की सफल एवं सरल व्याख्या भी करते हैं। शुक्ल जी विषम को सर्वत्र एवं रोचक बनाने का प्रयास करते हैं जगह-जगह पर पेना व्यंग्य भी करते हैं। यदि संक्षेप में कहें कि शुक्ल जी की भाषा प्रांजल एवं शैली सामासिकता लिए हुए हैं। वैसे तो इनकी शैली के तीन रूप प्रचलित हैं – आलोचनात्मक, गवेषणात्मक तथा भावात्मक आदि। इसके अलावा, विवेचनात्मक, तुलनात्मक एवं हास्य-व्यंग्यात्मक शैली भी देखने को मिलती हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी का साहित्य में स्थान

हिन्दी निबंध को एक नया आयाम देकर उसे ठोस धरातल पर प्रतिष्ठित करने वाले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी हिन्दी-साहित्य के मूर्धन्य आलोचक, श्रेष्ठ निबन्धकार, निष्पक्ष इतिहासकार, महान् शैलीकार एवं युग-प्रवर्तक साहित्यकार थे। ये हृदय से कवि, मस्तिष्क से आलोचक और जीवन से अध्यापक थे। हिंदी साहित्य में इनका मूर्धन्य स्थान है। इनकी विलक्षण प्रतिभा के कारण ही इनके समकालीन हिंदी गद्य काल को “शुक्ल युग” के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

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FAQs. आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के बारे में क्या जानते हैं बतायें?

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, जिन्हें “आचार्य शुक्ल” के नाम से भी जाना जाता है, 20वीं सदी के एक प्रमुख हिंदी लेखक, विद्वान और साहित्यिक आलोचक थे। उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य के अग्रदूतों में से एक माना जाता है और उन्होंने भाषा के विकास और प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

2. आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म कब और कहां हुआ था?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का जन्म 04 अक्टूबर सन् 1884 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के अगोना नामक ग्राम के एक सम्भ्रांत परिवार में हुआ था।

3. आचार्य रामचंद्र शुक्ल के माता पिता का नाम क्या था?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पिता का नाम श्री चन्द्रबली शुक्ल तथा इनकी माता का नाम श्रीमती निवासी देवी था।

4. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की प्रमुख रचनाएं कौन सी हैं?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की प्रमुख रचनाएं – चिन्तामणी (दो भाग), विचार-वीथी, रस-मीमांसा, हिंदी साहित्य का इतिहास, सूरदास, जायसी, त्रिवेणी आदि।

5. रामचंद्र शुक्ल के प्रिय कवि कौन है?

रामचंद्र शुक्ल के प्रिय कवि सूरदास जी हैं।

6. आचार्य रामचंद्र शुक्ल कौन से युग के कवि थे?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी शुक्ल युग के कवि थे।

7. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आधुनिक काल को क्या नाम दिया है?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की विलक्षण प्रतिभा के कारण ही इनके समकालीन आधुनिक काल को हिंदी गद्य काल एवं “शुक्ल युग” के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

8. आचार्य रामचंद्र शुक्ल की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

आचार्य रामचंद्र शुक्ल की मृत्यु 02 फरवरी सन् 1941 ईस्वी को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुई थी।

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