ऊर्जा के निम्नीकरण का नियम क्या है, सूत्र, उदाहरण | Law of Reduction of Energy in Hindi

ऊर्जा के निम्नीकरण का नियम

ऊष्मागतिकी के द्वितीय नियम के अनुसार, ऊष्मा को कार्य में तभी बदला जा सकता है, जब किसी अधिक ताप वाली वस्तु से उष्मा लेकर कम ताप वाली वस्तु को दे दी जाए।
उदाहरण के लिए – उत्क्रमणीय कार्नो इंजन में ताप T1 पर गर्म स्त्रोत से Q1 ऊष्मा ली जाती है तथा ताप T2 पर शीतल सिंक को Q2 ऊष्मा दी जाती है तथा शेष ऊष्मा (Q1 – Q2) कार्य में बदल दी जाती है। कार्य में बदलने वाली ऊष्मा को ‘प्राप्य ऊर्जा’ (available energy in Hindi) कहते हैं।

इसे भी पढे़…ऊष्मागतिकी का तृतीय नियम

ऊर्जा में कमी के नियम का व्यंजक

इस प्रकार प्राप्त उर्जा
W = Q1 – Q2
W = Q1(1 – \frac{Q_2}{Q_1} )
या W = Q1(1 – \frac{T_2}{T_1} ) ….(1)

{चूंकि \frac{Q_2}{Q_1} = \frac{T_2}{T_1} }
अतः स्पष्ट है कि सिंक का ताप T2 जितना कम होगा, प्राप्य ऊर्जा उतनी ही अधिक होगी। माना कि सिंक का न्यूनतम प्राप्य ताप T0 है, तब अधिकतम प्राप्य ऊर्जा
Wmax = Q1(1 – \frac{T_0}{T_1} ) ….(2)

अब अनुत्क्रमणीय प्रक्रम ऊष्मा-चालन पर विचार करते हैं। माना कि एक छड़ के दो सिरे, दो विभिन्न तापों T1 व T2 पर हैं (T1 > T2) तथा ऊष्मा Q ताप T1 वाले सिरे से ताप T2 वाले सिरे की ओर प्रवाहित होती है।
चालन से पहले ऊष्मा Q ताप T1 वाले सिरे पर प्राप्त रहती है, अतः चालन से पहले ऊष्मा Q से अधिकतम प्राप्य ऊर्जा
(Wmax)T1 = Q(1 – \frac{T_0}{T_1} ) ….(3)

चालन से प्राप्त ऊष्मा Q ताप T2 वाले सिरे पर प्राप्त रहती है। अतः चालन के पश्चात ऊष्मा Q से अधिकतम प्राप्त ऊर्जा
(Wmax)T2 = Q(1 – \frac{T_0}{T_2} ) ….(4)

चूंकि यहां T1 > T2 अतः (Wmax)T1 – (Wmax)T2
अर्थात् ताप T1 वाले सिरे पर प्राप्य उर्जा ताप T2 वाले सिरे पर प्राप्त उर्जा से अधिक होती है। इस प्रकार चालन के फलस्वरूप प्राप्य उर्जा घटती है।
यदि चालन के फलस्वरूप ऊर्जा में कमी ∆E हो, तब समीकरण (3) व (4) से,
∆E = (Wmax)T1 – (Wmax)T2
∆E = Q(1 – \frac{T_0}{T_1} ) – Q(1 – \frac{T_0}{T_2} )
या ∆E = Q( \frac{T_0}{T_2} \frac{T_0}{T_1} )
∆E = T0( \frac{T_0}{T_2} – QT1)
अर्थात्
\footnotesize \boxed{ ∆E = T_0.(∆S) }

यहां ∆S चालन के कारण विश्व की एण्ट्रॉपी में वृद्धि है। इस प्रकार एण्ट्रॉपी-वृद्धि से कार्य के लिए प्राप्य ऊर्जा में यह कमी एण्ट्रॉपी-वृद्धि की T0 गुनी होती है।

और पढ़ें..अणुगति एंव ऊष्मागतिकी

चूंकि सभी भौतिक प्रक्रम अनुत्क्रमणीय हैं। तथा प्रकृति में अनुत्क्रमणीय प्रक्रम लगातार हो रहे हैं, अतः विश्व की एण्ट्रॉपी तथा कार्य के लिए अप्राप्य उर्जा लगातार बढ़ रही है। दूसरे शब्दों में, ‘यद्यपि विश्व की कुल ऊर्जा संरक्षित रहती है। लेकिन कार्य के लिए प्राप्य ऊर्जा लगातार घट रही है। यही “ऊर्जा के निम्नीकरण का नियम” कहलाता है।’

Note – सम्बन्धित प्रश्न पूछे जाते हैं –
Q. 1 सिद्ध कीजिए कि एण्ट्रॉपी बढ़ने से कार्य के लिए प्राप्त ऊर्जा में कमी आती है ?
Q. 2 ऊर्जा के निम्नीकरण का नियम क्या है ? परिभाषा, सूत्र तथा उदाहरण द्वारा इसे सिद्ध कीजिए ?

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *