ऊर्जा संरक्षण का नियम क्या है | Conservation of Energy in Hindi

ऊर्जा संरक्षण का नियम क्या है

इस नियम के अनुसार, “ऊर्जा को न तो नष्ट किया जा सकता है और न ही उत्पन्न किया जा सकता है, परन्तु इसका एक रूप से दूसरे रूप में रूपान्तरण किया जा सकता है।
दूसरे शब्दों में, जब ऊर्जा का एक रूप विलुप्त हो जाता है, तो वहीं ऊर्जा उतने ही परिमाण में किसी और रूप में प्रकट हो जाती है।
अर्थात् किसी निकाय या तंत्र या ब्रह्माण्ड की कुल ऊर्जा हमेशा नियत रहती है।
K + U = नियत या ∆K + ∆U = 0

यान्त्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम क्या है

इस नियम के अनुसार, संरक्षी बलों के प्रभाव में किसी निकाय की कुल यान्त्रिक ऊर्जा नियत रहती है। अर्थात्

माना कि m द्रव्यमान का कण संरक्षी बल द्वारा एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाया जाता है।
तो कण पर बल द्वारा किया गया कार्य-
W = \int^2_1 \overrightarrow{F} .d \overrightarrow{r}
कार्य ऊर्जा प्रमेय के आधार पर,
W = \int^2_1 \overrightarrow{F} .d \overrightarrow{r} = \frac{1}{2} mv22 \frac{1}{2} mv21 ….(1)

W = U1 – U2 ….(2)

इन दोनों समीकरण से यह ज्ञात होता है। कि संरक्षी बल के क्षेत्र में एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक यदि कोई कण गति करता है। तो उसकी गतिज ऊर्जा में वृद्धि होती है। परन्तु स्थितिज ऊर्जा में उतनी ही कमी होती है। अतः समीकरण (1) व (2) से,

\frac{1}{2} mv22 \frac{1}{2} mv21 = U1 – U2
K = \frac{1}{2} mv2
K2 – k1 = U1 – U2
K2 + U2 = K1 + U1
\footnotesize \boxed{ E = K + U }
या कुल ऊर्जा = गतिज ऊर्जा + स्थितिज ऊर्जा

या ∆K + ∆U = 0 या \footnotesize \boxed{ + ∆K = - ∆U }
किसी निकाय की गतिज ऊर्जा में वृद्धि = स्थितिज ऊर्जा में कमी

तो कोइ भी स्थल पर संरक्षी बल के परिणाम में स्थितिज और गतिज ऊर्जाओं का योग स्थिर रहता है।
अतः इसे “यान्त्रिक ऊर्जा का संरक्षण नियम कहते हैं।

इसे भी पढ़ें…संरक्षी तथा असंरक्षी बल क्या है

ऊर्जा संरक्षण के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु

1.किसी वस्तु की गतिज ऊर्जा K सदैव धनात्मक होती है जबकि वस्तु की स्थिति ऊर्जा U धनात्मक व ऋणात्मक दोनों हो सकते हैं।
2.निकाय की सम्पूर्ण ऊर्जा अर्थात् K + U = E
(a).धनात्मक होगी यदि, U > 0
या K > | U | जब U < 0
(b).शून्य होगी यदि , K = 0 व U = 0
या E = | U | और U < 0
(c).ऋणात्मक होगी यदि, K < | U | और U < 0

अतः यह निर्णायक रूप में,
(1). यदि किसी निकाय की गतिज व स्थितिज ऊर्जाएं अलग-अलग शून्य है, तो निकाय की सम्पूर्ण ऊर्जा भी शून्य होगी। लेकिन इसके विपरीत कथन सत्य नहीं है। अनुभाग (b) में देखें ।
(2). यदि निकाय की सम्पूर्ण ऊर्जा ऋणात्मक है, तो निश्चित रूप से निकाय की स्थितिज ऊर्जा ऋणात्मक होनी चाहिए। अनुभाग (c) में देखें।
(3). यदि एक निकाय की स्थितिज ऊर्जा ऋणात्मक है, तो निकाय की सम्पूर्ण ऊर्जा धनात्मक हो सकती है। अनुभाग (a) में देखें।

Important FAQs –

Q.1 ऊर्जा की परिभाषा तथा मात्रक लिखिए?
Ans. किसी वस्तु के कार्य करने की क्षमता को उस वस्तु की ऊर्जा (Energy in Hindi) कहते हैं। ऊर्जा एक अदिश राशि है इसका मात्रक जूल होता है।

Q.2 गतिज ऊर्जा की परिभाषा उदाहरण सहित समझाइए?
Ans. किसी वस्तु या पिण्ड में उसकी गति या चाल के कारण कार्य करने की क्षमता को गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy in Hindi) कहते हैं। इसे K से प्रदर्शित करते हैं।
उदाहरण के लिए – बन्दूक से दागी गई गोली, तोप उसे छोड़ा गया गोला, चलते हुए वाहन तथा घूमते हुए लड्डू आदि गतिज ऊर्जा के उदाहरण हैं।

Q.3 स्थितिज ऊर्जा क्या है?
Ans. विभिन्न कणों अथवा वस्तुओं से बने निकाय में इन कणों के मध्य होने वाली पारस्परिक अन्योन्य क्रिया अर्थात् इन कणों के मध्य लगने वाले पारस्परिक आन्तरिक बलों से संबंधित ऊर्जा को निकाय की स्थितिज ऊर्जा कहते हैं। अर्थात् किसी वस्तु या निकाय में उसकी स्थिति या विकृत अवस्था के कारण जो ऊर्जा उत्पन्न होती है उस ऊर्जा को उस निकाय की स्थितिज उर्जा (Potential Energy in Hindi) कहते हैं। इसे U से प्रदर्शित करते हैं।

Note संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं?

  1. ऊर्जा संरक्षण के नियम को समझाइए ?
  2. यान्त्रिक ऊर्जा संरक्षण का नियम क्या है ? गतिज ऊर्जा तथा स्थितिज ऊर्जा क्या है ? परिभाषा उदाहरण सहित समझाइए ?
Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *