ऋणात्मक पुनर्भरण (फीडबैक) का सिद्धांत एवं लाभ

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प्रशन 1. ऋणात्मक पुनर्भरण का सिद्धांत क्या है? समझाइए तथा इसके लाभों का विस्तार से वर्णन कीजिए।

ऋणात्मक पुनर्भरण का सिद्धांत

एम्पलीफायरों में ऋणात्मक पुनर्भरण का सिद्धांत समझने के लिए एक मूल एम्पलीफायर का परिपथ आरेख बनाते हैं जिसे चित्र-1(a) में दिखाया गया है।

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ऋणात्मक पुनर्भरण

चित्र के अनुसार, निवेशी सिग्नल वोल्टेज vi व निर्गत सिग्नल वोल्टेज vo है, तब एम्पलीफायर का सिग्नल वोल्टेज Av होगा। अतः इस प्रकार
Av = \frac{v_o}{v_i} या Av = \frac{v_o}{v_s}
यहां Av को खुला लूप लाभ कहा जाता है। अब माना एम्पलीफायर के साथ पुनर्भरण परिपथ मिला दिया जाए, तो चित्र-1(b) में देखें।

इसमें दो भाग होते हैं एम्पलीफायर और पुनर्भरण परिपथ। माना यदि निर्गत वोल्टेज सिग्नल vo का β भाग निवेशी वोल्टेज सिग्नल में पुनर्निविष्ट किया जाता है, तो एम्पलीफायर के निवेशी सिरों के मध्य लगा एक वास्तविक निवेशी सिग्नल वोल्टेज
vs – vf = vs – βvo (चूंकि यह ऋणात्मक पुनर्भरण है)
इस प्रकार vi = vs – βvo
परंतु हम जानते हैं कि vo = Av हो, तो
vo = Av(vs – βvo) या vo = Avvs – Avβvo
या vo + Avβvo = Avvs या vo(1 + Avβ) = Avvs
तथा \frac{v_o}{v_s} = \frac{A_v}{1 + βA_v}
परंतु यहां \frac{v_o}{v_s} पुनर्भरण सहित एम्पलीफायर का वोल्टेज लाभ कहलाता है तथा इसे बन्द लूप लाभ भी कहते हैं। अर्थात्
Af = \frac{v_o}{v_s} = \frac{A_v}{1 + βA_v}

इस प्रकार, स्पष्ट है कि एम्पलीफायर का पुनर्भरण के साथ वोल्टेज लाभ Af गुणांक (1 + βAv) से कम होता है। यदि βAv का मान जितना अधिक होता है। उतना ही वोल्टेज लाभ कम होता है और फिर विकृति भी कम होती है। अतः ” इस गुण के कारण ही एम्पलीफायर में ऋणात्मक पुनर्भरण ज्यादा लाभदायक होता है।”

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ऋणात्मक पुनर्भरण के लाभ

एम्पलीफायर में ऋणात्मक पुनर्भरण के निम्नलिखित लाभ इस प्रकार है –
(1). पुनर्भरण में स्थायित्व लाभ – ऋणात्मक पुनर्भरण आरोपित करने पर वोल्टेज लाभ
Af = \frac{A_v}{1 + βA_v}
चूंकि βAv >> 1 हो, तो समीकरण निम्न रूप में होगी।
Af = \frac{A_v}{1 + βA_v} \frac{1}{β}
अतः यह समीकरण दर्शाती है कि वोल्टेज लाभ Av से स्वतंत्र होता है इसलिए सप्लाई वोल्टेज में परिवर्तन के कारण ऋणात्मक पुनर्भरण लगाने से पूर्व लाभ A पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। तथा ऋणात्मक पुनर्भरण लगाने के पश्चात लाभ A पर बहुत कम प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार, ऋणात्मक पुनर्भरण आरोपित करने पर प्रवर्धक का वोल्टेज लाभ स्थाई हो जाता है।

(2). आरेखीय विरूपण के आयाम में कमी – ऋणात्मक पुनर्भरण आरोपित करने पर एम्पलीफायर के निर्गत में आरेखीय विरूपण कम हो जाता है, इसे निम्न तथ्यों द्वारा देखा जा सकता है। यदि जब ऋणात्मक पुनर्भरण आरोपित किया जाता है तो कोई भी संनादी जो एम्पलीफायर के निर्गत में उपस्थित होता है।

यदि निवेशी सिग्नल में पुनर्भरित किया जाता है तब यह एम्पलीफायर द्वारा प्रवर्धित होगा एवं निर्गत में उसके साथ विपरीत कला में उपस्थित होगा जिसके कारण प्रारंभिक ऋणात्मक पुनर्भरण आरोपित सिग्नल में विरूपण के कारण आयाम में कमी होती है।

(3). आवृत्ति विरूपण में कमी – ऋणात्मक पुनर्भरण आवृत्ति विरूपण को भी घटा देता है। माना दो विभिन्न आवृतियों पर पुनर्भरण के बिना वोल्टेज लाभ A1 व A2 है। यदि जब पुनर्भरण आरोपित किया जाता है तो उसके संगत लाभ A1f व A2f है, तब
A1f = \frac{A_1}{1 + βA_1} , A2f = \frac{A_2}{1 + βA_2}
इसलिए \frac{A_{1f}}{A_{2f}} = ( \frac{A_1}{1 + βA_1} ) × ( \frac{1 + βA_2}{A_2} )
यदि पुनर्भरण गुणक βA1 >> 1 एवं βA2 >> 1 हो, तो
\frac{A_{1f}}{A_{2f}} = ( \frac{A_1}{βA_1} ) × ( \frac{βA_2}{A_2} )
अतः इस प्रकार प्रवर्धन लगभग पूर्ण रूप से आवृत्ति से स्वतंत्र होता है।

(4). निर्गत शोर में कमी – एम्पलीफायर के कारण निर्गत में उपस्थित शोर भी पुनर्भरण मार्ग द्वारा निवेशी टर्मिनलों पर पुनर्भरण हो जाता है एवं निर्गत में शोर घट जाता है। ऋणात्मक पुनर्भरण केवल एम्पलीफायर के अंदर उत्पन्न होने वाले शोर को घटाता है। यदि शोर वोल्टेज एम्पलीफायर के इनपुट पर स्थिर हो, तो यह इनपुट सिग्नल के समान मात्रा में प्रवर्धित हो जाता है।

परन्तु यदि शोर वोल्टेज एम्पलीफायर के अंदर उपस्थित होता है तो वह इनपुट सिग्नल के समान मान में प्रवर्धित नहीं होता है। और यदि जब ऋणात्मक पुनर्भरण आरोपित किया जाता है तो निर्गत में कुल शोर घट जाता है और एम्पलीफायर के प्रदर्शन में और अधिक सुधार हो जाता है।

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(5). निवेशी प्रतिबाधा में वृद्धि – ऋणात्मक पुनर्भरण एम्पलीफायर के निवेशी प्रतिबाधा में वृद्धि करता है जो एक एम्पलीफायर का आवश्यक अभिलक्षण है क्योंकि यह निवेशी वोल्टेज स्त्रोत को लोड नहीं करता है।

ऋणात्मक पुनर्भरण

चित्र में निवेशी वोल्टेज V1 व I1 निवेश धारा है। अतः ऋणात्मक पुनर्भरण एम्पलीफायर की निवेशी प्रतिबाधा
Zif = \frac{V_1}{I_1}
मूल एम्पलीफायर का कुल निवेशी वोल्टेज
V2 = V1 – βV0
परंतु V0 = AV2 का मान उपरोक्त समीकरण में रखने पर,
V2 = V1 – βAV2 या V1 = V2(1 + βA)
अथवा
\frac{V_1}{I_1} = \frac{V_2}{I_1} (1 + βA)
अतः समीकरण का प्रयोग करने पर,
Zif = Zi(1 + βA)
इस प्रकार ऋणात्मक पुनर्भरण आरोपित करने पर निवेशी प्रतिबाधा गुणक (1 + βA) से बढ़ जाती है।

(6). निर्गत प्रतिबाधा में कमी – एक एम्पलीफायर में ऋणात्मक श्रेणी वोल्टेज पुनर्भरण आरोपित करने पर निर्गत प्रतिबाधा घटती है जो एक एम्पलीफायर का अभिलक्षण है, क्योंकि कम निर्गत प्रतिबाधा के साथ एम्पलीफायर लोड को बहुत कम वोल्टेज प्रदान करता है।

ऋणात्मक पुनर्भरण

माना पुनर्भरण एम्पलीफायर के चित्र-3 आरेख में निर्गत सिग्नल को Z0 के साथ श्रेणी क्रम में जुड़े तुल्य परिपथ वोल्टेज AβV0 द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है, यहां βV0 एम्पलीफायर के निवेशी टर्मिनलों वोल्टेज है तथा निवेशी वोल्टेज βV0 के कारण निर्गत वोल्टेज AβV0 है।
यदि आरोपित स्त्रोत V0 से निर्गत टर्मिनलों में प्रभावित धारा I0 हो, तो
V0 + AβV0 = I0Z0 या V0(1 + Aβ) = I0Z0
या \frac{V_0}{I_0} = \frac{Z_1}{1 + βA}
अथवा Z0f = \frac{Z_0}{1 + βA}
जहां Z0f ऋणात्मक पुनर्भरण के साथ निर्गत प्रतिबाधा है। अतः इस प्रकार ऋणात्मक पुनर्भरण निर्गत प्रतिबाधा को (1 + βA) गुणक द्वारा घटा देता है।

(7). बैण्ड चौड़ाई में वृद्धि – ऋणात्मक पुनर्भरण में निम्न कटऑफ आवृत्ति को घटा देता है। परंतु उच्च कटऑफ आवृत्ति को बढ़ा देता है। इस प्रकार ऋणात्मक पुनर्भरण बैण्ड चौड़ाई को बढ़ा देता है। परंतु बैण्ड चौड़ाई में यह वृद्धि एम्पलीफायर के लाभ की कीमत पर प्राप्त होती है। जैसा कि चित्र-4 में दिखाया है।

ऋणात्मक पुनर्भरण

यदि पुनर्भरण के बिना एम्पलीफायर का लाभ A है ऋणात्मक पुनर्भरण के साथ लाभ Af है। क्योंकि वोल्टेज लाभ बैण्ड चौड़ाई गुणनफल के समान रहता है। अतः
A × BW = Af × BW’
अथवा A × (f2 – f1) = Af(f’2 – f’1) ।

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