एण्डूज का प्रयोग क्या है, उपकरण, कार्य विधि तथा परिणाम | Andrew’s Experiment in Hindi

एण्डूज का प्रयोग क्या है

यदि जब किसी पदार्थ की दो अवस्थाएं द्रव तथा गैस एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न प्रतीत होती है। तो प्रयोगों द्वारा यह भी पाया गया है, कि ये अवस्थाएं वास्तव में इतनी भिन्न नहीं होती हैं। जितनी कि साधारण तापों पर दिखाई देती है। एण्डूज ने सन् 1863 में प्रयोग द्वारा स्पष्ट रूप से यह प्रदर्शित किया कि पदार्थ की द्रव तथा गैसीय अवस्थाएं एक ही अवस्था में विलीन हो जाती हैं। तथा इन अवस्थाओं का एक-दूसरे में परिवर्तन जल्दी न होकर सतत रूप से होता है। एण्डूज के प्रयोग से इस बात का कारण भी ज्ञात हुआ कि प्रारंभिक प्रयासों में CO2 तथा SO2 जैसी गैसों के दाब लगाने पर द्रवित हो जाती है। जबकि गैसें (N2, O2 व H2) अत्यंत अधिक दाब लगाने पर भी द्रवित न हो पायीं ।

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एण्डूज के प्रयोग में ‘उपकरण’

एण्डूज के प्रयोग में कार्बन डाइ-ऑक्साइड गैस पर प्रयोग करके अनेक महत्वपूर्ण तथ्य ज्ञात किए हैं। तथा इस प्रयोग में प्रयुक्त उपकरण को चित्र में प्रदर्शित किया गया है।
इसमें कांच की दो एक-समान केशिका नलियाॅ M व N होती है। तथा प्रत्येक नली का ऊपरी भाग समान अनुप्रस्थ परिच्छेद वाली केशनली का बना होता है। अतः प्रत्येक केशनली में आयतन के चिन्ह अंकित होते हैं। जिससे कि केशनली के अंदर भरी गैस का आयतन सीधे प्राप्त किया जा सकता है।
आरंभ में दोनों नलियों के दोनों सिरें खुले होते हैं। तथा सर्वप्रथम नली M में लगभग 24 घंटों तक शुष्क CO2 प्रवाहित की जाती है। ताकि उसमें वायु बिल्कुल ना रहे। तथा नली M का ऊपरी सिरा सील कर दिया जाता है। तथा नीचे के सिरे को पारे में डुबोकर थोड़ा-सा गर्म किया जाता है। ऐसा करने पर कुछ CO2 गैस बाहर निकल जाती है। अब नली को ठंडा होने देते हैं। जिससे कुछ पारा केशनली में चढ़ जाता है। तथा इस प्रकार नली M के केशनली वाले भाग में पारे द्वारा कुछ CO2 बंद हो जाती है। इसी प्रकार नली N के केशनली वाले भाग में कुछ शुष्क वायु भर ली जाती है। जैसे कि चित्र में दिखाया गया है।

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एण्डूज का प्रयोग
एण्डूज का प्रयोग

अब दोनों नलियों M व N को ताॅंबें के दो बेलनाकार बर्तनों P1 ब P2 में इस प्रकार खड़ा करके कस दिया जाता है। ताकि उनके केशनली वाले भाग ऊपर रहे। यह दोनों बर्तन एक नली Q द्वारा परस्पर जुड़े रहते हैं। तथा इन बर्तनों में पानी भरा होता है। दोनों बर्तनों के ऊपरी सिरे को बंद कर दिया जाता है, तथा नीचे के सिरों पर पेज O1, O2 लगे रहते हैं। तथा इन पेजों को ऊपर की ओर घुमाकर नली M व N बन्द गैसों (जैसे- CO2 तथा वायु) का दाब बदला जा सकता है।
अतः दोनों नलियों में भरी गैसों का दाब समान रहता है। तथा वायु के ताप को स्थिर, जबकि CO2 के ताप को परिवर्तित किया जाता है। बर्तनों के ऊपर केशनली वाले भाग को तापस्थायी में बंद करके रखते हैं।

एण्डूज के प्रयोग की ‘कार्य-विधि’

एण्डूज के प्रयोगों में उपकरणों को एक स्थिर ताप पर रखते हुए पेचों O1, O2 को ऊपर की ओर घुमाकर CO2 तथा वायु पर भिन्न-भिन्न दाब आरोपित किए जाते हैं। इन दावों के संगत दोनों नलियों में भरी गैसों का आयतन तथा ताप नोट कर लेते हैं। तथा वायु को आदर्श गैस मानकर इसके आयतन से दाब को बाॅयल के नियम की सहायता से ज्ञात कर लेते हैं। अतः यही दाब CO2 का होता है, अब CO2 के ताप को स्थिर रखकर पेच O1, O2 को कसते हुए दाब बढ़ाते जाते हैं। तथा प्रत्येक दाब के संगत आयतन पढ़ते जाते हैं। तथा प्रत्येक बार वायु का दाब ज्ञात करते जाते हैं। जो CO2 के दाब के बराबर होता है। इस प्रकार स्थिर ताप पर CO2 के भिन्न-भिन्न दावों के लिए उसके आयतन ज्ञात हो जाते हैं। अब CO2 को भिन्न-भिन्न स्थिर तापों पर रखकर प्रयोग को दोहराते हैं।

एण्डूज के प्रयोग का ‘परिणाम’

यदि जब CO2 के लिए प्रत्येक स्थिर ताप पर दाब का आयतन के बीच एक वक्र को रखते हैं। तथा इस प्रकार प्राप्त वक्रों को “समतापी वक्र” कहते हैं।

Note – सम्बन्धित प्रश्न –
Q. 1 एण्डूज के कार्बन डाइ-ऑक्साइड के प्रयोगों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए? इसके द्वारा प्राप्त किए गए परिणामों की व्याख्या कीजिए?
Q. 2 एण्डूज के प्रयोग को चित्र की सहायता से समझाइए ? तथा इसकी उपकरण, कार्य विधि एवं परिणाम को परिभाषित कीजिए ?

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