एण्डूज के कार्बन डाइ-ऑक्साइड के प्रयोगों के लिए वक्र की व्याख्या

समतापी वक्र क्या है

यदि जब एण्डूज ने CO2 के लिए प्रत्येक स्थिर ताप पर दाब और आयतन के बीच ग्राफ खींचे। तो जैसे कि इन ग्राफों को चित्र में दर्शाया गया है। तो इन्हें ‘समतापी वक्र’ (Isothermal curves in Hindi)’ कहते हैं।

एण्डूज वक्र में परिणाम की विवेचना

एण्डूज के प्रयोग के अनुसार, सबसे पहले हम 13.1°C के समतापी वक्र MNOP पर विचार करते हैं। तथा बिंदु M पर CO2 गैस असंतृप्त वाष्प की अवस्था में है। दाब के बढ़ाने पर गैस का आयतन (बाॅयल के नियम के अनुसार) घटता जाता है, इस व्यवहार को समतापी वक्र के भाग MN द्वारा दिखाया गया है। जब दाब बिंदु N के संगत पहुंचता है। तो गैस संतृप्त हो जाती है। तथा द्रवित होना शुरु कर देती है। तथा चित्र में समतापी वक्र का भाग NO गैस के द्रवण की अवस्था को प्रकट करता है। यदि जब पेचों को घुमाया जाता है। तो दाब स्थिर रहता है, परंतु आयतन घटता रहता है। तथा अन्त में आयतन में बहुत अधिक कमी हो जाती है। तथा बिंदु O पर समस्त CO2 गैस द्रवित हो जाती है। समतापी वक्र का भाग OP, CO2 की द्रव प्रावस्था को प्रदर्शित करता है। इस भाग में दाब के बढ़ने पर आयतन लगभग स्थिर रहता है। क्योंकि द्रव अधिकतर असंपीड्स होते हैं।

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एण्डूज वक्र या समतापी वक्र

अब यदि दूसरा 21.5°C का समतापी वक्र RSTU, 13.1°C वाले समतापी वक्र MNOP के ही समान होता है। लेकिन इसके क्षैतिज भाग ST की लंबाई कम है तथा ताप के बढ़ने पर क्षैतिज भाग का कम होना यह प्रकट करता है, कि ताप के बढ़ने पर संतृप्त वाष्प के आयतन तथा द्रव के आयतन में अंतर कम हो जाता है। इसके अतिरिक्त 21.5°C के वक्र में बिंदु S (जिस पर गैस द्रवित होना आरंभ करती हैं) 13.1°C के वक्र में बिंदु N से ऊंचा होता है। इसका अर्थ है कि ताप के बढ़ने पर गैस को द्रवित करने के लिए उच्च दाब की आवश्यकता होती है।
अब जैसे-जैसे ताप बढ़ता है, वैसे-वैसे क्षैतिज भाग घटता जाता है। तथा 31.1°C बाले जल में क्षैतिज भाग बिल्कुल समाप्त हो जाता है इसका अर्थ है, कि अब गैस को द्रवित नहीं किया जा सकता है। इस समतापी वक्र से यह भी पता चलता है कि दाब के बढ़ने पर आयतन तेजी से घटना शुरू हो जाता है। अतः यह स्थिति चक्र में बिंदु X से पहले सतत मोड़ द्वारा प्रदर्शित की जाती है। इसी समतापी वक्र पर क्षैतिज भाग समाप्त होकर एक बिंदु X मिलता है। जिस पर खींची गई स्पर्श रेखा क्षैतिज तल में होती है। इस बिंदु के दोनों और वक्र का झुकाव परस्पर विपरीत होता है। अतः यह बिंदु “गति परिवर्तन बिंदु” कहलाते हैं। अतः बिंदु X को “क्रांतिक बिन्दु” कहते हैं। तथा इस बिंदु पर संगत ताप, दाब व आयतन को क्रमशः क्रांतिक ताप, क्रांतिक दाब व क्रांतिक आयतन कहते हैं। अतः स्पष्ट है कि क्रांतिक ताप के ऊपर CO2 को द्रवित नहीं किया जा सकता । चाहे उस पर कितना ही अधिक दाब क्यों ना लगाया जाए। सभी समतापी वक्रों के क्षैतिज भागों के सिरों को मिलाने पर एक परवलय प्राप्त होता है। जैसा की चित्र में दिखाया गया है तथा परवलय का शीर्ष क्रांतिक बिंदु X को स्पर्श करता है। इस परवलय के दायीं और CO2 गैस असंतृप्त वाष्प प्रावस्था मैं होती है। अतः परवलय के अंदर वाष्प तथा द्रव दोनों प्रावस्थाओं में होती है। परवलय के बायीं और केवल द्रव प्रावस्था में होती हैं।
यदि ताप 31.1°C तथा 35.5°C पर समतापी वक्रों का व्यवहार समान होता है। परंतु अधिक संपीड्यता का का भाग घट जाता है। अर्थात् ताप 48.1°C पर समतापी वक्र निष्कोण होता है। तथा CO2 गैस स्थायी गैसों की भांति बाॅयल के नियम का पालन करती है।

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समतापी वक्र के परिणाम की व्याख्या

इन समतापी वक्रों से पदार्थ की द्रव तथा गैस की अवस्थाओं के बीच सांतत्य होने का भी ज्ञान प्राप्त होता है। जैसा की चित्र में 31.1°C से ऊपर CO2 केवल गैस के रूप में है जबकि इस ताप से नीचे यह द्रव तथा वाष्प दोनों (या मिश्रण) के रूप में हो सकती है। वाष्प को आसानी से द्रव में बदला जा सकता है। जबकि गैस को नहीं।
चूंकि गैसीय प्रावस्था में प्रत्येक पदार्थ अपने क्रांतिक ताप के ऊपर गैस तथा क्रांतिक ताप से नीचे वाष्प कहलाता है। इस प्रकार 31.1°C से ऊपर CO2 गैस है। जबकि 31.1°C से नीचे वाष्प है, अर्थात चित्र में 21.5°C के समतापी वक्र RSTU के बिंदु V पर CO2 वाष्प प्रावस्था में है। तब बिंदु L पर द्रव प्रावस्था में है। यदि बिंदु V से L तक समतापी वक्र RSTU के अनुदिश चला जाए, तो बिंदु S पर CO2 द्रवित होने लगती है।
जिससे पदार्थ की प्रावस्था में सांतत्व नहीं रहता। बिंदु S पर वक्र असतत हो जाता है। तथा CO2 को बिना किसी असांतत्व के वाष्प से द्रव प्रावस्था में परिवर्तित किया जा सकता है। अतः परवलय के बाहर रहते हुए भी वाष्प प्रावस्था को द्रव प्रावस्था में बदला जा सकता है। इस प्रकार के प्रावस्था परिवर्तन में किसी भी क्षण दोनों प्रावस्थाएं (द्रव तथा गैस) एक साथ नहीं मिलती है। और इस प्रकार का प्रावस्था परिवर्तन द्रव तथा गैस प्रावस्थाओं के बीच सांतत्य बनाए रखता है।

निष्कर्ष (conclusion in Hindi)

एण्डूज के प्रयोग से प्राप्त परिणामों को संक्षेप में निम्न प्रकार व्यक्त किया जा सकता है।

  • प्रत्येक गैस के लिए एक क्रांतिक ताप होता है। क्रांतिक ताप पर केवल दाब बढ़ाकर गैस को द्रवित किया जा सकता है। क्रांतिक ताप से ऊपर ताप पर गैस को द्रवित नहीं किया जा सकता। चाहे उस पर कितना भी अधिक दाब क्यों ना लगाया जाए।
  • क्रांतिक ताप पर द्रव तथा इसकी संतृप्त वाष्प के घनत्व में अंतर समाप्त हो जाता है। इस ताप से ऊपर दोनों प्रावस्था में भेद करना संभव नहीं होता।
  • क्रांतिक ताप के निकट गैस की संपीड्यता बहुत अधिक होती है। और क्रांतिक ताप पर यह अनंत हो जाती है।
  • क्रांतिक ताप से ऊपर गैस का व्यवहार चिरस्थायी कहलाने वाली गैसों के समान हो जाता है।
  • पदार्थ की द्रव तथा गैस प्रावस्थाओं में सांतत्य होता है, अर्थात् पदार्थ की द्रव तथा गैस प्रावस्थाओं एक ही सतत भौतिक परिवर्तन की दो दूर की प्रावस्थाएं हैं।

Note – सम्बन्धित प्रश्न –
Q. 1 CO2 के लिए एण्डूज के वक्र विभिन्न तापक्रमों पर खींचकर व्याख्या कीजिए ?
Q. 2 एण्डूज के कार्बन डाइ-ऑक्साइड के प्रयोगों का एण्डूज वक्र या समतापी वक्र की सहायता से परिणामों की विवेचना कीजिए ?

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