कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर: जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

स्वातन्त्रता संग्राम की ज्योति और पत्रकारिता की साधना में जिन साहित्यकारों और गद्य-शैलीकारों का अभ्युदय हुआ है, उनमें कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी का स्थान विशिष्ट है। हिन्दी जगत में लघुकथा, संस्मरण, रेखाचित्र और रिपोर्ता की अनेक विधाओं का इन्होंने प्रवर्तन और पोषण किया है। ये एक आदर्शवादी पत्रकार रहे हैं। अतः इन्होंने पत्रकारिता को भौतिक स्वार्थी की सिद्धि का साधन न बनाकर उच्च मानवीय मूल्यों की खोज और स्थापना में ही लगाया है।

तो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर का जीवन परिचय” (Kanhaiyalal Mishra Prabhakar biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर किस युग के लेखक हैं? को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने प्रभाकर जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर का जीवन परिचय

प्रभाकर जी का जन्म सन् 1906 ईस्वी में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित देवबन्द नामक ग्राम के एक सामान्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता पंo रमादत्त मिश्र की आजीविका पूजा-पाठ और पुरोहिताई थी, पर विचारों की महानता और व्यक्तित्त्व की दृढ़ता में ये श्रेष्ठ थे। उनका जीवन अत्यन्त सरल और सात्विक था, पर प्रभाकर जी की माता का स्वभाव बड़ा कर्कश और उग्र था। अपने एक संस्मरण ‘मेरे पिताजी’ में लेखक ने दोनों का परिचय देते हुए लिखा है कि ‘वे दूध मिश्री तो माँ लाल मिर्ची’।

प्रभाकर जी की शिक्षा प्रायः नगण्य ही हुई। एक पत्र में इन्होंने लिखा है- “हिन्दी शिक्षा (सच माने) पहली पुस्तक के दूसरे पाठ ख ट म ल-खटमल, ट म ट म-टमटम। फिर साधारण संस्कृत। बस हरि ओम। यानी बाप पढ़े न हम ।” उस किशोर अवस्था में जबकि व्यक्तित्व के गठन के लिए विद्यालयों की शरण आवश्यक होती है, प्रभाकर जी ने राष्ट्रीय संग्राम में भाग लेना ही अधिक पसन्द किया। जब खुर्जा के संस्कृत विद्यालय में पढ़ रहे थे, तब इन्होंने प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेता मौलाना आसिफ अली का भाषण सुना, जिसका इन पर इतना असर हुआ कि ये परीक्षा छोड़कर चले आये उसके बाद इन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र सेवा में लगा दिया। ये सन् 1930-32 ई० तक और सन् 1942 ई० में जेल में रहे और निरंतर राष्ट्र के उच्च नेताओं के सम्पर्क में आते रहे। इनके लेख इनके राष्ट्रीय जीवन के मार्मिक संस्मरणों की जीवन्त झाँकियाँ हैं, जिनमें भारतीय स्वाधीनता के इतिहास के महत्त्वपूर्ण पृष्ठ भी है। स्वतन्त्रता के बाद इन्होंने अपना पूरा जीवन पत्रकारिता में लगा दिया। 9 मई, सन् 1995 ईस्वी को इस महान् साहित्यकार का निधन हो गया।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर की प्रमुख रचनाएं

प्रभाकर जी की प्रसिद्ध प्रकाशित रचनाएं एवं कृतियां निम्नलिखित हैं— 1. आकाश के तारे, 2. धरती के फूल, 3. जिन्दगी मुस्करायी, 4. भूले बिसरे चेहरे, 5. दीप जले शंख बजे, 6. महके आँगन चहके द्वार, 7. मादी हो गयी सोना, 18. बाजे पायलिया के घुंघरू 9. क्षण बोले कपण मुस्काये। इनके सम्पादन में दो पत्र सहारनपुर से प्रकाशित हुए। ये नया जीवन और विकास। इन पत्रों से तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षिक समस्याओं पर इसके निर्भीक आशावादी। विचारों का परिचय प्राप्त होता है।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर का साहित्यिक परिचय

प्रभाकर जी का गद्य-साहित्य इनके साहित्यिक जीवन से ढलकर आया है। इनकी रचनाओं में कालगत आत्मपरकता, चित्रात्मकता और संस्मरणात्मकता की प्रमुखता दिखायी देती है। पत्रकारिता के क्षेत्र में इन्हें अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई है। स्वतन्त्रता आन्दोलन के दिनों में अनेक सेनानियों का संस्मरण इन्होंने लिखा है। इन्होंने लेखन के अतिरिक्त वैयक्तिक स्नेह और सम्पर्क से भी हिन्दी के अनेक नये लेखकों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया था। इनके व्यक्तित्त्व की दृढ़ता, विचारों की सत्यता, अन्याय के प्रति आक्रोश, सहृदयता, उदारता और मानवीय करुणा की झलक इनकी रचनाओं में मिलती है। अपने विचारों में से उदार, राष्ट्रवादी और मानवतावादी हैं। इसलिए देश-प्रेम और मानवीय निष्ठा के अनेक रूप इनके लेखों में मिलते हैं।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी ने हिन्दी गद्य को नये मुहावरे, नयी लोकोक्तियाँ और नयी सूक्तियाँ दी हैं। कविता इन्होंने नहीं लिखी पर कवि की भावुकता और करुणा इनके गद्य में छलकती है। यथार्थ जीवन की दर्दभरी अनुभूतियों से इनके गद्य में भी कविता का सौन्दर्य भर उठा है। इसीलिए इनके शब्द निर्माण में जगह-जगह चमत्कार है, वार्तालाप में विदग्धता है और परिस्थिति चित्रण में नाटकीयता है। इनके वाक्यविन्यास में भी विविधता रहती है। पात्र और परिस्थिति के साथ इन्होंने वाक्य-रचना बदली है। विनोद की परिस्थिति में छोटे वाक्य, चिन्तन की मनःस्थिति में लम्बे वाक्य और भावुकता के क्षणों में व्याकरण के कठोर बन्धन से मुक्त कवित्वपूर्ण वाक्य-रचना भी की है।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी की भाषा शैली

प्रभाकर जी की भाषा सामान्यतया तत्सम शब्द प्रधान, शुद्ध और साहित्यिक खड़ीबोली है। इन्होंने उर्दू, अंग्रेजी आदि भाषाओं के साथ देशज शब्दों एवं मुहावरों का भी प्रयोग किया है। सरलता, मार्मिकता, चुटीलापन, व्यंग्य और भावों को व्यक्त करने की क्षमता इनकी भाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं। वर्णनात्मक, भावात्मक, नाटक-शैली के रूप इनकी रचनाओं में देखने को मिलते हैं।

प्रभाकर जी की शैली में भी हमें विविधता के दर्शन होते हैं। इनकी गद्य-शैली में भावों एवं विचारों के साथ-साथ विषय का सुन्दर विवेचन किया गया है। इनके निबन्धों में शैली के विविध रूप देखने के मिलते हैं-

भावात्मक शैली— ये इनकी प्रधान शैली है, अधिकांश रचनाएँ इसी शैली में ही लिखी गयी हैं। इस शैली में भाषा सुललित एवं वाक्य छोटे-छोटे हैं। इस गद्य शैली की भाषा सरल है।

वर्णनात्मक शैली— इनके वर्णन सजीव और आकर्षक होते हैं। वर्णनात्मक प्रसंग में भाषा सरल तथा मिश्रित होती है किन्तु विदग्ध वाक्य-विन्यास उसमें आकर्षण पैदा कर देता है।

विचारात्मक शैली— प्रभाकर जी के निबन्धों में कोरी भावुकता नहीं है, विचारात्मकता भी है। गम्भीर से गम्भीर विषय को ये अपने अनुभव के आधार पर आसानी से अभिव्यक्त कर देते हैं।

आलंकारिक शैली— काव्य को आलंकारिक भाषा के द्वारा प्रस्तुत करना इनकी शैली की मुख्य विशेषता है।

नाटकीय शैली— इनकी अनेक रचनाओं में नाटकीय शैली के दर्शन होते हैं।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर जी का साहित्य में स्थान

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ जी हिन्दी साहित्य की निबन्ध विधा के स्तम्भ हैं। अपनी अद्वितीय भाषा-शैली के कारण इन्हें गद्यकारों में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। हिन्दी साहित्य इस महान् कृतित्व के लिए प्रभाकर जी का हमेशा ऋणी रहेगा।

कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर का निबंध

प्रस्तुत लेख ‘राबर्ट नर्सिंग होम में’ में प्रभाकर जी ने इन्दौर के राबर्ट नर्सिंग होम की एक साधारण घटना को इस प्रकार मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है कि वह हमें सच्चे धर्म अर्थात् मानव सेवा और समता का पाठ पढ़ानेवाली बन गयी है। यहाँ इन्होंने तीन सेवारत ईसाई महिलाओं को देखा – मदर मार्गरेट, मदर टेरेजा और सिस्टर क्रिस्ट हेल्ड मदर मार्गरेट अत्यन्त बूढ़ी थीं, मदर टेरेजा अधेड़ आयु की और सिस्टर क्रिस्ट हेल्ड पूर्ण युवती मदर टेरेजा फ्रांस की थी और सिस्टर क्रिस्ट ड जर्मनी की दोनों ही देश दो विश्व युद्धों में विरोधी देश रहे हैं। पर मदर टेरेजा और सिस्टर क्रिस्ट हेल्ड इस संकीर्ण राष्ट्रीयता से मुक्त थीं। उन्हें एक ही ईसाई धर्म से उदार मानवता और निःस्वार्थ मानव सेवा का पाठ प्राप्त हुआ था। इस प्रकार लेखक ने अपने उदार मानवीय दृष्टिकोण को भी इस लेख में प्रकट किया है।

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