कबीरदास: जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली | Kabir Das Biography in Hindi

भक्तिकालीन धारा की निर्गुण काव्यधारा के ज्ञानमार्गी शाखा के कवि संत कबीरदास जी थे। ये 15वीं सदी के एक प्रसिद्ध भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको कबीर दास जी के बारे में संपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं।
तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “कबीरदास का जीवन परिचय” (Kabir Das biography in Hindi) के बारे में जानकारी दी है। इसमें हमने कबीर दास का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली, साहित्य में स्थान और कबीर दास का जन्म कब और कहां हुआ, को विस्तार से सरल भाषा में समझाया है।

इसके अलावा, इसमें हमने संत कबीरदास जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं, जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप कबीर दास जी से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सके।

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कबीरदास का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने संत कबीर दास जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
कबीरदास की जीवनी –

पूरा नामसंत कबीरदास
अन्य नामकबीर, कबीर परमेश्वर, कबीरा
जन्मसन् 1398 ई. (संवत् 1455 वि०)
जन्म स्थानकाशी, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)
मृत्युसन् 1518 ई. (संवत् 1575 वि०)
मृत्यु स्थानमगहर, उत्तर प्रदेश
माता-पिता (पालने वाले) का नाममाता – नीमा और पिता – नीरू
पत्नी का नाम लोई
संतानकमाल (पुत्र) और कमाली (पुत्री)
शिक्षानिरक्षर
व्यवसायकवि, संत (ज्ञानश्री निर्गुण), समाज सुधारक
गुरुस्वामी रामानन्द
साहित्यकालभक्तिकाल
भाषासधुक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी, अवधि
प्रमुख रचनाएंसाखी, सबद एवं रमैनी

संत कबीरदास जी हिंदी भक्तिकालीन धारा के एक प्रमुख रहस्यवादी कवि, संत और दार्शनिक थे। वह 15वीं शताब्दी के दौरान माने जाते थे। और उन्हें भक्तिकाल आंदोलन में सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक माना जाता है जिनमें आध्यात्मिकता के लिए व्यक्तिगत और भक्तिपूर्ण दृष्टिकोण पर जोर दिया था।

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कबीरदास का जीवन परिचय

कबीरदास
कबीरदास का जीवन परिचय

भक्तिकालीन धारा की निर्गुणाश्रयी शाखा के अंतर्गत ज्ञानमार्ग का प्रतिपादन करने वाले महान् संत कबीर दास जी की जन्मतिथि के संबंध में कोई निश्चित मत प्रकट नहीं किया जा सकता है। प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध न होने के कारण इनके जन्म के संबंध में अनेक जनश्रुतियां एवं किंवदन्तियां प्रचलित हैं। “कबीर पन्थ” में कबीर का आविर्भाव काल सं० 1455 वि० (सन् 1398 ई.) में ज्येष्ठ शुक्ल पथ पूर्णिमा को सोमवार के दिन माना जाता है। कबीरदास जी के जन्म के संबंध में निम्न काव्य पंक्तियां प्रसिद्ध हैं –

चौदह सौ पचपन साल गये, चन्द्रवार एक ठाट ठये।
जेठ सुदी बरसायत को, पूरनमासी प्रगट भये।।

‘भक्त परम्परा’ में प्रसिद्ध है कि किसी विधवा ब्राह्मणी को स्वामी रामानन्द के आशीर्वाद से पुत्र उत्पन्न होने पर उसने समाज के भय से काशी के समीपस्थ लहरतारा, लहर तालाब के किनारे फेंक दिया था, जहां से नीमा और नीरू नाम के जुलाहा दम्पति ने उसे ले जाकर पाला पोशा और उसका नाम कबीर रखा। इस प्रकार कबीर दास जी पर बचपन से ही हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के संस्कार पड़े।

कबीरदास जी के जन्मस्थान के संबंध में तीन प्रकार के मत प्रचलित हैं – काशी, मगहर और आजमगढ़ जिले में बेलहरा गांव। लेकिन सर्वाधिक स्वीकार मत काशी का ही होता है। ‘भक्त-परम्परा’ एवं ‘कबीर पन्थ’ के अनुसार स्वामी रामानंद जी इनके गुरु थे। जिसकी पुष्टि स्वयं कबीर दास जी की यह पंक्तियां भी करती हैं – “काशी में परगट भये, हैं रामानंद चेताये।”

इस कथन से इनके जन्म स्थान काशी का भी पता चलता है और इनके गुरु का नाम भी पता चलता है कि प्रसिद्ध वैष्णव संत आचार्य रामानंद जी से इन्होंने दीक्षा ग्रहण की। और गुरुमंत्र के रूप में इन्हें ‘राम’ नाम मिला जो इनके जीवन की भावी साधना का आधार बना।

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कबीरदास का वैवाहिक जीवन

कबीर दास जी का विवाह ‘लोई’ नाम की एक स्त्री से हुआ था जिससे इनके दो बच्चे भी हुए थे जिनके नाम हैं – कमाल (पुत्र) और कमाली (पुत्री) ।
कबीर दास जी का जीवन बहुत ज्यादा अभावों में गुजरा था। उनके माता पिता की अच्छी आमदनी नहीं होती थी उसी में ही इनको गुजारा करना पड़ता था। शादी के कुछ दिनों बाद जब उनकी पत्नी लोई अपने मायके जाती थी, तो कबीर जी भी उनके साथ-साथ चले जाते थे, लेकिन उनकी पत्नी को यह बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता था। एक दिन उनकी पत्नी ने कबीर जी से कहा दिया था कि जब भी वह मायके जाए तो वह उनके पीछे-पीछे न जाया करें।

उसी दिन से कबीर जी को यह एहसास हुआ कि उनका इस दुनिया में कोई नहीं है। और फिर कबीर जी ने प्राण ले लिया कि अब वे जो भी काम करेंगे, अपने समाज के लिए ही करेंगे और उनके इसी फैसले ने उन्हें कबीर से “संत कबीरदास” बना दिया था।

कबीरदास की शिक्षा-दीक्षा

कबीर जी को शिक्षा-प्राप्ति का अवसर नहीं प्राप्त हुआ था। उनकी काव्य प्रतिभा उनके गुरु स्वामी रामानन्द जी की कृपा से ही जागृत हुई। अतः यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि इन्होंने स्वयं अपनी रचनाओं को लिपिबद्ध नहीं किया। अपने मन की अनुभूतियों को इन्होंने स्वाभाविक रूप से अपनी साखी में व्यक्त किया है। अनपढ़ होते हुए भी कबीर जी ने जो काव्य-संग्रम को प्रस्तुति दी है वह अत्यन्त विस्मयकारी है।

ये भावना की प्रबल अनुभूति से युक्त, उत्कृष्ट रहस्यवादी, समाज सुधारक, पाखण्ड के आलोचक तथा मानवता की भावना से ओतप्रोत भक्तिकाल के कवि थे। अपनी रचनाओं में इन्होंने मंदिर, तीर्थांकर, माला, नमाज, पूजा-पाठ आदि धर्म के बाहरी आचार व्यवहार तथा कर्मकांडों की कठोर शब्दों में निन्दा की और सत्य, प्रेम, सात्विकता, पवित्रता, सत्संग, इन्द्रिय निग्रह, सदाचार, गुरु महिमा, ईश्वर भक्ति आदि पर विशेष बल दिया था।

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संत कबीरदास जी की मृत्यु

कबीर दास अपने जीवन के अन्तिम दिनों में मगहर चले गए थे। क्योंकि उस समय यह प्रथा चलती थी कि काशी में मरने पर व्यक्ति को स्वर्ग की प्राप्ति होती है तथा मगहर में मरने से व्यक्ति को नरक मिलता है। समाज में प्रचलित इस अन्धविश्वास को दूर करने के लिए कबीर जी अन्तिम समय में मगर चले गए थे।

कबीर दास जी की मृत्यु के संबंध में भी अनेक मत हैं। ‘कबीर पन्थ’ में कबीर जी का मृत्युकाल सं० 1575 वि० माघ शुक्ल पक्ष एकादशी, बुधवार (सन् 1518 ई.) को माना गया है जोकि तर्कसंगत प्रतीत होता है। ‘कबीर परचाई’ के अनुसार बीस वर्ष में कबीर चेतन हुए और सौ वर्ष तक भक्ति करने के बाद मुक्ति पाई अर्थात् इन्होंने 120 वर्ष की आयु पाई थी। इनकी मृत्यु के संबंध में निम्नलिखित पंक्तियां प्रसिद्ध हैं –

संवत् पन्द्रह सौ पछत्तरा, कियो मगहर को गौन।
माघे सुदी एकादशी, रलौ पौन में पौन।।

इनके शव का संस्कार किस विधि से हो इस बात को लेकर हिंदू-मुसलमानों में विवाद भी हुआ। हिंदू इनका दाह संस्कार करना चाहते थे और मुसलमान दफनना। फिर एक किंवदंती के अनुसार जब इनके शव पर से कफ़न उठाया गया तो शव के स्थान पर पुष्प राशि ही दिखाई दी, जिसे दोनों धर्मों के लोगों ने आधा-आधा बांट लिया और दोनों संप्रदायों में उत्पन्न विवाद समाप्त हो गया।

कबीरदास का साहित्यिक परिचय

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे फिर भी वे बहुश्रुत होने के साथ-साथ उच्च कोटि के प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे। इस संबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने लिखा है कि – “कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था, कविता तो उन्हें भेंट में मिली हुई वस्तु थी उनका लक्ष्य लोकहित था।”
इस दृष्टि से उनके काव्य में दो रूप दिखाई पढ़ते हैं –
(1). सुधारक रूप तथा (2). साधक रूप ।
उनके दूसरे रूप में ही उनके सच्चे कवित्व के दर्शन थे।

कबीरदास का सामाजिक योगदान

कबीर अपने युग के सबसे महान् समाज सुधारक, प्रतिभा-संपन्न एवं प्रभावशाली व्यक्ति थे। ये अनेक प्रकार के विरोधी संस्कारों में पले थे। और किसी भी बाह्य आडम्बर, कर्मकांड और पूजा पाठ की अपेक्षा पवित्र नैतिक और सादे जीवन को अधिक महत्व देते थे। सत्य, अहिंसा, दया तथा संयम युक्त धर्म के सामान्य स्वरूप में ही ये विश्वास करते थे जो भी संप्रदाय इन मूल्यों के विरुद्ध कहता था। उसका ये निर्ममता से खंडन करते थे इसी से इन्होंने अपनी रचनाओं में हिंदू और मुसलमान दोनों के रूढ़िगत विश्वासों एवं धार्मिक कुरीतियों का विरोध किया है।

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कबीरदास की रचनाएं एवं कृतियां

कबीर ने कभी अपनी रचनाओं को एक कवि की भांति लिखने-लिखाने का प्रयत्न नहीं किया था। गाने वाले के मुख में पढ़कर उनका रूप भी एक सा नहीं रह गया। कबीर ने स्वयं कहा है – “मसि कागद छुऔ नहीं, कलम गह्नों नहिं हाथ।”

इससे स्पष्ट है कि इन्होंने भक्ति के आवेश में जिन पदों एवं साखियों को गाया, उन्हें इनके शिष्यों में संग्रहित कर लिया। उसी संग्रह का नाम “बीजक” है। यह संग्रह तीन भागों में विभाजित है – साखी, सबद और रमैनी ।

अधिकांश ‘साखियाॅं’ दोहों में लिखी गई है पर उनमें सोरठे का प्रयोग भी मिलता है। ‘सबद’ गेय पद है और इनमें संगीतात्मक का भाव विद्यमान है। चौपाई एवं दोहा छंद में रचित ‘रमैनी’ में कबीर के रहस्यवादी और दार्शनिक विचारों को प्रकट किया गया है।

कबीरदास जी की भाषा शैली

कबीर की भाषा में अवधि, राजस्थानी, पंजाबी आदि अनेक प्रान्तीय भाषाओं के शब्दों की खिचड़ी मिलती है। सहज भावाभिव्यक्ति के लिए ऐसी ही लोकभाषा की आवश्यकता भी थी, इसीलिए इन्होंने साहित्य की अलंकृत भाषा को छोड़कर लोकभाषा को अपनाया। इनकी साखियों की भाषा अत्यंत सरल और प्रसाद गुण संपन्न है।

कबीर दास जी की शैली में उपदेशात्मकता के दर्शन होते हैं कुछ अद्भुत अनुभूतियों को कबीर ने विरोधाभास के माध्यम से उलटवासियों की चमत्कारपूर्ण शैली में व्यक्त किया है जिससे कहीं-कहीं दुर्बोधता आ गई है।

कबीरदास जी का हिंदी साहित्य में स्थान

संत कबीर एक उच्चकोटि के संत तो थे ही, साथ ही हिंदी साहित्य में एक श्रेष्ठ एवं प्रतिभावान कवि के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं। ये केवल राम जपने वाले जड़ साधक नहीं थे। सत्संगति से इन्हें जो बीच मिला उसे इन्होंने अपने पुरुषार्थ से वृक्ष का रूप दिया। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने कहा था – “हिंदी साहित्य के हजार वर्षों में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेखक उत्पन्न नहीं हुआ। महिमा में यह व्यक्तित्व केवल एक ही प्रतिद्वन्दी तक जानता है-तुलसीदास।”

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FAQs. संत कबीरदास जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. कबीर दास कौन थे?

कबीरदास जी 15वीं सदी के एक प्रसिद्ध भारतीय रहस्यवादी कवि और संत थे।

2. कबीर दास का जन्म कब और कहां हुआ था?

कबीरदास का जन्म संवत् 1455 वि० (सन् 1398 ई.) में काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश में हुआ था।

3. कबीर दास के माता पिता का क्या नाम था?

कबीरदास की माता का नाम नीमा और पिता का नाम नीरू था।

4. कबीर दास की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

कबीरदास की मृत्यु संवत् 1575 वि० (सन् 1518 ई.) को मगहर, उत्तर प्रदेश में हुई थी।

5. कबीर दास की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी हैं?

कबीरदास की प्रमुख रचनाएं – साखी, सबद और रमैनी हैं।

6. कबीर दास किस काल के कवि थे?

कबीरदास भक्तिकाल के कवि थे।

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