कृष्णिका विकिरण में ऊर्जा का स्पेक्ट्रमी वितरण क्या है | Spectral Distribution of Blackbody Radiation in Hindi

कृष्णिका स्पेक्ट्रम में ऊर्जा का वितरण

आदर्श कृष्णिका पूर्ण विकिरक होती है अर्थात् यह सभी सम्भव तरंगदैर्ध्यों के विकिरणों को उत्सर्जित करती है। सन् 1899 में ल्यूमर एवं प्रिंग्जहाइन ने विभिन्न तापों पर कृषिका से उत्सर्जित विकिरण ऊर्जा के स्पेक्ट्रमी वितरण अर्थात् विभिन्न तरंगदैर्ध्यों के अनुसार, ऊर्जा के वितरण का प्रयोगात्मक अध्ययन किया। उनके प्रायोगिक प्रबन्ध को चित्र-1 में दिखाया गया है।

कृष्णिका स्पेक्ट्रम में ऊर्जा वितरण
कृष्णिका स्पेक्ट्रम में ऊर्जा वितरण
चित्र-1

इसमें आदर्श कृष्णिका O से उत्सर्जित विकिरण को एक अवतल दर्पण M1 द्वारा एक स्लिट S पर फोकस किया जाता है। स्टील S एक अन्य अवतल दर्पण M2 के फोकस तल में होती है जिससे कि M2 पर आपतित विकिरण समान्तर किरण पुंज के रूप में परावर्तित होता है। इसे फ्लोस्पर के बने प्रिज्म P पर डाला जाता है।
यदि प्रिज्म P से अपवर्तित विकिरण अवतल दर्पण M3 पर पड़ती है, जो इसे अपने फोकस तल में रखें एक वोलोमीटर पर फोकस कर देता हैं। यदि अवतल दर्पण M3 को ऊर्ध्वाधर अक्ष के परितः घुमाया जाए, तो विभिन्न तरंगदैर्ध्यों के विकिरणों को एक के बाद एक वोलोमीटर फोकस किया जा सकता है और प्रत्येक बार वोलोमीटर के परिपथ में जुड़े धारामापी का विक्षेप ज्ञात किया जा सकता है। इन विक्षेपों से विभिन्न तरंगदैर्ध्यों के विकिरणों की तीव्रताओं का ज्ञान हो जाता है, क्योंकि ये विक्षेप आपतित विकिरणों की तीव्रताओं के समानुपाती होते हैं। विकिरणों की तरंगदैर्ध्यों को प्रिज्म P के पदार्थ के विक्षेपण के सूत्र से ज्ञात कर सकते हैं। अब तरंगदैर्ध्यों के विभिन्न मानों λ और संगत तीव्रताओं Eλ के बीच एक ग्राफ खींच लेते हैं जिसे “स्पेक्ट्रमी वितरण वक्र” कहते हैं।
अब कृष्णिका को भिन्न-भिन्न उच्च तापों तक गर्म करके उपर्युक्त की भांति प्रयोग को दोहराया जाता है। और विभिन्न तापों पर एक ग्राफ पेपर पर स्पेक्ट्रमी वितरण वक्र खींचे जाते हैं। अतः इन वक्रों को चित्र-2 में दिखाया गया है।

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कृष्णिका विकिरण स्पेक्ट्रम
कृष्णिका विकिरण स्पेक्ट्रम
चित्र-2

अर्थात् ल्यूमर एवं प्रिंग्जहाइन ने कृष्णिका के कई तापों के संगत वितरण वक्र खींचे। और उनके द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा तथा तरंगदैर्ध्य में खींचे वक्रों को चित्र में दर्शाया गया है। तथा “सभी तापों पर इनकी आकृति एक जैसी होती है।”

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कृष्णिका विकिरण स्पेक्ट्रम के अभिलक्षण

इन वक्रों के विश्लेषण से निम्न महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त होते हैं –

1.किसी दिए हुए ताप T पर तरंगदैर्ध्य λ के बढ़ने से Eλ का मान पहले बढ़ता है, फिर एक महत्तम मान प्राप्त करके घटता जाता है। इससे स्पष्ट है कि एक दिए गए ताप पर कृष्णिका द्वारा उत्सर्जित उर्जा एक विशेष तरंगदैर्ध्य (माना) λm के लिए सर्वाधिक होती है, अर्थात् भिन्न-भिन्न तापों पर λm का मान भिन्न-भिन्न होता है। अधिकांश उत्सर्जित ऊर्जा उस विशेष तरंगदैर्ध्य λm के आस-पास ही होती है।

2.ताप बढ़ने पर प्रत्येक λ के लिए Eλ का मान बढ़ जाता है। अर्थात् सभी तापों पर वितरण वक्रों की सामान्य आकृति एक जैसी होती हैं। तथा किसी दिए हुए ताप T पर प्रारम्भ में λ का मान बढ़ने पर Eλ का मान बढ़ता है और λ के एक विशेष मान के लिए Eλ का मान अधिकतम हो जाता है इसके पश्चात λ का मान बढ़ने पर Eλ का मान बढ़ने लगता है।

3.जैसे-जैसे कृष्णिका का ताप बढ़ता है, वितरण वक्र का शिखर छोटी तरंगदैर्ध्य की ओर विस्थापित होता जाता है। अर्थात् ताप बढ़ने पर Eλ का महत्तम मान कम तरंगदैर्ध्य पर प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में, ताप T बढ़ने पर तरंगदैर्ध्य λm का मान (जिस पर Eλ का महत्तम मान प्राप्त होता है) घटता है। सन् 1896 में वीन ने ताप T तथा तरंगदैर्ध्य λm के बीच निम्न संबंध स्थापित किया।
\footnotesize \boxed{ λ_m × T = b (नियतांक) }
यहां b एक नियतांक है, b का मान 2.9×10-3 मीटर-K होता है। इसे “वीन का विस्थापन नियम” कहते हैं।
इसके अनुसार, कम ताप पर बड़ी तरंगदैर्ध्य वाली विकिरण तरंगें उत्सर्जित होती हैं। ताप बढ़ने पर छोटी-छोटी तरंगें भी निकलती है। इसी कारण “लोहे को गर्म करने पर पहले वह हल्का लाल, फिर गहरा लाल, नीला और अन्त में श्वेत दिखाई पड़ता है।”

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4.वीन ने यह भी सिद्ध किया कि किसी ताप T पर उत्सर्जित किसी भी तरंगदैर्ध्य λ की अधिकतम ऊर्जा (Eλ)m का मान उस ताप की पांचवी घात T5 के अनुक्रमानुपाती होता है, अर्थात्
\footnotesize \boxed{ (E_λ)_m ∝ T^5 }
इसका अर्थ है कि पिण्ड का ताप बढ़ाने पर किसी तरंगदैर्ध्य λ के संगत उत्सर्जित अधिकतम उर्जा बहुत तेजी से बढ़ती है।

5.कृष्णिका विकिरण का ताप T बढ़ने पर वितरण वक्र द्वारा घेरा हुआ क्षेत्रफल भी बढ़ता है। वास्तव में किसी वक्र द्वारा घिरा हुआ क्षेत्रफल उस ताप पर कृष्णिका द्वारा उत्सर्जित कुल विकिरण ऊर्जा E सभी तरंगदैर्ध्यों के संगत कुल ऊर्जा को प्रदर्शित करता है। यदि तरंगदैर्ध्य λ व दिए गए ताप पर कृष्णिका की उत्सर्जन क्षमता Eλ हो, तो λ व λ + dλ तरंगदैर्ध्यों के मध्य कृष्णिका के एकांक क्षेत्रफल से प्रति सेकण्ड उत्सर्जित उर्जा की मात्रा Eλdλ होती है। अतः कृष्णिका के एकांक क्षेत्रफल से नियत ताप पर प्रति सेकण्ड उत्सर्जित ऊर्जा की कुल मात्रा
E = \int^∞_0 Eλ dλ
यह उस ताप के वक्र और λ अक्ष के बीच घिरे क्षेत्रफल द्वारा प्रकट होती है। यह क्षेत्रफल वक्र के परम ताप के चतुर्थ घात के अनुक्रमानुपाती पाया जाता है। अर्थात्
\footnotesize \boxed{ E ∝ T^4 }
इस प्रकार, “इससे स्टीफन के नियम की भी पुष्टि होती है।”

Note – कृष्णिका विकिरण से सन्बन्धित प्रशन परिक्षाओं में पूछें जाते हैं।
Q. 1 वर्णन कीजिए कि कृष्णिका विकिरण के स्पेक्ट्रम में ऊर्जा वितरण का किस प्रकार प्रायोगिक रूप से अध्ययन किया जाता है। तथा इसकी व्याख्या किस प्रकार से की जाती है ?
Q. 2 आदर्श कृष्णिका विकिरण के स्पेक्ट्रमी वितरण के प्रायोगिक अध्ययन का वर्णन कीजिए और प्राप्त निष्कर्ष समझाइए तथा परिणाम की विवेचना कीजिए ?
Q. 3 कृष्णिका विकिरण के स्पेक्ट्रमी वितरण वक्र से आप क्या समझते हैं ? ये वक्र कृष्णिका विकिरण के लक्षणों के बारे में क्या सूचनाएं देते हैं ?

  1. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  2. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
  3. मौलिक परिपथ एवं आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स नोट्स (Circuit Fundamental and Basic Electronics)
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