गजानन माधव मुक्तिबोध – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन परिचय” (Gajanan Madhav Muktibodh biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और मुक्तिबोध की काव्यगत विशेषताएँ को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने मुक्तिबोध जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन परिचय

गजानन माधव मुक्तिबोधजी का जन्म 13 नवम्बर, सन् 1917 ईस्वी को श्योपुर, जिला मुरैना (मध्य प्रदेश) में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री माधवराव एवं माता का नाम श्रीमती पार्वतीबाई था। मुक्तिबोध जी ने इन्दौर के होल्कर कॉलेज से बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा उज्जैन के मॉडर्न स्कूल में अध्यापक हो गये। सन् 1954 ई० में इन्होंने एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण करके राजनाँद गाँव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुए। कामवाली की पुत्री शान्ताबाई से इन्होंने विवाह किया। ‘हंस’ नामक पत्रिका का सम्पादन भी किया। मुक्तिबोध जी का जीवन अभाव-संघर्ष एवं आर्थिक विपन्नता में बीता तथा 11 सितम्बर, सन् 1964 ईस्वी को इनका असामयिक देहावसान हो गया।

गजानन माधव मुक्तिबोध का साहित्यिक परिचय

चालाक बुद्धिजीवियों की स्वार्थपरता पर गहरी चोट करने वाले मुक्तिबोध जी प्रायः अस्पष्ट हो गये हैं। सुविधाप्रिय जीवन-पद्धति पर तीखा प्रहार करते हुए मुक्तिबोध जी ने अपनी सामाजिक भावना को प्रकट किया है। छायावादी लिजलिजेपन और प्रगतिवादी थोथें-नारों और हुल्लड़बाजी के प्रति असहमति प्रकट करते हुए मुक्तिबोध जी ने शोषण और भेड़चाल का बड़ा सशक्त विरोध अपनी रचनाओं के माध्यम से किया है।

फैंटेसी गजानन माधव मुक्तिबोध जी को अति प्रिय है तथा यही इनका समर्थ शिल्प पैटर्न है। कवि की फैण्टेसी भीतरी बाहरी द्वन्द्वों एवं आघातों का परिणाम है, सामाजिक जीवन ज्ञान अति सूक्ष्म रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रतीक एवं बिम्बों का प्रयोग भी कवि ने किया है। मुक्तिबोध जी के ‘क्लासिक रचना शिल्य’ को समझने के लिये एक ‘खास समझ’ विकसित होनी चाहिए।

गजानन माधव मुक्तिबोध की प्रमुख रचनाएं

मुक्तिबोध जी की प्रमुख रचनाएँ कुछ इस प्रकार से हैं –
काव्य – चाँद का मुंह टेढ़ा है। तारसप्तक में प्रकाशित कविताएँ।
कहानी संग्रह – काठ का सपना आदि।
उपन्यास – विपात्र आदि।
आख्यान – एक साहित्यिक की डायरी आदि।
निबन्ध – नयी कविता का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबन्ध, कामायनी एक पुनर्विचार आदि।
पुस्तक समीक्षाएँ – उर्वशी दर्शन और काव्य आदि।

गजानन माधव मुक्तिबोध की भाषा शैली

मुक्तिबोध जी की भाषा अनगढ़ है जिसमें संस्कृत के अतिरिक्त अरबी, फारसी तथा अंग्रेजी के शब्दों की भरमार है। वारदात, वाकई तजुर्बा वक्त, मुफलिसी, फिक्र आदि उर्दू शब्द, ड्रेस, टावर, फ्यूज, मार्शल, कर्नल, बल्ब, प्रोसेशन, गैस लाइट, फ्रेम, रिवाल्वर ड्राअर आदि अंग्रेजी, खट्खटाक्-खट्, तड़-तड़ातड़-तड़, सटर-पटर, धड़मधूम, छपाछप, भबभड़, दलिद्दर, टण्टा, धूलधक्कड़ आदि देशज निर्मित शब्द जो शब्द ध्वनि, गतिशीलता एवं वातावरण एवं विशिष्ट मानसिकता व्यक्त करने में पर्याप्त समर्थ है। शब्द तराश कर उसकी अर्थवत्ता एवं आत्मा को समझकर प्रयोग करते हैं। कवि ने शब्दों एवं मुहावरों को नई अर्थवत्ता प्रदान की है। इनके शब्दों के अर्थ के भीतर अर्थ हैं।

गजानन माधव मुक्तिबोध की काव्यगत विशेषताएँ

मुक्तिबोध जी का कवि व्यक्तित्व हो, सृजन क्रिया हो अथवा समीक्षा पद्धति- इन तीनों की एकतानता नयी कविता में मुक्तिबोध के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं दिखलाई नहीं देती। इन्होंने साहित्य एवं युग को नया सौन्दर्य शास्त्र दिया है। मुक्तिबोध जी अनास्था से आस्था की ओर बढ़ते हैं।

इस प्रकार साहित्य साधक मुक्तिबोध जी का काव्य जन को जन-जन और मन को मानवीय बनाने की सार्थक चेष्टा है लेकिन इनके काव्य आम आदमी तक पहुँचने के लिये बुद्धिजीवी आश्रय ढूँढना पड़ेगा। इन्होंने प्रत्येक वाणी में महाकाव्य पीड़ा को सुना है।

गजानन माधव मुक्तिबोध का भाव पक्ष

मुक्तिबोध की कविताओं का भाव पक्ष उन्नत तथा समसामयिक है। समस्त परिवेश में कुछ पाने की ललक और जीवन के दलदल में फँसे मानव को बाहर लाने का इन्होंने सदैव प्रयास किया है। मुक्तिबोध जी की अनुभूति अत्यंत गंभीर तथा मार्मिक है। कल्पना में प्रश्नों की महक है जो भावना सागर की लहरों को मोहित करने वाली है। मुक्तिबोध जी नई कविता के प्रतिनिधि कवि हैं और जीवन मूल्यों के प्रयोगकर्मी कवि भी है। नई कविता को स्वरूप प्रदान करने में इनका विशिष्ट स्थान है।

गजानन माधव मुक्तिबोध का कला पक्ष

इनकी भाषा परिमार्जित, प्रौढ़ तथा सबल है। सामान्य बोलचाल की भाषा के अतिरिक्त संस्कृत निष्ठ समसामयिक पदावली से युक्त इनकी भाषा सरल एवं प्रभावमय है। इनकी शैली प्रतीक एवं बिम्बों से अलंकृत हैं। बिम्ब सर्वथा मौलिक तथा नूतन ही प्रयोग किए गए हैं। मुक्तिबोध जी की काव्य शैली को अनगिनत काव्य शैलियों के मध्य शहज ही पहचाना जा सकता है।

गजानन माधव मुक्तिबोध का साहित्य में स्थान

साहित्य में स्थान – नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर एवं उसको नया मोड़ देने वाले मुक्तिबोध जी का हिंदी पद्य साहित्य में विशेष महत्वपूर्ण स्थान है।

गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताएँ

[प्रस्तुत कविता मुक्तिबोध के ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ काव्य-संग्रह से ली गई है। मुक्तिबोध का अनुभव-जगत् अत्यन्त व्यापक है और परिवेश के जीवन से सम्बद्ध है। इस कविता में इन्होंने बताया है कि एक सच्चे रचनाकार को काव्य-सृजन करने के लिए विषयों की कमी नहीं है। जीवन का प्रत्येक दृश्य, विविध रूपाकार चारित्रिक विशेषताओं युक्त से व्यक्तित्व, प्रत्येक वाणी में छिपी पीड़ा मनुष्य-मात्र के दुःख की अनेकानेक कथाएँ, उनके अहं भाव का विश्लेषण और न जाने कितने घटना क्रम उसकी रचना का प्रतिपाद्य हो सकते हैं। कहने का आशय यह है कि एक सशक्त रचनाकार को अपने विषयों का चयन जीवन-यथार्थ से करना चाहिए।]

मुझे कदम-कदम पर

मुझे कदम-कदम पर
चौराहे मिलते हैं
बाहें फैलाये !
एक पैर रखता हूँ
कि सौ राहें फूटतीं,
मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूँ,
बहुत अच्छे लगते हैं
उनके तजुर्बे और अपने सपने
सब सच्चे लगते हैं,
अजीब सी अकुलाहट दिल में उभरती है,
मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,
जाने क्या मिल जाये !!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में
चमकता हीरा है,
हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,
प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है,
मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में
महाकाव्य-पीड़ा है,
पल भर में सब में से गुजरना चाहता हूँ,
प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ,
इस तरह खुद ही को दिये-दिये फिरता हूँ,
अजीब है जिन्दगी !!

कहानियाँ लेकर और
मुझ को कुछ दे कर ये चौराहे फैलते
जहाँ जरा खड़े हो कर
बातें कुछ करता हूँ
उपन्यास मिल जाते ।
दुःख की कथाएँ, तरह-तरह की शिकायतें,
अहंकार विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,
जमाने के जानदार सूरे व आयतें
सुनने को मिलती हैं।
कविताएँ मुसकरा लाग-डाँट करती हैं,
प्यार बात करती हैं।
मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियाँ
श्रद्धाएँ चढ़ती हैं !!

घबराए, प्रतीक और मुसकाते रूप चित्र
लेकर मैं घर पर जब लौटता
उपमाएँ, द्वार पर आते ही कहती हैं कि
सौ बरस और तुम्हें
जीना ही चाहिए।

घर पर भी, पग-पग पर चौराहे मिलते हैं,
बाहें फैलाये रोज मिलती हैं सौ राहें,
शाखा प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं,
नव-नवीन रूप दृश्य वाले सौ-सौ विषय
रोज-रोज मिलते हैं।
और मैं सोच रहा कि
जीवन में आज के
लेखक की कठिनाई यह नहीं कि
कमी है विषयों की
वरन् यह कि आधिक्य उनका ही
उसको सताता है,
और वह ठीक चुनाव नहीं कर पाता है !!
(चाँद का मुँह टेढ़ा है से)

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