गिरिजाकुमार माथुर – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “गिरिजाकुमार माथुर का जीवन परिचय” (Girija Kumar Mathur biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने गिरिजा कुमार माथुर का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और गिरिजाकुमार माथुर किस युग के कवि हैं को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने गिरिजा कुमार माथुरजी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

गिरिजाकुमार माथुर का जीवन परिचय

श्री गिरिजा कुमार माथुर आधुनिक युग के प्रतिभा-संपन्न कलाकार हैं। ये प्रमुख रूप से प्रयोगवादी कवि माने जाते हैं लेकिन इनकी कविताएँ मात्र प्रयोग के लिए न होकर जीवन की यथार्थ अनुभूति के चित्रण के लिए हैं। कोमलता एवं मधुरता के प्रति आकर्षक होने के कारण माथुर जी की कविता में छायावादी शैली का सौंदर्य भी प्राप्त होता है।

माथुर जी का जन्म मध्यप्रदेश राज्य के अशोक नगर (गुना) नामक स्थान पर 22 अगस्त, सन् 1919 ईस्वी में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री देवीशरण माथुर तथा माता का नाम श्रीमती लक्ष्मी देवी था। इनके पिता ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवि माने जाते थे। परिवार का स्तर साधारण था। यही कारण है कि इनकी कविताओं एवं नाटकों में प्रायः सामान्य स्तर के जीवन का ही चित्रण रहता है। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। इसके बाद सन् 1934 ई० में इन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा झांसी से उत्तीर्ण की। इसके बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से इन्होंने अँग्रेजी साहित्य में एम०ए० तथा एल०एल०बी० की परीक्षा उत्तीर्ण की। प्रसिद्ध कवयित्री शकुन्त माथुर से इनका विवाह हुआ। कुछ समय बाद इन्हें दिल्ली सचिवालय में नौकरी मिल गयी। इसके बाद इन्होंने ऑल इण्डिया रेडियों में कार्य किया।

माथुर जी ने झांसी में रहकर आकाशवाणी में भी कार्य किया। ये दूरदर्शन से भी संबंधित रहे। आकाशवाणी छोड़कर संयुक्त राष्ट्र अमेरिका चले गये। वहाँ दो वर्ष तक कार्य करने के बाद सन् 1953 ई० में आकाशवाणी लखनऊ में उपनिदेशक के रूप में ये पुनः नियुक्त हुए। 10 जनवरी, सन् 1994 ईस्वी में इनका निधन हो गया था।

गिरिजाकुमार माथुर का साहित्यिक परिचय

माथुर जी नयी कविता के रोमानी स्वभाव के कवि माने जाते हैं। इनके साहित्यिक जीवन का आरम्भ सन् 1934 ई० में ब्रजभाषा के परम्परागत कवित्त सवैया लेखनी से हुआ। इन्होंने कविता, एकांकी, नाटक, आलोचना आदि का भी सृजन किया। इनका पहला काव्य-संग्रह ‘मंजीर’ नाम से सन् 1941 ई० में प्रकाशित हुआ। माथुर जी की कविताओं में निराशा और कुण्ठ के विपरीत जीवन के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण देखने को मिलता है। इन्होंने ‘गगनांचल’ नामक पत्रिका का संपादन भी किया। सन् 1943 ई० में अज्ञेय द्वारा सम्पादित ‘तारसप्तक’ के सात कवियों में से एक कवि गिरिजा कुमार माथुर जी भी हैं। इनकी रचनाओं में प्रयोगशीलता भी दिखाई देती है।

गिरिजाकुमार माथुर की प्रमुख रचनाएं

गिरिजा कुमार माथुरजी बहुमुखी प्रतिभा के संपन्न साहित्यकार थे। ‘गगनांचल’ पत्रिका के संपादन के अलावा इन्होंने कविता, कहानी, नाटक और आलोचना भी लिखीं। माथुर जी की प्रमुख रचनाएं इस प्रकार हैं-

काव्य-संग्रह – मंजीर, नाश और निर्माण, धूप के धान, शिलापंख चमकीले, जो बँध नहीं सका, भीतरी नदी की यात्रा, साक्षी रहे वर्तमान, पृथ्वीकल्प, मैं वक्त के हूँ सामने, मुझे और अभी कहना है, छाया मत छूना आदि ‘तार सप्तक’ में संगृहीत कविताएँ है।

नाटक – जन्म कैद आदि।

आलोचना – नयी कविता : सीमाएँ और संभावनाएँ आदि।

गिरिजाकुमार माथुर की भाषा शैली

कवि श्री गिरिजाकुमार माथुरजी का ध्यान सदा शिल्प विधान पर रहा है। शिल्प प्रयोगों की दृष्टि से रंगयोजना, ध्वनि संगीत तथा नये उपमान आदि में माथुर जी ने काव्य को एक नया मोड़ दिया है। इनकी भाषा शुद्ध साहित्यिक खड़ीबोली है जिसमें आंचलिक जनपदीय शब्द योजना का प्रयोग हुआ है जो स्वाभाविक चित्रण हेतु आवश्यक है। कवि ने तद्भव एवं देशज शब्दों का सटीक एवं खुलकर प्रयोग किया है, जैसे धुरी साँझ, काँवर, चकमक, बीजरी, खरैरी, सुनैली, सुन्न, चंदरिया, मटीली, छुवन, बीरज, दौज आदि।

साधारण व्यावहारिक भाषा में अर्थ एवं नाद सौन्दर्य की असाधारण पहचान कवि माथुर जी की विशेषता है। अनेक स्थलों पर ग्रामीण शब्द प्रयोग अखरता है। ढाकपनी कविता में जनपदीय शब्द एवं लोकजीवन की छाया उल्लेखनीय है। इनके काव्य में अर्थ सौन्दर्य, नाद सौन्दर्य एवं प्रगति तत्वों की श्रेष्ठता निहित है। नये उपमानों के प्रयोग में माथुर जी सिद्धहस्त कवि हैं। कवि प्रतीकों से सम्प्रेषण को सशक्त बनाता है, इनके प्रतीक पौराणिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक, वैज्ञानिक तथा यौगिक हैं। इनके साथ मनोवैज्ञानिक प्रतीक भी देखने को मिलते हैं। माथुर कीट्स की बिम्ब योजना से प्रभावित प्रतीत होते हैं।

गिरिजाकुमार माथुर का कवि परिचय

कवि श्री माथुर रोमानी गीतात्मकता, प्रखर सामाजिकता, प्रयोगशीलता, वैज्ञानिक चेतना आधुनिक भाव-बोध तथा मानववादी भावभूमि की सीढ़ियाँ तय कर चुके हैं। कुछ समीक्षकों का आक्षेप है कि माथुर के काव्य में स्थितियों से टकराने की ताकत ज्यादा नहीं रही इसलिये ये प्राकृतिक दृश्यों की शाब्दिक पच्चीकारी करने में लग जाते हैं या फिर मध्यवर्गीय जिन्दगी की तस्वीर खींचने में। ऐसा नहीं है ये जीवन तथा जगत की हलचलों से उद्वेलित हैं। संवेदना एवं शिल्प की दृष्टि से माथुर जी हिन्दी की नयी कविता धारा का समग्र रूप से प्रतिनिधित्व करते हैं।

गिरिजाकुमार माथुर के पुरस्कार एवं सम्मान

माथुर जी को सन् 1991 ई० में इनकी प्रसिद्ध काव्य कृति ‘मैं वक्त के हूं सामने’ के लिए “साहित्य अकादमी पुरस्कार” मिला। और कुछ समय बाद इसी रचना के लिए इन्हें सन् 1993 ई० में के०के० बिरला फाउंडेशन द्वारा दिया जाने वाला प्रतिष्ठित ‘व्यास सम्मान’ एवं ‘शलाका सम्मान’ से भी नवाजा गया।

गिरिजाकुमार माथुर का साहित्य में स्थान

प्रसिद्ध कवि गिरिजा कुमार माथुरजी उत्तरछायावादी संस्कारों से प्रारम्भ होकर ‘अप्रतिबद्ध सामाजिकता’ तथा प्रयोगधर्मिता से निकलकर नयी कविता की जीवन्तता एवं सामर्थ्य से जुड़कर नयी कविता के समर्थ कवियों में विशेष महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

गिरजाकुमार माथुर की कविताएं

[प्रस्तुत कविता श्री गिरिजाकुमार माथुर के ‘धूप के धान’ नामक काव्य संकलन से अवतरित है। कवि की काव्य-कला का वितान अत्यन्त विस्तृत है। सौन्दर्यानुभूति और वेदनानुभूमि से प्रारम्भ होने वाली आपकी कविता मानवतावाद और सामाजिक-सन्दर्भों से गुजरते हुए समसामयिक भावबोध, एवं अतिबौद्धिकता की ओर उन्मुख हो गयी है। इस कविता में आपने धरती के कोमल एवं कठोर रूपों का चित्रोपम वर्णन किया है, जो अपने रम्य रूप में मनुष्य को आकृष्ट करने वाली है। रूपक, उपमा, मानवीकरण अलंकार यहाँ नवीन-भंगिमा के साथ आये हैं।]

चित्रमय धरती

ये धूसर, साँवर मटियाली, काली धरती
फैली है कोसों आसमान के घेरे में
रूखों छायें नालों के हैं तिरछे ढलान
हरे-भरे लम्बे चढ़ाव
झरबेरी, ढाक, कास से पूरित टीलों तक
जिनके पीछे छिप जाती है।
गढ़वाटों की रेखा गहरी
ये सोंधी घास ढँकी रुँदे
हैं धूप बुझी हारें भूरी सूनी-सूनी उन चरगाहों के पार कहीं
धुंधली छाया वन चली गयी है
पाँत दूर के पेड़ों की
उन ताल वृक्ष के झौरों के आगे दिखती
नीली पहाड़ियों की झाँई
जो लटें पसारे हुए जंगलों से मिलकर
है एक हुई

यह चित्रमयी धरती फैली है कोसों तक
जिसके वन-पेड़ों के ऊपर
नीमों, आमों, वट, पीपल पर
निखरे निखरे मौसम आते
कच्ची मिट्टी के गाँवों पर
भर जाते हैं खेरे और खेत
फिर रंग-बिरंगी फसलों से
जिनमें सूरज की धूप दूध बन रम जाती
हर दाने में रच जाता अमरित चन्दा का
इस धूसर साँवर धरती की सोंधी उसाँस
कच्ची मिट्टी का ठण्डापन
मटियाला-सा हलका साया
तन मन में साँसों में छाया,
जिसकी सुधि आते ही पड़ती
ऐसी ठण्डक इन प्रानों में
ज्यों सुबह ओस गीले खेतों से आती है
मीठी हरियाली-खुशबू मन्द हवाओं में
(लैण्डस्केप : धूप के धान से)

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *