जयशंकर प्रसाद – जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, काव्यगत विशेषताएं, भाषा शैली

हिंदी में छायावादी काव्य के प्रवर्तक जयशंकर प्रसाद को आधुनिक हिन्दी साहित्य के अग्रदूतों में से एक माना जाता है। और अक्सर इन्हें “आधुनिक हिन्दी साहित्य का तुलसीदास” भी कहा जाता है। प्रसाद जी ने 20वीं सदी की शुरुआत में हिंदी कविता में साहित्यिक पुनर्जागरण, छायावाद आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम जयशंकर प्रसाद जी के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करते हैं, ताकि परीक्षाओं में हम ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय” (Jaishankar Prasad biography in Hindi) के बारे में जानकारी दी है। इसमें हमने जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, कविताएं, भाषा शैली तथा साहित्य में स्थान और जयशंकर प्रसाद का जन्म एवं मृत्यु को विस्तार से सरल भाषा में समझाया है।

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इसके अलावा, इसमें हमने जयशंकर प्रसाद जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप प्रसाद जी से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

विषय-सूची show

जयशंकर प्रसाद का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने प्रसाद जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
जयशंकर प्रसाद की जीवनी –

नामजयशंकर प्रसाद
उपनामप्रसाद
जन्म30 जनवरी, 1889 ई. में
जन्मस्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश
मृत्यु15 नवम्बर, 1937 ई. में
मृत्युस्थानवाराणसी (काशी), उत्तर प्रदेश
शिक्षास्वाध्याय से ही अनेक भाषाओं का ज्ञान अर्जन
व्यवसायकवि, लेखक, नाटककार, उपन्यासकार, कहानीकार
गुरुश्री मोहिनीलाल गुप्त, उपनाम “रसमय सिद्ध”
पिता का नामश्री देवी प्रसाद
माता का नामश्रीमती मुन्नी देवी
पत्नी का नामश्रीमती कमला देव
लेखन विधाकविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध
काल/अवधिछायावादी युग
भाषाखड़ीबोली
शैलीचित्रात्मक, अलंकृत
प्रमुख रचनाएंकामायनी, ऑंसू, लहर, झरना, प्रेम पथिक, कानन कुसुम, चित्राधार आदि।
नाटकचन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अजातशत्रु, राज्यश्री, कल्याणी आदि।
कहानीआकाशदीप, ऑंधी, इन्द्रजाल, छाया आदि।
पुरस्कार‘कामायनी’ महाकाव्य पर इन्हें “मंगलाप्रसाद पारितोषिक” पुरस्कार मिला।
हिंदी साहित्य में स्थानछायावादी युग के प्रवर्तक
जयशंकर प्रसाद की जीवनी

जयशंकर प्रसाद (30 जनवरी 1889 – 15 नवंबर 1937) एक प्रख्यात भारतीय लेखक, कवि, नाटककार, उपन्यासकार और कहानीकार थे। इन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य के अग्रदूतों में से एक माना जाता है। प्रसाद जी की रचनाएं सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक मुद्दों को प्रतिबिंबित करती थी। इन्होंने देश भक्ति, प्रेम, प्रकृति और आध्यात्मिकता जैसे विषयों पर लिखा है। इनकी कुछ उल्लेखनीय कृतियों में महाकाव्य ‘कामायनी’, कविता-संग्रह ‘चित्राधार’ और नाटक ‘स्कन्दगुप्त’ आदि शामिल हैं।

‘कामायनी’ प्रसाद जी की सबसे प्रसिद्ध कृति, हिन्दी काव्य का गौरव ग्रंथ है। इसे प्रथम कलात्मक महाकाव्य कहा जा सकता है, जो मानवीय भावनाओं, संघर्षों और नैतिक दुविधाओं के विषयों की खोज करता है।

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जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय

श्री जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी, सन् 1889 ईस्वी में वाराणसी (उत्तर प्रदेश) के ‘सुॅंघनी साहू’ नाम से प्रसिद्ध एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री बाबू देवीप्रसाद तथा माता का नाम श्रीमती मुन्नी देवी था। प्रसाद जी की शिक्षा स्कूल में केवल आठवें दर्जे तक ही हुई थी। किन्तु घर पर ही इन्होंने अंग्रेजी, हिंदी, उर्दू, फारसी और संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की। संस्कृत साहित्य के प्रति इनका गहन अनुराग था। वेद, पुराण, इतिहास, साहित्य और दर्शन शास्त्र का स्वाध्याय से ही इन्होंने सम्यक् ज्ञान प्राप्त कर लिया। प्रसाद जी में काव्य सृजन के संस्कार बचपन से ही थे, इनकी प्रथम कविता 9 वर्ष की अवस्था में ही प्रकाश में आ गई थी।

जयशंकर प्रसाद
जयशंकर प्रसाद का जीवन परिचय

जयशंकर प्रसाद जी को पारिवारिक सुख नहीं मिला। जब ये 12 वर्ष के थे तथा कक्षा सात में पढ़ते थे तभी इनके पिता का देहावसान हो गया था। तथा माता व पत्नी श्रीमती कमला देवी सभी इनकी युवावस्था से पहले ही परलोकवासी हुए। इनका परिवार जो पहले वैभव के पालने पर झूलता था, ऋण के बोझ से दब गया। अतः प्रसाद जी को जीवन भर विषम परिस्थितियों से संघर्ष करना पड़ा, किन्तु इन्होंने हार नहीं मानी और अपनी पैतृक संपत्ति का कुछ भाग बेचकर ऋण से छुटकारा पाया। अपने जीवन में प्रसाद जी ने कभी भी अपने कारोबार की ओर ध्यान नहीं दिया। परिणाम स्वरूप इनकी आर्थिक स्थिति बिगड़ती गई और चिन्ताओं ने इन्हें घेर लिया।

जयशंकर प्रसाद जी को बाल्यावस्था से ही काव्य के प्रति अनुराग था जो उत्तरोत्तर बढ़ता ही गया। ये बड़े ही स्वाभिमानी व्यक्ति थे। अपनी कविताओं अथवा कहानियों के लिए पुरस्कार स्वरूप एक पैसा भी नहीं लेते थे। यद्यपि इनका जीवन बड़ा नपा-तुला और संयम शील था, किन्तु दुःखों के निस्तर आघातों से ये न बच सके और चिंताओं ने इनके शरीर को जर्जर कर दिया और ये क्षय रोग से पीड़ित हो गए। 15 नवम्बर, सन् 1937 ईस्वी को काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश में ही इनकी जीवन लीला समाप्त हो गई। माॅं-भारती का यह अमर गायक जीवन के केवल 48 बसन्त ही देख सका।

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जयशंकर प्रसाद का साहित्यिक योगदान

प्रसाद जी छायावाद के प्रवर्तक, उन्नायक तथा प्रतिनिधि कवि होने के साथ-साथ एक महान कवि, सफल नाटककार, श्रेष्ठ उपन्यासकार, कुशल कहानीकार तथा गंभीर निबंधकार थे। इन्हें भारतीय संस्कृति और सभ्यता से अगाध प्रेम था। भारत के उज्जवल अतीत को इन्होंने अपने साहित्य में सफलतापूर्वक अंकित किया है। इनके नाटक ‘चन्द्रगुप्त’, ‘स्कन्दगुप्त’ और ‘अजातशत्रु’ राष्ट्र के गौरवमय इतिहास का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करते हैं।

जयशंकर प्रसाद जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी साहित्यकारों में अग्रगण्य थे। इन्होंने अपनी कविताओं में सुक्ष्म अनुभूतियों का रहस्यवादी चित्रण प्रारंभ किया, जो इनके काव्य की एक प्रमुख विशेषता है। इनके इस नवीन प्रयोग ने काव्य जगत् में एक क्रान्ति उत्पन्न कर दी और छायावादी युग का सूत्रपात किया। इन्होंने काव्य-सृजन के साथ ही “हंस” एवं “इन्दु” नामक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी कराया।

“कामायनी” प्रसाद जी की छायावादी युग की ही नहीं सम्पूर्ण आधुनिक काल का कलात्मक महाकाव्य है। इस पर इनको ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन’ ने “मंगलाप्रसाद पारितोषिक” पुरस्कार प्रदान किया था। इसके अतिरिक्त ‘इन्द्रजाल’, ‘ऑंधी’ आदि इनके कहानी-संग्रह हैं। अतः ‘आकाशदीप’ और ‘पुरस्कार’ कहानियां विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं इनकी कहानियों और नाटकों में भावुकता पूर्ण कवित्व शक्ति के दर्शन होते हैं।

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जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएं

प्रसाद जी की प्रमुख रचनाएं एवं कृतियां निम्नलिखित हैं –
काव्य-ग्रन्थ ⇒ ऑंसू, कामायनी, चित्राधार, लहर, झरना, प्रेम-पथिक, करुणालय, कानन-कुसुम, महाराणा का महत्व।

कहानी-संग्रह ⇒ ऑंधी, इन्द्रजाल, आकाशदीप, प्रतिध्वनि, पुरस्कार, छाया, देवरथ आदि। (69 कहानियां हैं)

नाटक ⇒ चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशत्रु, ध्रुवस्वामिनी, कामना, जनमेजय का नागयज्ञ, एक घूॅंट, विशाख, कल्याणी-परिणय, राजश्री, अग्नि-मित्र, सज्जन और प्रायश्चित आदि।

उपन्यास ⇒ तितली, कंकाल व इरावती (अपूर्ण) आदि।
निबंध-संग्रह ⇒ काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध ।
चम्पू ⇒ प्रसाद जी ने कुल 3 चंपू लिखें हैं- उर्वशी, बभ्रुवाहन और उर्वशी चम्पू (1906 ई.) ।

जयशंकर प्रसाद के निबन्ध

काव्य और कला, रहस्यवाद, रस, नाटकों में रस का प्रयोग, नाटकों में आरंभ, रंगमंच, आरंभिक-पाठ काव्य यथार्थवाद और छायावाद पहले हंस में प्रकाशित हुए थे। बाद में पुस्तकाकार “काव्य और कला और अन्य निबन्ध” नाम से संपादित होकर प्रकाशित हुए। बाद में इन्होंने शोध परक ऐतिहासिक निबंध यथा – सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, प्राचीन आर्यवर्त और उसका प्रथम सम्राट आदि भी लिखें।

जयशंकर प्रसाद की भाषा शैली

प्रसाद जी की भाषा पूर्णतः साहित्यिक, परिमार्जित एवं परिष्कृत है। भाषा प्रवाहयुक्त होते हुए भी इन्होंने संस्कृतनिष्ठ खड़ीबोली को अपनाया है जिसमें सर्वत्र ओज एवं माधुर्य गुण विद्यमान हैं। अपने सूक्ष्म भावों को व्यक्त करने के लिए प्रसाद जी ने लक्षणा एवं व्यंजना का आश्रय लिया है।

प्रसाद जी की शैली काव्यात्मक चमत्कारों से परिपूर्ण है। अलंकृत, चित्रात्मकता, संगीतात्मकता एवं लय पर आधारित इनकी शैली अत्यन्त सरस एवं मधुर है।

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जयशंकर प्रसाद की काव्यगत विशेषताएं

प्रसाद जी छायावादी कवि हैं। प्रेम और सौन्दर्य इनके काव्य का प्रधान विषय है। मानवीय संवेदना उसका प्राण है प्रकृति को संचेतन अनुभव करते हुए उसके पीछे परम सत्ता का आभास कवि ने सर्वत्र किया है। यही इनका रहस्यवाद है। प्रसाद जी का रहस्यवाद साधनात्मक नहीं है। वह भावसौंदर्य से संचालित प्रकृति का रहस्यवाद है। अनुभूति की तीव्रता, वेदना, कल्पना प्रवणता आदि प्रसाद काव्य की कतिपय अन्य विशेषताएं हैं।

प्रकृति-चित्रण

प्रसाद जी की प्रारंभिक रचनाओं में ही संकोच और झिझक होते हुए भी कुछ कहने को आतुर चेतना के दर्शन होते हैं। ‘चित्राधार’ में ये प्रकृति की रमणीयता और माधुर्य पर मुग्ध हैं। ‘प्रेम पथिक’ में प्रकृति की पृष्ठभूमि में कवि हृदय में मानव सौंदर्य के प्रति जिज्ञासा का भाव जगता है। ‘ऑंसू’ प्रसाद जी का उत्कृष्ट, गंभीर, विशुद्ध मानवीय विरह काव्य है जो प्रेम के स्वर्गीय रूप का प्रभाव छोड़ता है। इसलिए कुछ लोग इसे आध्यात्मिक विरह काव्य मानते हैं।

‘कामायनी’ प्रसाद काव्य की सिद्धावस्था है इनकी काव्य साधना का पूर्ण परिपाक है। कवि ने मनु और श्रद्धा के बहाने पुरुष और नारी के शाश्वत स्वरूप एक मानव के मूल मनोभावों का काव्यमय चित्र अंकित किया है। काव्य, दर्शन और मनोविज्ञान की त्रिवेणी ‘कामायनी’ निश्चय ही ‘आधुनिक काल की सर्वोत्कृष्ट सांस्कृतिक रचना’ है।

जयशंकर प्रसाद की कविताएं

गीत

[प्रस्तुत गीत ‘लहर’ से अवतरित है-]

बीती विभावरी जाग री।
अंबर पनघट में डुबो रही-
तारा घट उषा नागरी।

खग कुल कुल कुल सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लायी-
मधु मुकुल नवल रस गागरी।

अधरों में राग अमन्द पिए,
अलकों में मलयज बंद किए-
तू अब तक सोयी है आली!
ऑंखों में भरे विहाग री।

श्रद्धा-मनु

“कौन तुम? संतृति जलनिधि तीर तरंगों से फेंकी मणि एक;
कर रहे निर्जन का चुपचाप प्रभा की धारा से अभिषेक?
मधुर विश्रांत और एकांत- जगत का सुलझा हुआ रहस्य;
एक करुणामय सुन्दर मौन और चंचल मन का आलस्य!”

“सुना यह मनु ने मधु गुंजार मधुकरी का सा जब सानंद,
किए मुख नीचा कलम समान प्रथम कवि का ज्यों सुन्दर छंद।
एक झटका सा लगा सहर्ष, निरखने लगे लुटे से, कौन-
गा रहा यह सुन्दर संगीत? कुतूहल रह न सका फिर मौन।”

“और देखा वह सुन्दर दृश्य नयन का इंद्रजाल अभिराम;
कुसुम वैभव में लता समान चंद्रिका से लिपटा घनश्याम;
हृदय की अनुकृति बाहृय उदार एक लम्बी काया, उन्मुक्त;
मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।”

श्रद्धा मनु का सारांश

प्रसाद जी श्रद्धा मनु ने ‘कामायनी’ में देव संस्कृति के विनाश के बाद विकसित होने वाली मानव संस्कृति एवं मानवता के विकास के लिए मनोवैज्ञानिक प्रस्तुति की है। यह विकास श्रद्धा और मनु के योग से हुआ है। प्रस्तुत स्थल श्रद्धा मनु के प्रथम दर्शन एवं परस्पर के सहज आकर्षण के वर्णन से आरंभ होता है। इसमें श्रद्धा के रूप तथा शील का चित्रण है। अंतिम भाग में श्रद्धा मनु को अर्थात् मानव को जीवन का संदेश दे रही है।

जयशंकर प्रसाद का साहित्य में स्थान

प्रसाद जी का साहित्य अनन्त वैभव संपन्न है। वे भारत के चुने हुए कुछ आधुनिक श्रेष्ठ साहित्यकारों में हैं। जयशंकर प्रसाद जी की साहित्यिक विरासत लेखकों और पाठकों की पीढ़ियों को प्रेरित करती रही है। मानवीय भावनाओं, गीतात्मक भाषा और गहरी दार्शनिक अंतर्दृष्टि की इनकी गहरी समझ ने इन्हें हिंदी साहित्य में एक स्थाई व्यक्ति बना दिया है।
हिन्दी काव्य में जयशंकर प्रसाद के योगदान और सामाजिक परिवर्तन के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने इन्हें भारत के साहित्यिक और सांस्कृतिक इतिहास में एक प्रतिष्ठित स्थान दिलाया है।

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FAQs. जयशंकर प्रसाद जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. जयशंकर प्रसाद का जन्म कब और कहां हुआ था?

जयशंकर प्रसाद का जन्म 30 जनवरी, 1889 में वाराणसी, उत्तर प्रदेश के सुॅंघनी साहू नाम से प्रसिद्ध एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था।

2. जयशंकर प्रसाद की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

जयशंकर प्रसाद की मृत्यु 15 नवंबर, 1937 को काशी, उत्तर प्रदेश में हुई थी।

3. जयशंकर प्रसाद के माता पिता का क्या नाम था?

जयशंकर प्रसाद के पिता का नाम बाबू देवी प्रसाद तथा माता का नाम मुन्नी देवी था।

4. जयशंकर प्रसाद का प्रसिद्ध महाकाव्य कौन सा है?

“कामायनी” जयशंकर प्रसाद जी का छायावादी युग का ही नहीं संपूर्ण आधुनिक काल का सर्वोत्तम, कलात्मक और प्रतिनिधि हिन्दी महाकाव्य है। सन् 1936 में प्रसाद जी ने इसकी रचना की थी।

5. जयशंकर प्रसाद की सभी रचनाएं कौन कौन सी हैं?

जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएं – काव्य – चित्राधार, लहर, आंसू, झरना, कानन कुसुम, प्रेम पथिक, महाराणा का महत्व, करुणालय और कामायनी।
नाटक – अजातशत्रु, चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, कामना, एक घूॅंट, सज्जन, जनमेजय का नागयज्ञ, राजश्री और प्रायश्चित आदि। उपन्यास – तितली, कंकाल व इरावती (अपूर्ण) आदि। निबंध-संग्रह – काव्य और कला तथा अन्य निबन्ध ।

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