जूल-टाॅमसन प्रभाव, शीतलन का सूत्र, हाइड्रोजन तथा हीलियम के व्यवहार को समझाइए

जूल-टाॅमसन प्रभाव क्या है

“जब कोई गैस स्थिर ताप पर सरंध्र डॉट में से गुजर कर उच्च दाब से निम्न स्थिर दाब के क्षेत्र में भेजी जाती है, तो इसके ताप में कुछ परिवर्तन होता है।” इस प्रभाव को “जूल-टाॅमसन प्रभाव (Joule-Thomson effect in Hindi)” कहते हैं। जबकि यह प्रक्रिया ‘जूल-टाॅमसन प्रसार’ कहलाता है। तथा इस प्रक्रम को ‘उपरोधी प्रक्रम’ कहते हैं। ताप-परिवर्तन सरंध्र डॉट के दोनों और के दाबान्तर के अनुक्रमानुपाती है। तथा यह गैस के प्रारंभिक ताप पर निर्भर करता है। साधारण तापों पर हाइड्रोजन तथा हीलियम को छोड़कर सभी गैसों में शीतलन प्रभाव होता है, जबकि हाइड्रोजन तथा हीलियम में तापन प्रभाव होता है।

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शीतलन के लिए व्यंजक

माना कि एक ऊष्मारुध्द सिलिण्डर MN एक सरंध्र डॉट S के द्वारा दो प्रकोष्ठों में विभाजित है, जिसमें दो अचालक पिस्टन m1 तथा n2 लगी है। पिस्टन m1 स्थिर दाब P1 पर सरंध्र डॉट में एक मोल गैस भेजती है, तथा डाट में से निकलने वाली गैस पिस्टन n2 को निम्न स्थिर दाब P2 पर धकेलती ती है जैसा की चित्र में दिखाया गया है।

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जूल-टाॅमसन प्रभाव
जूल-टाॅमसन प्रभाव

माना कि सरंध्र डॉट में प्रवेश करने से पहले पिस्टन m1 व सरंध्र डॉट के बीच दाब P1 पर एक मोल गैस भरी है। तथा जिसका आयतन V1 है। माना सरंध्र डॉट से निकलने के बाद दाब P2 पर गैस की उसी मात्रा का आयतन V2 है, तब पिस्टन m1 द्वारा गैस पर किया गया बाह्य कार्य P1V1 होता है। तथा गैस द्वारा पिस्टन n2 को धकेलने में किया गया बाह्य कार्य P2V2 है। अतः गैस द्वारा किया गया परिणामी बाह्य कार्य (P2V2 – P1V1) है। अर्थात् इसके अतिरिक्त गैस को प्रसारित होने में अन्तराअणुक बलों के विरुद्ध आंतरिक कार्य भी करना पड़ता है। क्योंकि हम जानते हैं कि किसी वास्तविक (वाण्डर वाल्स) गैस के अणुओं के बीच आकर्षण बल, आंतरिक दाब ( \frac{a}{V^2} ) के तुल्य होता है। यहां a एक नियतांक है। अतः जब एक-ग्राम अणु गैस के आयतन V1 से V2 तक प्रसारित होती है। तो उपर्युक्त बलों के विरुद्ध किया गया आन्तरिक कार्य
= \int^{V_2}_{V_1} ( \frac{a}{V^2} )dV
= a( \frac{1}{V_1} \frac{1}{V_2} )

अतः गैस द्वारा किया गया कुल कार्य
W = (P2V2 – P1V1) + a( \frac{1}{V_1} \frac{1}{V_2} ) ….(1)

अब यदि वाण्डर वाल्स समीकरण (P + \frac{a}{V^2} )(V – b) = RT से,
PV + \frac{a}{V} – Pb – \frac{ab}{V^2} = RT
यहां पर \frac{ab}{V^2} पद द्वितीय कोटि का होने के कारण, नगण्य मान लेने पर,
PV = RT – \frac{a}{V} + Pb
या P1V1 = RT – \frac{a}{V_1} + P1b …(2)
तथा P2V2 = RT – \frac{a}{V_2} + P2b …(3)
अतः समीकरण (2) को (3) में से घटाने पर,
(P2V2 – P1V1) = a( \frac{1}{V_1} \frac{1}{V_2} ) – b(P1 – P2)

अब (P2V2 – P1V1) का उपर्युक्त मान समीकरण (1) में रखने पर,
W = 2a( \frac{1}{V_1} \frac{1}{V_2} ) – b(P1 – P2)

चूंकि \frac{a}{V_1} तथा \frac{a}{V_2} के मान अत्यंत अल्प है, अतः इसमें V का मान PV = RT से भी रखा जा सकता है, अर्थात V1 = \frac{RT}{P_1} तथा V2 = \frac{RT}{V_2} मान सकते हैं अतः
W = 2a( \frac{P_1}{RT} \frac{P_2}{RT} ) – b(P1 – P2)
या W = \frac{2a}{RT} (P1 – P2) – b(P1 – P2)
या W = ( \frac{2a}{RT} – b)(P1 – P2) …(4)

चूंकि यह माना गया है, कि निकाय पूर्णता ऊष्मारुध्द है। अतः इस कार्य W के लिए आवश्यक ऊर्जा, गैस की आंतरिक ऊर्जा से ही ली जाती है। फलस्वरूप गैस शीतल हो जाती है। यदि गैस के ताप में होने वाली कमी – ∆T ले, तब
W = – Cp.∆T (कैलोरी)

यहां Cp नियत दाब पर गैस की आण्विक विशिष्ट ऊष्मा है। तब

– Cp.∆T = (P1 – P2).( \frac{2a}{RT} – b)
या ∆T = – \frac{(2a/RT - b)}{C_p} (P1 – P2) ….(5)

अर्थात् यही जूल-टाॅमसन प्रभाव में उत्पन्न “शीतलन” के लिए अभीष्ट व्यंजक है।
अतः समीकरण (5) से स्पष्ट होता है कि ∆T ∝ (P1 – P2)
अर्थात् “किसी ताप पर शीतलन प्रभाव, सरंध्र डॉट के दोनों और दाबान्तर के अनुक्रमानुपाती होता है।

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व्युत्क्रमण ताप क्या है

अब यदि चूंकि P1 > P2, अतः P1 – P2 धनात्मक होगा। अतः समीकरण (5) से स्पष्ट है कि-
1.यदि ( \frac{2a}{RT} – b) धनात्मक है, अर्थात् T < \frac{2a}{Rb} , तब राशि ∆T ऋणात्मक होगी। अर्थात् यदि गैस के प्रारंभिक ताप का मान \frac{2a}{Rb} से कम है, तो गैस पर “शीतलन प्रभाव” होगा।

2.यदि ( \frac{2a}{RT} – b) ऋणात्मक है, अर्थात् T > \frac{2a}{Rb} , तब राशि ∆T धनात्मक होगी। अर्थात् यदि गैस के प्रारंभिक ताप का मान \frac{2a}{Rb} से कम है, तो गैस पर “तापन-प्रभाव” होगा।

3.यदि ( \frac{2a}{RT} – b) का मान शून्य हैं, अर्थात् T = \frac{2a}{Rb} , तब ∆T = 0 अर्थात् गैस का ताप अपरिवर्तनीय रहेगा।
अथवा जिस ताप पर जूल-टाॅमसन प्रभाव में ताप परिवर्तन शून्य होता है, उसे “व्युत्क्रमण ताप” कहते हैं। इसे Ti से प्रदर्शित करते हैं, अतः व्युत्क्रमण ताप
\footnotesize \boxed{ T_i = \frac{2a}{Rb} } ….(6)

हाइड्रोजन तथा हीलियम गैसों द्वारा तापन-प्रभाव

चूंकि हाइड्रोजन तथा हीलियम के व्युत्क्रमण ताप क्रमशः -80°C तथा -240°C होते हैं, जो कमरे के ताप से काफी कम है। अतः यह दोनों गैसें सामान्य ताप पर तापन प्रभाव दर्शाती है। जबकि अन्य गैसें ऐसा नहीं करती।

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व्युत्क्रमण ताप तथा क्रांतिक ताप में संबंध

वाण्डर वाल्स नियतांकों a तथा b के पदों में व्युत्क्रमण ताप Ti तथा क्रांतिक ताप Tc निम्न है
Ti = \frac{2a}{Rb} तथा Tc = \frac{8a}{27bR}
इसलिए,
\frac{T_i}{T_c} = \frac{27}{4} = 6.75
स्पष्ट है कि “निष्पत्ति \frac{T_i}{T_c} गैस की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती है।” तो अतः

\footnotesize \boxed{ T_i = 6.75 T_c }

यही व्युत्क्रमण ताप तथा क्रांतिक ताप में संबंध कहलाता है।

Note – सम्बन्धित प्रश्न –
Q. 1 जूल-टाॅमसन प्रभाव क्या है? किसी वान्डरवाल्स गैस में उत्पन्न जूल-टाॅमसन शीतलन के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए तथा समझाइए कि साधारण ताप पर हाइड्रोजन तथा हीलियम गैसें तापन प्रभाव क्यों दर्शाती हैं? जबकि अन्य गैसें नहीं । दर्शाइए कि व्युत्क्रमण ताप तथा क्रांतिक ताप की निष्पत्ति गैस की प्रकृति पर निर्भर नहीं करती है?
Q. 2 जूल-थॉमसन प्रभाव क्या है? किसी वाण्डर वाल्स गैस में उत्पन्न जूल-थॉमसन शीतलन के लिए व्यंजक प्राप्त कीजिए तथा स्पष्ट कीजिए कि साधारण ताप पर हाइड्रोजन व हीलियम गैसें ‘तापन-प्रभाव’ क्यों दर्शाती हैं। जबकि अन्य गैसें ऐसा नहीं।
Q. 3 जूल-टाॅमसन प्रभाव क्या है? शीतलन के लिए सूत्र ज्ञात कीजिए तथा व्युत्क्रमण ताप किसे कहते हैं? हाइड्रोजन तथा हीलियम द्वारा गैसों का तापन ज्ञात कीजिए?

  1. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
  2. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  3. मौलिक परिपथ एवं आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स नोट्स (Circuit Fundamental and Basic Electronics)
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