जैनेंद्र कुमार: जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय” (jainendra kumar biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने जैनेन्द्र कुमार का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, उपन्यास, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और जैनेंद्र कुमार जी की कहानियों की विशेषताएँ को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने जैनेन्द्र कुमारजी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

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जैनेंद्र कुमार का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने जैनेन्द्र जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
जैनेंद्र कुमार की जीवनी –

नामजैनेन्द्र कुमार
वास्तविक नामआनन्दी लाल
जन्म तिथि02 जनवरी, 1905 ई०
जन्म स्थानउत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के कौड़ियागंज कस्बे में
मृत्यु तिथि24 दिसम्बर, 1988 ई०
पिता का नामश्री प्यारेलाल
माता का नामश्रीमती रमादेवी
पैशालेखक, उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार
साहित्य कालआधुनिक काल
लेखन विधागद्य साहित्य
भाषासरल एवं सुबोध हिन्दी भाषा
शैलीविचारात्मक, वर्णनात्मक
प्रमुख रचनाएंप्रस्तुत प्रश्न, पूर्वोदय, परख, सुनीता, त्यागपत्र, फांसी, ये और वे आदि।
पुरस्कारसाहित्य अकादमी पुरस्कार
साहित्य में स्थानउपन्यासकार, कहानीकार एवं निबंधकार के रूप में हिंदी साहित्य में विशिष्ट स्थान है।

आधुनिक हिन्दी जगत् में जैनेन्द्र कुमार जी (jainendra kumar ka jivan parichay) (1905-1988) का एक विशिष्ट स्थान है। ये प्रेमचन्दोत्तर युगीन धारा के श्रेष्ठ कथाकार के रूप में विख्यात हैं। इन्होंने उपन्यास, कहानी, निबन्ध तथा संस्मरण आदि अनेक गद्यविधाओं को स्वलेखनी से समृद्ध किया है। इनके निबन्ध चिन्तन प्रधान एवं विचारात्मक हैं।

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जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय

प्रेमचन्दोत्तर युग के श्रेष्ठ कथाकार जैनेन्द्र कुमारजी का जन्म 02 जनवरी, सन् 1905 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के कौड़ियागंज नामक कस्बे में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री प्यारेलाल और माता का नाम श्रीमती रमादेवी था। इनके जन्म के दो वर्ष बाद ही इनके पिता की मृत्यु हो गयी। इनका पालन-पोषण इनकी माता और मामा ने किया। इनका बचपन का नाम आनन्दी लाल था, इनकी प्रारम्भिक शिक्षा हस्तिनापुर के जैन गुरुकुल ऋषि ब्रह्मचर्याश्रम में हुई। सन् 1912 ई० में इन्होंने गुरुकुल छोड़ दिया।

जैनेंद्र कुमार
जैनेंद्र कुमार का जीवन परिचय

सन् 1919 ई० में जैनेंद्र कुमार जी ने मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया, किन्तु सन् 1921 ई० के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण इनकी शिक्षा का क्रम टूट गया। सन् 1921 ई० से 1923 ई० के बीच इन्होंने अपनी माता की सहायता से व्यापार किया और उसमें सफलता प्राप्त की। सन् 1923 ई० में ये नागपुर पहुँच गये और राजनीतिक पत्रों में संवाददाता के रूप में कार्य करने लगे। उसी समय इन्हें गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया जहाँ ये तीन माह तक रहे। इनमें स्वाध्याय की प्रवृत्ति छात्र जीवन से ही थी। जेल में स्वाध्याय के साथ ही इन्होंने साहित्य सृजन का कार्य भी प्रारम्भ किया।

जैनेंद्र कुमार जी के प्रथम प्रकाशित उपन्यास ‘परख’ पर साहित्य अकादमी ने 500/- रु० का पुरस्कार प्रदान किया। तथा इनकी पहली कहानी- ‘खेल’ सन् 1928 ई० में ‘विशाल भारत’ में प्रकाशित हुई थी। इसके बाद ये निरन्तर साहित्य-सृजन में प्रवृत्त रहे। 24 दिसम्बर, सन् 1988 ईस्वी को इस महान् साहित्यकार का देहावसान हो गया था।

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जैनेन्द्र कुमार का साहित्यिक परिचय

जैनेन्द्र जी की साहित्य-सेवा का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। मौलिक कथाकार के रूप में तो इनकी विशेष पहचान है ही, साथ-ही निबन्धकार और विचारक के रूप में भी इन्होंने अद्भुत प्रतिभा दिखायी है। इन्होंने साहित्य, कला, धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान, समाज, राष्ट्र आदि अनेक विषयों को लेकर निबंध रचना की है। इनके निबंध चिन्तन-प्रधान और विचारात्मक हैं। इनका विचार करने का अपना ढंग है। कभी विषय को सीधे उठा लेना, कभी कुछ दूसरे प्रसंगों की चर्चा करते हुए मूल विषय पर आना, कभी मूल विषय के केन्द्रीय विचार-सूत्र की व्याख्या करते हुए विषय-विस्तार करना, कभी किसी कथा-सन्दर्भ को प्रस्तुत करके उसके भीतर के विचार-सूत्र को निकालकर आगे बढ़ाना और कभी पाठकों को आमंत्रित करके उनके साथ बातचीत करते हुए एक परिचर्चा के रूप में प्रतिपाद्य विषय को प्रस्तुत करना, इनकी विचार-पद्धति की विविध भंगिमाएँ हैं। किसी भी प्रश्न पर विचार करते हुए ये उसके आंतरिक पक्ष को विशेष महत्त्व देते हैं। इसलिए इनके निबंधों में दर्शन, मनोविज्ञान और अध्यात्म के शब्दों का प्रयोग अधिक हुआ है। विचार की निजी शैली के कारण ही इनके निबंधों में व्यक्तिनिष्ठता आ गयी है।

जैनेन्द्र कुमार की प्रमुख रचनाएँ

जैनेन्द्र जी ने कहानी, उपन्यास, निबंध, संस्मरण आदि अनेक गद्य-विधाओं को समृद्ध किया है। इनकी प्रमुख रचनाएं एवं कृतियाँ निम्नांकित हैं—

निबंध-संग्रह — 1. प्रस्तुत प्रश्न, 2. जड़ की बात, 3. पूर्वोदय, 4. साहित्य का श्रेय और प्रेय, 5. मंथन, 6. सोच-विचार, 7. काम, 8. प्रेम और परिवार आदि।

उपन्यास — 1. परख, 2. सुनीता, 3. त्याग-पत्र, 4. कल्याणी, 5. विवर्त, 6. सुखदा, 7. व्यतीत, 8. जयवर्धन, 9. मुक्तिबोध आदि।

कहानी-संग्रह — 1. फाँसी, 2. जयसंधि, 3. वातायन, 4. नीलमदेश की राजकन्या, 5. एक रात, 6. दो चिड़ियाँ, 7. पाजेब आदि। (इन संग्रहों के बाद जैनेन्द्र की समस्त कहानियाँ दस भागों में प्रकाशित की गयी हैं।)

संस्मरण — 1. ये और वे आदि।

अनुवाद — 1. मन्दालिनी (नाटक), 2. पाप और प्रकाश (नाटक), 3. प्रेम में भगवान् (कहानी संग्रह) आदि।
उपर्युक्त रचनाओं के अतिरिक्त इन्होंने संपादन कार्य भी किया है।

जैनेंद्र कुमार की भाषा शैली

मुख्य रूप से जैनेन्द्रजी की भाषा के दो रूप दिखाई देते हैं- भाषा का सरल, सुबोध रूप तथा संस्कृतनिष्ठ भाषा । मुहावरों और कहावतों का सजीव प्रयोग इन्होंने अपनी रचनाओं में किया है। भाव को भली प्रकार से व्यक्त करने की क्षमता इनकी भाषा में सहज रूप से विद्यमान है।

जैनेन्द्र जी के निबंधों की भाषा मूलतः चिन्तन की भाषा है। ये सोचा हुआ न लिखकर सोचते हुए लिखते हैं। इसलिए इनके विचारों में कहीं-कहीं उलझाव आ जाता है। इनकी विचारात्मक शैली में प्रश्न, उत्तर, तर्क, युक्ति, दृष्टान्त आदि तत्त्वा का समावेश उसे गूढ़ता प्रदान करता है। शब्द चयन में जैनेन्द्र का दृष्टिकोण उदार है। ये सही बात को सही ढंग से उपयुक्त शब्दावली में कहना चाहते हैं। इसके लिए इन्हें चाहे अंग्रेजी से शब्द लेना पड़े, चाहे उर्दू से, चाहे संस्कृत के तत्सम शब्दों का चयन करना पड़े, चाहे ठेठ घरेल जीवन के शब्दों को ग्रहण करना हो, इन्हें इसमें कोई संकोच नहीं होता।

वस्तुतः जैनेन्द्र की शैली इनके व्यक्तित्त्व का ही प्रतिरूप है। हिन्दी साहित्य के विद्वानों के समक्ष ‘जैनेन्द्र ऐसी उलझन हैं जो पहले से भी अधिक गूढ़ है।’ इनके व्यक्तित्त्व का यह सुलझा हुआ उलझाव इनकी शैली में भी लक्षित होता है। अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए इन्होंने विचारात्मक, विवरणात्मक, प्रश्नात्मक, भावात्मक, मनोविश्लेषणात्मक आदि शैलियों का प्रयोग किया है।

जैनेन्द्र कुमार जी का निबंध

प्रस्तुत निबंध ‘भाग्य और पुरुषार्थ’ में जैनेन्द्रजी ने भाग्य और पुरुषार्थ के सम्बन्ध में मौलिक दृष्टि से विचार किया है। इनके अनुसार ये दोनों एक दूसरे के विरोधी न होकर सहवर्ती हैं। भाग्य तो विधाता का ही दूसरा नाम है। विधाता की कृपा को पहचानना ही भाग्योदय है। मनुष्य का सारा पुरुषार्थ विधाता की कृपा प्राप्त करने में ही है। विधाता की कृपा प्राप्त होते ही मनुष्य के कर्त्तापन का अहंकार मिट जाता है और उसका भाग्योदय हो जाता है।

जैनेंद्र कुमार का साहित्य में स्थान

मनोविश्लेषणात्मक लेखन में जैनेन्द्र कुमारजी को साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त है। मनोवैज्ञानिक उपन्यास एवं कहानी की इन्होंने एक विशेष विधा प्रारम्भ की। इनके चिन्तन तथा नवीन शैली विधान ने हिन्दी साहित्य को नव दिशा प्रदान की है जिसके लिए ये चिरस्मरणीय रहेंगे।

FAQs. जैनेंद्र कुमार जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. जैनेन्द्र कुमार का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

जैनेंद्र कुमार का जन्म अलीगढ़ जिले के कौड़ियागंज नामक कस्बे में 2 जनवरी, सन् 1905 ईस्वी को हुआ था।

2. जैनेंद्र कुमार के माता पिता का नाम क्या था?

जैनेन्द्र कुमार के पिता का नाम श्री प्यारेलाल और माता का नाम श्रीमती रमादेवी था।

3. जैनेंद्र कुमार का पूर्व नाम क्या था?

इनका मूल नाम आनन्दीलाल था मूल नाम त्याग कर इन्होंने अपना नाम जैनेन्द्र कुमार रख लिया।

4. जैनेन्द्र कुमार की कहानियों की मुख्य संवेदना क्या है?

जैनेन्द्र की कहानियाँ स्त्री और प्रकृति के साथ होने वाले भेदभाव और उनके संघर्षपूर्ण जीवन का मुखरित दस्तावेज है। वैवाहिक संस्था और पुरुषवादी मानसिकता के पीछे स्त्रियों का शोषण हो रहा है तो वहीं मानवों की अतृप्त इच्छाओं की वजह से प्रकृति का दोहन हो रहा है।

5. जैनेंद्र की पहली कहानी कौन सी है?

जैनेंद्र कुमार जी की प्रथम कहानी ‘खेल’ जो सन् 1928 में ‘विशाल भारत’ में प्रकाशित हुई। इसके बाद यें कहानी और उपन्यास निरंतर लिखते रहें। कहानी के रूप में इन्होंने कथा-साहित्य में एक नवीन युग की स्थापना की। इन्होने कहानी को कला की दृष्टि से आधुनिक रूप प्रदान किया।

6. जैनेंद्र कुमार की प्रसिद्ध रचना कौन सी है?

जैनेन्द्र कुमार जी की प्रमुख कृतियाँ इस प्रकार हैं- कहानी संग्रह – फाँसी, एक रात, स्पर्धा, पाजेब, वातायन, नीलम देश की राजकन्या, ध्रुवयात्रा, दो चिड़ियाँ आदि। ‘जैनेन्द्र की कहानियाँ’ नाम से दस भागों में आपकी कहानियाँ संग्रहीत हैं। उपन्यास- सुनीता, त्याग-पत्र, परख, कल्याणी, जयवर्द्धन, विवर्त, सुखदा, मुक्तिबोध आदि आपके प्रसिद्ध उपन्यास हैं। निबन्ध-संग्रह – प्रस्तुत प्रश्न, पूर्वोदय, जड़ की बात, साहित्य का श्रेय और प्रेम, मन्थन, गांधी-नीति, काम प्रेम और परिवार आदि। संस्मरण- ये और वे। अनुवाद – मन्दाकिनी (नाटक), पाप और प्रकाश (नाटक), प्रेम में भगवान् (कहानी संग्रह) आदि।

7. जैनेंद्र कुमार की मृत्यु कब और कहां हुई?

जैनेन्द्र कुमार जी की मृत्यु 24 दिसंबर, सन् 1988 ईस्वी में नई दिल्ली, भारत में हुई थी।

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