डॉ रामकुमार वर्मा – जीवन परिचय, रचनाएं, एकांकी, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “डॉ रामकुमार वर्मा का जीवन परिचय” (Dr Ramkumar Verma biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने रामकुमार वर्मा का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, एकांकी, भाषा शैली और डॉ रामकुमार वर्मा की एकांकी कला की विशेषता को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

इसके अलावा, इसमें हमने डॉ रामकुमार वर्मा जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप वर्मा जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं, तो आप इस आर्टिकल को लास्ट तक अवश्य पढ़ें।

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डॉ रामकुमार वर्मा का संक्षिप्त परिचय

तो दोस्तों इसमें हमने रामकुमार वर्मा जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
डॉ रामकुमार वर्मा की जीवनी –

पूरा नामडॉ रामकुमार वर्मा
जन्म15 सितम्बर, 1905 ई. में
जन्म स्थानमध्य प्रदेश के सागर जिले के गोपालगंज ग्राम में
मृत्यु05 अक्टूबर, 1990 ई. में
मृत्यु स्थानप्रयागराज, उत्तर प्रदेश
पिता का नामश्री लक्ष्मीप्रसाद वर्मा
माता का नामश्रीमती राजरानी देवी
शिक्षाप्रयाग विश्वविद्यालय से एम० ए०,
नागपुर विश्वविद्यालय से पी०-एच०डी०
व्यवसायलेखक, एकांकीकार, आलोचक, कवि और नाटककार
उपाधिडी०-लिट्० (डॉक्टर्स ऑफ़ लेटर्स)
साहित्य कालछायावादी युग, आधुनिक काल
लेखन विधाएकांकी, आलोचना, कविता, नाटक
पुरस्कारपद्मभूषण, साहित्य वाचस्पति, देव पुरस्कार
भाषाखड़ीबोली
शैलीवर्णनात्मक, संवाद-शैली
प्रमुख रचनाएंपृथ्वीराज की आंखें, दीपदान, चारुमित्रा, वीर हमीर, चित्तौड़ की चिता, अंजलि, शिवाजी, औरंगजेब की आखिरी रात, कबीर का रहस्यवाद आदि।
हिंदी साहित्य में स्थानहिन्दी एकांकीकारों में सर्वप्रथम स्थान

डॉ रामकुमार वर्मा (15 सितंबर, 1905 – 05 अक्टूबर, 1990) का हिंदी एकांकी नाट्य व प्रणेताओं में सर्वप्रथम स्थान है, इन्हें एकांकी का जनक भी माना जाता है। इन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं, पौराणिक संदर्भों, समसामयिक समस्याओं एवं जीवन दृष्टियों को अपनी एकांकी रचना का आधार बनाया। सामाजिकता एवं ऐतिहासिकता को एक सी स्वाभाविकता के साथ नाटकीय रूप प्रदान कर लोगों को यथार्थ दर्शन करा देने वाले सफल रचनाकार वर्मा जी के लिए ही संभव है।

डॉ रामकुमार वर्मा का जीवन परिचय

रामकुमार वर्मा जी का जन्म 15 सितम्बर, सन् 1905 ईस्वी को मध्य प्रदेश के सागर जिले के गाॅंव गोपालगंज में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री लक्ष्मीप्रसाद था, जो मध्य प्रदेश में एक डिप्टी कलेक्टर थे। तथा इनकी माता का नाम श्रीमती राजरानी देवी था। वर्मा जी की प्रारम्भिक शिक्षा मध्य प्रदेश में हुई। उच्च शिक्षा इन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर (एम०ए०) तथा नागपुर विश्वविद्यालय से (‘हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास’ विषय पर) पी-एच०डी० की उपाधियां प्राप्त की। ये अनेक वर्षों तक प्रयाग विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे थे।

डॉ रामकुमार वर्मा
डॉ रामकुमार वर्मा का जीवन परिचय

डॉ रामकुमार वर्मा जी ने विदेशों में भी हिंदी का शिक्षण कार्य किया था। मॉस्कों में ये हिंदी के प्रोफेसर भी रहे और श्रीलंका में इन्होंने भारतीय हिंदी साहित्य और संस्कृति का प्रचार-प्रसार कार्य किया। बचपन से ही इन्हें अभिनेता बनने का शौक था। इसी कारण ये आरंभ से ही रंगमंच से जुड़े रहे। हिंदी साहित्य में कवि, नाटककार, एकांकी और आलोचक के रूप में इनका प्रमुख स्थान है। हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा इन्हें “साहित्य वाचस्पति” तथा भारत सरकार द्वारा इन्हें “पद्म-भूषण” की उपाधि से अलंकृत किया गया और मध्य प्रदेश सरकार द्वारा इन्हें “देव पुरस्कार” से भी सम्मानित किया गया था। 05 अक्टूबर, सन् 1990 ईस्वी को प्रयाग, उत्तर प्रदेश में डॉ रामकुमार वर्मा जी का देहावसान हो गया था।

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डॉ रामकुमार वर्मा का साहित्यिक परिचय

डॉ. वर्मा की एकांकी कला बहुमुखी रूप में विकसित हुई है। इन्होंने ऐतिहासिक, सामाजिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक, पौराणिक, समस्या- प्रधान, भौतिक तथा हास्य-व्यंग्य पूर्ण एकाकियों की रचना की है। वे सभी प्रकार के एकांकियों की रचना करने में सफल रहे हैं, किन्तु ऐतिहासिक एकांकियों में इनकी प्रतिभा सबसे अधिक निखरी है। ऐसे नाटकों में इन्होंने इतिहास की भ्रांतियों का निराकरण कर, इन्हें आधुनिक प्रासंगिकता में देखा है। जड़ीभूत रूढ़ियों पर प्रहार कर सामाजिकों को समाधान की कृष्ण छाया में बिठाया है। ‘औरंगजेब की आखिरी रात’ भी उसी प्रकार की एकांकी है, जिसमें जीवन भर साम्राज्य की लालसा पूर्ति के लिए रक्त संबंधों को भी दफन कर देने वाले क्रूर औरंगजेब के व्यक्तित्व के मानवीय पहलू को उद्घाटित करने का प्रयास किया गया है।

अन्तिम साँसें गिन रहे औरंगजेब को पश्चात्ताप की अग्नि में जलते हुए दिखाकर लेखक ने उसके आंचल पर लगे सगे-संबंधियों के खून के बदनुमा दागों को धोने का प्रयास किया है। “मैं और मेरी सल्तनत” में ही जीवन की सार्थकता तलाशने वाले औरंगजेब की मृत्यु शय्या के पास सिवाय उसकी पुत्री के किसी की मौजूदगी नहीं। वह अकेले ही इस दुनिया से रुखसत हो रहा है इसके कारणों का एहसास तो उसे हो चुका है, पर पश्चात्ताप का समय नहीं है उसके पास। लेखक भौतिकता की अंधी दौड़ में दौड़ते, संबंधों की ऊष्मा को सोखने वाली परिस्थितियों का निर्माण करते मानव को अन्त समय में एकाकीपन, शून्यता और निरर्थकता बोध की पीड़ा झेलते हुए, मात्र पश्चात्ताप की अनुभूति मन में लिए संसार से विदा हो जाने के स्थान पर समय रहते अपनी सांसारिक ऐषणाओं पर लगाम तथा मानवीय संबंधों एवं मूल्यों को तरजीह देने की अपनी दृष्टि को बड़ी साफगोई के साथ देश की युवा पीढ़ी के समक्ष रखना चाहता है। इसके लिए उसने इतिहास के पृष्ठों का अत्यन्त खूबसूरत माध्यम चुना है।

डॉ रामकुमार वर्मा का साहित्यिक अवदान

डॉ वर्मा जी ने अपने अन्य ऐतिहासिक एकांकियों के समान प्रस्तुत एकांकी में भी वर्मा जी ने भारतीय अतीत से एक मर्मस्पर्शी घटना का चयन करते हुए ध्यान रखा कि संकलन-त्रय का पूर्ण निर्वाह हो सके। कथावस्तु, काल तथा स्थान तीनों का संकलन घटनाओं को ऐसा गुम्फित कर देता है कि वे केन्द्रित होकर एक ही दृश्य में सिमट जाती हैं। पात्रों का संयोजन घटनाओं के प्रवाह में हुआ है, पात्रों की चारित्रिक विशेषताओं को मनोवैज्ञानिक आधार देना वर्माजी की एकांकी कला की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता है। सांस्कृतिक दृष्टिकोण से वे अपने क्षेत्र में प्रसाद और प्रेमचंद के समकक्ष रखे जा सकते हैं क्योंकि उन्होंने भारतीय इतिहास के चरित्रों का विश्लेषण कर उनमें ऐसी प्राण प्रतिष्ठा की है, जो ऐतिहासिक सत्य से ओत-प्रोत होते हुए भी जीवन के स्पंदन से सजीव है। प्रस्तुत एकांकी में वर्माजी ऐतिहासिक दायित्व को निभाते हुए प्रत्येक प्रसंग के नाटकीय क्षणों को चुस्ती के साथ प्रस्तुत करने में समर्थ हुए हैं।

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रामकुमार वर्मा की प्रमुख रचनाएं

डॉ रामकुमार वर्मा जी की प्रमुख रचनाएं एवं कृतियां इस प्रकार है – पृथ्वीराज की ऑंखें, दीपदान, चारुमित्रा, वीर हमीर, चित्तौड़ की चिता, अंजलि, शिवाजी, औरंगजेब की आखिरी रात, कबीर का रहस्यवाद, बादल की मृत्यु, रेशमी टाई, रिमझिम, अभिशाप, जौहर और साहित्य समालोचना आदि इनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

डॉ रामकुमार वर्मा की एकांकी है

  • पृथ्वीराज की ऑंखें
  • रेशमी टाई
  • चार ऐतिहासिक एकांकी
  • रूपरंग
  • कौमुदी महोत्सव
  • मयूर-पंख
  • रजत-रश्मि
  • ऋतुरात
  • बहुरंगी-नाटक
  • इन्द्रधनुष
  • सप्त-किरण
  • दीपदान
  • चारुमित्रा
  • रिमझिम
  • विभूति ।

रामकुमार वर्मा की कविताएं

  • वीर हमीर
  • चित्तौड़ की चिता
  • अंजलि
  • हिन्दी गीतिकाव्य
  • चित्ररेखा
  • आधुनिक हिन्दी काव्य
  • जौहर
  • अभिशाप
  • निशीथ
  • एकलव्य ।

डाॅ रामकुमार वर्मा के नाटक

  • शिवाजी
  • समुद्रगुप्त का परिक्रमा
  • चारुमित्र
  • तैमूर की हार
  • औरंगजेब की आखिरी रात
  • नाना फड़नवीस
  • अशोक का शोक
  • कला और कृपाल
  • जौहर की ज्योति
  • महाराणा प्रताप
  • विजय पर्व
  • सागर स्वर
  • कुंजी का परिताप
  • पृथ्वी का स्वर्ग ।

डॉ रामकुमार वर्मा के आलोचना

  • साहित्य समालोचना
  • कबीर का रहस्यवाद
  • हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास ।

डॉ रामकुमार वर्मा की एकांकी कला की विशेषता

वर्मा जी के एकांकी उच्च मानवीय भावनाओं से परिपूर्ण है, इनके एकांकियों की पृष्ठभूमि भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत है। भारतीय आदर्शों का इतना कलात्मक चित्रण करने में डॉ० रामकुमार वर्मा जी के जोड़ का कोई भी ऐतिहासिक एकांकीकार हिंदी साहित्य में नहीं है। मनोवैज्ञानिकता का समावेश कर पात्रों के चरित्र को उभारने की कला में डॉ० वर्मा जी अद्वितीय हैं।

डॉ रामकुमार वर्मा जी के एकांकी चरित्रिक द्वंद्व प्रधान है। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ एकांकियों की रचना केवल चारित्रिक अंतर्द्वंद्व को दर्शाने के लिए ही की गई है। नारी के प्रति इनका दृष्टिकोण आदर्शात्मक है। संवाद-शिल्प के स्तर पर वर्मा जी के एकांकियों के संबंध में कहा जा सकता है कि वे उनकी निजी विशेषताओं को उजागर करने वाले तथा कथ्य-कथानक की मूल आत्मा के सर्वथा अनुरूप हैं। उनमें संक्षिप्तता, स्वाभाविकता, भावपूर्णता और रोचकता आदि सभी शिल्पगत् गुण देने को मिलते हैं फिर भी कई स्थलों पर लंबे-लंबे अखरने और उबारने वाले संवाद देखने को मिल जाते हैं जिनमें कथा-प्रवाह में शिथिलता आ जाती है।

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रामकुमार वर्मा की भाषा शैली

डॉ रामकुमार वर्मा जी की भाषा आम बोलचाल की धाराप्रवाह खड़ीबोली है। इनकी भाषा अत्यन्त सरल, सहज, भावानुकूल, प्रसंगानुकूल व पात्रानुकूल है। पात्रानुकूल भाषा का ध्यान रखते हुए ही इन्होंने अपनी इस एकांकी में उर्दू-फारसी शब्दावली का खुलकर प्रयोग किया है, अन्यथा सामान्यतः इनकी भाषा तत्सम् व तद्भव शब्दावली युक्त है। इनकी भाषा में प्रसाद गुण सर्वत्र व्याप्त है। वाक्य विन्यास सरल, सहज, संक्षिप्त तथा रोचक है। संवाद गतिशील, रोचक तथा पात्रानुकूल हैं। दृश्य बिम्ब की प्रधानता है। ये अपनी एकाकियों में अभिद्या, लक्षणा व व्यंजना तीनों ही शब्द-शक्तियों का यथावश्यकता सुष्ठु प्रयोग करते हैं। लोकोक्तियों व मुहावरों का प्रयोग इनकी भाषा में आकर्षण उत्पन्न कर देता है। इनके एकांकियों में संवाद-शैली के साथ अनेक स्थलों पर वर्णनात्मक शैली का प्रयोग भी देखने को मिलता है।

डॉ रामकुमार वर्मा के पुरस्कार

  1. सन् 1963 ई. में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्मभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
  2. रामकुमार वर्मा जी को ‘चित्ररेखा’ कविता-संग्रह पर हिंदी का सर्वश्रेष्ठ ‘देव पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था।
  3. ‘सप्त-किरण’ एकांकी-संग्रह पर इन्हें ‘अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  4. मध्यप्रदेश शासन परिषद् द्वारा ‘विजय पर्व’ नाटक पर इन्हें प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
  5. स्विट्जरलैंड के विश्वविद्यालय द्वारा इन्हें ‘डी०-लिट्०’ की उपाधि से अलंकृत किया गया था।
  6. हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा इन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से विभूषित किया गया था।
  7. इसके अलावा, डॉ रामकुमार वर्मा जी को रत्न साहित्य और सर्वश्रेष्ठ नाटककार रतन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

डॉ रामकुमार वर्मा का साहित्य में स्थान

डॉक्टर वर्मा जी की रचनात्मक प्रतिभा बहुमुखी है वे हिंदी के छायावादी धारा के सुप्रसिद्ध कवि, नाटककार और समालोचक थे, परन्तु कवि और समालोचक की अपेक्षा नाटककार, विशेष रूप से एकांकीकार के रूप में अधिक लोकप्रिय और विख्यात हैं। डॉ० वर्मा जी ने सामाजिक, पौराणिक, वैज्ञानिक और ऐतिहासिक सभी विषयों पर एकांकी लिखीं हैं किंतु ऐतिहासिक एकांकीकार के रूप में इनकी प्रतिष्ठा अद्वितीय स्थान पर रही है।

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FAQs. डॉ रामकुमार वर्मा जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. डॉ रामकुमार वर्मा का जन्म कब और कहां हुआ था?

डॉ रामकुमार वर्मा का जन्म 15 सितंबर, 1905 ईस्वी को मध्य प्रदेश के सागर जिले के गोपालगंज ग्राम में हुआ था।

2. डॉ रामकुमार वर्मा की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

डॉ रामकुमार वर्मा की मृत्यु 05 अक्टूबर, 1990 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद (वर्तमान प्रयागराज) में हुई थी।

3. डॉ रामकुमार वर्मा के माता पिता का नाम क्या था?

डॉ रामकुमार वर्मा के पिता का नाम श्री लक्ष्मीप्रसाद वर्मा तथा माता का नाम श्रीमती राजरानी देवी था।

4. डॉ रामकुमार वर्मा की एकांकी का नाम क्या है?

डॉ रामकुमार वर्मा के प्रमुख एकांकी-संग्रह निम्नलिखित है – पृथ्वीराज की ऑंखें, चारुमित्रा, रेशमी टाई, सप्त-किरण, कौमुदी महोत्सव, दीपदान, रजत-रश्मि, रिमझिम, विभूति आदि।

5. रामकुमार वर्मा की प्रथम एकांकी कौन सी है?

डॉ रामकुमार वर्मा की प्रथम एकांकी-संग्रह “बादल की मृत्यु” है जो सन् 1930 ईस्वी में प्रकाशित हुआ था।

6. औरंगजेब की आखिरी रात के लेखक कौन हैं?

औरंगजेब की आखिरी रात नाटक के रचनाकार डॉ रामकुमार वर्मा जी हैं।

7. डॉ रामकुमार वर्मा द्वारा रचित दीपदान एकांकी में कुल कितने पत्र हैं?

दीपदान एकांकी में कुल 5 पात्र हैं। दीपदान एकांकी डॉ रामकुमार वर्मा द्वारा लिखा गया एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाला एकांकी संग्रह है।

8. हिंदी एकांकी का जनक कौन है?

आधुनिक हिंदी एकांकी का जनक डॉ रामकुमार वर्मा जी को माना जाता है।

9. डॉ रामकुमार वर्मा को कौन कौन से पुरस्कार मिले थे?

डॉ रामकुमार वर्मा जी को निम्न पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है उनमें कुछ इस प्रकार है – पद्मभूषण, साहित्य वाचस्पति, देव पुरस्कार, डी०-लिट्०, अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन आदि।

10. रामकुमार वर्मा की कौन कौन सी रचना है?

डॉ रामकुमार वर्मा जी की प्रमुख रचनाएं निम्न प्रकार है – पृथ्वीराज की ऑंखें, दीपदान, चारुमित्रा, वीर हमीर, चित्तौड़ की चिता, अंजलि, शिवाजी, औरंगजेब की आखिरी रात, कबीर का रहस्यवाद, बादल की मृत्यु, रेशमी टाई, रिमझिम, अभिशाप, अशोक का शोक, कला और कृपाल, जौहर की ज्योति, महाराणा प्रताप, विजय पर्व, सागर स्वर, कुंजी का परिताप, पृथ्वी का स्वर्ग, जौहर और साहित्य समालोचना आदि इनकी प्रमुख रचनाएं हैं।

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