डॉ सम्पूर्णानंद: जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान एवं हिन्दी व संस्कृत के महान ज्ञाता डॉ सम्पूर्णानंद थे। इनका हिन्दी से विशेष प्रेम था। इन्होंने भारतीय दर्शन एवं धर्म के गूढ़ तत्त्वों को समझकर सुबोध शैली में उच्चकोटि के लेख लिखें। ये ‘समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे।’ तथा ये बहुमुखी प्रतिभा के सम्पन्न साहित्यकार एवं उच्चकोटि के लेखक, पत्रकार, राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी थे, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको डाॅ० सम्पूर्णानन्द जी के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “डॉ सम्पूर्णानंद का जीवन परिचय” (Dr Sampurnanand biography in Hindi) के बारे में बताया है। इसमें हमने डॉक्टर संपूर्णानंद का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, निबंध, भाषा शैली, पुरस्कार एवं हिंदी साहित्य में स्थान और डॉ० सम्पूर्णानन्द के राजनीतिक कार्य को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है।
इसके अलावा, इसमें हमने डॉक्टर संपूर्णानंद जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप भी सम्पूर्णानन्द जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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डॉ सम्पूर्णानंद का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने संपूर्णानंद जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
डॉ सम्पूर्णानंद की जीवनी –

पूरा नामडॉक्टर सम्पूर्णानन्द
जन्म तिथि01 जनवरी, 1890 ई० में
जन्म स्थानकाशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश में
मृत्यु तिथि10 जनवरी, 1969 ई० में
मृत्यु स्थानकाशी (वाराणसी)
पिता का नामश्री विजयानन्द
माता का नामश्रीमती आनन्दी देवी
शिक्षाबी० एस० सी० एवं एल० टी०
विद्यालयक्वीन्स कालेज (वाराणसी) एवं ट्रेनिंग कालेज (इलाहाबाद)
उपाधिसाहित्य वाचस्पति
नागरिकताभारतीय
पैशालेखक, साहित्यकार, सम्पादक, अध्यापक, राजनेता, स्वतंत्रता सेनानी
लेखन विधानिबंध, दर्शन, जीवनी, संपादन, राजनीति और इतिहास
साहित्य कालआधुनिक काल (स्वातन्त्र्योत्तर युग)
सम्पादनमर्यादा और टुडे (पत्रिका)
प्रसिद्धिश्रेष्ठ शिक्षाशास्त्री, कुशल राजनीतिज्ञ एवं मर्मज्ञ साहित्यकार के रूप में।
पार्टीभारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
पदराज्य के शिक्षामंत्री, गृहमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल रहे।
कार्य-कालमुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश)- सन् 1955 से 1960 ई. तक, राज्यपाल (राजस्थान)- सन् 1962 से 1967 ई. तक।
योगदानसम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना में विशेष योगदान दिया।
भाषाशुद्ध, परिष्कृत एवं साहित्यिक हिन्दी भाषा
शैलीविचारात्मक, व्याख्यात्मक और ओजपूर्ण शैली
प्रमुख रचनाएंसमाजवाद, आर्यों का आदि देश, चिद्विलास, गणेश, जीवन और दर्शन, भारत के देश राज्य, अन्तरिक्ष यात्रा, महात्मा गांधी, अन्तर्राष्ट्रीय विधान, चीन की राज्यक्रान्ति आदि।
पुरस्कार‘समाजवाद’ कृति पर मंगलाप्रसाद पारितोषिक पुरस्कार
साहित्य में स्थाननिबन्ध, ग्रन्थ और सम्पादन के क्षेत्र में इन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया हैं। एक मनीषी साहित्यकार के रूप में हिंदी-साहित्य में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान सदा बना रहेगा।
डॉ सम्पूर्णानंद की जीवनी

डॉ सम्पूर्णानंद का जीवन परिचय (Doctor Sampurnanand ka Jivan Parichay)

प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री, कुशल राजनीतिज्ञ एवं मर्मज्ञ साहित्यकार डॉ० सम्पूर्णानन्द का जन्म 01 जनवरी, सन् 1890 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के काशी के एक सम्भ्रांत कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम विजयानंद तथा माता का नाम आनंदी देवी था। संपूर्णानंद जी ने क्वीन्स कालेज, वाराणसी से बी०एस०सी० की परीक्षा पास करने के बाद ट्रेनिंग कालेज, इलाहाबाद से एल० टी० किया। इन्होंने एक अध्यापक के रूप में जीवन क्षेत्र में प्रवेश किया और सबसे पहले प्रेम महाविद्यालय, वृन्दावन में अध्यापक नियुक्त हुए। कुछ दिनों बाद इनकी नियुक्ति डूंगर कालेज, बीकानेर में प्रिंसिपल के पद पर हुई।

डॉ सम्पूर्णानंद
डॉ सम्पूर्णानंद का जीवन परिचय

सन् 1921 ई० में ये महात्मा गाँधी के राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रेरित होकर काशी लौट आये और ‘ज्ञान मण्डल’ में काम करने लगे। इन्हीं दिनों इन्होंने ‘मर्यादा’ मासिक पत्रिका और ‘टुडे’ अंग्रेजी दैनिक का सम्पादन किया और ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ के अध्यक्ष तथा संरक्षक भी रहे। वाराणसी में स्थित सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय इनकी ही देन है।

इन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रथम पंक्ति के सेनानी के रूप में कार्य किया और सन् 1936 ई० में प्रथम बार कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा के सदस्य चुने गये। सन् 1937 ई० में कांग्रेस मन्त्रिमंडल गठित होने पर ये उत्तर प्रदेश के शिक्षामन्त्री नियुक्त हुए। सन् 1955 ई० में ये उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री बने। सन् 1960 ई० में इन्होंने मुख्यमंत्री पद से त्याग-पत्र दे दिया। और सन् 1362 ई० में ये राजस्थान के राज्यपाल नियुक्त हुए। सन् 1967 ई० में राज्यपाल के पद से सेवामुक्त होने पर ये काशी लौट आये और काशी विद्यापीठ के कुलपति बने और जीवन के अन्तिम समय तक इसी पद पर कार्यरत रहे। 10 जनवरी, सन् 1969 ईस्वी को काशी में ही इस साहित्य-तपस्वी का निधन हो गया।

डॉ संपूर्णानंद का साहित्यिक परिचय

डॉ० सम्पूर्णानन्द एक उद्भट विद्वान् थे। हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी तीनों भाषाओं पर इनका समान अधिकार था। ये उर्दू और फारसी के भी अच्छे ज्ञाता थे। विज्ञान, दर्शन और योग इनके प्रिय विषय थे। इन्होंने इतिहास, राजनीति और ज्योतिष का भी अच्छा अध्ययन किया था। राजनीतिक कार्यों में उलझे रहने पर भी इनका अध्ययन-क्रम बराबर बना रहा। सन् 1940 ई० में ये अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति निर्वाचित हुए थे। हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने इनकी ‘समाजवाद’ कृति पर इन्हें “मंगलाप्रसाद पारितोषिक” पुरस्कार प्रदान किया था। इनको सम्मेलन की सर्वोच्च उपाधि “साहित्य वाचस्पति” भी प्राप्त हुई थी। काशी नागरी प्रचारिणी सभा के भी ये अध्यक्ष और संरक्षक थे। उत्तर प्रदेश के शिक्षामंत्री और मुख्यमंत्री के रूप में इन्होंने शिक्षा, कला और साहित्य की उन्नति के लिए अनेक उपयोगी कार्य किये। वाराणसी संस्कृत विश्वविद्यालय इनकी ही देन है।

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डॉ सम्पूर्णानंद का सामाजिक योगदान

डॉ० सम्पूर्णानन्द भारतीय दर्शन और संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान एवं हिन्दी व संस्कृत के महान ज्ञाता थे। इनका हिन्दी से विशेष प्रेम था। इन्होंने भारतीय दर्शन एवं धर्म के गूढ़ तत्त्वों को समझकर सुबोध शैली में उच्चकोटि के लेख लिखे। ये समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे। इन्होंने भारतीय दर्शन, धर्म, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, ज्योतिष आदि विविध विषयों पर उच्च कोटि के निबन्ध लिखे और उत्कृष्ट साहित्य का सृजन किया। इनकी रचनाओं में इनके प्रकाण्ड पाण्डित्य के दर्शन होते हैं। इन्होंने दर्शन की गूढ़ गुत्थियों को सुलझाते हुए ‘चिद्विलास’ नामक ग्रन्थ की रचना की। इनकी कृतियों में शिक्षा सम्बन्धी मौलिक चिन्तन तथा शिक्षा-जगत् की गम्भीर समस्याओं का समाधान पाया जाता है।

डॉ सम्पूर्णानंद की प्रमुख रचनाएं

डॉ० सम्पूर्णानन्द की प्रसिद्ध रचनाएं एवं कृतियाँ निम्नलिखित हैं— समाजवाद, आर्यों का आदि देश, चिद्विलास, गणेश, जीवन और दर्शन, अन्तर्राष्ट्रीय विधान, पुरुषसूक्त, व्रात्यकाण्ड, पृथिवी से सप्तर्षि मण्डल, भारतीय सृष्टि क्रम विचार, हिन्दू देव परिवार का विकास, वेदार्थ प्रवेशिका, चीन की राज्यक्रान्ति, भाषा की शक्ति तथा अन्य निबंध, अन्तरिक्ष यात्रा, स्फुट विचार, ब्राह्मण सावधान, ज्योतिर्विनोद, अधूरी क्रान्ति, भारत के देशी राज्य आदि।

उपर्युक्त ग्रंथों के अतिरिक्त इन्होंने सम्राट् अशोक, सम्राट् हर्षवर्धन, महादजी सिंधिया, चेतसिंह आदि इतिहास- प्रसिद्ध व्यक्तियों तथा महात्मा गाँधी, देशबन्धु चितरंजनदास जैसे आधुनिक महापुरुषों की जीवनियाँ तथा अनेक महत्त्वपूर्ण निबंध भी लिखे हैं।

डॉ सम्पूर्णानंद की रचनाओं का विवरण

नोट- विद्यार्थी ध्यान दें कि यहां हमने इनकी रचनाओं का सम्पूर्ण उल्लेख किया है जैसे कि डॉ० सम्पूर्णानन्द जी ने साहित्य, दर्शन, राजनीति, इतिहास तथा अन्य विषयों पर उच्चकोटि के ग्रन्थों की रचना की। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं—

  • निबन्ध-संग्रह ⇒ भाषा की शक्ति तथा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अनेक फुटकर निबन्ध।
  • दर्शन ⇒ चिद्विलास, जीवन और दर्शन आदि।
  • जीवनी ⇒ देशबन्धु चितरंजनदास, महात्मा गांधी आदि।
  • राजनीति और इतिहास ⇒ चीन की राज्यक्रान्ति, अन्तर्राष्ट्रीय विधान, मिस्र की राज्यक्रान्ति, समाजवाद, आर्यों का आदिदेश, सम्राट हर्षवर्धन, भारत के देशी राज्य आदि।
  • धर्म ⇒ गणेश, नासदीय सूक्त की टीका, पुरुष-सूक्त, ब्राह्मण सावधान आदि।
  • ज्योतिष ⇒ पृथ्वी से सप्तर्षि मण्डल ।
  • सम्पादन ⇒ ‘मर्यादा’ मासिक, ‘टडे’ अंग्रेजी दैनिक ।
  • अन्य प्रमुख रचनाएँ— इन रचनाओं के अतिरिक्त व्रात्यकाण्ड, भारतीय सृष्टि-क्रम विचार, हिन्द देव परिवार का विकास, वेदार्थ प्रवेशिका अन्तरिक्ष यात्रा, स्फुट विचार, ज्योतिर्विनोद, अधुरी क्रान्ति आदि इनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ हैं।

इस प्रकार इन्होने विविध विषयों पर लगभग 25 ग्रन्थों की तथा अनेक स्वतन्त्र लेखों की रचना की। इनकी ‘समाजवाद’ नामक कृति पर इन्हें हिन्दी-साहित्य सम्मेलन द्वारा मंगलाप्रसाद पारितोषिक प्रदान किया गया था।

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डॉ सम्पूर्णानंद की भाषा शैली

इनकी शैली शुद्ध, परिष्कृत एवं साहित्यिक है। इन्होंने विषयों का विवेचन तर्कपूर्ण शैली में किया है। विषय प्रतिपादन की दृष्टि से इनकी शैली के तीन रूप (1) विचारात्मक, (2) व्याख्यात्मक तथा (3) ओजपूर्ण लक्षित होते हैं।

विचारात्मक शैली— इस शैली के अन्तर्गत इनके स्वतंत्र एवं मौलिक विचारों की अभिव्यक्ति हुई है। भाषा विषयानुकूल एवं प्रवाहपूर्ण है । वाक्यों का विधान लघु है, परन्तु प्रवाह तथा ओज सर्वत्र विद्यमान है।

व्याख्यात्मक शैली— दार्शनिक विषयों के प्रतिपादन के लिए इस शैली का प्रयोग किया गया है। भाषा सरल एवं संयत है। उदाहरणों के प्रयोग द्वारा विषय को अधिक स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

ओजपूर्ण शैली— इस शैली में इन्होंने मौलिक निबंध लिखे हैं। ओज की प्रधानता है। वाक्यों का गठन सुन्दर है। भाषा व्यावहारिक है।

इनकी भाषा सबल, सजीव, साहित्यिक, प्रौढ़ एवं प्राञ्जल है। संस्कृत के तत्सम शब्दों का अधिक प्रयोग किया गया है। गंभीर विषयों के विवेचन में भाषा विषयानुकूल गंभीर हो गयी है। कहावतों और मुहावरों का प्रयोग प्रायः नहीं किया गया है। शब्दों का चुनाव भावों और विचारों के अनुरूप किया गया है। भाषा में सर्वत्र प्रवाह, सौष्ठव और प्राञ्जलता विद्यमान है।

डॉ सम्पूर्णानंद का निबंध

प्रस्तुत ‘शिक्षा का उद्देश्य’ शीर्षक निबंध सम्पूर्णानन्द जी के ‘भाषा की शक्ति’ नामक संग्रह से संकलित है। इस पाठ में लेखक ने ‘शिक्षा के उद्देश्य’ पर मौलिक ढंग से अपना विचार व्यक्त किया और प्राचीन आदर्शों को ही सर्वश्रेष्ठ स्वीकार किया है। लेखक ने इस पाठ में अध्यापकों का कर्त्तव्य बताते हुए स्पष्ट किया है कि अध्यापक का सर्वप्रथम कर्त्तव्य छात्रों में चरित्र का विकास करना और उनमें लोक-कल्याण की भावना जाग्रत करना है।

डॉ सम्पूर्णानंद जी का साहित्य में स्थान

साहित्य में स्थान- डॉ० सम्पूर्णानन्द जी ने हिन्दी में गम्भीर विषयों पर निबन्धों और ग्रन्थों की रचना की। इनकी रचनाओं में मौलिक चिन्तन, गम्भीरता और उच्च स्तर का पाण्डित्य पाया जाता है। सम्पादन के क्षेत्र में भी इन्होंने उल्लेखनीय कार्य किया है। एक मनीषी साहित्यकार के रूप में हिन्दी-साहित्य में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान सदा बना रहेगा।

FAQs. डॉ सम्पूर्णानंद जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. संपूर्णानंद जी का जन्म कब हुआ था?

डॉ सम्पूर्णानंद जी का जन्म 1 जनवरी, 1890 ई. में हुआ था।

2. डॉ संपूर्णानंद का जन्म कहाँ हुआ था?

डॉ सम्पूर्णानंद जी का जन्म वाराणसी (काशी), उत्तर प्रदेश के एक सम्भ्रान्त कायस्थ परिवार में हुआ था?

3. डॉक्टर संपूर्णानंद के माता पिता का क्या नाम था?

डॉ सम्पूर्णानंद के पिता का नाम श्री विजयानन्द और माता का नाम श्रीमती आनन्दी देवी था।

4. डॉक्टर संपूर्णानंद कैसे प्रभावित थे?

डॉ सम्पूर्णानंद जी समाजवादी विचारधारा से प्रभावित थे। इन्होंने भारतीय दर्शन, धर्म, संस्कृति, राजनीति, इतिहास, ज्योतिष आदि विविध विषयों पर उच्च कोटि के निबन्ध लिखे और उत्कृष्ट साहित्य का सृजन किया। इनकी रचनाओं में इनके प्रकाण्ड पाण्डित्य के दर्शन होते हैं।

5. संपूर्णानंद समिति क्या है?

डॉ सम्पूर्णानंद जी ने सन् 1961 ई० में केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय की अध्यक्षता में एक ‘भावनात्मक एकता समिति’ का आयोजन किया। इस समिति ने राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने और मजबूत करने के लिए कुछ सिफारिशें दीं। राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्राथमिक, माध्यमिक, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रम का पुनर्गठन।

6. डॉक्टर संपूर्णानंद की पत्रिका का क्या नाम है?

डॉ सम्पूर्णानंद जी ने ‘मर्यादा’ नामक मासिक हिंदी पत्रिका और ‘टुडे’ नामक अंग्रेज़ी दैनिक का संपादन भी किया।

7. डॉ संपूर्णानंद विधानसभा सदस्य कब बने?

डॉ सम्पूर्णानंद सन् 1936 ईस्वी में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा के सदस्य चुने गये। तथा सन् 1937 ईस्वी में कांग्रेस मन्त्रिमंडल गठित होने पर ये उत्तर प्रदेश के शिक्षामंत्री तथा सन् 1955 ईस्वी में ये उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने।

8. संपूर्णानंद की मृत्यु कब हुई थी?

डॉ सम्पूर्णानंद की मृत्यु 10 जनवरी, 1969 ई. में हुई थी।

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