त्रिलोचन शास्त्री: जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “त्रिलोचन शास्त्री का जीवन परिचय” (Trilochan Shastri biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने त्रिलोचन का जीवन परिचय भाव पक्ष कला पक्ष, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली, काव्यगत विशेषताएं, पुरस्कार व साहित्य में स्थान आदि को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने त्रिलोचन जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

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त्रिलोचन शास्त्री का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने त्रिलोचन जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
त्रिलोचन शास्त्री की जीवनी –

पूरा नामत्रिलोचन शास्त्री
असली नामवासुदेव सिंह
उपनामत्रिलोचन
जन्म तिथि20 अगस्त, 1917 ई. में
जन्म स्थानउत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के चिरानी पट्टी में
मृत्यु तिथि09 दिसम्बर, 2007 ई. में
मृत्यु स्थानदिल्ली, भारत
मृत्यु के समय आयु90 वर्ष
पिता का नामश्री जगरदेव सिंह
माता का नामज्ञात नहीं है
शिक्षाएम०ए० (अंग्रेजी में) एवं संस्कृत में ‘शास्त्री’ की उपाधि
विद्यालयकाशी हिन्दू विश्वविद्यालय
पैशालेखक, कवि, सम्पादक, अध्यापक
नागरिकताभारतीय
साहित्य कालआधुनिक काल (प्रगतिवादी युग)
आन्दोलनप्रगतिशील काव्यधारा के कवि
विधागद्य और पद्य
विषयलेख, कविता, कहानी और गीत
सम्पादनआज, जनवार्त्ता, समाज, प्रदीप, हंस और कहानी
भाषासरल, साहित्यिक खड़ीबोली
प्रमुख रचनाएंधरती, गुलाब और बुलबुल, ताप के ताए हुए दिन, जीने की कला, शब्द, दिगन्त, देशकाल, रोजनामचा, उस जनपद का कवि हूं आदि।
पुरस्कारसाहित्य अकादमी पुरस्कार, शलाका सम्मान, महात्मा गांधी पुरस्कार
साहित्य में स्थानश्री त्रिलोचन हिन्दी-साहित्य जगत् में प्रगतिशील काव्यधारा के कवि के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे।

त्रिलोचन शास्त्री का जीवन परिचय

जीवन-परिचय— त्रिलोचन शास्त्री का वास्तविक नाम वासुदेव सिंह हैं। आप त्रिलोचन उपनाम से लिखते हैं। आप हिन्दी के प्रगतिवादी कवियों में आते हैं। आपका जन्म उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के कटघरा चिरानी पट्टी में 20 अगस्त, सन् 1917 ईस्वी को एक सामान्य मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री जगरदेव सिंह तथा माता का नाम हमें ज्ञात नहीं है। त्रिलोचन जी ने संस्कृत माध्यम से शास्त्री की परीक्षा पास की और शास्त्री हो गये। इसके बाद, अंग्रेजी साहित्य में एम० ए० (पूर्वार्द्ध) की परीक्षा उत्तीर्ण की। स्वाध्याय से ही इन्होंने उर्दू, फारसी, अंग्रेजी, संस्कृत, पालि, प्राकृत तथा हिन्दी साहित्य का गहन अध्ययन किया था।

त्रिलोचन शास्त्री
त्रिलोचन शास्त्री का जीवन परिचय

त्रिलोचन शास्त्री जी बहु-भाषाविद् साहित्य जगत् में चलते-फिरते शब्द-कोश के रूप में पहचाने जाते थे। लोक छंदों से लेकर मुक्त छंद और अंग्रेजी के सानेट छंद तक की इन्हें सिद्धि प्राप्त थी। ये साधिकार उर्दू छंदों में भी रचनाएँ करते थे। इन्होंने कहीं भी ठहर कर सेवा नहीं की। वर्ष 1951-53 में गणेशराय इण्टर कॉलेज डोभी में अध्यापन कार्य किया। इन्होंने मुक्ति बोध पीङ्ग उज्जैन के अतिरिक्त दिल्ली और अलीगढ़ विश्वविद्यालयों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। तथा वर्ष 1970-72 में विदेशी छात्रों को इन्होंने हिन्दी, उर्दू और संस्कृत की शिक्षा प्रदान की। कुछ वर्षों तक दिल्ली विश्वविद्यालय में द्वैभाषिक कोश (उर्दू-हिन्दी) परियोजना में भी कार्य किया। मुक्तिबोध सृजन पीठ के अध्यक्ष के रूप में सागर विश्वविद्यालय, मध्यप्रदेश में कार्यरत रहे।

सन् 1945 ई. से प्रारम्भ हुई त्रिलोचन शास्त्री जी की काव्य-यात्रा 21वीं सदी के पहले दशक तक चलती रही। इन्होंने आज, जनवार्त्ता, समाज, प्रदीप, हंस और कहानी पत्रिकाओं के सम्पादन कार्य में सहयोग भी किया। ‘ताप के ताये हुए दिन’ (1980) के कविता संग्रह पर इन्हें सन् 1981 ई. में “साहित्य अकादमी पुरस्कार” प्राप्त हुआ। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इन्हें ‘महात्मा गाॅंधी पुरस्कार’ से सम्मानित किया ‘शलाका सम्मान’ भी इनकी महत्वपूर्ण उपलब्धि रही है। इसके अलावा, इन्हें ‘मैथिलीशरण गुप्त’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। 09 दिसम्बर, सन् 2007 ईस्वी को दिल्ली में इनका देहावसान हुआ। ये जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। इन्हें हिन्दी-साहित्य जगत् में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

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त्रिलोचन शास्त्री की प्रमुख रचनाएं

रचनाएँ एवं कृतियां— त्रिलोचन ने गद्य और पद्य दोनों में ही लेखन कार्य किया। परन्तु ये कवि के रूप में ही ज्यादा जाने जाते हैं, इनकी प्रमुख रचनाएं एवं कृतियां कुछ इस प्रकार से हैं-

काव्य-संग्रह— धरती, गुलाब और बुलबुल, दिगंत, ताप के ताए हुए दिन, शब्द, उस जनपद का कवि हूँ, अरधान, तुम्हें सौंपता हूँ, चैती, अमोला, मेरा घर, जीने की कला, फूल नाम है एक, अगर चोर मर जाता, आदमी की गंध, एक लहर फैली अनन्त की, अनकहनी की कुछ कहनी है तथा ‘सबका अपना आकाश’ आदि इनकी प्रमुख पद्य-रचनांए हैं।

गद्य-संग्रह— देशकाल, रोजनामचा, काव्य और अर्थबोध, मुक्तिकोश की कविताएं एवं ‘रोजनामचा’ नाम से इनकी डायरी भी प्रकाशित है। और बहुत कुछ अप्रकाशित भी है।
इसके अतिरिक्त, हिन्दी के अनेक कोशों के निर्माण में इनका महत्वपूर्ण योगदान भी रहा है।

त्रिलोचन शास्त्री का साहित्यिक परिचय

साहित्यिक-परिचय— त्रिलोचन शास्त्री एक कवि होने के साथ-साथ एक सफल सम्पादक के रूप में भी जाने जाते हैं। इन्होंने पत्रकारिता के साथ-साथ कोश सम्पादन भी भली-भाँति किया है। त्रिलोचन जी ने अनेक पत्रिकाओं से सम्बद्ध रहकर कार्य किया जिनमें ये ‘हंस’ तथा ‘कहानी’ पत्रिकाओं से विशेष रूप से सम्बद्ध रहे। इसके अतिरिक्त ये ‘आज’, ‘जनवार्ता’, ‘समाज’, ‘प्रदीप’ और ‘चित्रलेखा’ आदि पत्रिकाओं के सह-सम्पादक के रूप में सुचारु कार्य किया, ये सागर विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध पीठ के अतिथि प्रोफेसर के रूप में कार्य कर चुके हैं।

त्रिलोचन शास्त्री आम आदमी, किसान और कामगार के मजूर और मध्यवर्गीय समाज के सच्चे और विश्वसनीय चित्रकार हैं। कविता को काल्पनिकता के रोमानी आकाश से धरती पर उतार कर सबकी सुख-दुःख, सबकी पीड़ा, सबकी करुणा-से व्यापक जन-संसार को इन्होंने जोड़ा। इनकी कविता में सहजता है, शालीनता है, गम्भीरता और रवानी है। ये सपाटबयानी से एक सम्पूर्ण दृश्य-चित्र सृजित करते हैं।

त्रिलोचन शास्त्री जी का काव्य-व्यक्तित्व लगभग पचास वर्षों से अधिक समय तक प्रसरित है। इन पचास वर्षों की लम्बी कालावधि में इन्होंने सुल्तानपुर, जौनपुर, प्रयाग, वाराणसी, दिल्ली, सागर में प्रवास किया तथा जनजीवन के प्रत्येक पहलू को समझने का उपक्रम किया।

त्रिलोचन शास्त्री की काव्यगत विशेषताएँ

काव्यगत-विशेषताएँ— सानेट के संस्थापक कवि त्रिलोचन हिन्दी की जातीय परम्परा के कवि हैं। तुलसी और निराला को अपना आदर्श मानने वाले त्रिलोचन की भाषा सिद्धि अद्भुत थी। इनकी भाषा में कठिन और सरल का समन्वय है। ये मानवीय संवेदना और मूल्यों के कवि थे। प्रकृति का विविध वर्णों और आत्मीय रूप त्रिलोचन की कविताओं में अनायास ही प्राप्त होता है। नाटकीयता और बातचीत दोनों का सुख त्रिलोचन की कविताओं के दृष्टिगोचर होता है। जीवन में व्याप्त विषमता और नैराश्य की बात करते हुए भी इनकी कविता का स्वर आशावादी है। लोक का सार्थक और सर्जनात्मक विस्तार त्रिलोचन की कविता में अनायास मिल जाता है। शब्दों के पारखी होने के कारण सम्यक् और समीचीन शब्द प्रयोग इनकी कविता को अतिरिक्त शक्ति देता है। नागार्जुन और केदारनाथ अग्रवाल के साथ त्रिलोचन की कविता हिन्दी की प्रगतिवादी कविता का स्तम्भ तो है ही, साथ ही लोक की पीड़ा और अनुभव की प्रस्तुति का मानक भी है।

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त्रिलोचन शास्त्री का भाव पक्ष

भाव-पक्ष— त्रिलोचन जनजीवन से जुड़े हुए कवि हैं, इनकी कविताओं में माटी की महक है। इन्होंने मानवीय अनुभूतियों का सहज एवं सजीव चित्रण किया है, इनकी कविताओं में प्रगतिशीलता का गुण विद्यमान है। भाषा सरल है सुबोध है तथा जनमानस के अति निकट है। शिल्पगत सौंदर्य की दृष्टि से ये स्वयं अपनी तुलना में आप ही हैं।

श्री त्रिलोचन शास्त्री जी जीवन में निहित पद-लय के कवि हैं। प्रबल आवेग और त्वरा की अपेक्षा इनके काव्य में काफी कुछ स्थिर है। इनकी भाषा छायावादी रूमानियत से मुक्त है तथा उसका काव्य ठाठ ठेठ का गाॅंव की जमीन से जुड़ा हुआ है। ये हिन्दी में साॅनेट (अंग्रेजी छंद) को स्थापित करने वाले कवि के रूप में भी जाने जाते हैं। त्रिलोचन जी ने बोलचाल की भाषा को चुटीला और नाटकीय पूर्ण बनाकर कविताओं को एक नया आयाम दिया है।

त्रिलोचन शास्त्री का कला पक्ष (भाषा शैली)

कला-पक्ष— अपरिहार्य देशज ठेठपन इनकी भाषा की शक्ति है। चूँकि त्रिलोचन एक समग्र चेतना के कवि हैं इसलिए इनकी भाषा में भी यह समग्रता दिखायी देती है। इनकी ‘रैन बसेरा’ कविता की बुनावट में भाषा और संवेदनीयता के कई स्तर दिखायी देते हैं। ये सहज भाषा को बोलचाल की भाषा को काव्यात्मक गरिमा देते हैं। कवि त्रिलोचन का अनुभव-संसार बड़ा है और शब्द चयन भी इन्होंने बड़े और व्यापक क्षेत्रों से किया है। संस्कृतनिष्ठ शब्दों के प्रयोग से ये अपनी स्वाध्याय वृत्ति को प्रमाणित करते हैं। अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों को ये सहजता से व्यवहृत कर देते हैं। जीवन के विविध क्षेत्रों से शब्दचयन इन्होंने किया है। ये स्वयं लिखते हैं-

“लड़ता हुआ समाज नयी आशा, अभिलाषा ।
नये चित्र के साथ नयी देता हूँ भाषा ।।”

इन्होंने तद्भव शब्दों का अर्थगर्भ प्रयोग किया है। ‘आरर डाल’, ‘बेंचा-कीना’, ‘मँजर गये आम’, ‘झापस’, ‘झाँय- झाँय करती दुपहरिया’, ‘भगताना’, ‘धरौवा टुत्र-पुत्र’ जैसे तद्भव और ग्राम्य प्रयोग इन्हें सहज-सरल-चित्त का कवि बनाता है। जेंवरी बुनना, उड़न्च्छू, बजर गिरे, बानी फुर होना जैसी लोकोक्ति के साथ-ही-साथ शेकहैन्ड, मास्टर, ब्यूटी क्वीन जैसे अंग्रेजी शब्दों को भी ये पिरोते चलते हैं। अवधी की सर्जनात्मक क्षमता को परिनिष्ठित खड़ीबोली हिन्दी में उतारने की अद्भुत क्षमता के कवि हैं त्रिलोचन । हिन्दी की जातीय अस्मिता के लिए त्रिलोचन तुलसी की सहजता और गालिब की सरसता को एक साथ साधते हैं।

त्रिलोचन शास्त्री का साहित्य में स्थान

साहित्य में स्थान— त्रिलोचन ने लोक कल्याण की भावना से साहित्य सृजन किया, इनके समीचीन शब्द प्रयोग ने इनकी कृतियों को गौरवपूर्ण स्थान दिलाया। मानवीय संवेदना एवं लोक की पीड़ा का चित्रण इनकी कविताओं में देखने को मिलता है। त्रिलोचन शास्त्री जी हिन्दी-साहित्य जगत् में प्रगतिशील काव्यधारा के कवि के रूप में सदैव स्मरणीय रहेंगे। अतः नवीन कवियों में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है।

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त्रिलोचन शास्त्री की कविता

बढ़ अकेला

बढ़ अकेला
यदि कोई संग तेरे पंथ वेला
बढ़ अकेला

चरण ये तेरी रुके ही यदि रहेंगे
देखने वाले तुझे, कह, क्या कहेंगे
हो न कुंठित, हो न स्तंभित
यह मधुर अभियान वेला
बढ़ अकेला

श्वास ये संगी तरंगी क्षण प्रति क्षण
और प्रति पदचिह्न परिचित पंथ के कण
शून्य का श्रृंगार तू
उपहार तू किस काम मेला
बढ़ अकेला

विश्व जीवन मूक दिन का प्राणमय स्वर
सांद्र पर्वत-श्रृंग पर अभिराम निर्झर
सकल जीवन जो जगत के
खेल भर उल्लास खेला
बढ़ अकेला

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FAQs. त्रिलोचन शास्त्री जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. त्रिलोचन शास्त्री का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

त्रिलोचन शास्त्री का जन्म 20 अगस्त, सन् 1917 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के चिरानी पट्टी में एक सामान्य मध्यवर्गीय किसान परिवार में हुआ था।

2. कवि वासुदेव सिंह का उपनाम क्या है?

हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा के प्रमुख कवियों में से एक त्रिलोचन शास्त्री भी थे। इनका उपनाम त्रिलोचन तथा वास्तविक नाम वासुदेव सिंह था इन्हें हिन्दी-साहित्य में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

3. त्रिलोचन शास्त्री के पिता का नाम क्या था?

त्रिलोचन शास्त्री जी के पिता का नाम श्री जगरदेव सिंह था।

4. त्रिलोचन शास्त्री जी का प्रथम कविता संग्रह कौन सी थी?

त्रिलोचन शास्त्री का पहला कविता संग्रह ‘धरती’ था, जो सन् 1945 ई. में प्रकाशित हुआ था। इसके अलावा, ‘गुलाब और बुलबुल’, ‘उस जनपद का कवि हूं’ और ‘ताप के ताये हुए दिन’ इनके चर्चित कविता संग्रह थे। ‘दिगंत’ और ‘धरती’ जैसी रचनाओं को कलमबद्ध करने वाले त्रिलोचन शास्त्री के 17 कविता संग्रह प्रकाशित हुए।

5. त्रिलोचन का पूरा नाम क्या है?

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में कटघरा पट्टी के चिरानी पट्टी में 20 अगस्त, 1917 ई. को जन्मे त्रिलोचन शास्त्री का वास्तविक नाम वासुदेव सिंह था। त्रिलोचन इनका उपनाम था इन्हें हिंदी सॉनेट (अंग्रेजी छंद) का साधक माना जाता है। त्रिलोचन जी को ‘ताप के ताये हुए दिन’ नामक कविता संग्रह के लिए सन् 1981 ई. में “साहित्य अकादमी पुरस्कार” मिला था।

6. त्रिलोचन की रचनाएं कौन कौन सी हैं?

त्रिलोचन शास्त्री की प्रमुख रचनाएं – धरती, गुलाब और बुलबुल, दिगंत, ताप के ताए हुए दिन, शब्द, उस जनपद का कवि हूँ, अरधान, तुम्हें सौंपता हूँ, चैती, अमोला, मेरा घर, जीने की कला, फूल नाम है एक, अगर चोर मर जाता, आदमी की गंध, एक लहर फैली अनन्त की, सबका अपना आकाश, देशकाल, रोजनामचा, काव्य और अर्थबोध आदि इनकी प्रमुख रचनांए हैं।

7. त्रिलोचन को कौन सा पुरस्कार मिला?

त्रिलोचन शास्त्री जी को ‘ताप के ताये हुए दिन’ (1980) के कविता-संग्रह पर सन् 1981 ई. में “साहित्य अकादमी पुरस्कार” प्राप्त हुआ। इसके अलावा इन्हें ‘महात्मा गाॅंधी पुरस्कार’, ‘शलाका सम्मान’ और ‘मैथिलीशरण गुप्त’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

8. त्रिलोचन शास्त्री की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

त्रिलोचन शास्त्री जी की मृत्यु 09 दिसम्बर, सन् 2007 ईस्वी को दिल्ली, भारत में हुई थी।

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