धर्म सुधार आंदोलन, मार्टिन लूथर व प्रोटेस्टेंट, NCERT सार संग्रह | Religious Reform Movement in Hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको संक्षिप्त इतिहास NCERT सार संग्रह “महेश कुमार वर्णवाल” Book का अध्याय “धर्म सुधार आंदोलन” (Religious Reform Movement in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। इसमें हम आपको यूरोप में धर्म-सुधार आंदोलन pdf, धर्म सुधार आंदोलन के कारण एवं परिणाम एवं धर्म सुधार आंदोलन के क्या उद्देश्य थे? को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

धर्म सुधार आंदोलन

  • धर्म सुधार आंदोलन शब्द यूरोप के इतिहास में पुनर्जागरण के उत्तरकाल में हुए दो प्रमुख परिवर्तनों के लिए प्रयुक्त होता है।
  • इनमें प्रथम था प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार। इसके कारण ईसाई धर्म में मतभेद पैदा हुए, अनेक देश रोमन कैथोलिक चर्च से अलग हो गए और उन देशों में सामान्यतः राष्ट्रीय स्तर पर पृथक चर्चों की स्थापना हुई।
  • दूसरे परिवर्तन का सम्बंध रोमन कैथोलिक चर्च के भीतर हुए उन सुधारों से था, जिन्हें आमतौर पर कैथोलिक धर्म-सुधार या प्रति धर्म-सुधार के नाम से जाना जाता है।
  • धर्म-सुधार महज एक धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि इसका सम्बंध उस काल के उन सामाजिक तथा राजनीतिक आंदोलनों से था, जिन्होंने मध्ययुग का अंत करके आधुनिक युग को जन्म दिया।
  • आरंभिक मध्ययुग में कैथोलिक चर्च रोम के पोप के अधिनायकत्व में एक विशाल श्रेणीबद्ध संगठन बन गया था। समूचे पुरोहित-तंत्र पर पोप की परमसत्ता स्थापित हो गई थी और पोप का प्राधिकार सीधे लागू होता था। पोप की उस स्थिति को प्रायः पोप के राजतंत्र के नाम से जाना जाता है। कम से कम साल में एक बार पुरोहित के सामने मौखिक रूप से अपना पाप स्वीकार करना और उसके लिए दिए गए दंड को भोगना प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपरिहार्य बना दिया गया। विरोध करने वाले को धर्म से बहिष्कृत कर दिया जाता था।
  • चर्च के धर्म-सिद्धांत को एक ऐसे साधन के रूप में परिभाषित किया गया, जिससे दैवीय-कृपा मनुष्य को प्राप्त हो जाती है। ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए इन संस्कारों को अपरिहार्य माना गया और कहा गया कि इनके बिना मुक्ति संभव नहीं है।
    🔺जनसाधारण के लिए तीन सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार थे- नाम संस्कार, पाप स्वीकार संस्कार और यूखारिस्ट अर्थात् परम प्रसाद संस्कार।

कैथोलिक चर्च की बुराइयाँ

  • धर्म सुधार आंदोलन को कैथोलिक चर्च में पनपी हुई बुराइयों के विरुद्ध भड़‌का हुआ प्रायः एक विद्रोह माना जाता है।
  • चर्च की धर्मश्रेणी के कुछ पुरोहितों और उच्च धर्माधिकारों ने भ्रष्ट साधनों से अपने पद हासिल किए थे। वे विलासिता और अनैतिकता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।
  • ऊँची बोली बोलने वालों को धार्मिक पद प्रदान किए जाते थे और जो लोग पैसा खर्च करके ऐसे पद प्राप्त करते थे वे अपनी सेवाओं के लिए ऊँची कीमत वसूल करके अच्छी कमाई कर लेते थे। पोप और उच्चपदस्थ पुरोहित राजाओं की तरह रहते थे।
  • एक नई बुराई ऐसे पत्रों को बिक्री थी, जो पापों से इस जीवन में और नरक में दंड भोगने से मुक्ति दिलाने का दावा करते थे।
  • चर्च ने धर्म-विरोध के दमन के लिए एक व्यापक व्यवस्था का आयोजन किया था। धर्म-विरोधियों को खोज निकालने और दंड देने के लिए धर्माधिकरण या एक अदालत की स्थापना की गई थी।
  • मुक्ति-पत्र खरीदने के अलावा अब कोई भी व्यक्ति फीस या शुलक देकर आस्था के बदले में मुक्ति प्राप्त कर सकता था।
  • पुरोहित, बिशप और यात्री-साधु किसी विवाह को वैध या अवैध घोषित कर सकते थे।
  • शुल्क अदा करने पर समस्या सुलझ जाती थी। जन्म से लेकर मृत्यु तक के जीवन के हर कार्य के लिए शुल्क की व्यवस्या थी। आत्मा की शांति के लिए शुल्क की व्यवस्था थी और बहुत पहले मर चुके लोगों को आत्मा की शांति के लिए भी शुल्क या कर की व्यवस्था थी।

चर्च के विरुद्ध विद्रोह

  • 14वीं सदी से चर्च के कुछ धर्म-सिद्धांतों का विरोध और बुराइयों के विरुद्ध विद्रोह आरंभ हुआ।
  • कैथोलिक चर्च की भाषा लैटिन थी, जिसे आम जनता समझ नहीं पाती थी। यूरोप की किसी भी आधुनिक भाषा में धर्मग्रंथ उपलब्ध नहीं थे। लैटिन, हिब्रू और ग्रीक भाषाओं को पवित्र समझा जाता था।
  • वाइक्लिफ बाइबिल के पहले अंग्रेजी अनुवाद का प्रेरक और समर्थक था। आम जनता में धर्म-ग्रंथों के ज्ञान का प्रचार करने के लिए उसने गरीब प्रचारकों का एक दल बनाया।
  • 1401 ई. में इंग्लैण्ड की पार्लियामेंट ने धर्म-विरोधियों को जलाने के औचित्य के बारे में एक कानून बनाया।
  • वाइक्लिफ के देहांत के 34 साल बाद उस पर धर्म-विरोधी होने का आरोप लगाया गया। उसकी कब्र में से उसकी हड्डियाॅं खोदकर निकाली गई उन्हें जलाया गया और उनकी राख को नदी में फेंक दिया गया।
  • वाइक्लिफ की शिक्षाओं का उसके शिष्यों ने इंग्लैंड के बाहर भी प्रचार किया। उसमें से एक चेकोस्लोवाकिया का जॉन हुस था, जिसे धर्म-विरोध के लिए अपराधी घोषित किया गया एवं 1415 ई. में खूंटे से बाॅंधकर जिंदा जला दिया गया। मृत्युदंड के पश्चात् उसके देश में एक प्रबल विद्रोह हुआ। परिणामस्वरूप वहाँ कुछ वर्षों के लिए गणतंत्र की स्थापना हुई।

मार्टिन लूथर और प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन

  • प्रोटेस्टेंट क्रांति का प्रारम्भ 1517 ई. में उस समय मानी जाती है, जब सेंट अगस्ट इन के धर्म-संप्रदाय के साधु मार्टिन लूथर ने मुक्ति-पत्रों पर हमला करने वाले अपने 95 प्रतिपादनों या कथनों को जर्मनी के बीटेनबर्ग में एक गिरजाघर के दरवाजे पर कील ठोंककर टाँग दिया। उसने लोगों को चुनौती दी, कि वे उनके उन प्रतिपादनों पर उससे बहस करें। उसने इनकी प्रतिलिपियाँ कई नगरों में अपने मित्रों के पास भेजीं।
  • 1520 ई. में पोप ने उसे आदेश दिया, कि साठ दिनों के अन्दर अपने मतों को वापस लेकर क्षमा माँगे या धर्म-विरोधी होने का दंड भुगते। पोप के आदेश को उसने खुले आम जनता के सामने जला डाला। इस पूरे दौर में सक्सोनी के शासक ने, जो उसका मित्र था, उसे संरक्षण प्रदान किया।
  • जर्मनी के कई शासक चर्च के विरोधी थे, इसलिए जब मार्टिन लूथर को धर्म से निष्कासित कर दिया गया, तो उसे कोई नुकसान नहीं पहुँचा।
  • उसने चर्च की सेवाओं के लिए जर्मन भाषा के उपयोग को प्रारम्भ किया, मठों की व्यवस्था को समाप्त कर दिया, पुरोहितों को विवाह करने का अधिकार दिया, पृथ्वी पर ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में पुरोहितों को प्राप्त अधिकार समाप्त कर दिया, अधिकांश संस्कारों को समाप्त कर दिया और तीर्थ-यात्राओं तथा तबर्रुकों (संतों के अवशेषों) की पूजा के स्थान पर धर्म पर अधिक जोर दिया। उसने धर्मग्रंथों की मान्यताओं को सर्वाधिक महत्व दिया।
  • एक अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ, कि कैथोलिक चर्च की सत्ता राज्य से ऊपर होने का विचार त्याग दिया।

प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार आंदोलन का प्रसार

  • जर्मनी में लूथर की सफलता के बाद प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार का कई अन्य देशों में भी प्रचार हुआ।
  • स्विट्जरलैंड में प्रोटेस्टेंट धर्म-सुधार का नेतृत्व ज्विंगली और जाॅन कॉल्विर ने किया। वस्तुतः कॉल्विन के विचारों को यूरोप के विभिन्न भागों में लूथर के विचारों से अधिक समर्थन मिला।
    🔺कॉल्विन के विचारों से मिलते-जुलते कई धर्म-सम्प्रदाय अस्तित्व में आए। इंग्लैण्ड तथा अमेरिका में वे प्यूरिटन, स्कॉटलैंड में प्रेसबिटेरियन और फ्रांस में ह्यूगेनॉट कहलाए।
  • स्कैंडेनेवियन देशों डेनमार्क, नार्वे और स्वीडन के शासकों ने लूथर के धर्म को स्वीकार कर लिया और इन देशों में प्रोटेस्टेंट लूथरीय चर्च राजकीय चर्च बन गया।
  • इंग्लैण्ड के हेनरी VIII को अपनी पत्नी कैथरीन का त्याग करने की पोप से अनुमति नहीं मिली, तो उसने अपने को चर्च का प्रमुख घोषित कर दिया।
  • 1959 ई. में रानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने राजकीय चर्च के रूप में इंग्लैंड के चर्च की स्थापना की।

✴️ कैथोलिक धर्म-सुधार -• कैथोलिक चर्च में सुधार करने के लिए कई कदम उठाए जाने लगे। जिस काल में कैथोलिक चर्च के अधिकारियों में सुधार के लिए प्रयास किए और चर्च की खोई हुई शक्ति को वापस लाने के लिए कार्य किया, वह प्रति धर्म-सुधार आंदोलन अथवा कैथोलिक धर्म-सुधार के आंदोलन का काल कहा जाता है।

  • धर्म परिवर्तन करके प्रोटेस्टेन्ट बने लोगों को कैथोलिक पंथ में वापस लाने एवं नये लोगों को उसमें दीक्षित करने के उद्देश्य से एक नये समाज जेसुइट संघ की स्थापना की गई। इसका संस्थापक इग्नेशियस लोयोला था। वह स्पेनवासी था। प्रारम्भ में एक सैनिक के रूप में जीवन प्रारम्भ करने वाला लोयोला कालान्तर में प्रतिवादात्मक धर्म सुधार आन्दोलनों का सबसे सशक्त नेता सिद्ध हुआ। उसके द्वारा स्थापित सोसायटी ऑफ जीसस ने, न केवल यूरोप, बल्कि एशिया, अफ्रीका एवं अमेरिका जैसे नवीन क्षेत्रों में कैथोलिक संप्रदाय को फैलाया।
  • जेसुइट संघ के सदस्यों को कैथोलिक धर्म के प्रचार-प्रसार में बहुत अधिक सफलता मिली। चीन, भारत तथा उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका में जेसुइटों के प्रयास से ही अपने पैर जमाये। इनके प्रयासों से प्रोटेस्टेन्ट संप्रदाय की तीव्र प्रगति रुक गई तथा मृतप्राय कैथोलिक धर्म में नवजीवन का संचार हुआ।
Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *