नरेंद्र शर्मा – जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “पण्डित नरेन्द्र शर्मा का जीवन परिचय” (Pandit Narendra Sharma biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने नरेंद्र शर्मा का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और नरेंद्र शर्मा की काव्यगत विशेषताएं को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने शर्मा जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

नरेंद्र शर्मा का जीवन परिचय

पं० नरेन्द्र शर्माजी का जन्म 28 फरवरी, सन् 1913 इस्वी को उत्तर प्रदेश के बुलन्दशहर जिले के जहाँगीरपुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री पूरनलाल शर्मा तथा माता का नाम श्रीमती गंगादेवी था। जब ये मात्र चार वर्ष के थे तभी इनके पिता का देहान्त हो गया। पं० नरेन्द्र शर्माजी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में हुई। सन् 1929 ई० में इन्होंने हाईस्कूल एवं सन् 1931 ई० में इण्टरमीडिएट की परिक्षा उत्तीर्ण की। तदुपरान्त वर्ष 1931 से 36 ई० तक प्रयाग विश्वविद्यालय से बी०ए० में अध्ययन करते हुए सन् 1936 ई० में एम०ए० की परीक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय से ही उत्तीर्ण की।

सन् 1937 ई० में पं० नरेन्द्र शर्मा जी ‘भारत’ के सहकारी सम्पादक बनें। सन् 1938 से 40 ई० तक आन्दोलनों में भाग लेने के कारण इन्हें जेल यात्राएँ भी करनी पड़ी। सन् 1940 ई० में इन्होंने काशी विद्यापीठ में अध्यापन कार्य किया तथा सन् 1943 ई० में इन्होंने फिल्मजगत में प्रवेश कर फिल्मी गीत भी लिखे। नरेंद्र शर्मा जी ने आकाशवाणी में अवैतनिक कार्यक्रम नियोजक के रूप में कार्य किया। सन् 1966 ई० में ये मुम्बई केन्द्र में विविध भारती के चीफ प्रोड्यूसर भी रहे। 11 फरवरी, सन् 1989 ईस्वी को इनका देहावसान हो गया।

नरेंद्र शर्मा का साहित्यिक परिचय

छायावादोत्तर युग के प्रमुख व्यक्तिवादी गीतिकाव्य के रचयिता कवियों में नरेन्द्र शर्माजी का विशिष्ट स्थान है। पं० नरेन्द्र शर्माजी का अतःकरण अत्यधिक भावुक था इनके गीत छायावादी युग से भिन्न हैं, उनमें श्रृंगारिकता, दार्शनिकता सजीवता, सुदृढ़ राष्ट्रीयता, लाक्षणिकता, चित्रोपमता तथा प्रतीकात्मकता का गुण विद्यमान है। इसी सामाजिक विषमता को देखकर कवि का हृदय क्रन्दन कर उठता है।

पंडित नरेन्द्र शर्माजी ने साहित्य और लोकमंच कवि सम्मेलनों के माध्यम से जनजीवन को प्रभावित एवं प्रेरित कर साहित्यकार के दायित्व का पूर्ण निर्वाह किया है। इन्होंने कवि सम्मेलनों एवं गोष्ठियों में अपने गीतों को प्रस्तुत करके लोगों के मन मस्तिष्क को मोह लिया है। ये विशेष रूप से छोटी भावनाओं को सरसता से व्यक्त करने वाले सफल कवि थे। इनके कुछ गीत फिल्मों में भी रिकॉर्ड किए गए हैं।

नरेंद्र शर्मा की प्रमुख रचनाएं

पंडित नरेन्द्र जी की रचनाएँ कुछ इस प्रकार हैं –

काव्य – शूलफूल, कर्णफूल, प्रवासी के गीत, पलाशवन, मिट्टी और फूल, हंसमाला, रक्तचन्दन, अग्निशस्य, कदलीवन, प्रभात फेरी, प्यासा निर्झर, बहुत रात रोये आदि।

खण्डकाव्य – द्रौपदी, उत्तर जय एवं सुवर्णा आदि।

नरेंद्र शर्मा की काव्यगत विशेषताएं

पं० नरेन्द्र शर्माजी मूलतः गीतकार हैं। इनके अधिकांश गीत यथार्थवादी दृष्टिकोण से लिखे गए हैं। ये प्रगतिवादी चेतना से प्रभावित थे। इन्होंने प्रकृति के सुंदर चित्र उकेरे हैं। व्याकुल प्रेम की अभिव्यक्ति और प्रकृति के कोमल रूप के चित्रण में इन्हें विशेष सफलता मिली है। अंतिम दौर की रचनाएँ आध्यात्मिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि लिए हुए हैं। फिल्मों के लिए लिखे गए इनके गीत साहित्यिकता के कारण अलग से पहचाने जाते हैं। नरेंद्र शर्मा की भाषा सरल एवं प्रवाहपूर्ण है। संगीतात्मकता और स्पष्टता इनके गीतों की विशेषता है।

नरेन्द्र शर्मा जी का भाव पक्ष

चित्रात्मकता, सजीवता एवं आत्मीयता के भाव भावात्मक अनुभूति की तीव्रता एवं सहजता की दृष्टि से नरेन्द्र शर्माजी के गीतों की अपनी विशिष्टता है। इनके गीतों में चित्रात्मकता, सजीवता एवं आत्मीयता के भाव हैं।

क्रान्तिकारी दृष्टिकोण- छायावादोत्तरकाल में अपने प्रण्य गीतों, सामाजिक भावना एवं क्रान्तिवाहक कविताओं से जनमत को बहुत गहराई से प्रभावित करने वाले कवियों में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।

विद्रोही स्वर- शर्मा जी ने आक्रोश-भरे विद्रोही स्वर में विशाल जनमानस की विवशता, विद्रोह की भावना एवं नव निर्माण की चेतना को मुखरित किया है।

प्रकृति चित्रण- इनके प्रकृति चित्रण में सरलता से हृदय को आकर्षित कर लेने की क्षमता है। इनमें प्रकृति को आकर्षक रूप देने में अत्यधिक कुशलता है।

नरेन्द्र शर्मा जी का कला पक्ष (भाषा-शैली)

भाषा – नरेन्द्र शर्माजी ने अपने साहित्य में शुद्ध साहित्यिक खड़ीबोली का प्रयोग किया है, जिसमें सरसता एवं सरलता विद्यमान है। नाद-सौन्दर्य सहायक शब्द संरचना करके कवि विशेष शब्द सृष्टि करता है। उपमा रूपक आदि परम्परागत अलंकारों के साथ मानवीकरण अलंकार का पुष्ट प्रयोग इनके गीतों में मिलता है, किन्तु इसके उपरान्त भी इनकी भाषा सरल, सुबोध और प्रभावशाली बन पड़ी है।

शैली – पं० नरेन्द्र शर्माजी की रचनाओं में लाक्षणिकता, चित्रोपमता एवं प्रतीकात्मकता प्रचुरता से उपलब्ध हैं। शर्मा जी के काव्य में अलंकारों एवं छन्दों का बड़ा ही स्वाभाविक, सजीव और सुन्दर प्रयोग देखने को मिलता है।

नरेंद्र शर्मा जी का साहित्य में स्थान

छायावादोत्तर गीतकारों में नरेन्द्र जी का सम्मानीय स्थान है। अपने प्रणय गीतों, सामाजिक भावना एवं क्रान्तिकारी कविताओं से लोगों को प्रभावित करने वाले कवियों में नरेन्द्र जी प्रमुख हैं। एक उत्कृष्ट गीतकार के रूप में पं० नरेन्द्र शर्माजी का हिन्दी साहित्य जगत् में सदैव विशिष्ट स्थान रहेगा।

नरेंद्र शर्मा की कविताएं

[कविवर नरेन्द्र शर्मा उत्तरछायावादी कवियों में अग्रगण्य हैं। अपनी काव्य-यात्रा के उत्तरार्द्ध में ये आध्यात्मिकता और दार्शनिकता की ओर उन्मुख हो गये थे। प्रस्तुत कविता में इन्होंने आनन्द प्राप्ति को जीवन का अन्तिम लक्ष्य माना है। ‘मधु की एक बूँद’ शाश्वत अनश्वर नानंद की प्रतीक है। मधु की एक बूँद को आनंद का अथाह सागर बताते हुए नरेन्द्र जी ने यह उद्घाटित किया है कि उसमें जीवात्मा रूपी मछली तैर रही है और उस मधु की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है।]

मधु की एक बूँद

मधु की एक बूँद के पीछे
मानव ने क्या-क्या दुख देखे !
मधु की एक बूंद धूमिल घन
दर्शन और बुद्धि के लेखे !

सृष्टि-अविद्या का कोल्हू यदि,
विज्ञानी विद्या के अन्धे,
मधु की एक बूँद बिन कैसे
जीव करे जीने के धन्धे !

मधु की एक बूंद से भी यदि
जुड़ न सके मन का अपनापा,
क्या दें श्रमिक पसीना, सैनिक
लहू करे क्यों जाया जापा !
मधु की एक बूँद से बच कर,
व्यक्ति मान की बची चदरिया,
न घर तेरा, ना घर मेरा,
रैन-बसैरा बनी नगरिया !

मधु की एक बूँद बिन, रीते
पाँचों कोश और पाँचो जन,
मधु की एक बूँद बिन, हम से
सभी योजनाएँ सौ योजन !

मधु की एक बूँद बिन, ईश्वर
शक्तिमान भी शक्तिहीन है !
मधु की एक बूँद सागर है,
हर जीवात्मा मधुर मीन है।

मधु की एक बूँद पृथ्वी में,
मधु की एक बूँद शशि-रवि में
मधु की एक बूँद कविता में,
मधु की एक बूँद है कवि में।
मधु की एक बूँद के पीछे
मैंने अब तक कष्ट सहे शत,
मधु की एक बूँद मिथ्या है-
कोई ऐसी बात कहे मत !
(बहुत रात गए से)

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