नागार्जुन – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली, पुरस्कार व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको “नागार्जुन का जीवन परिचय” (Nagarjuna biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं। इसमें हम आपको नागार्जुन का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली और साहित्य में स्थान तथा इसके अतिरिक्त हम आपको नागार्जुन की प्रसिद्ध कविताएं को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

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नागार्जुन का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने कवि की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
नागार्जुन की जीवनी –

सामान्य नाम वैद्यनाथ मिश्र
अन्य नामनागार्जुन
जन्म-तिथि30 जून, 1911 ई. में
जन्मस्थानबिहार के दरभंगा जिले के सतलखा ग्राम में
मृत्यु-तिथि05 नवंबर, 1998 ई. में
मृत्युस्थानबिहार के दरभंगा जिले में
पिता का नामश्री गोकुल मिश्र
माता का नामश्रीमती उमा देवी
पत्नी का नामश्रीमती अपराजिता देवी
व्यवसायकवि, लेखक, उपन्यासकार, कहानीकार
साहित्य कालप्रगतिवादी काव्यधारा
गुरुपादलिप्त ‘सूरी’
लेखन विधाकाव्य, उपन्यास, कहानी, कविता
भाषाहिन्दी भाषा तथा मातृभाषा मैथिली
काव्य रचनाएंयुगधारा, सतरंगें पंखों वाली, प्यासी पथराई आंखें, तालाब की मछलियां, तुमने कहा था, खिचड़ी विप्लव देखा हमने, खून और शोले आदि।
उपन्यासरतिनाथ की चाची, नयी पौध, बलचनमा, बाबा बटेसरनाथ, दुःख मोचन, उग्रतारा, कुंभीपाक, आसमान में चांद तारे आदि।
खण्ड-काव्यभस्मांकुर, भूमिजा आदि।
बाल साहित्यकथामंजरी भाग-1, कथामंजरी भाग-2, मर्यादा पुरुषोत्तम, विद्यापति की कहानियां आदि।
मैथिली रचनाएंचित्रा, पत्रहीन नग्न गाछ, पका है यह कटहल, नवतूरिया आदि।
पुरस्कारसाहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत भारती पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, राजेन्द्र शिखर सम्मान, राहुल सांकृत्यायन सम्मान आदि।
हिंदी साहित्य में स्थानप्रगतिवादी काव्यधारा के सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक

नागार्जुन का जीवन परिचय

नागार्जुन, जिन्हें वैद्यनाथ मिश्र के नाम से भी जाना जाता है, ये एक प्रमुख भारतीय कवि, लेखक, उपन्यासकार और कहानीकार थे। इन्हें आधुनिक हिंदी साहित्य की सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक माना जाता है। इनका जन्म 30 जून, सन् 1911 ईस्वी में बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा गांव में हुआ था।

नागार्जुन
नागार्जुन का जीवन परिचय

नागार्जुन के पिता का नाम गोकुल मिश्र तथा माता का नाम श्रीमती उमा देवी था। इनके पिता एक अशिक्षित ब्राह्मण थे और बैद्यनाथ धाम देवघर में जाकर बाबा बैद्यनाथ की भक्ति किया करते थे। नागार्जुन अपने माता पिता की पांचवी संतान थे। इनसे पहली की चारों संतानों की मृत्यु हो गई थी, इसलिए इन्हें ‘ठक्कन मिश्र’ भी कहा जाने लगा था। फिर इनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र रखा गया। बाद में इन्होंने उपनाम “नागार्जुन” अपनाया जिससे ये सबसे ज्यादा जाने जाते हैं।

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नागार्जुन का व्यक्तित्व जीवन

इनका आरंभिक जीवन अभावों से भरा हुआ था। जीवन के अभाव ने ही आगे चलकर इनके संघर्षशील व्यक्तित्व का निर्माण किया। व्यक्तिगत दुःख से इन्हें मानवता के दुःख को समझने की क्षमता प्रदान की। इनके जीवन की यही रागिनी इनकी रचनाओं में मुखर हुई है। नागार्जुन के व्यक्तित्व जीवन की दो मुख्य विशेषताएं भी थी। ‘घुमक्कड़’ तथा ‘फक्कड़पन’ ने इनके व्यक्तिगत जीवन को घेर लिया था।

नागार्जुन की शिक्षा व धर्म

नागार्जुन का बचपन गरीबी में गुजरा और शुरुआती वर्षों में इन्हें विभिन्न कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वित्तीय कठिनाइयों के बावजूद इन्होंने छोटी उम्र से ही साहित्य और लेखन में गहरी रुचि प्रदर्शित की। इन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा बिहार के दरभंगा शहर में पूरी की। तथा उच्च शिक्षा के लिए ये वाराणसी चले गए। और फिर कुछ समय तक इन्होंने कलकत्ता से भी शिक्षा प्राप्त की। कलकत्ता (कोलकाता) में ये अध्यापक पद पर भी रहे। इसके बाद नागार्जुन जी भ्रमण लंका आ गए और वहां पर इन्होंने विद्यालंकर परिवेण से बौद्ध धर्म की शिक्षा प्राप्त की और फिर इन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया था।

नागार्जुन की मृत्यु कब हुई

अपने बाद के वर्षों में भी नागार्जुन को बड़ी वित्तीय कठिनाइयों का सामना करना पड़ा और स्वास्थ्य समस्याओं से जूझना पड़ा। चुनौतियों के बावजूद वह अपने लेखन के प्रति प्रतिबद्ध रहे और अपनी मृत्यु तक सशक्त कविता का सृजन करते रहे। 05 नवम्बर, सन् 1998 ईस्वी को दरभंगा, बिहार में दमा रोग की लम्बी बीमारी के कारण इस प्रगतिवादी विचार धारा के प्रमुख कवि नागार्जुन का देहान्त हो गया था।

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नागार्जुन का साहित्यिक परिचय

नागार्जुन के मन में सदैव दलितों के प्रति संवेदना रही। अपनी कविताओं में ये अत्याचार पीड़ितों, वस्त्रविहीन व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करके ही संतुष्ट नहीं हुए बल्कि उनको अनीति और अन्याय का विरोध करने की प्रेरणा भी देते रहे। सामाजिक, राजनीतिक तथा समसामयिक समस्याओं पर इन्होंने काफी रचनाएं लिखी है। व्यंग्य करने में इन्हें संकोचन नहीं होता तथा तीखी और सीधी चोट करने वाले ये अपने समय के प्रमुख व्यंग्यकार थे।

नागार्जुन को इनकी रचनाओं पर उत्तर प्रदेश सरकार का भारत-भारती, मध्यप्रदेश सरकार का कबीर तथा बिहार सरकार का राजेंद्र प्रसाद सम्मान प्राप्त हुए। इसके अलावा, इन्हें सन् 1969 ई. में साहित्य अकादमी पुरस्कार और सन् 1994 ई. में साहित्य अकादमी फेलों के रूप में नामांकित कर सम्मानित किया गया था। नागार्जुन जीवन के, धरती के, जनता के तथा श्रम के गीत गाने वाले ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं को किसी बात की सीमा में नहीं बांधा जा सकता है। अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व की भांति इन्होंने अपनी कविता को भी स्वतंत्र रखा है।

नागार्जुन की प्रमुख रचनाएं

युगधारा, प्यासी पथराई आंखें, सतरंगें पंखों वाली, खून और शोले, भस्मांकुर आदि खंडकाव्य तथा पुरानी जूतियों का कोरस और तालाब की मछलियां आदि इनकी प्रमुख काव्य रचनाएं हैं।

नागार्जुन के काव्य-संग्रह

  • युगधारा (सन् 1943 ई.)
  • सतरंगें पंखों वाली (सन् 1949 ई.)
  • प्यासी पथराई आंखें (सन् 1962 ई.)
  • तालाब की मछलियां (सन् 1974 ई.)
  • तुमने कहा था (सन् 1980 ई.)
  • खिचड़ी विप्लव देखा हमने (सन् 1980 ई.)
  • हजार-हजार बाॅंहोंवाली (सन् 1981 ई.)
  • पुरानी जूतियों का कोरस (सन् 1982 ई.)
  • रत्नगर्भ (सन् 1984 ई.)
  • ऐसे भी हम क्या! ऐसे भी तुम क्या! (सन् 1985 ई.)
  • आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने (सन् 1986 ई.)
  • इस गुब्बारे की छाया में (सन् 1990 ई.)
  • भूल जाओ पुराने सपने (सन् 1994 ई.)
  • अपने खेत में (सन् 1997 ई.) आदि।

नागार्जुन के खंड-काव्य

  • भस्मांकुर (सन् 1970 ई.)
  • भूमिजा आदि।

नागार्जुन के उपन्यास

  • रतिनाथ की चाची (सन् 1938 ई.)
  • बलचनमा (सन् 1942 ई.)
  • नयी पौध (सन् 1943 ई.)
  • बाबा बटेसरनाथ (सन् 1954 ई.)
  • वरुण के बेटे (सन् 1956 ई.)
  • दुखमोचन (सन् 1957 ई.)
  • कुंभीपाक (सन् 1960 ई.)
  • चम्पा (कुंभीपाक) (सन् 1972 ई.)
  • हीरक जयंती (सन् 1962 ई.)
  • अभिनन्दन (हीरक जयंती) (सन् 1979 ई.)
  • उग्रतारा (सन् 1963 ई.)
  • जमनिया का बाबा (सन् 1968 ई.)
  • इमरतिया (जमनिया का बाबा) (सन् 1968 ई.)
  • गरीबदास (सन् 1971 ई.) आदि।

नागार्जुन की मैथिली रचनाएं

  • चित्रा (कविता संग्रह) (सन् 1949 ई.)
  • पत्रहीन नग्न गाछ (सन् 1967 ई.)
  • पका है कटहल (सन् 1994 ई.)
  • पारो (उपन्यास) (सन् 1946 ई.)
  • नवतुरिया (सन् 1954 ई.) आदि।

बांग्ला रचनाएं

  • मैं मिलिट्री का बूढ़ा घोड़ा (सन् 1997 ई.) आदि।

नागार्जुन का बाल-साहित्य

  • कथा मंजरी भाग-1 (सन् 1948 ई.)
  • कथा मंजरी भाग-2 (सन् 1958 ई.)
  • मर्यादा पुरुषोत्तम राम (सन् 1955 ई.)
  • विद्यापति की कहानियां (सन् 1964 ई.) आदि।

कहानी-संग्रह

  • आसमान में चन्दा तारे (सन् 1962 ई.) आदि।

निबंध-संग्रह

  • अन्नहीनम् क्रियानाम् (सन् 1983 ई.)
  • बम्भोले नाथ (सन् 1989 ई.) आदि।

संस्मरण

  • एक व्यक्ति (एक योग) (सन् 1963 ई.) आदि।

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नागार्जुन की भाषा शैली

नागार्जुन जी की भाषा अधिकांशतः लोक भाषा के अधिक निकट है इसलिए इनकी भाषा सहज, सरल, बोधगम्य, स्पष्ट, स्वाभाविक और मार्मिक प्रभाव डालने वाली है। कुछ थोड़ी सी कविताओं में संस्कृत के क्लिष्ट तत्सम, विसतन्तु, मदिरारूण तथा उन्माद आदि शब्दों का प्रयोग अधिक मात्रा में किया गया है। इन्होंने अपनी भाषा में तद्भव तथा ग्रामीण शब्दों का भी यत्र तत्र प्रयोग किया है, किन्तु ऐसे शब्द इनकी भावाभिव्यक्ति में बाधक न होकर उसमें एक विविध प्रकार की मिठास उत्पन्न करते हैं। कुछ कविताओं को छोड़कर इन्होंने अपनी शेष कविताओं में लोक-मुख को वाणी दी है। इनकी भाषा में न तो शब्दों की तोड़-मरोड़ है और न उस पर मैथिली का प्रभाव है।

नागार्जुन जी की शैली पर उनके व्यक्तित्व की अमिट छाप है। वे अपनी बात अपने ढंग से कहते हैं इसलिए उनकी काव्य शैली किसी से मेल नहीं खाती। ये न तो अपनी शैली में भाषा का न तो श्रृंगार करते दिखाई पड़ते हैं और न ही रस परिपाक की योजना का अनुष्ठान करते हैं। इन्होंने अधिकांशतः मुक्तक काव्यों की ही रचनाएं की हैं। ‘भाव मुक्तक’ और ‘प्रबंध मुक्तक’ आदि। इसलिए इन्होंने अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व की भांति अपनी काव्य शैली को भी स्वतंत्र रखने की चेष्टा की है।

नागार्जुन के पुरस्कार

  1. नागार्जुन जी को मैथिली भाषा में लिखित ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ कृति के लिए सन् 1969 ई. में “साहित्य अकादमी पुरस्कार” से सम्मानित किया गया।
  2. उत्तर प्रदेश के हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा, नागार्जुन जी को “भारत-भारती पुरस्कार” से सम्मानित किया गया।
  3. मध्य प्रदेश सरकार द्वारा, नागार्जुन जी को “मैथिलीशरण गुप्त सम्मान” से भी सम्मानित किया गया।
  4. बिहार सरकार द्वारा, नागार्जुन जी को सन् 1994 ई. में “राजेन्द्र शिखर सम्मान” से सम्मानित किया गया।
  5. पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा, नागार्जुन जी को “राहुल सांकृत्यायन सम्मान” से सम्मानित किया गया।
  6. सन् 1994 ई. में ही नागार्जुन जी को “साहित्य अकादमी फेलों” के रूप में नामांकितकर सम्मानित किया गया था।

नागार्जुन का साहित्य में स्थान

हिंदी साहित्य की अधिक शक्तिशाली और सामाजिक रूप से प्रासंगिक कविता की एक समृद्ध विरासत छोड़कर नागार्जुन जी का निधन हो गया था। इनके कार्यों का अधिक प्रचार समाज में आज भी मनाया जाता है और इनका अध्ययन किया जाता है। और इन्हें हिंदी साहित्य में सबसे प्रभावशाली शख्सियतों में से एक के रूप में याद किया जाता है जिनकी रचनाएं आज भी पाठकों के बीच गूंजती रहती हैं।

नागार्जुन का सामाजिक योगदान

नागार्जुन जी प्रगतिवादी विचारधारा से गहरे प्रभावित थे और इन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। और वह साहित्य को सामाजिक परिवर्तन के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग करने में विश्वास करते थे। तथा ये अपने लेखन का उपयोग प्रचलित सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था की आलोचना करने के लिए करते थे। इनकी कविताएं और उपन्यास जनता के बीच गूंजते रहे और इन्होंने अपने समय के दौरान सार्वजनिक चर्चा को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

नागार्जुन की काव्यगत विशेषताएं

नागार्जुन के काव्य की विशेषता का चित्रण उनके पहले काव्य-संग्रह ‘बादल को घिरते देखा है’ के प्रकाशन के साथ शुरू हुई। उनकी कविताओं की विशेषता उनकी कच्ची भावनाएं, गहन कल्पना और शक्तिशाली सामाजिक टिप्पणी थी। इन्होंने आम लोगों के संघर्षों, हाशिये पर पड़े लोगों की दुर्दशा और भारतीय समाज में व्याप्त सामाजिक असमानताओं के बारे में अपने काव्य में उल्लेखित किया है।

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नागार्जुन की प्रसिद्ध कविताएं

[प्रस्तुत लेख में कुछ पंक्तियां बादल को घिरते देखा है, “प्यासी पथराई आंखें” नामक काव्य से अवतरित हैं]

बादल को घिरते देखा है
अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है।
छोटे-मोटे मोती जैसे-अतिशय शीतल वारि-कणो को
मानसरोवर के उन स्वर्णिम कमलों पर गिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर छोटी-बड़ी कई झीलों के
श्यामल, शीतल, अमल सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की ऊमस से आकुल
तिक्त-मधुर-बिसतंतु खोजते, हंसों को तिरते देखा है।
एक दूसरे से वियुक्त हो
अलग-अलग रहकर ही जिनकी
सारी रात बितानी होती
निशा-काल के चिर अभीशापित
बेबस उन चकवा-चकाई का
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी-दरी पर, प्रणय-कहल छिड़ते देखा है।
कहां गया धनपति कुबेर वह
कहां गई उसकी वह अलका?
नहीं ठिकाना कालिदास का,
व्योम-वाहिनी गंगा जल का!
ढूंढा बहुत परंतु लगा क्या,
मेघदूत का पता कहीं पर!
कौन बताए यह यायावर,
बरस पड़ा होगा न यहीं पर
जाने दो वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में, नभचुम्बी कैलाश शीर्ष पर
महामेघ को झंझानिल से, गरज-गरज भिड़ते देखा है।
दुर्गम बर्फानी घाटी में,
शत सहस्त्र फुट उच्च-शिखर पर
अलख नाभि से उठने वाले
अपने ही उन्मादक परिमल-
के ऊपर धावित हो-होकर
तरल, तरुण कस्तूरी-मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है।
शत-शत निर्झर निर्झरिणी-कल
मुखरित देवदारू कानन में
शोणित, धवल, भोज-पात्रों से छाई हुई कुटी के भीतर
रंग-बिरंगे और सुगंधित फूलों से कुंतल को साजे
इंद्रनील की माला डाले शंख-सरीखे सुघर गले में,
कानों में कुवलय लटकाए, शतदल रक्त कमल वेणी में,
रजत-रचित मणि-खचित कलामय
पान-पात्र द्राक्षासव पूरित
रखे सामने अपने-अपने,
लोहित चंदन की त्रिपदी पर
नरम निदाग बाल कस्तूरी
मृग छालों पर पल्थी मारे
मदिरारुण आंखों वाले उन
उन्माद-किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल, मनोरम अंगुलियों की वंशी पर फिरते देखा है।

FAQs. नागार्जुन जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. नागार्जुन का जन्म कब और कहां हुआ था?

नागार्जुन का जन्म 30 जून, 1911 ई. में बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा ग्राम में हुआ था। सतलखा नागार्जुन का ननिहाल था।

2. बाबा नागार्जुन का दूसरा नाम क्या है?

नागार्जुन का वास्तविक नाम वैद्यनाथ मिश्र था। हिंदी साहित्य में इन्हें नागार्जुन और मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएं की थी।

3. नागार्जुन की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

नागार्जुन की मृत्यु 5 नवंबर, 1998 ई. में बिहार के दरभंगा शहर में हुई थी।

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4. नागार्जुन के माता पिता का क्या नाम था?

नागार्जुन के पिता का नाम श्री गोकुल मिश्र तथा माता का नाम श्रीमति उमा देवी था।

5. नागार्जुन की पहली हिंदी रचना कब प्रकाशित हुई थी?

नागार्जुन की पहली कविता “राम के प्रति” सन् 1935 ई. में विश्वबंधु नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इनकी मैथिली में प्रथम कविता बुकलेट थी, ‘बूढ़कर और विलाप’ जो सन् 1946 ई. में प्रकाशित हुई थी। तथा इनका हिंदी का पहला उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’ जो सन् 1948 ई. में प्रकाशित हुआ था।

6. नागार्जुन को कौन कौन से पुरस्कार मिले थे?

नागार्जुन जी को मैथिली भाषा में लिखित ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए सन् 1969 ई. में “साहित्य अकादमी पुरस्कार” से सम्मानित किया गया। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा “भारत-भारती” पुरस्कार, मध्य प्रदेश सरकार द्वारा “मैथिलीशरण गुप्त सम्मान”, बिहार सरकार द्वारा “राजेन्द्र शिखर सम्मान” तथा पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा “राहुल सांकृत्यायन सम्मान” से भी सम्मानित किया गया था।

7. नागार्जुन की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी हैं?

नागार्जुन की प्रमुख रचनाएं – युगधारा, सतरंगें पंखों वाली, प्यासी पथराई आंखें, तालाब की मछलियां, हजार-हजार बाॅंहोंवाली, भस्मांकुर, रतिनाथ की चाची, बलचनमा, नयी पौध, बाबा बटेसरनाथ, वरुण के बेटे, चित्रा, पत्रहीन नग्न गाछ, पका है कटहल, मर्यादा पुरुषोत्तम राम, विद्यापति की कहानियां, आसमान में चन्दा तारे आदि।

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