फ्रांस की क्रांति (1789 ई. – 1799 ई.), NCERT सार संग्रह | French Revolution in Hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको संक्षिप्त इतिहास NCERT सार संग्रह “महेश कुमार वर्णवाल” Book का अध्याय “फ्रांस की क्रांति” (French Revolution in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। इसमें हम आपको फ्रांसीसी क्रांति कब हुई इसका मुख्य कारण क्या था को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

फ्रांस की क्रांति

  • जिस समय अमरीकी स्वतंत्रता संग्राम (1776-81 ई.) चल रहा था उसी समय फ्रांस की क्रांति के बीज बोए जा रहे थे। फ्रांस की स्थिति अमेरिका से बिल्कुल भिन्न थी, किन्तु वहाँ भी अमेरिकी क्रान्ति का व्यापक प्रभाव पड़ रहा था।
  • अमेरिका की क्रांति की अपेक्षा फ्रांस की क्रांति ने विश्व को अधिक प्रभावित किया। इसके कारण विश्व के अनेक देशों में उथल-पुथल हुई, जिसके प्रति कोई भी देश तटस्थ नहीं रह सका।

फ्रांस की सामाजिक स्थिति

  • फ्रांस की दशा यूरोप के अन्य देशों की दशा से अधिक खराब न थी, फिर भी साधारण जनता को अनेक कष्ट सहन करने पड़ते थे।
  • शासक निरंकुश और फिजूलखर्च थे। अभिजात्य वर्ग और पादरियों को विशेषाधिकार प्राप्त थे। इस समय किसान भूमिहीन थे, मजदूर बेरोजगार थे और कराधान में बड़ी असमानताएँ थीं।
  • 18वीं सदी में फ्रांस एक शक्तिशाली राज्य था। उसने उत्तरी अमेरिका के एक विस्तृत क्षेत्र, और वेस्टइंडीज के द्वीपों के समूह पर अधिकार कर लिया था। इस दिखावटी शक्ति के होते हुए फ्रांसीसी राजतंत्र को एक महान् आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा था।

विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग या एस्टेट्स

🔺फ्रांसीसी समाज वगों या एस्टेट्स में विभाजित था। विशेषाधिकार प्राप्त दो वर्ग थे- पादरी और कुलीन वर्ग। इनको क्रम से पहला और दूसरा वर्ग कहा जाता था।

  • पहले वर्ग में लगभग एक लाख तीस हजार पादरी थे। दूसरे वर्ग में लगभग 80,000 परिवार या 4,00,000 व्यक्ति थे।
  • इन दोनों वर्गों के व्यक्ति प्रायः सभी करों से मुक्त थे। प्रशासकीय पदों और सेना के उच्च पदों पर अधिकतर इन वर्ग की नियुक्ति की जाती थी। फ्रांस की जनसंख्या उस समय 2,50,00,000 थी। मगर फ्रांस की कुल भूमि का 40 प्रतिशत भाग इन्हीं दोनों वर्गों के व्यक्तियों के पास था।
  • इन दोनों वर्गों की आय मुख्य रूप से उनकी बड़ी-बड़ी जमींदारियों से होती थी।
  • हर स्थान पर अभिजात्य वर्ग के व्यक्ति फिजूलखर्ची तथा भोग-विलास का जीवन बिताते थे, किन्तु दोनों उच्च वर्गों में कुछ निर्धन व्यक्ति भी थे। वे सभी बहुत असंतुष्ट थे और अपने वर्गों के धनी लोगों को अपने कष्टों के लिए दोषी ठहराते थे।

तीसरा वर्ग

  • फ्रांस की शेष जनता तीसरे वर्ग में आती थी। इस वर्ग में जनसाधारण आते थे, जो कुल जनसंख्या का लगभग 95 प्रतिशत थे। तीसरे वर्ग में कई विशेषाधिकार विहीन वर्ग के लोग थे। उनके बीच जीवन-स्तर और संपत्ति को लेकर बहुत अंतर था।
    🔺तीसरे वर्ग में सबसे अधिक संख्या किसानों की थी। फ्रांस की कुल जनसंख्या में लगभग 80 प्रतिशत किसान थे। इस बड़े वर्ग का जीवन बहुत ही निम्न स्तर का था।
  • फ्रांस के किसान मध्यकाल के कृषि दासों या पूर्वी यूरोप के 18वीं सदी के कृषि दासों की तरह न होकर स्वतंत्र किसान थे। अधिकतर किसानों के पास अपनी भूमि थी। किंतु अधिकांश किसान भूमिहीन थे या सीमांत किसान थे।
  • काश्तकारों और बटाईदारों की दशा इन किसानों की स्थिति से अधिक दयनीय थी। खेतों पर मजदूरी करने वालों की आय इससे भी कम थी।
  • 18वीं सदी में फ्रांस की कृषि व्यवस्था में कुछ परिवर्तन किए, गए। इससे किसानों की दशा पहले से भी चिंताजनक हो गई। वह जंगल से जलाने के लिए न ईधन ले सकता था और न अपने पशुओं को घास के मैदानों में चरा सकता था।
  • उसके ऊपर करों का असहनीय भार था। करों के अतिरिक्त उसे बेगारी करनी पड़ती थी। यहां लॉर्डों का सामंती व्यवस्था पर विशेषाधिकार था। अब सार्वजनिक कार्य पूरा करने के लिए पहले से अधिक बेगार कराई जाती थी।

मध्य वर्ग

  • तीसरे वर्ग के सभी व्यक्ति भूमि पर काम नहीं करते थे। इसी वर्ग में कस्बों और शहरों में रहने वाले शिल्पी, मजदूर और निर्धन व्यक्ति शामिल थे।
  • बुर्जुआ या मध्यम वर्ग में लेखक, डॉक्टर, जज, वकील, अध्यापक और असैनिक अधिकारी जैसे शिक्षित व्यक्ति तथा व्यापारी, बैंकर और कारखाने वाले धनी व्यक्ति शामिल थे।
  • आर्थिक दृष्टि से इस वर्ग के लोगों का महत्व बहुत अधिक था। व्यापार और वाणिज्य में यह वर्ग काफी सक्रिय था। फ्रांसिसी उपनिवेशों की स्थिति ने काफी धन बना दिया। इसलिए राज्य, पादरी और कुलीन वर्ग सभी इसके ऋणी थे। इन्होंने 19वीं सदी में आर्थिक और सामाजिक जीवन में परिवर्तन किया।
  • मध्य वर्ग को राजनीतिक अधिकार बिल्कुल नहीं मिले थे। इस वर्ग का समाज में कोई विशेष सम्मान नहीं था। इस वर्ग के सदस्यों को बार-बार अपमानित होना पड़ता था।

दस्तकार तथा शहरों के मजदूर

  • 18वीं सदी में फ्रांस के शहरों के निर्धन-वर्ग की दशा बहुत खराब थी। इस वर्ग में मजदूर और दस्तकार शामिल थे। उनको हीन प्राणी समझा जाता था और उनके पास कोई अधिकार नहीं थे।
  • बिना मालिक की इच्छा के और उससे अच्छे आचरण का प्रमाण-पत्र लिए बिना कोई मजदूर अपनी नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी नहीं कर सकता था। जिन मजदूरों के पास प्रमाण-पत्र नहीं होता, उन्हें बंदी बनाया जा सकता था। उन्हें सुबह से शाम तक कठिन परिश्रम करना पड़ता था और बहुत से कर देने पड़ते थे।
  • शोषित या पीड़ित मजदूर बहुत-सी गुप्त संस्थाएँ बना लेते थे और बहुधा हड़ताल और विद्रोह करते थे।

राजतंत्र

  • फ्रांस में राज्य का अध्यक्ष राजा था, जो पूर्णतः निरंकुश होता था। जब क्रांति प्रारंभ हुई तब फ्रांस में लुई XVI शासन कर रहा था।
  • वह बुद्धिमान नहीं था अपितु बहुत जिद्दी तथा सरकारी कार्यों से उदासीन रहने वाला व्यक्ति था। उसकी सुंदर किन्तु मूर्ख पत्नी मैरी एंटोनेटे (Marie Antoinette) उत्सवों में काफी रुपये खर्च करती थी। वह अपने लोगों को उच्च पद दिलाने के लिए राजकाज में दखल देती रहती थी।
  • ऐसी परिस्थिति में, सरकार को बहुधा आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता था। बड़ी सेना और युद्धों के व्यय ने आर्थिक दशा और भी बिगाड़ दी थी।

तर्कवाद और तर्क का युग

  • फ्रांसीसी बुद्धिजीवियों ने 18वीं सदी में जो विचार व्यक्त किए वे तर्क पर आधारित थे, इसलिए इस काल को तर्क का युग कहते हैं।
    🔺ईसाई धर्म की शिक्षा थी कि मनुष्य का जन्म ही कष्ट भोगने के लिए हुआ है।
  • फ्रांस के क्रांतिकारी दार्शनिकों ने बड़े जोरदार शब्दों में कहा कि मनुष्य का जन्म इस संसार में सुखी रहने के लिए हुआ है।
  • वे ईश्वर के अस्तित्व को या तो मानते ही नहीं थे या उसकी उपेक्षा करते थे। ईश्वर के स्थान पर वे प्रकृति को मानते थे और कहते थे कि मनुष्य को प्राकृतिक नियमों को समझने का प्रयत्न करना चाहिए और तर्क में आस्था रखनी चाहिए। उनके अनुसार समाज को सुधारने और पूर्णता प्रदान करने के लिए केवल तर्क बुद्धि पर्याप्त है।

पादरियों पर प्रहार

  • फ्रांसीसी दार्शनिकों के विचारों का प्रभाव सबसे पहले पादरियों पर पड़ा। इस समय के सबसे प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखकों में वाल्टेयर का नाम उल्लेखनीय है। वह नास्तिक नहीं था, किन्तु उसका मत था कि सभी धर्म व्यर्थ हैं, क्योंकि वह तर्क पर आधारित नहीं हैं।
  • वाल्टेयर के बाद अन्य नास्तिक या भौतिकवादी दार्शनिक फ्रांस में बहुत लोकप्रिय हो गए। उनका विश्वास था कि मनुष्य का भविष्य स्वर्ग में नहीं, बल्कि इसी संसार में है।
  • कैथोलिक धर्म की आलोचना में जो रचनाएँ लिखी गई, उन्होंने क्रांति की ज्वाला को अधिक तीव्र कर दिया।

अर्थशास्त्री

  • उस समय फ्रांस के अर्थशास्त्रियों को फिजियोक्रेट कहा जाता था। अहस्तक्षेप के सिद्धांत में उनकी पूरी आस्था थी। इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संपत्ति का प्रबंध करने या बेचने की पूरी स्वतंत्रता थी।
  • इंग्लैण्ड और अमेरिका के क्रांतिकारियों की तरह फिजियोक्रेटों का मत था कि कर जनता की सहमति से ही लगाए जाने चाहिए।

लोकतंत्र

  • मांटेस्क्यू नामक दार्शनिक ने इस बात पर विचार किया कि मनुष्य के लिए किस प्रकार का शासन सर्वश्रेष्ठ रहेगा। उसने गणतंत्रीय लोकतंत्र के सिद्धांतों की रूपरेखा तैयार की।
    🔺रूसो पहला लेखक था, जिसने लोकप्रिय प्रभुसत्ता और लोकतंत्र का जोरदार शब्दों में समर्थन किया। उसका कथन था कि मानव इस जगत में आजाद पैदा हुआ परंतु अब वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है।
  • रूसो के अनुसार एक नई सामाजिक अनुबंध की आवश्यकता है। इस अनुबंध के द्वारा मनुष्य को उस स्वतंत्रता, समानता और सुख की गारंटी मिलनी चाहिए, जिसका उसने प्राकृतिक अवस्था में उपभोग किया था।
  • रूसो के सिद्धांतों में एक सिद्धांत, जिसको अमेरिका की स्वतंत्रता की घोषणा में सम्मिलित किया गया, रूसों के अनुसार कोई राजनीतिक पद्धति जो जनता के सहयोग पर आधारित न हो, सफल नहीं हो सकती।

क्रांति का प्रारंभ

  • सन् 1789 में जब लुई XVI को धन की आवश्यकता हुई तो विवश होकर वह पुरानी सामंती सभा (Feudal House) स्टेट्स-जनरल का अधिवेशन बुलाने के लिए सहमत हो गया।
  • 1614 ई. में इस सभा का कोई अधिवेशन नहीं हुआ था। अब लुई नए ऋण लेने और कर लगाने के लिए इस सभा की सहमति चाहता था।
  • इस सभा में तीनों वर्गों का प्रतिनिधित्व था, कितु तीनों वर्ग अपने अलग-अलग अधिवेशन करते थे।
  • 17 जून, 1789 को तीसरे वर्ग के सदस्यों ने इस आधार पर कि वे जनसंख्या के 96 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं, अपनी सभा को राष्ट्रीय सभा घोषित कर दिया।
  • 20 जून को जब वे अधिवेशन करने के लिए एकत्रित हुए तो उन्होंने देखा कि जिस हॉल में उनका अधिवेशन होने वाला था, उस पर शाही अंगरक्षकों का पहरा है।
  • वे अधिवेशन करने के लिए दृढ़संकल्प थे, इसलिए वे पास के शाही टेनिस-कोर्ट में एकत्रित हुए और वहीं उन्होंने फ्रांस का संविधान बनाना प्रारंभ किया।
  • लुई ने उस सभा को भंग करने का प्रयत्न किया। सेना बुला ली गई और इस बात की अफवाह फैल गई कि शीघ्र ही सभा के प्रमुख सदस्यों को बंदी बना लिया जाएगा। इससे जनता में रोष की लहर दौड़ गई और हजारों की संख्या में लोग वहाँ एकत्रित होने लगे।
  • 14 जुलाई को उन्होंने बास्तील के कारागार को घेर लिया। चार घंटे घेरा डालने के बाद वे जेल का फाटक तोड़ने में सफल हुए और उन्होंने सभी बंदियों को स्वतंत्र कर दिया।
    🔺बास्तील कारागृह की समाप्ति निरंकुश शासन के पतन का प्रतीक थी। फ्रांस में हर वर्ष 14 जुलाई का दिन राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है।
  • 14 जुलाई, 1700 के पश्चात् लुई XVI नाममात्र के लिए राजा बना रहा। राष्ट्रीय सभा देश के लिए अधिनियम बनाने लगी। राष्ट्रीय सभा ने मानव और नागरिकों के अधिकारों की घोषणा को स्वीकार किया।
  • इस घोषणा के द्वारा कानून की दृष्टि में सब व्यक्तियों की समानता, समस्त सार्वजनिक पदों पर सब नागरिकों के नियुक्त होने का अधिकार, बिना कारण दंड देने या बंदी बनाए जाने से मुक्ति और भाषण व प्रकाशन (प्रेस) की स्वतंत्रता के सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया था।
  • मध्यवर्ग के लिए सबसे महत्वपूर्ण निश्चय वे थे, जिनके अनुसार कर का भार सभी वगों पर बराबर डालने का निश्चय किया गया और सभी को निजी संपत्ति रखने का अधिकार दिया गया।

युद्ध और राजतंत्र का अंत

  • फ्रांस को ऑस्ट्रिया, प्रशा और सेवॉय (इटली) के राजाओं के विरुद्ध लड़ना पड़ा। देश से भाग जाने वाले फ्रांस के निवासियों की सेना ने इन तीनों राजाओं की सहायता की।
  • फ्रांस ने सामंतवाद और राजतंत्र की समाप्ति कर दी और अपनी नई संस्थाओं का निर्माण स्वतंत्रता तथा समानता के आधार पर किया।
  • ऑस्ट्रिया, प्रशा और सेवाॅय ने कुछ दिन पश्चात् स्वयं को फ्रांसीसी गणराज्य का सम्राट घोषित किया।

क्रांति और नेपोलियन के युद्ध

  • सन् 1792 से 1815 तक फ्रांस बराबर युद्धों में फंसा रहा। इन युद्धों में एक ओर फ्रांस था और दूसरी ओर अन्य राष्ट्र थे।
  • इस युद्ध में सैनिक दृष्टि से फ्रांस अकेला था, किन्तु नेपोलियन के सम्राट बनने से पूर्व संसार के प्रायः प्रत्येक विचारशील व्यक्तियों ने फ्रांसीसी क्रांति के प्रति सहानुभूति प्रकट की थी।
  • सन् 1793-96 के मध्य फ्रांसीसी सेनाओं ने लगभग संपूर्ण पश्चिमी यूरोप पर विजय हासिल कर ली।
  • नेपोलियन माल्टा, मिस्र और सीरिया की ओर बढ़ा (1797-99 ई.) तथा इटली से फ्रांसीसियों को बाहर ढकेल दिया गया। जब सत्ता पर नेपोलियन का कब्जा हुआ तब फ्रांस ने अपने खोये हुए भूखण्ड पुनः वापस प्राप्त कर लिए। उसने ऑस्ट्रिया को 1805 ई. में, प्रशा को 1806 ई. में और रूस को 1807 ई. में परास्त किया।
  • समुद्र के ऊपर ब्रिटिश नौसेना पर फ्रांसीसी अपना प्रभुत्व कायम नहीं कर सके।
  • यूरोपीय देशों ने मिलकर सन् 1813 में लिप्जिंग में फ्रांस को परास्त किया और इन मित्र राष्ट्रों की सेनाओं ने पेरिस पर अधिकार कर लिया।
  • नेपोलियन पराजित हो गया, जून 1815 में वाटरलू में पुनः विजय हासिल करने का उसका प्रयास सफल न हो सका इसके पश्चात् वियना सम्मेलन में शांति संधियाँ हुई।

✴️ क्रांति का परिणाम -• क्रांति का एक महत्वपूर्ण परिणाम फ्रांस में सामंतवाद का विनाश था। पुराने सामंतवादी कानून समाप्त कर दिए गए।

  • मध्य वर्ग के लोगों ने चर्च और समुदाय को भूमि खरीद ली और अभिजात्य वर्ग की भूमि जब्त कर ली गई।
  • जब नेपोलियन सत्ता में आया तो नेपोलियन ने नये कानून चलाए। फ्रांस की क्रांति का दूसरा स्थायी परिणाम यह हुआ, कि सामंती अर्थव्यवस्था को उखाड़ फेंका गया।
    🔺सामंती अर्थव्यवस्था को जगह एक नई अर्थव्यवस्था कायम हुई। इस नई व्यवस्था का नाम पूँजीवाद था।
  • फ्रांस की क्रांति ने राष्ट्र शब्द का आधुनिक अर्थ स्पष्ट किया। राष्ट्र केवल उस प्रदेश को नहीं कहते जहाँ केवल वहाँ के लोग रहते हैं बल्कि स्वयं भी लोग राष्ट्र का हिस्सा होते हैं।
  • अब फ्रांस केवल वह देश-प्रदेश नहीं रहा जिसे लोग फ्रांस के नाम से जानते थे, बल्कि फ्रांस का अर्थ फ्रांस के लोग समझा जाने लगा।
  • इससे प्रभुसत्ता के विचार का अविर्भाव हुआ प्रभुसत्ता यानि कोई राष्ट्र अपने स्वयं के कानूनों और प्रभुत्व के अलावा किसी और देश के प्रभुत्व या कानून को मान्यता नहीं देता।
  • किसी राष्ट्र के प्रभुता संपन्न होने का अर्थ यह हुआ, कि जिन लोगों द्वारा वह राष्ट्र बना है, वे ही लोग उस राष्ट्र को शक्ति और प्रभुता के आधार हैं।
  • जब नेपोलियन सम्राट बना तो उसने अपने को फ्रांसीसी गणतंत्र का सम्राट कहलवाया। हालांकि उसने वहाँ के गणतंत्र को समाप्त कर दिया।

फ्रांस की क्रांति का विश्व पर प्रभाव

  • यूरोप के लगभग सभी देशों में और दक्षिण व मध्य अमेरिका में अनेक क्रांतिकारी आंदोलन इससे प्रेरित हुए।
  • फ्रांस के सैनिक जहाँ कहीं भी गए, अपने साथ वे आजानी व समानता के विचार ले गए। इससे पुरानी सामंती व्यवस्था को धक्का लगा।
  • उन्होंने अधिकृत प्रदेशों में कृषि-वासता की प्रथा समाप्त की और प्रशासन का आधुनिकीकरण किया।

अमेरिका में क्रांतियाँ

  • अमेरिका महाद्वीप में क्रांति का प्रभाव दिखाई दिया। क्रांतिकारी फ्रांस ने अपने उपनिवेशों में दासता की प्रथा समाप्त कर दी थी। पहले का फ्रांसीसी उपनिवेश हैती गणतंत्र देश बन गया।
  • यह उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के काले लोगों द्वारा, जो पूर्वकाल में दास थे, स्थापित पहला गणतंत्र था।
  • इससे प्रेरणा पाकर उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका में विदेशी शासन को समाप्त करने, दासता की प्रथा समाप्त करने और स्वतंत्र गणतंत्रों की स्थापना करने के लिए क्रांतिकारी आंदोलन प्रारम्भ हुए। मध्य दक्षिणी अमेरिका में प्रमुख यूरोपीय साम्राज्यवादी शक्तियाँ स्पेन और पुर्तगाल थीं।
  • फ्रांस ने स्पेन पर अधिकार कर लिया था और पुर्तगाल को संघर्ष में उलझाए हुए था।
  • उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में ये दोनों साम्राज्यवादी देश अपने उपनिवेशों से काट दिए गए, नतीजा यह हुआ कि मध्य व दक्षिणी अमेरिका के अधिकाँश स्पेनी व पुर्तगाली उपनिवेश स्वतंत्र हो गए।
  • इन देशों में स्वाधीनता के आंदोलन ने अमेरिका के स्वाधीनता युद्ध की सफलता से प्रेरणा पाई थी।

यूरोप में क्रांतिकारी आंदोलन

  • सन् 1815 के बाद के काल में यूरोप के हर देश में क्रांतिकारी गतिविधियों का अविर्भाव हुआ।
  • इस काल में एक प्रबलकारी शक्ति के रूप में राष्ट्रीयता का उदय हुआ। यह राष्ट्रीयता न तो किसी खास प्रदेश के लिए विशिष्ट थी, न ही अंधवेशभक्ति वाली थी।
  • दक्षिणी अमेरिका के क्रांतिकारी हिसिंग, साइमन बोलिवर और सैन मार्टिन दक्षिण अमेरिका के अनेक देशों के लिए लड़े।
    🔺इटली की आजादी और एकता के लिए लड़ने वाले नेताओं में सर्वोच्च मेजिनी था। उसने पोलैंड, जर्मनी और इटली की स्वतंत्रता के लिए यंग पोलैंड, यंग जर्मनी, यंग इटली जैसे कई संगठन बनाए।
  • 1815 ई. में ऑस्ट्रिया, ब्रिटेन, रूस और प्रशा ने एक संधि की। इस संधि के घोषित लक्ष्यों में से प्रमुख था- जनता द्वारा किसी ऐसे शासक को जिसे ये देश वैध शासक मानते हों, उखाड़ने की कोशिश को कुचलना।
  • ऑस्ट्रिया, रूस और प्रशा ने एक और संधि कर रखी थी, जिसे वे पवित्र संधि कहते थे इसमें आगे चल कर और शासक शामिल हो गए।
  • यूरोप के क्रांतिकारी आंदोलनों को दबाने के लिए वहाँ के शासकों ने जो उपाय किए वे असफल रहे। सन् 1830 में अनेक देशों में क्राति की चिंगारी दहक उठी।
  • फ्रांस का राजा भाग कर इंग्लैण्ड पहुँचा और उसकी जगह लुई फिलिप ने ले ली, जिसने जनता की इच्छानुसार शासन करने का वचन दिया।
  • हॉलैंड से आजादी लेने के लिए बेल्जियम में विद्रोह हुआ। अधिकांश विद्रोहों को दबा दिया गया, फिर भी दो नए राष्ट्रों की आजादी को मान्यता मिल गई। 1830 ई. में यूनान और 1839 ई. में बेल्जियम को आजादी की मान्यता मिली।

1848 ई. की क्रांतियाँ

  • 1848 ई. में यूरोप के लगभग सभी देशों में क्रांति के लिये आसार दिखने लगे जो पवित्र संधि वाले देशों के लिये दुर्भाग्यशाली सिद्ध हुये।
  • नेपोलियन के भतीजे लुई नेपोलियन बोनापार्ट ने स्वयं को 1852 ई. में फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया और वहाँ की सत्ता हड़प ली। अंत में जब इस लुई बोनापार्ट का साम्राज्य समाप्त हुआ, तब 1871 ई. में फ्रांस गणतंत्र बन सका।
  • फ्रांस की क्रांति के तुरंत बाद जर्मनी के अनेक शहरों में विद्रोह हुए। जर्मनी के कई राज्यों के शासक, जिसमें पवित्र सधि का सदस्य प्रशा भी शामिल था, अनेक सुधार करने को तैयार हो गए।
  • पवित्र संधि के दूसरे सदस्य ऑस्ट्रियाई साम्राज्य की राजधानी वियना और कई नगरों में विद्रोह हुए। वहाँ के अधिपति (चांसलर) मेटरनिक को, जो वहाँ का सबसे घृणित व्यक्ति था, को साम्राज्य त्यागना पड़ा।
  • सन् 1848 की क्रांतियाँ यूरोप की जमी हुई अत्याचारी शासन प्रणालियों को उखाड़ फेंकने में असफल रहीं, हालाँकि इन क्रांतियों ने इन प्रणालियों को अत्यधिक कमजोर कर दिया।
  • 1848 ई. की क्रांतियों का सबसे सशक्त पहलू यह है, कि यूरोप में एक नई राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ।
  • 1848 ई. की क्रांतियों की एक बड़ी ताकत श्रमिक थे। उनका उद्देश्य केवल राजतंत्रों को उखाड़ फेंकना ही नहीं, बल्कि औद्योगिक क्रांति के साथ जन्मी आर्थिक प्रणाली-पूँजीवाद को समूल नष्ट करना था।

इंग्लैण्ड में लोकतंत्र का विकास

  • निरंकुश राजतंत्र को समाप्त करने वाली प्रथम सफल क्रांति इंग्लैण्ड में सत्रहवीं शताब्दी के दौरान हुई। इंग्लैण्ड में संसद को सर्वोच्च स्थान मिल गया, फिर भी उस समय संसद लोकतांत्रिक संस्था नहीं थी।
  • 18वीं और 19वीं सदी के दौरान संसद को लोकतांत्रिक संस्था बनाने की माँग ने जोर पकड़ा। प्रत्येक नागरिक को मतदान का अधिकार दिलाने के लिए आंदोलन चलाए गए।
  • सन् 1832 तक संसद के लिए प्रतिनिधि जनसख्या नहीं बल्कि चुनाव क्षेत्रों (काउन्टियों और बरो) के आधार पर चुने आते थे।
  • सन् 1832 के अधिनियम के द्वारा पुराने जनसंख्या विहीन क्षेत्रों में या सड़े हुए बरो (उस समय उन क्षेत्रों को इसी नाम से पुकारा जाता था) को चुनाव-क्षेत्र के रूप में समाप्त कर दिया गया और उनके स्थान पर नये कस्बों और शहरों को प्रतिनिधि भेजने का अधिकार दे दिया गया।
  • उस समय मतदान का अधिकार केवल उन्हीं व्यक्तियों को था, जिनके पास कस्बे या गाँव में अपना निजी मकान हो या जिन्होंने एक निश्चित मूल्य या उससे ऊपर का मकान किराये पर ले रखा हो।
  • इस प्रकार केवल 10 प्रतिशत जनता को मतवान का अधिकार था। राष्ट्रीय एकीकरण और आजादी के लिए किए जाने वाले संघर्ष 19वीं सदी के यूरोप के इतिहास को एक प्रमुख विशेषता थी।

जर्मनी का एकीकरण

  • 18वीं सदी में जर्मनी अनेक राज्यों में बँटा हुआ था, जिनमें से कुछ तो इतने छोटे थे कि शहरों से बड़े न थे।
  • नेपोलियन की लड़ाइयों के जमाने में इनमें से बहुत से समाप्त हो गए। युद्ध के बाद भी जर्मनी में 38 स्वतंत्र राज्य बचे थे। इनमें से प्रशा, ब्रेनलबर्ग, बवेरिया, बाॅडेन और सैक्सोनी काफी बड़े थे। आकार और सैनिक शक्ति की दृष्टि से प्राशा सबसे शक्तिशाली था।
    🔺प्रशा की सामाजिक व्यवस्था में सबसे प्रभावकारी वर्ग बड़े जमींदारों का था, जिन्हें जुंकर कहते थे।
  • प्रशा भी पवित्र संधि के सदस्यों में से था।
  • अनेक राज्यों में बँटे होने के कारण जर्मनी के आर्थिक विकास को अत्यधिक नुकसान उठाना पड़ा था।
  • इन राज्यों की सामाजिक व राजनीतिक प्रणालियाँ भी बड़ी पिछड़ी हुई थीं। इन राज्यों के लोगों ने जर्मनी के राष्ट्रीय एकीकरण, लोकतंत्रीय सरकार की स्थापना और सामाजिक व आर्थिक सुधारों की माँग करना प्रारम्भ कर दिया।
  • 1815 ई. में जर्मनी के राज्यों को ऑस्ट्रिया के साथ जर्मनी संघ में संगठित कर दिया गया। 1848 ई. में जर्मनी के प्रत्येक राज्य में विद्रोह हुए और शासकों को लोकतांत्रिक संविधान बनाने पर मजबूर किया गया।
  • जर्मनी को एक करने की दृष्टि से और संयुक्त जर्मनी के लिए सविधान बनाने के उद्देश्य से फ्रैंकफर्ट में एक विधान सभा बैठी।
फ्रांस की क्रांति
फ्रांस की क्रांति
  • फ्रैंकफर्ट की सभा ने जर्मनी के एकीकरण का प्रस्ताव रखा। इसके अंतर्गत एक संवैधानिक राजतंत्र का निर्माण होना था, जो प्रशा के राजा के अधीन काम करता और यह राजा जर्मनी का सम्राट कहलाता था।
  • प्रशा के राजा ने प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया और उसने जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों के हाथों से राजमुकुट ग्रहण करने से इंकार कर दिया। इसके साथ ही दमनचक्र प्रारम्भ हो गया और लोगों को क्रांति के प्रारंभ में ही जो अधिकार मिल चुके थे, वे भी छिन गए। हजारों जर्मन क्रांतिकारियों को देश छोड़ कर भागना पड़ा और विदेश में अज्ञातवास करना पड़ा।
  • अब जर्मनी का एकीकरण एक लोकतंत्रीय देश के रूप में क्रांतिकारियों के प्रयत्न से नहीं होना था, बल्कि एक सैन्यशक्ति प्रधान साम्राज्य के रूप में शासकों द्वारा होना था।
  • इस नीति का नेता बिस्मार्क था, जो प्रशा के एक अभिजात्य घराने का था। वह संयुक्त जर्मन राज्य में जमींदार अभिजात्यों और सेना की प्रधानता चाहता था।
  • वह जर्मनी का एकीकरण प्रशा के राजघराने के अधीन चाहता था।
    🔺बिस्मार्क ने एकीकरण की अपनी नीति को रक्त और लौह की नीति कहा। रक्त और लौह की नीति का अर्थ था, युद्ध।
  • अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने ऑस्ट्रिया को जर्मनी संघ से निकाल बाहर किया। उसने 1866 ई. में जर्मनी के 22 राज्यों को संयुक्त करके उत्तरी जर्मन संघ बनाया। जर्मनी का एकीकरण प्रशा और फ्रांस के बीच हुए एक युद्ध के बाद पूरा हो गया।
  • 1870 ई. में लुई बोनापार्ट ने, जिसकी शक्ति क्षीण होने लगी थी. प्रशा पर आक्रमण कर दिया। यह युद्ध बोनापार्ट के पतन का कारण बनी। फ्रांस की सेना पराजित हुई और सम्राट बंदी बना लिया गया।
  • पराजय के पश्चात् फ्रांस एक गणतंत्र हो गया और जर्मनी का एकीकरण पूरा हो गया। एकीकरण के बाद जर्मनी यूरोप का शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर कर सामने आया।

इटली का एकीकरण

  • जर्मनी की तरह इटली भी अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था। 19वीं सदी के इटली के प्रमुख राज्य सार्डीनिया, लोम्बार्डी, वेनेशिया, सिसिली के दो राज्य (अर्थात् सिसिली और नेपल्स) पोप के अधीन राज्य, टस्कनी, पर्मा और मॉडेना थे। इनमें सबसे शक्तिशाली सार्डीनिया का राज्य था।
  • इटली की स्वाधीनता और एकीकरण का संघर्ष इटली के दो प्रसिद्ध क्रांतिकारियों ने शुरु किया ये थे-मेजिनी और गरीबाल्डी। उनके द्वारा चलाये गये आंदोलन को यंग इटली आंदोलन कहते हैं।
फ्रांस की क्रांति
  • इसका उद्देश्य इटली को स्वाधीनता दिलाना, उसका एकीकरण करना और वहाँ गणतंत्र की स्थापना करना था।
  • यूरोप के अन्य भागों की तरह 1848 ई. में इटली में भी क्रांतिकारी विद्रोह आरंभ हो गए थे। 1848 ई. की क्रांति के बाद सार्डीनिया के राजा ने अपने राज्य के राजनीतिक तंत्र में अनेक सुधार कर लिये थे।
  • 1848 ई. के पश्चात् उसके प्रधान मंत्री काउंट कैवूर ने सार्डीनिया के नेतृत्व में इटली का एकीकरण करने के काम में पहल की। कैवूर की नीति कुछ मायनों में जर्मनी के बिस्मार्क द्वारा अपनाई गई नीति के समान थी।
  • ब्रिटेन और फ्रांस का समर्थन पाने की उम्मीद से कैवूर ने सन् 1853-56 में रूस के विरुद्ध क्रीमिया का युद्ध का आरंभ किया।
  • 1859 ई. में कैवूर ने लुई बोनापार्ट के साथ एक संधि की और उनके अनुसार उसने ऑस्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध का आरंभ किया।
  • सार्डीनिया ने लोम्बार्डी से ऑस्ट्रियाई शासन को समाप्त दिया और उस पर अधिकार कर लिया। टस्कनी, माॅडेना, पर्मा और उत्तर के पोप के राज्य भी सार्डीनिया से आ मिले।
  • सार्डीनिया के साथ संयुक्त होने के लिए जो राज्य बच गए, वे थे- सिसिली के दोनों राज्य और रोम जिस पर पोप का शासन था। इस दौरान सिसिली के दोनों राज्यों में विद्रोह प्रारम्भ हो गया था। गैरीबाल्डी अपने क्रांतिकारी साथियों के साथ सिसिली द्वीप गया और तीन महीनों के अंदर उसने राजा के शासन से उसको मुक्त कर दिया।
  • नवंबर, 1860 तक संपूर्ण सिसली के दोनों राज्य मुक्त हो चुके थे। इटली के क्रांतिकारी संभवतः इतने मजबूत नहीं थे, कि इटली के एक संयुक्त गणतंत्र की स्थापना के लिए सिसिली को क्रांति को और आगे बढ़ाते।
  • उन्होंने पूर्ववर्ती राज्य को सार्डीनिया के राजा विक्टर इमैनुएल द्वितीय को सौंप दिया जिसने 1861 ई. में इटली के राजा की उपाधि से अपने को विभूषित किया।
  • रोम अब भी इटली के राज्य से बाहर था। जब 1870 ई. में फ्रांस और प्रशा के मध्य युद्ध हुआ तब बोनापार्ट को अपनी सेनाओं को लेकर रोम से हटना पड़ा।
  • 1870 ई. में रोम के नगर पर इटली के सैनिकों ने अधिकार कर लिया और जुलाई, 1871 में रोम इटली के संयुक्त राज्य को राजधानी बनी।
  • मेजिनी और गैरीबाल्डी जैसे लोकतान्त्रिक और क्रांतिकारी नेताओं द्वारा इटली की स्वाधीनता और एकीकरण के लिए किए गए संघर्ष के महत्वपूर्ण योगदान के बाद, जर्मनी की भाँति इटली भी एक राजतंत्र बन गया।
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