बिहारीलाल – जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारीलाल हिन्दी साहित्य के आकाश में उदित होने वाले महान् एवं श्रेष्ठतम् कवि माने जाते है, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको कविवर बिहारी जी के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “बिहारीलाल का जीवन परिचय” (Bihari Lal biography in Hindi) के बारे में बताया है। इसमें हमने कविवर बिहारी का जीवन परिचय भाव पक्ष कला पक्ष अथवा साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली, काव्यगत विशेषताएं एवं हिंदी साहित्य में स्थान और कविवर बिहारी का संबंध किस काव्यधारा से है को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है।

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इसके अलावा, इसमें हमने बिहारीलाल जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप भी बिहारी जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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बिहारीलाल का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने कविवर बिहारी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
बिहारीलाल की जीवनी –

नामबिहारी लाल
अन्य नामबिहारी, कविवर बिहारी
जन्म तिथिसंवत् 1660 वि० (सन् 1603 ई.)
जन्म स्थानबसुआ गोविन्दपुर ग्राम (ग्वालियर), मध्य प्रदेश
मृत्यु तिथिसंवत् 1720 वि० (सन् 1663 ई.)
मृत्यु स्थानवृन्दावन (मथुरा), उत्तर प्रदेश
पिता का नामश्री केशवराय
माता का नामज्ञात नहीं है
पैशाकवि, रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि
काव्य-गुरुआचार्य केशवदास
शिक्षाकाव्य-शास्त्र की शिक्षा, ओरछा में
आश्रयराजा जयसिंह के दरबारी कवि
काल/अवधिरीतिकाल
रचना के विषयश्रृंगार, भक्ति, नीतिपरक दोहे
भाषासाहित्यिक ब्रजभाषा
शैलीमुक्तक (समास शैली)
काव्य-रचनाबिहारी सतसई (एकमात्र रचना)
प्रमुख रचनाएंबिहारी-सतसई (नीति, श्रृंगार और भक्ति के दोहे)।
उपलब्धि‘गागर में सागर भरने’ की संज्ञा से प्रतिष्ठित
साहित्य में स्थानकविवर बिहारी रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं, हिन्दी साहित्य में इनका विशेष महत्वपूर्ण स्थान है।
बिहारीलाल की जीवनी

प्रस्तावना— संक्षिप्त वर्णन और नपे-तुले शब्दों में किसी व्यक्ति अथवा भाव का जगमगाता रूप निखारने वाले बिहारीलाल रीति काल के प्रतिनिधि कवि एवं श्रृंगार रस के अद्वितीय कवि माने जाते हैं।

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बिहारीलाल का जीवन परिचय (bihari lal ka jeevan parichay)

जीवन-परिचय— बिहारी हिन्दी रीतिकाल के अन्तर्गत उसकी भावधारा को आत्मसात् करके भी प्रत्यक्षतः आचार्यत्व न स्वीकार करनेवाले मुक्त कवि हैं। इनका जन्म सन् 1603 ईस्वी (संवत् 1660 वि०) के लगभग ग्वालियर के पास बसुआ-गोविन्दपुर ग्राम में हुआ था। मध्य युग के अनेक भारतीय कवियों की भाँति इनके भी जन्म समय के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। इनके पिता का नाम केशवराय था। इन्हें मथुरा का चौबे ब्राह्मण माना जाता है। इनके एक भाई और एक बहन थी। बिहारी का विवाह मथुरा के किसी माथुर ब्राह्मण की कन्या से हुआ था और इन्होंने युवावस्था अपनी ससुराल मथुरा में ही बितायी थी। इनकी कोई सन्तान न होने के कारण अपने भतीजे निरंजन को गोद ले लिया था।

बिहारीलाल
बिहारीलाल का जीवन परिचय

कहा जाता है कि इनके पिता केशवराय इनके जन्म के सात-आठ वर्ष बाद ग्वालियर छोड़कर ओरछा चले गये। वहीं बिहारी ने हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि आचार्य केशवदास से काव्य-शिक्षा ग्रहण की। ओरछा में रहकर इन्होंने काव्य-ग्रन्थों के साथ ही संस्कृत और प्राकृत आदि का अध्ययन किया। आगरा जाकर इन्होंने उर्दू-फारसी का अध्ययन किया और अब्दुर्रहीम खानखाना के सम्पर्क में आये। इन्होंने अपनी काव्य-प्रतिभा से जयपुराधीश जयसिंह तथा उनकी पटरानी अनन्तकुमारी को विशेष प्रभावित किया, जिनसे इन्हें पर्याप्त पुरस्कार और ग्राम मिला तथा ये दरबार के राजकवि भी हो गये थे। जयपुर के राजकुमार रामसिंह का विद्यारम्भ संस्कार भी इन्होंने ही कराया था। अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद बिहारी राजदरबार छोड़कर वृन्दावन चले गये और वहीं सन् 1663 ईस्वी (संवत् 1720 वि०) में इनका निधन हो गया था।

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बिहारीलाल का साहित्यिक परिचय

साहित्यिक-परिचय— बिहारी ने सात सौ से कुछ अधिक दोहों की रचना की, जिनका संग्रह ‘बिहारी सतसई’ के नाम से हुआ है। एक-एक दोहे में अनेक भावों को सफलतापूर्वक भर देना इन्हीं का काम था। इसीलिए कहा जाता है कि बिहारी ने ‘गागर में सागर’ भरा है। अलंकार, नायिका-भेद, प्रकृति-वर्णन तथा भाव, विभाव, अनुभाव, संचारीभाव आदि सब कुछ अड़तालिस मात्राओं के एक छोटे से छन्द दोहे में भरकर इन्होंने काव्य-कला का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है। प्रसिद्ध है कि जयपुर नरेश महाराजा जयसिंह अपनी नवपरिणीता नवोढ़ा रानी के प्रेम-पाश में आबद्ध हो गये। इस कारण वे दरबार में अनेक दिनों तक नहीं आये। बिहारी की एक श्रृंगारिक अन्योक्ति ने महाराजा को सचेत कर पुनः कर्त्तव्यपथ पर अग्रसर कर दिया। वह दोहा निम्नलिखित है—

नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं बिकासु इहिं काल।
अली, कली ही सौं बँध्यो, आगैं कौन हवाल॥

महाराज इन्हें प्रत्येक दोहे पर एक स्वर्ण-मुद्रा भेंट करते थे। अतः इनकी 719 दोहों की सतसई सन् 1662 ई० (संवत् 1719 वि०) में समाप्त हुई। इनके दोहों के विषय में यह उक्ति प्रसिद्ध है—

सतसैया के दोहरे ज्यों नाविक के तीर।
देखन में छोटे लगें घाव करें गम्भीर ॥

यद्यपि ‘बिहारी सतसई’ शृंगार-प्रधान ग्रन्थ है, पर जीवन और प्रमुख विषयों पर बिहारी ने अपना अनुभव बड़े चमत्कारिक ढंग से प्रदर्शित किया है। इन्होंने नीति, भक्ति, ज्योतिष, गणित, आयुर्वेद, इतिहास आदि सम्बन्धी बड़ी अनूठी उक्तियाँ लिखी हैं, जिनसे इनकी बहुमुखी काव्य-प्रतिभा पर आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। हिन्दी जगत् में इनकी सतसई का सम्मान बहुत हुआ। बड़े-बड़े महाकवियों ने इस पर टीका लिखने में गर्व समझा ।

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बिहारीलाल की साहित्यिक सेवाएँ

साहित्यिक-सेवाएँ— बिहारी को निश्चय ही रीतिकाल का प्रतिनिधि कवि कहा जा सकता है; क्योंकि उनमें रीतिकालीन काव्य की सभी प्रमुख प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। रीतिकाल में एक धारा रीतिबद्ध कवियों की थी तथा दूसरी धारा रीतिमुक्त कवियों की। बिहारी ने रीतिकाल की बँधी-बँधाई परिपाटी के अन्तर्गत भी अपने लिये एक मध्यम मार्ग का निर्माण किया। यही बिहारी की वह विशेषता है, जिसने उन्हें रीतिसिद्ध काव्यधारा का एकमात्र कवि बना दिया। उन्होंने ही इस धारा का प्रवर्तन किया और उन्हीं के साथ यह समाप्त भी हो गयी। यह बिहारी की असाधारण प्रतिभा का एक ज्वलन्त प्रमाण है।

बिहारीलाल की प्रमुख रचनाएं

कृतियाँ— बिहारी ने केवल एक ही ग्रन्थ ‘बिहारी सतसई‘ की रचना की। उसी एक कृति ने इनको हिन्दी साहित्य में अमर कर दिया। ‘बिहारी सतसई’ में नीति, भक्ति और शृंगार सम्बन्धी दोहों का संकलन है। ‘बिहारी सतसई’ एक श्रृंगार रसप्रधान मुक्तक काव्य-ग्रन्थ है। श्रृंगार की अधिकता होने के कारण बिहारी मुख्य रूप से श्रृंगार रस के कवि माने जाते हैं। इन्होंने छोटे-से दोहे में प्रेम-लीला के गूढ़-से-गूढ़ प्रसंगों को अंकित किया है। इनके दोहों के विषय में कहा गया है-

सतसैया के दोहरे, ज्यौं नाविक के तीर।
देखन में छोटे लगें, घाव करें गम्भीर॥

बिहारीलाल की काव्यगत विशेषताएँ

काव्यगत-विशेषताएँ— कविवर बिहारी अपनी शृंगारिक रचनाओं के लिए विशेष प्रसिद्ध हैं। इन्होंने श्रृंगार के संयोग एवं विप्रलम्भ दोनों ही पक्षों का सफल चित्रण किया है। संयोग-शृंगार वर्णन में बिहारी के प्रेमी और प्रेमिका में परस्पर इतनी निकटता है जिसके कारण वे अपने द्वैत भाव को भूलकर एकरूप हो जाते हैं। मिलन के प्रकरणों में मनोवैज्ञानिक चित्रण के साथ बिहारी ने सांकेतिक दृश्यों का भी अनुपम मिश्रण किया है। कवि की दृष्टि नायिका के बाह्य रूप-सौन्दर्य के वर्णन, नख-शिख-वर्णन- विवेचन में जितनी रमी है उतनी आन्तरिक रमणीयता के प्रकाशन में नहीं। इनके काव्य में जहाँ पारम्परिक शृंगार का वर्णन है वहाँ मौलिक उद्भावनाएँ भी प्राप्त होती हैं। आलम्बन के विशद वर्णन के साथ उद्दीपन के चित्र भी मिलते हैं। बिहारी की काव्यगत विशेषताएँ दो पक्षों में अग्रलिखित हैं—

भाव पक्ष

बिहारी के काव्य में भक्ति, नीति और शृंगार की त्रिवेणी प्रवाहित हुई है। उनके नीति सम्बन्धी दोहे जीवन के ठोस एवं गहन अनुभवों पर आधारित हैं। प्रेम और सौंदर्य वर्णन में बिहारी अपना सानी नहीं रखते। उन्होंने नायक-नायिकाओं के हाव-भाव का बड़ा ही सजीव वर्णन प्रस्तुत किया है-

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौन में करत हैं, नैननु ही सौं बात ।।

प्रकृति का सजीव वर्णन भी बिहारी के दोहों में मिलता है। सरसता बिहारी के दोहों की विशेषता है। सतसई में श्रृंगार रस ही प्रधानता है परन्तु उसमें शांत रस, हास्य रस, अद्भुत रस के भी उदाहरण मिल जाते हैं।

कला पक्ष (भाषा-शैली)

कथन के बॉकेपन से सहृदय-पाठक को रस-मग्न करने की कला में निपुण बिहारी ने साहित्यिक ब्रजभाषा को ही अपनाया है। भाषा में शब्द-योजना बड़ी व्यवस्थित है। बिहारी कोमलकान्त पदावली से युक्त ब्रजभाषा के बेजोड़ कवि हैं। उनकी भाषा में भाव व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता है। बिहारी मुक्तक शैली के कवि हैं। उन्होंने फुटकर दोहों में सुन्दर-सुन्दर भाव चित्र उतारे हैं। सामासिकता, चित्रात्मकता, माधुर्य आदि बिहारी की शैली की विशेषताएँ हैं। बिहारी ने दोहा छन्द का ही प्रयोग किया है और दोहा जैसे छोटे छन्द में विस्तृत अर्थ की सफल अभिव्यंजना की है। इसीलिए कहा जाता है कि बिहारी ने ‘गागर में सागर’ भर दिया है। बिहारी ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष और यमक आदि अलंकारों का सुन्दर कलात्मक प्रयोग किया है, एक उदाहरण देखिए –

अरुन सरोरुह-कर चरन, दृग-खंजन मुख चंद।
समै आइ सुंदरि सरद, काहि न करति अनंद ॥

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बिहारीलाल का साहित्य में स्थान

साहित्य में स्थान— रीतिकालीन कवि बिहारी अपने ढंग के अद्वितीय कवि हैं। इनकी विलक्षण सृजन-प्रतिभा के कारण काव्य-संसार ने इन्हें महाकवि के पद पर प्रतिष्ठित किया है। आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र का कहना है, “प्रेम के भीतर उन्होंने सब प्रकार की सामग्री, सब प्रकार के वर्णन प्रस्तुत किये हैं और वह भी इन्हीं सात-सौ दोहों में। यह इनकी एक विशेषता ही है। नायिका-भेद या श्रृंगार का लक्षण-ग्रन्थ लिखने वाले भी किसी नायिका या अलंकारादि का वैसा उदाहरण प्रस्तुत करने में समर्थ नहीं हुए जैसा बिहारी ने किया है। हमें यह भी मान लेने में आनाकानी नहीं करनी चाहिए कि उनके जोड़ का हिन्दी में कोई दूसरा कवि नहीं हुआ।” अतः

कविवर बिहारी एक-एक दोहे में अनेक भावों को भरने की कला में निपुण बिहारी रीतिकाल के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं। हिन्दी साहित्य में इनका विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान है।

FAQs. कवि बिहारीलाल के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. बिहारीलाल का जन्म कब और कहां हुआ था?

बिहारीलाल का जन्म सन् 1603 ईस्वी (संवत् 1660 वि०) को मध्य प्रदेश के ग्वालियर के निकट बसुआ-गोविन्दपुर ग्राम में हुआ था।

2. बिहारी जी की मृत्यु कब हुई थी?

अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद बिहारीलाल राजदरबार छोड़कर वृन्दावन चले गये और वहीं सन् 1663 ईस्वी (संवत् 1720 वि०) में इनका निधन हो गया था।

3. बिहारी की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी है?

बिहारीलाल ने केवल एक ही ग्रन्थ ‘बिहारी सतसई’ की रचना की। ‘बिहारी सतसई’ में नीति, भक्ति और शृंगार सम्बन्धी दोहों का संकलन है।

4. बिहारी किसका दरबारी कवि था?

कविवर बिहारीलाल मिर्जा राजा जयसिंह के दरबारी कवि थे, जो जयपुर के राजा थे।

5. बिहारी के गुरु का क्या नाम है?

बिहारीलाल के काव्य-गुरु आचार्य केशवदास जी है।

6. बिहारी के काव्य की मुख्य विशेषता क्या है?

बिहारीलाल के समान इतनी कम रचना करके इतना अधिक सम्मान प्राप्त करनेवाला हिन्दी का कोई दूसरा कवि समझ में नहीं आता। इनको जो सम्मान मिला, वह इसलिए नहीं कि ये कविता के उस क्षेत्र में अकेले हैं, बल्कि इसलिए कि इन्होंने रचना के लिए शृंगार का जो क्षेत्र चुना, उसमें उसी ढंग की मुक्तक रचना करनेवाला कवि जनता और काव्य-मर्मज्ञों की दृष्टि में इनसे बढ़कर नहीं है। मुक्तक रचना में जितनी भी विशेषताएँ सम्भाव्य हैं, इनकी रचना में सब पायी जाती हैं। और वे अपने चरम उत्कर्ष को पहुँची हुई हैं।

7. बिहारी की काव्य भाषा क्या है?

बिहारीलाल की काव्य रचना बिहरी-सतसई की भाषा बड़ी ही प्रौढ़, प्राञ्जल, परिष्कृत और परिमार्जित ब्रज-भाषा है। परन्तु इसमें उस समय के प्रचलित अरबी-फारसी के शब्दों का भी बिहारी ने प्रयोग किया है। भाषा का आलंकारिक गुण देखा जाय तो इन्होंने अनुप्रास की योजना बहुत सावधानी से की है।

8. बिहारी का प्रिय अलंकार कौन सा है?

बिहारीलाल का प्रिय अलंकार अनुप्रास है।

9. कबीर बिहारी जी का जीवन परिचय?

कविवर बिहारी का जीवन-परिचय— रीतिकाल के प्रतिनिधि कवि बिहारी श्रृंगार रस के अद्वितीय कवि थे। इनका जन्म सन् 1603 ई० (सं० 1660 वि०) के लगभग ग्वालियर के निकट बसुवा गोविन्दपुर ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम केशवराय था। इन्हें मथुरा का चौबे ब्राह्मण माना जाता है। अनेक विद्वानों ने इनको आचार्य केशवदास (‘रामचन्द्रिका’ के रचयिता) का पुत्र स्वीकार किया है और तत्सम्बन्धी प्रमाण भी प्रस्तुत किये हैं। इन्होंने निम्बार्क सम्प्रदाय के अनुयायी स्वामी नरहरिदास से संस्कृत, प्राकृत आदि का अध्ययन किया था। इन्होंने युवावस्था अपनी ससुराल मथुरा में बितायी थी। मुगल बादशाह शाहजहाँ के निमन्त्रण पर ये आगरा चले गये और उसके बाद जयपुर के राजा जयसिंह के दरबारी कवि हो गये। राजा जयसिंह अपनी नवविवाहिता पत्नी के प्रेम-पाश में फँसकर जब राजकार्य को चौपट कर बैठे थे, तब बिहारी ने राजा की मोहनिद्रा भंग करने के लिए निम्नलिखित अन्योक्तिपूर्ण दोहा लिखकर उनके पास भेजा-
नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं बिकासु इहिं काल ।
अली कली ही सौं बँध्यो, आगे कौन हवाल ॥
इस दोहे को पढ़कर राजा की आँखें खुल गयीं और वे पुनः कर्त्तव्य-पथ पर अग्रसर हो गये। राजा जयसिंह की प्रेरणा पाकर बिहारी सुन्दर-सुन्दर दोहों की रचना करते थे और पुरस्कारस्वरूप प्रत्येक दोहे पर एक स्वर्ण-मुद्रा प्राप्त करते थे। बाद में पत्नी की मृत्यु के कारण श्रृंगारी कवि बिहारी का मन भक्ति और वैराग्य की ओर मुड़ गया। 723 दोहों की सतसई सन् 1662 ई० में समाप्त हुई मानी जाती है। सन् 1663 ई० (सं० 1720 वि०) में इनकी मृत्यु हो गयी।

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