भवानी प्रसाद मिश्र: जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “भवानी प्रसाद मिश्र का जीवन परिचय” (Bhawani Prasad Mishra biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने भवानीप्रसाद मिश्र का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और भवानी प्रसाद मिश्र की काव्यगत विशेषताएँ, भाव पक्ष एवं कला पक्ष को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने पं० भवानीप्रसाद मिश्र जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

भवानी प्रसाद मिश्र का जीवन परिचय

पं० भवानीप्रसाद जी का जन्म 23 मार्च, सन् 1914 ईस्वी में सिवनी, मालवा तहसील की सीमा से लगे हुए रेवा तट पर बसे टिगरिया नामक ग्राम, जिला होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री सीताराम मिश्र एवं माता का नाम श्रीमती गोमती देवी था। मिश्र जी का बचपन खण्डवा, बैतूल एवं सुहागपुर आदि में बीता था। इन्होंने बी०ए० की परीक्षा जबलपुर के ऐबर्टसन कॉलेज से उत्तीर्ण की। सन् 1942 ई० मे स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के परिणामस्वरूप इन्हें तीन वर्ष तक कारागार यातना सहन करनी पड़ी।

भवानी प्रसाद मिश्र जी ने वर्धा महिला आश्रम में कुछ समय तक अध्यापन कार्य किया। पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया, चित्रपट गीत लिखें, आकाशवाणी बम्बई केन्द्र में हिन्दी विभाग के प्रधान पद पर भी कार्य किया। इसके बाद इन्होंने ‘सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय’ का सम्पादन किया। 20 फरवरी, सन् 1985 ईस्वी को इनका देहावसान हो गया था।

भवानी प्रसाद मिश्र का साहित्यिक परिचय

श्री भवानीप्रसाद मिश्रजी गांधीवादी विचारधारा के चिन्तनशील कवि थे। वैयक्तिक्ता के आधार पर मिश्र जी ने अपने आसपास की हलचलों को सामाजिक उत्तरदायित्व की दृष्टि से बड़े प्रभावपूर्ण रूप में तथा नितान्त सहज और बोलचाल की भाषा शैली में व्यक्त कर कविता को आत्मीय वार्तालाप एवं आत्मानुभव कथन के रूप में प्रतिष्ठित किया है। जीवन में जो कुछ स्वस्थ है, मंगलदायक है, आह्लादकारी है उसे उभारने एवं प्रचारित-प्रसारित करने के लिये ही इन्होंने काव्य को साधन बनाया है। ‘गीत-फरोश’ नामक प्रसिद्ध रचना में इन्होंने कवि सम्मेलनों एवं सर्वज्ञ बनने का दावा करने वाले, रचनाकारों पर परोक्षतः प्रहार किया है। आधुनिक जीवन की यात्रिकता और ऊब को प्राकृतिक एवं मानवीय सौन्दर्य एवं गरिमा से मुक्ति प्राप्त कर सम्पन किया जा सकता है, यह विश्वास इनकी रचनाओं में मुखर हुआ है।

भवानी प्रसाद मिश्र की रचनाएँ

मिश्र जी की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं – तारसप्तक में संकलित कविताएँ, 1. गीतफरोश, 2. चकित है दुःख, 3. अँधेरी कविताएँ, 4. बुनी हुई रस्सी, 5. गाँधी पंचशती आदि।
इसके अतिरिक्त – 1. अनाम तुम अति हो, 2. त्रिकाल संध्या, 3. परिवर्तन जिये, 4. मानसरोवर दिन, 5. कालजयी आदि।

भवानी प्रसाद मिश्र की भाषा शैली

मिश्र जी की भाषा में विशेष सादगी एवं ताजगी है। इनकी भाषा में सजीवता है तथा भावाभिव्यक्ति की अपूर्व सामर्थ्य है। लोकोक्ति एवं मुहावरों से भाषा की जीवन शक्ति बढ़ी है, अलंकारों के प्रयोग से इनकी रचनाओं में अति प्रभावशीलता आई है। प्रतीकों का प्रयोग भी इनके काव्य में देखने को मिलता है। इनकी शैली में सजीवता, स्वाभाविकता, चिन्तनशीलता विचारप्रधानता मिश्र जी की रचनाओं के विशेष गुण कहे जा सकते हैं।

भवानी प्रसाद मिश्र की काव्यगत विशेषताएँ

मिश्र जी की कविता धरती की कविता ही नहीं, बल्कि जनता की कविता है। इन्होंने शोषण के विरुद्ध एवं शोषित के पक्ष में कविता को वाणी दी है। ग्रामीण जीवन और संस्कृति के यथार्थ चित्र भी इन्होंने अपनी रचनाओं में अंकित किये हैं। इनकी कविता का प्रमुख रस श्रृंगार एवं करुणा है। व्यंग्य को भी इनकी रचनाओं में स्थान प्राप्त है।

भवानी प्रसाद मिश्र जी के सम्मान एंव पुरस्कार

सन् 1972 ई० में इनकी कृति ‘बुनी हुई रस्सी’ के लिए मिश्र जी को ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त अन्य पुरस्कारों के साथ-साथ इन्हें भारत सरकार द्वारा ‘पद्मश्री’ की उपाधि से भी अलंकृत किया गया। सन् 1981-82 ई० में उत्तर प्रदेश के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद से सम्मानित किया और सन् 1983 ई० में इन्हें मध्य प्रदेश शासन के शिखर सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

भवानी प्रसाद मिश्र साहित्य में स्थान

दिनकर जी ने मिश्र जी को ‘सर्वोदयी कवि’ कहा है। इनके काव्य में मानव कल्याण एवं जन-जन के उत्थान की भावना है। नई कविता के ‘दूसरे सप्तक’ के ये प्रथम कवि हैं। नई कविता के कर्णधारों में भवानीप्रसाद मिश्रजी का नाम आदर से लिया जाता है। हिंदी साहित्य जगत् में इनका विशेष महत्वपूर्ण स्थान है।

भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएं

[भवानीप्रसाद मिश्र मूलतः प्रयोगवादी कवि हैं, ‘तार सप्तक’ में इनकी रचनाएँ संकलित हैं। प्रस्तुत कविता में इन्होंने आकाश से एक बूँद के टपकने की सामान्य सी घटना विविध उपमान-विधानों के साथ प्रस्तुत कर उसे अत्यन्त मोहक बनाया है। परम्परागत प्रतिक्रिया से भिन्न सर्वथा नवीन भाव-चित्रों का प्रणयन सहज ही पाठक को अभिभूत कर देता है। प्रयोगवादी कवियों ने परम्परागत उपमानों को छोड़कर सर्वथा नवीन उपमानों का प्रयोग अपनी कविताओं में किया था। यही प्रवृत्ति प्रस्तुत कविता में लक्षित होती है।]

बूँद टपकी एक नभ से

बूँद टपकी एक नभ से,
किसी ने झुक कर झरोखे से
कि जैसे हँस दिया हो,
हँस रही सी आँख ने जैसे
किसी को कस दिया हो,
ठगा सा कोई किसी की आँख
देखे रह गया हो,
उस बहुत से रूप को, रोमांच रोके
सह गया हो।

बूँद टपकी एक नभ से,
और जैसे पथिक
छू मुस्कान, चौंके और घूमे
आँख उसकी, जिस तरह
हँसती हुई-सी आँख चूमे,
उस तरह मैंने उठाई आँख :
बादल फट गया था,
चन्द्र पर आता हुआ-सा अभ्र
थोड़ा हट गया था।

बूँद टपकी एक नभ से,
ये कि जैसे आँख मिलते ही
झरोखा बन्द हो ले,
और नूपुर ध्वनि, झमक कर,
जिस तरह द्रुत छन्द हो ले,
उस तरह बादल सिमट कर,
और पानी के हजारों बूँद
तब आये अचानक ।
(दूसरा सप्तक से)

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