भारतीय राष्ट्रवाद का उदय, मुख्य तीन कारण, NCERT सार संग्रह | Rise of Nationalism in India in Hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको संक्षिप्त इतिहास NCERT सार संग्रह “महेश कुमार वर्णवाल” Book का अध्याय “भारतीय राष्ट्रवाद का उदय” (Rise of Nationalism in India in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। इसमें हम आपको भारत में राष्ट्रवाद का उदय कैसे हुआ? अथवा भारत में राष्ट्रवाद के उदय के तीन सामाजिक कारणों पर प्रकाश डालें आदि को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

भारतीय राष्ट्रवाद का उदय

  • 1857 ई. के विद्रोह को कुचल देने के पश्चात् भी कई वर्षों तक देश के विभिन्न भागों में ब्रिटिश शासन की आर्थिक व प्रशासनिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह होते रहे। जनता में राजनीतिक और राष्ट्रीय चेतना उभरने लगी जिसके कारण एक अलग प्रकार का आंदोलन जन्म लेने लगा, जिसने जल्दी ही स्वतंत्रता के देशव्यापी संघर्ष का रूप धारण कर लिया।
  • अंग्रेजों ने अपने राजनीतिक नियंत्रण के माध्यम से अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए भारत पर शासन किया।
  • भारतीय जनता के हितों में और अंग्रेजों के भारत पर शासन करने के उद्देश्यों में कोई साम्यता नहीं थी। भारतीयों में कुछ ऐसे वर्ग भी थे जिन्होंने अग्रजों को अपना शासन सशक्त बनाने में सहायक की थी।
  • कुछ वर्गों को छोड़कर शेष भारत पर ब्रिटिश शासन के दौरान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में जो परिवर्तन हुए उससे जनता को एकजुट होने और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलन करने के लिए प्रेरणा मिली। ये परिवर्तन अंग्रेजों द्वारा अपने हित-साधन के लिए अपनाई गई नीतियों के परिणाम थे।
  • इनके परिणामस्वरूप जनता ब्रिटिश शासन के विरुद्ध एकजुट हुई। ब्रिटिश शासन ने अपने साम्राज्यवादी एवं शोषणकारी कार्यों से स्वयं अपने विनाश के लिए परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं।

राजनीतिक और प्रशासनिक एकता

  • ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत लगभग सम्पूर्ण देश का एक राजनीतिक इकाई के रूप में एकीकरण हुआ। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में कई ऐसे क्षेत्र थे, जहाँ भारतीय शासक शासन करते थे।
  • वे पूर्णत: ब्रिटिश शासन की कृपा पर आश्रित थे और नाममात्र के लिए स्वतंत्र थे। वे दूसरे देशों के साथ सम्बंध स्थापित नहीं कर सकते थे।
  • दूसरे देशों से उनकी रक्षा की जिम्मेदारी पूर्णतः ब्रिटिश शासन के हाथों में थी। इन राज्यों की जनता, ब्रिटिश प्रजा मानी जाती थी। क्योंकि इनमें से कुछ राज्यों का निर्माण स्वयं अंग्रेजों ने किया था।
  • भारत की राजनीतिक एकता एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, यद्यपि यह विदेशी शासन के अन्तर्गत और उनके हित-साधन के लिए, प्राप्त की गई थी।
  • इस एकता को ब्रिटिश शासित प्रदेशों में स्थापित प्रशासन की एकरूप व्यवस्था ने अधिक मजबूत बनाया। कानून एकरूप बनाए गए और कम से कम सिद्धांत रूप में, उन्हें प्रत्येक व्यक्ति पर समान रूप से लागू किया गया।
  • कानून के सामने समानता, एकता का एक अंग बन गई। सम्पूर्ण देश में प्रशासन की समान व्यवस्था और एकरूप कानून ने देश के विभिन्न भागों में निवास करने वाले लोगों में समानता एवं एकता की भावना को बढ़ाया।

आर्थिक परिवर्तन

  • रेलमार्गों के निर्माण के कारण, माल और लोगों को पहले की अपेक्षा अधिक आसानी व तेजी से देश के एक भाग से दूसरे भाग तक ले जाना संभव हुआ।
  • विभिन्न आर्थिक परिवर्तन जैसे- व्यापार पर अपना आधिपत्य बनाए रखना, व्यापारिक फसलों को बढ़ावा देना आदि अंग्रेजों द्वारा जनता पर बलपूर्वक आरोपित किए गये थे जिसके कारण जनता को अत्यधिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ा।
  • परन्तु रेलमार्गों तथा सड़‌कों के निर्माण से क्षेत्रीय सम्पर्क में हुई वृद्धि ने लोगों को एकजुट करने और उनमें समान आकांक्षाएँ पैदा करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

भारत में आधुनिक उद्योगों की स्थापना

  • भारत ब्रिटिश उत्पाद‌कों के लिए बाजार और ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल का स्रोत बन गया।
  • ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनाई गई नीति के कारण भारत में उद्योगों का विकास बहुत धीमी गति से हुआ। आधुनिक व्यापार और उद्योग एकीकरण की प्रबल शक्तियाँ है, जो देश के विभिन्न भागों को एक दूसरे के समीप लाती है।
  • उद्योगों में काम करने वाले लोग देश के विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न जातियों और संप्रदायों के होते हैं। अत: ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होती है कि, उनमें जातीय, सांप्रदायिक और क्षेत्रीय तत्व मिटने लग जाता है।
  • कारखानों में काम करने वाले लोगों में भाईचारे की भावना पैदा होती है। इससे वे एकजुट होते हैं एवं विशेष माँगों के लिए आंदोलन करते हैं। फलस्वरूप नगर क्षेत्र राजनीतिक आन्दोलन के केन्द्र बन जाते हैं।
  • इन सभी कारणों से उद्योगों के विकास ने लोगों को एक राष्ट्र के रूप में आबद्ध करने की महत्वूपर्ण भूमिका निभाई।
  • 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारत में प्रारम्भ हुए आधुनिक उद्योगों के विकास ने राष्ट्रीय चेतना को उभारने में सहायता की। उद्योगों का विकास होने से समाज में दो महत्वपूर्ण वर्गों पूँजीपति वर्ग और औद्योगिक मजदूर वर्गों का उदय हुआ।
  • इन दोनों वर्गों के अधिक विकास के लिए देश का औद्योगिकीकरण होना आवश्यक था। चूंकि ब्रिटिश शासन भारत के औद्योगिक विकास में बाधक बना हुआ था, इसलिए वह इन दोनों वर्गों का भी विरोधी था।
  • इनमें से प्रत्येक वर्ग के अपने सार्वदेशिक हित भी थे। उदाहरण के लिए, सम्पूर्ण देश के सूती कपड़ा कारखानों के मालिक अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों के कारण समान रूप से प्रभावित हुए थे तथा उनकी समस्याएँ व उद्देश्य समान थे।

आधुनिक शिक्षा का प्रभाव

  • आधुनिक शिक्षा के प्रसार ने राष्ट्रीय चेतना को उभारने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंग्रेजी शिक्षा अंग्रेजों ने जिस उद्देश्य से शुरू की थी, उसके कारण व उद्देश्य सीमित थे।
  • ब्रिटिश शासक सोचते थे कि, अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले भारतीय उनके शासन के समर्थक बनेंगे। परन्तु राजा राममोहन राय जैसे भारतीय नेताओं ने अंग्रेजी शिक्षा का स्वागत भिन्न प्रयोजनों से किया था।
  • उनका विचार था कि, अंग्रेजी शिक्षा से भारत के लोगों को विश्व के उन्नत ज्ञान की जानकारी मिलेगी। इससे भारतीयों को यूरोपीय भाषाओं के साहित्य और विश्व के अन्य भागों की घटनाओं की जानकारी मिल सकेगी।
  • 18वीं और 19वीं सदी में पश्चिम में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। पश्चिम के महान विचारकों ने जनतंत्र, समानता और राष्ट्रवाद के समर्थन में ग्रंथ लिखे। अमरीकी स्वतंत्रता की घोषणा और मानव एवं नागरिकों के अधिकारों की फ्रांसीसी घोषणा ने नए क्रांतिकारी विचारों को बल प्रदान किया। उन्होंने बलपूर्वक कहा कि, किसी भी देश के वास्तविक शासक वहाँ के लोग होते हैं तथा लोगों को यह अधिकार है कि वे ऐसी सरकार को उखाड़ फेंके, जो उनको आकांक्षाओं के अनुरूप काम नहीं करती और उनका उत्पीड़न करती है।
  • शिक्षा ने भारतीयों के लिए आधुनिक ज्ञान के द्वार खोल दिए और उनमें राष्ट्रवादी एवं जनतांत्रिक विचार पनपने लगे।
  • दूसरे देशों के क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी आंदोलन उनके लिए प्रेरणा के स्रोत बन गए। समूचे देश के शिक्षित भारतीयों का देश की समस्याओं के विषय में एक समान दृष्टिकोण बनने लगा।
  • उच्च शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी था, इसलिए सभी शिक्षित भारतीय अंग्रेजी भाषा से परिचित थे। इससे देश के विभिन्न भागों को एक-दूसरे से सम्पर्क स्थापित करने में आसानी हुई।
  • शिक्षित भारतीयों ने पूरे देश में राष्ट्रीयता के विचारों को फैलाने में प्रमुख भूमिका निभाई तथा कई यूरोपीय भाषाओं के ग्रंथों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद किया। उन्होंने स्वयं ग्रंथ लिखे तथा पत्र-पत्रिकाएँ निकालीं। उन्होंने भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याओं पर भी प्रकाश डाला।

🔺 प्रमुख शिक्षा आयोग

समिति/आयोगवर्षगवर्नर जनरल/वायसराय
1.चार्ल्स बुड डिस्पैच1854लॉर्ड डलहौजी
2.हंटर आयोग1882लॉर्ड रिपन
3.रैले आयोग (विश्वविद्यालय अयोग)1902लॉर्ड कर्जन
4.सैडलर आयोग1917लॉर्ड चेम्सफोर्ड
5.इंचकैप आयोग1923लॉर्ड रीडिंग
6.हार्टोंग समिति (प्राथमिक शिक्षा)1929लॉर्ड इरविन
7.लिंडसे आयोग (प्रौढ़ शिक्षा)1929लॉर्ड इरविन
8.सार्जेंट आयोग1944लॉर्ड वेवेल
9.राधाकृष्णन आयोग1948लॉर्ड माउंटबेटन

🔺स्वतंत्रता पूर्व स्थापित विश्वविद्यालय

विश्वविद्यालयवर्ष
1.कलकत्ता विश्वविद्यालय1857 ई.
2.बम्बई (मुंबई) विश्वविद्यालय1857 ई.
3.मद्रास (चेन्नई) विश्वविद्यालय1857 ई.
4.पंजाब विश्वविद्यालय1882 ई.
5.इलाहाबाद विश्वविद्यालय1887 ई.
6.मैसूर विश्वविद्याय1916 ई.
7.बनारस विश्वविद्यालय1916 ई.
8.पटना विश्वविद्यालय1917 ई.
9.उस्मानिया विश्वविद्यायल1918 ई.
10.अलीगढ़ विश्वविद्यालय1920 ई.
11.लखनऊ विश्वविद्यालय1921 ई.
12.दिल्ली विश्वविद्यालय1922 ई.
13.नागपुर विश्वविद्यालय1923 ई.
14.आंध्र विश्वविद्यालय1926 ई.
15.आगरा विश्वविद्यालय1927 ई.
16.अन्नामलाई विश्वविद्यालय1929 ई.
17.केरल विश्वविद्यालय1937 ई.
18.राजस्थान विश्वविद्यालय1947 ई.

ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष

  • भारत में ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियों के कारण किसान, शिल्पकार और कारीगरों को अत्यधिक नुकसान हुआ परिणामस्वरूप उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में तीन करोड़ लोगों की मौत हुई थी।
  • भारत के आर्थिक पिछड़ेपन के लिए भी ब्रिटिश शासन की आर्थिक नीतियां ही जिम्मेदार थी। ब्रिटिश शासन भारतीयों के हितों का विरोधी है, यह अनुभव किए जाने पर ही भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना का उदय हुआ।
  • भारत में ब्रिटिश शासन को चलाने में जो खर्च होता था, उसे भारतीय जनता ही वहन करती थी। भारत की ब्रिटिश सरकार ने दूसरे देशों के साथ जो लड़ाईयाँ लड़ीं, उनसे भारतीय जनता के शोषण में वृद्धि हुई।
  • भारत के ब्रिटिश शासन ने जो विशाल सेना खड़ी की थी, उसका खर्च भारतीय जनता से वसूल किए गए करों से पूरा होता था। ब्रिटिश शासन ने भारतीय जनता के प्रति जातीय घृणा और जातीय अभिमान की भावना को बढ़ावा दिया।
  • उन भारतीयों को भी अपमानित किया गया, जो न्यायाधीश जैसे उच्च पदों पर आसीन थे। आम लोगों को पीटा गया और यातनाएँ दी गईं।
  • कई ऐसे स्थान थे, जहाँ भारतीयों के लिए प्रवेश निषेध था। रेलगाड़ी में गोरों के लिए सुरक्षित कंपार्टमेंट होते थे। ऐसे सुरक्षित पार्क भी थे, जहाँ केवल यूरोपवासी ही जा सकते थे। राष्ट्रीय चेतना में उभार आने लगा तो ऐसे अपमानों एवं भेदभावों के विरुद्ध रोष बढ़ने लगा।
  • राष्ट्रीयता का उत्थान होने लगा तो विचार करने, भाषण देने और अभिव्यक्ति (समाचार पत्रों, पुस्तकों) जैसे प्राकृतिक अधिकारों पर भी प्रतिबंध लगने प्रारम्भ हो गए। इस नीति के बावजूद भारतीय जनता में विकसित हो रही राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रीय संगठनों के रूप में प्रकट होने लगी।

राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना

  • 19वीं सदी के मध्यकाल के आस-पास भारतीयों की राजनीतिक सभाएँ स्थापित होने लगीं। इनकी स्थापना कलकत्ता, बम्बई और मद्रास आदि प्रेसीडेंसी नगरों में हुई। इन संस्थाओं में देश के प्रशासन में भारतीयों को भागीदार बनाने की माँग उठाई गयी।
  • भारतीय जनता के कल्याणार्थ भारत और ब्रिटेन के ब्रिटिश अधिकारियों के पास आवेदन को भेजने के लिए 1852 ई. में बॉम्बे एसोसिएशन की स्थापना हुई। ऐसे ही उद्देश्य के लिए 1852 ई. में मद्रास नेटिव एसोसिएशन की स्थापना हुई।
  • इन सभी एसोसिएशनों (सभाओं) के सदस्य अधिकतर भारतीय समाज के उच्च वर्गों के लोग थे। इनकी गतिविधियां सीमित थीं, जैसे- प्रशासन में सुधार करने के लिए, सरकार के संचालन में भारतीयों को भागीदार बनाने के लिए, करों में कमी करने और भारतीयों के प्रति भेदभाव की नीति समाप्त करने के लिए सरकार और ब्रिटिश संसद के पास याचिकाएँ भेजना।
  • यद्यपि ये सभाएँ मुख्यतः अपने-अपने प्रांतों में ही काम करती थीं, परन्तु इनके घोषित उद्देश्य भारतीय जनता के उद्देश्य थे, न कि देश के किसी एक प्रदेश या समुदाय के उद्देश्य थे।
  • ऐसे कई संगठन बने, जो उपर्युक्त सभाओं की अपेक्षा जनता का ज्यादा प्रतिनिधित्व करते थे। जैसे- 1876 ई. में स्थापित इण्डियन एसोसिएशन, 1884 ई. में स्थापित मद्रास महाजन सभा और 1885 ई. में स्थापित बॉम्बे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन आदि।
  • कुछ घटनाओं के कारण 1870 ई. और 1880 ई. के दशकों में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध असंतोष और अधिक बढ़ गया। सरकार ने भारतीयों की माँगों को पूरा करने के प्रयासों के विरुद्ध दमनकारी कदम उठाए।
  • 1878 ई. में शस्त्र कानून बनाया गया जिससे भारतीयों के शस्त्र रखने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उसी वर्ष भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए।
  • 1883 ई में सरकार ने भारत में रहने वाले अंग्रेजों और अन्य यूरोपवासियों के जातीय अहंकार को करने वाले एक ऐसे विधेयक (इल्बर्ट बिल) को वापस ले लिया, जो उसने स्वयं पेश किया था।
  • इल्बर्ट बिल नामक इस विधेयक के अन्तर्गत भारत में रहने वाले किसी अंग्रेज या यूरोपवासी पर भारतीय न्यायाधीश की अदालत में मुकदमा चलाया जा सकता था।
  • भारत में अंग्रेज और भारतीय न्यायाधीशों के बीच समानता स्थापित करने के उद्देश्य से ही यह विधेयक पेश किया गया था। परन्तु भारत में रहने वाले अंग्रेजों और यूरोपवासियों के विरोध के कारण इस विधेयक को सरकार ने वापस ले लिया।
  • सुरेंद्रनाथ बनर्जी ने कलकत्ता में इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की। ये पहले ऐसे भारतीय नेता थे, जिन्होंने दिसंबर, 1882 ई. में कलकत्ता में आयोजित अखिल भारतीय राष्ट्रीय सम्मेलन में देश के सभी भागों के लोगों को एकत्र किया था।
  • दिसम्बर, 1885 में बम्बई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के लिए एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसी वर्ष कलकत्ता में इण्डियन नेशनल एसोसिएशन का भी अधिवेशन आयोजित किया गया था।
  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारतीय जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला संगठन बना और इस संगठन ने भारतीय जनता की आजादी के संघर्ष का नेतृत्व किया।
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