भारतेंदु हरिश्चंद्र – जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र जी 18, 19वीं शताब्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि, उपन्यासकार, नाटककार और समाज विचारक थे। उन्हें भारतेन्दु युग के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त करते हैं ताकि परीक्षाओं में हम ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय” (Bhartendu Harishchandra biography in Hindi) के बारे में जानकारी दी है। इसमें हमने भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली तथा साहित्य में स्थान को विस्तार से सरल भाषा में समझाया है।

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इसके अलावा, इसमें हमने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप हरिश्चंद्र जी से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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भारतेंदु हरिश्चंद्र का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी –

नामभारतेंदु हरिश्चंद्र
मूल नामहरिश्चंद्र
जन्म09 सितंबर, 1850 ई. में
जन्म स्थानकाशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश
मृत्यु06 जनवरी, 1885 ई. में
मृत्यु स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश
पिता का नामश्री गोपालचन्द्र (गिरिधरदास)
माता का नामश्रीमती पार्वती देवी
पत्नी का नामश्रीमती मन्ना देवी
व्यवसायलेखक, कवि, उपन्यासकार, नाटककार
साहित्यकालआधुनिक काल
उपाधिभारतेन्दु
विधाकविता, नाटक, उपन्यास, निबन्ध-संग्रह, अनुवाद
विषयआधुनिक हिन्दी साहित्य
शिक्षास्वाध्याय से ही अनेक भाषाओं का ज्ञान अर्जन
गुरुराजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’
सम्पादनहरिश्चंद्र पत्रिका, हरिश्चंद्र चंद्रिका, कवि-वचन सुधा
भाषाब्रजभाषा और खड़ीबोली
शैलीमुक्तक
प्रमुख रचनाएंप्रेम फुलवारी, प्रेम माधुरी, प्रेम सरोवर, प्रेम तरंग, प्रेम प्रलाप एवं सतसई श्रृंगार आदि।
नाटकभारत-दुर्दशा, सत्य-हरिश्चंद्र, नील-देवी, श्रीचंद्रावली आदि।
हिंदी साहित्य में स्थानभारतेन्दु युग के प्रवर्तक

भारतेंदु हरिश्चंद्र, जिन्हें भारतेन्दु या हरिश्चन्द्र के नाम से भी जाना जाता है। 18, 19वीं सदी के भारत के एक प्रमुख लेखक, कवि और समाज सुधारक थे। हिंदी भाषा में उनके महत्वपूर्ण योगदान और अपने लेखन विद्या के माध्यम से सामाजिक जागृति लाने के प्रयासों के लिए उन्हें अक्सर “आधुनिक हिंदी साहित्य का जनक” कहा जाता है।

हिंदी साहित्य और रंगमंच में भारतेंदु हरिश्चंद्र जी का योगदान अतुलनीय था। उन्होंने न केवल साहित्यिक परिदृश्य को बदल दिया, बल्कि उस समय की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके प्रगतिशील विचारों सामाजिक सुधारों और अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में हिंदी के उपयोग पर जोर ने हिंदी साहित्य के भविष्य के विकास की नींव रखी और हिंदी भाषा के विकास में योगदान दिया।

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भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय

आधुनिक हिन्दी साहित्य के जन्मदाता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र इतिहास प्रसिद्ध सेठ अमीचन्द के प्रपौत्र गोपालचंद्र ‘गिरिधरदास’ के ज्येष्ठ पुत्र थे। इनका जन्म 09 सितम्बर, सन् 1850 ईस्वी को काशी में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री गोपालचंद्र (उपनाम गिरिधरदास) तथा माता का नाम श्रीमती पार्वती देवी था। मात्र पांच वर्ष की अवस्था में माता पार्वती देवी का निधन हो गया। तथा दस वर्ष की अवस्था में पिता गोपालचंद्र के सुख से भी यह वंचित हो गए। विमाता मोहन बीवी का इन पर विशेष प्रेम न होने के कारण इनके पालन-पोषण का भार कालीकदमा दाई और तिलकधारी नौकर पर था। पिता की असामयिक मृत्यु के बाद क्वींस कॉलेज, वाराणसी में तीन- चार वर्ष तक अध्ययन किया। किन्तु पारिवारिक सम्पत्ति की देखभाल तथा गार्हस्थ्य जीवन की उलझनों में इन्हें शिक्षा की ओर से विरत कर दिया। उस समय काशी के रईसों में केवल राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिन्द’ ही अंग्रेजी पढ़े-लिखे थे।

भारतेंदु हरिश्चंद्र
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जीवन परिचय

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी अंग्रेजी पढ़ने के लिए उनके पास जाया करते थे और उन्हें अपना गुरु तुल्य भी मानते थे। कालेज छोड़ने के बाद इन्होंने स्वाध्याय द्वारा हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के अतिरिक्त मराठी, गुजराती, बंग्ला, मारवाड़ी, उर्दू, पंजाबी आदि भारतीय भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। मात्र 13 वर्ष की अल्पावस्था में इनका विवाह काशी के रईस लाला गुलाब राय की पुत्री मन्ना देवी से हुआ। इनके दो पुत्र और एक पुत्री थी। पुत्रों की बाल्यावस्था में ही मृत्यु हो गई थी, जबकि पुत्री विद्यावती सुशिक्षित थी।

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने अनेक स्थानों की यात्राएं भी की थी। और इन्हें ऋण लेने की भी आदत पड़ गई। ऋणग्रस्तता, कौटुम्बिक तथा अन्य सांसारिक चिंताओं सहित क्षय रोग से पीड़ित होने के कारण भारतेन्द्र जी का निधन 06 जनवरी, सन् 1885 ईस्वी को चौंतीस वर्ष चार महीने की अवस्था में हो गया था।

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भारतेंदु हरिश्चंद्र का साहित्यिक परिचय

भारतेन्दु जी ने हिंदी साहित्य की जो समृद्धि की वह सामान्य व्यक्ति के लिए असंभव है। ये लेखक, कवि, नाटककार, निबंधकार, उपन्यासकार, सम्पादक और समाज सुधारक सभी कुछ थे। हिंदी गध खड़ीबोली के तो ये जन्मदाता समझे जाते हैं। काव्य रचना भी ये बाल्यावस्था से ही करने लगे थे। इनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर सन् 1880 ईस्वी में पंडित रघुनाथ, पंडित सुधाकर द्विवेदी, पंडित रामेश्वरदत्त व्यास आदि के प्रस्तावानुसार हरिश्चन्द्र जी को “भारतेन्दु” की उपाधि से विभूषित किया गया और तभी से इनके नाम के साथ भारतेन्दु शब्द जुड़ गया था।

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने हिंदी भाषा के प्रचार के लिए एक आंदोलन चलाया। इस आंदोलन को गति देने के लिए पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एवं सम्पादन किया। इन्होंने सन् 1868 ईस्वी में ‘कवि-वचन सुधा’ और सन् 1873 ईस्वी में ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ का सम्पादन किया था। आठ अंकों के बाद ‘हरिश्चन्द्र मैगजीन’ का नाम ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ हो गया। हिन्दी गध को एक नई दिशा में ढालने का श्रेय ‘हरिश्चन्द्र चन्द्रिका’ को ही जाता है।

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने साहित्य के विभिन्न अंगों अर्थात् विविध विधाओं की पूर्ति की। इन्होंने हिंदी गध के क्षेत्र में नवयुग का सूत्रपात किया और नाटक, निबंध, कहानी, इतिहास आदि विषयों पर साहित्य रचना की। भारतेन्दु जी ने अपने निबन्धों में तत्कालीन सामाजिक साहित्यिक और राजनीतिक परिस्थितियों का चित्रण किया था।

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भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रमुख रचनाएं

भारतेन्दु जी की रचनाएं एवं कृतियां अनेक विधाओं में उल्लेखनीय है। किन्तु नाटक के क्षेत्र में इनकी देन सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। भारतेन्दु जी की रचनाओं का विवरण कुछ इस प्रकार से है –

नाटक ⇒ भारतेन्दु जी ने मौलिक और अनूदित सब मिलाकर 17 नाटकों की रचना की है –
(i). मौलिक नाटक – भारत दुर्दशा, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, सत्य हरिश्चंद्र, श्रीचन्द्रावली, नीलदेवी, सती प्रताप, अंधेर नगरी, विषस्थ विषमौषधम् तथा प्रेम जोगिनी आदि।
(ii). अनूदित नाटक – भारत जननी, धनंजय विजय, विद्यासुन्दर, पाखण्ड विडम्बन, दुर्लभ बन्दु, रत्नावली नाटिका, मुद्राराक्षस और कर्पूरमंजरी आदि।

काव्य-संग्रह ⇒ प्रेम सरोवर, भक्त सर्वस्व, प्रेम तरंग, प्रेम प्रलाप, सतसई सिंगार, प्रेम फुलवारी, भारत वीणा, प्रेम मालिका, प्रेम माधुरी, नए जमाने की मुकरी, सुमनांजलि, उत्तरार्द्ध भक्तमाल, गीत-गोविन्दानन्द, होली, मधु मुकुल, राग संग्रह, वर्षा विनोद, विनय प्रेम पचासा, फूलों का गुच्छा, कृष्ण चरित्र, प्रेमाश्रु वर्णन, दान लीला, भारत वीरत्व, विजय वल्लरी, विजयिनी, विजय पताका, बन्दर सभा, बकरी विलाप और तन्मय लीला आदि।

निबन्ध-संग्रह ⇒ दिल्ली दरबार दर्पण, परिहास वंचक, सुलोचना, मदालसा, लीलावती, भारतेन्दु ग्रन्थावली, नाटक, कालचक्र, लेवी प्राण लेवी, भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?, कश्मीर कुसुम, जातीय संगीत, संगीत सार, हिंदी भाषा, स्वर्ग में विचार सभा आदि।

उपन्यास ⇒ पूर्णप्रकाश, चन्द्रप्रभा आदि।
यात्रा-वृत्तान्त ⇒ सरयूपार की यात्रा, लखनऊ की यात्रा आदि।
इतिहास ⇒ अग्रवालों की उत्पत्ति, महाराष्ट्र देश का इतिहास तथा कश्मीर कुसुम आदि।
जीवनियां ⇒ सूरदास, जयदेव, महात्मा मोहम्मद आदि।
आत्मकथा ⇒ एक कहानी कुछ आप बीती कुछ जग बीती ।
सम्पादन ⇒ कवि वचन सुधा, हरिश्चंद्र मैगजीन, बाला बोधिनी, हरिश्चंद्र चंद्रिका आदि।
पुरातत्व ⇒ रामायण का समय, काशी आदि।

अनूदित रचनाएं ⇒ भारतेन्दु जी ने बांग्ला भाषा से ‘विद्यासुन्दर’ नामक नाटक का हिंदी में अनुवाद किया था। संस्कृत से ‘मुद्राराक्षस’ और प्राकृत से ‘कर्पूर मंजरी’ नामक नाटकों का भी हिंदी में अनुवाद किया। अतः विद्या सुन्दर, पाखण्ड विडम्बन, धनंजय विजय, भारत जननी, दुर्लभ बन्दु इनकी कुछ अन्य अनूदित रचनाएं कहलाती हैं।

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भारतेंदु हरिश्चंद्र की भाषा शैली

भारतेन्दु जी की भाषा व्यावहारिक, बोलचाल के निकट, प्रवाहपूर्ण और जीवंत है। इन्होंने काव्य में ब्रजभाषा का प्रयोग किया, परन्तु गध के लिए खड़ीबोली को अपनाया है। भारतेन्दु जी ने भाषा को सजीव बनाने के लिए लोकोक्तियों और मुहावरों का भी सटीक प्रयोग किया है। भारतेन्दु जी की भाषा विषम एवं भावानुसारिणी है, उसमें सजीवता है। कवित्त, सवैया, कुण्डलियां, छप्पय, दोहा, लावनी तथा गजल आदि छन्दों का प्रयोग करने में भी सक्षम रहे हैं।

शैली की दृष्टि से भारतेन्दु जी ने वर्णनात्मक, विचारात्मक, विवरणात्मक और भावात्मक सभी शैलियों में निबन्ध रचना की है। इनके द्वारा लिखित ‘दिल्ली दरबार दर्पण’ वर्णनात्मक शैली का श्रेष्ठ निबंध है। इनके यात्रा-वृत्तान्त विवरणात्मक शैली में लिखे गए हैं। ‘वैष्णवता और भारतवर्ष’ तथा ‘भारतवर्षोन्नति कैसे हो सकती है?’ जैसे निबन्ध विचारात्मक शैली में है। भारतेन्दु जी की भावात्मक शैली का रूप इनके द्वारा लिखित जीवनियां तथा ऐतिहासिक निबंधों में बीच-बीच में मिलता है। इसके अतिरिक्त इनके निबंधों में शोध-शैली, भाषण-शैली, स्तोत्र-शैली, प्रदर्शन-शैली, कथा-शैली आदि के रूप भी देखने को मिलते हैं।

भारतेंदु हरिश्चंद्र का हिन्दी साहित्य में स्थान

भारतेन्दु जी ने हिन्दी गद्य का सूत्रपात किया तथा साहित्य क्षेत्र की समस्त पुरानी व नई विधाओं में रचना करके हिंदी साहित्य को सर्वांग पूर्ण बनाया। इसी दौरान पन्त जी ने लिखा है –

“भारतेन्दु कर गये भारती की वीणा निर्माण।
किया अमर स्पर्शों ने जिसका बहुविध स्वर संधान।।”

अपनी विशिष्ट और बहुमुखी सेवाओं के कारण ये हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल के प्रवर्तक कहे जाते हैं।

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FAQs. भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म कब और कहां हुआ था?

भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म 9 सितंबर, सन् 1850 ईसवी को काशी, उत्तर प्रदेश में हुआ था।

2. भारतेंदु हरिश्चंद्र के माता पिता का क्या नाम था?

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी के पिता का नाम श्री गोपालचंद्र ‘गिरिधरदास’ तथा माता का नाम श्रीमती पार्वती देवी था।

3. भारतेंदु हरिश्चंद्र की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

भारतेंदु हरिश्चंद्र की मृत्यु 6 जनवरी, सन् 1885 ईसवी को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुई थी।

4. भारतेन्दु का असली नाम क्या है?

भारतेन्दु का वास्तविक नाम हरिश्चन्द्र है।

5. हिंदी भाषा के जन्मदाता कौन हैं?

आधुनिक हिन्दी साहित्य के जन्मदाता ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र’ हैं।

6. हिंदी साहित्य में भारतेंदु हरिश्चंद्र का क्या योगदान है?

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने हिंदी साहित्य की जो समृद्धि की है वह सामान्य व्यक्ति के लिए असंभव है। भारतेन्दु जी कवि, नाटककार, निबंधकार, लेखक, सम्पादक, समाज सुधारक सभी कुछ थे। हिंदी गद्य के तो ये जन्मदाता समझे जाते हैं।

7. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कितने नाटक लिखें?

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी ने मौलिक और अनूदित दोनों प्रकार के नाटकों की रचना की है जिनकी कुल संख्या 17 है।

8. हिन्दी का जनक कौन है?

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र खड़ीबोली हिन्दी गद्य के जनक माने जाते हैं।

9. भारतेंदु हरिश्चंद्र के पत्नी का क्या नाम था?

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की पत्नी का नाम श्रीमती मन्ना देवी था।

10. भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी हैं?

भारतेंदु हरिश्चंद्र जी की प्रमुख रचनाएं – प्रेम सरोवर, प्रेम मालिका, प्रेम माधुरी, भारत दुर्दशा, कृष्ण चरित्र, अंधेर नगरी, प्रेम तरंग, सत्य हरिशचंद्र और प्रेम फुलवारी आदि है।

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