मलिक मुहम्मद जायसी – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

भक्तिकालीन धारा की प्रेममार्गी शाखा के अग्रगण्य तथा प्रतिनिधि कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने मुसलमान होकर भी हिन्दुओं की कहानियों हिन्दुओं की ही बोली में पूरी सहृदयता से कहकर उनके जीवन में मर्मस्पर्शिनी अवस्थाओं के साथ अपने उदार हृदय का पूर्ण सामञ्जस्य दिखा दिया। कबीरदास जी ने तो केवल भिन्न प्रतीत होती हुई परोक्ष सत्ता का आभास दिया था। प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य सामने रखने की आवश्यकता बनी थी, वह जायसी के द्वारा पूर्ण हुई। तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको मलिक मोहम्मद जायसी के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

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तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन परिचय” (Malik Muhammad Jayasi biography in Hindi) के बारे में बताया है। इसमें हमने मलिक मोहम्मद जायसी का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, दोहे, भाषा शैली एवं हिंदी साहित्य में स्थान और मलिक मोहम्मद जायसी की काव्यगत विशेषताएँ को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है।
इसके अलावा, इसमें हमने मलिक मोहम्मद जायसी जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप भी जायसी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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मलिक मुहम्मद जायसी का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने जायसी जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
मलिक मोहम्मद जायसी की जीवनी –

पूरा नाममलिक मुहम्मद जायसी
उपनामजायसी
जन्म तिथिसन् 1492 ईस्वी में
जन्म स्थानउत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के जायस ग्राम में
मृत्यु तिथिसन् 1542 ईस्वी में
मृत्यु स्थानअमेठी, उत्तर प्रदेश
पिता का नाममलिक राजे अशरफ
गुरुसूफी संत शेख मोहिदी और सैयद अशरफ जहाँगीर
व्यवसायकवि, भक्त, समाजसेवी
साहित्य कालभक्तिकाल
प्रमुख काव्य-ग्रंथपद्मावत
मुख्य भाषाअवधी
मुख्य छंददोहा, चौपाई
प्रमुख रचनाएंपद्मावत, आखिरी कलाम, चित्ररेखा, कहरानामा, अखरावट आदि।

मलिक मुहम्मद जायसी (1492-1542) भक्तिकालीन धारा की निर्गुण प्रेमाश्रयी शाखा के अग्रगण्य एवं प्रतिनिधि कवि थे। ये उच्चकोटि के सरल और महान् सूफी संत थे। हिन्दी-साहित्य के प्रसिद्ध सूफी कवियों जिनके लिए केवल ‘जायसी’ शब्द का प्रयोग ही उनके उपनामों की भाँति किया जाता है। इससे यह भी पता चलता है कि ये जायस नगर के निवासी थे।

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मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन परिचय

भक्ति आंदोलन के अग्रगण्य एवं प्रतिनिधि कवि मलिक मोहम्मद जायसी के जन्म के सम्बन्ध में अनेक मत हैं। इनकी रचनाओं से जो मत उभरकर सामने आया है, उसके अनुसार जायसी का जन्म सन् 1492 ईस्वी के लगभग उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के जायस नामक गांव में हुआ था। इनके जन्म के संबंध में ये दोहा प्रचलित हैं—
जायस नगर मोर अस्थानू। नगरक नाँव आदि उदयानू।।
तहाँ देवस दस पहुने आएऊँ। भा वैराग बहुत सुख पाएऊँ।।

मलिक मुहम्मद जायसी
मलिक मुहम्मद जायसी का जीवन परिचय

जायस के निवासी होने के कारण ही ये जायसी कहलाये। ‘मलिक’ जायसी को वंश-परम्परा से प्राप्त उपाधि थी और इनका नाम केवल मुहम्मद था। इस प्रकार इनका प्रचलित नाम मलिक मुहम्मद जायसी बना। बाल्यकाल में ही जायसी के माता-पिता का निधन हो जाने के कारण शिक्षा का कोई उचित प्रबन्ध न हो सका। सात वर्ष की आयु में ही चेचक से इनका एक कान और एक आँख नष्ट हो गयी थी। ये काले और कुरूप तो थे ही, एक बार बादशाह शेरशाह इन्हें देखकर हँसने लगे। तब जायसी ने कहा— ‘मोहिका हँसेसि, कि कोहरहिं?’ इस बार बादशाह बहुत लज्जित हुए। जायसी एक गृहस्थ के रूप में भी रहे। इनका विवाह भी हुआ था तथा पुत्र भी थे। परन्तु पुत्रों की असामयिक मृत्यु से इनके हृदय में वैराग्य का जन्म हुआ।

मलिक मुहम्मद जायसी के चार घनिष्ठ मित्र थे– यूसुफ मलिक, सालार कादिम, सलोने मियाँ और बड़े शेख। बाद में जायसी अमेठी में रहने लगे थे और यहीं सन् 1542 ईस्वी में इनकी मृत्यु हुई थी। कहा जाता है कि जायसी के आशीर्वाद से अमेठी नरेश के यहाँ पुत्र का जन्म हुआ। तबसे उनका अमेठी के राजवंश में बड़ा सम्मान था प्रचलित है कि जीवन के अन्तिम दिनों में ये अमेठी से कुछ दूर मँगरा नाम के वन में साधना किया करते थे। वहीं किसी के द्वारा शेर की आवाज के धोखे में इन्हें गोली मार देने से इनका देहान्त हो गया था।

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मलिक मोहम्मद जायसी का साहित्यिक परिचय

मलिक मुहम्मद जायसी ‘प्रेम की पीर’ के कवि हैं जिन्हें भक्तिकालीन धारा के प्रतिनिधि कवि माना जाता है। जायसी ने पूरी सहृदयता से कहकर उनके साहित्यिक जीवन में मर्मस्पर्शिनी अवस्थाओं के साथ अपने उदार हृदय का पूर्ण सामञ्जस्य दिखाया है। इनमें ‘पद्मावत’ सर्वोत्कृष्ट है और वही जायसी की अक्षय कीर्ति का आधार है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार इस ग्रन्थ का प्रारम्भ सन् 1520 ई. में हुआ था और समाप्ति सन् 1540 ई. में। जायसी ने ‘पद्मावत’ में चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा का अत्यन्त मार्मिक वर्णन किया है। एक ओर इतिहास और कल्पना के सुन्दर संयोग से यह एक उत्कृष्ट प्रेम गाथा है और दूसरी ओर इसमें आध्यात्मिक प्रेम की भी अत्यन्त भावमयी अभिव्यंजना है। ‘अखरावट’ में वर्णमाला के एक-एक अक्षर को लेकर दर्शन एवं सिद्धान्त सम्बन्धी बातें चौपाइयों में कही गयी हैं। इसमें ईश्वर, जीव, सृष्टि आदि से सम्बन्धित वर्णन हैं। ‘आखिरी कलाम’ में मृत्यु के बाद प्राणी की दशा का वर्णन है। ‘चित्ररेखा’ में चन्द्रपुर की राजकुमारी चित्ररेखा तथा कन्नौज के राजकुमार प्रीतम कुँवर के प्रेम की गाथा वर्णित की है।

मलिक मोहम्मद जायसी की प्रमुख रचनाएं

रचनाएं एवं कृतियां— ‘पद्मावत’, ‘अखरावट’, ‘आखिरी कलाम’, ‘चित्ररेखा’ आदि जायसी की प्रसिद्ध रचनाएँ हैं। जायसी की रचनाओं का सम्पूर्ण विवरण निम्नवत् है-

पद्मावत – जायसी की कीर्ति का मुख्य आधार ‘पद्मावत’ नामक प्रबन्ध काव्य है, जो हिन्दी में अपने ढंग का अनोखा है। यह एक प्रेमाख्यानक काव्य है, जिसका पूर्वार्द्ध कल्पित और उत्तरार्द्ध ऐतिहासिक है। पूर्वार्द्ध में चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमगाथा है। सूफी सिद्धान्तानुसार कवि ने रत्नसेन को साधक और पद्मावती को ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया है। रत्नसेने अनेक बाधाओं को पार करता और कष्टों को सहता हुआ अन्त में पद्मावती को प्राप्त करता है। उत्तरार्द्ध में पद्मिनी और अलाउद्दीन वाली ऐतिहासिक गाथा है। इस भाग में पद्मावती ब्रह्म रूप में नहीं, प्रत्युत एक सामान्य नारी के रूप में प्रस्तुत की गयी है।

आखिरी कलाम – यह रचना दोहे चौपाइयों में और बहुत छोटी है। इनमें मरणोपरान्तं जीव की दशा और कयामत (प्रलय) के अन्तिम न्याय आदि का वर्णन है।

अखरावट – इसमें वर्णमाला के एक-एक अक्षर को लेकर इस्लामी सिद्धान्त-सम्बन्धी कुछ बातें कही गयी हैं। इसमें ईश्वर, जीव, सृष्टि आदि से सम्बन्धित दार्शनिक वर्णन है।

चित्ररेखा – यह ‘प्रेमकाव्य है, जिसमें कन्नौज के राजा कल्याणसिंह के पुत्र राजकुमार प्रीतम सिंह तथा चन्द्रपुर नरेश चन्द्रभानु की राजकुमारी चित्ररेखा की प्रेमकथा वर्णित है।

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मलिक मोहम्मद जायसी की काव्यगत विशेषताएँ

जायसी के काव्य विरह का वर्णन अत्यन्त विशद एवं मर्मस्पर्शी है। ‘षड्ऋतु वर्णन’ और ‘बारहमासा’ जायसी के संयोग एवं विरह वर्णन के अत्यन्त मार्मिक स्थल हैं। जायसी रहस्यवादी कवि हैं और इनके रहस्यवाद की सबसे बड़ी विशेषता उसकी प्रेममूलक भावना है। इन्होंने ईश्वर और जीव के पारस्परिक प्रेम की व्यंजना दाम्पत्य-भाव के रूप में की है। रत्नसेन जीव है तथा पद्मावती परमात्मा। यह सूफी पद्धति है। ‘पद्मावत’ में पुरुष (रत्नसेन) प्रियतमा (पद्मावती) की खोज में निकलता है। जायसी ने इस प्रेम की अनुभूति की व्यंजना रूपक के आवरण में की है। इन्होंने साधनात्मक रहस्यवाद का चित्रण भी किया है, जिसकी प्रधानता कबीर में दिखायी देती है। जायसी ने सम्पूर्ण प्रकृति में पद्मावती के सौन्दर्य को देखा है तथा प्रकृति की प्रत्येक वस्तु को उस परम सौन्दर्य की प्राप्ति के लिए आतुर और प्रयत्नशील दिखाया है। यह प्रकृति का रहस्यवाद कहलाता है। जायसी की भाँति कबीर में हमें यह भावात्मक प्रकृतिमूलक रहस्यवाद देखने को नहीं मिलता।

भावपक्ष की विशेषताएँ

रस-योजना— ‘पद्मावत’ प्रबन्ध काव्य होते हुए भी एक श्रृंगारप्रधान प्रेमकाव्य है; अतः श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का वर्णन इसमें मिलता है। यद्यपि अन्य रसों की भी योजना की गयी है, परन्तु गौण रूप में ही। ये गौण रस हैं करुण, वात्सल्य, वीर, शान्त और अद्भुत ।

संयोग-पक्ष— जायसी के प्रमुख काव्य ‘पद्मावत’ में संयोग-पक्ष को उतना विशद और विस्तृत चित्रण नहीं है, जितना वियोग-पक्ष का; क्योंकि संयोग-पक्ष से कवि के आध्यात्मिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती थी। रहस्यवादी कवि होने के नाते इन्होंने रत्नसेन और पद्मावती को जीव और ब्रह्म का प्रतीक माना है। सूफी सिद्धान्त की दृष्टि से रत्नसेन और पद्मावती के संयोग-वर्णन को इन्होंने अधिक महत्त्व दिया है। संयोग के अन्तर्गत नवोढ़ा स्त्री की भावनाओं का अत्यधिक सुन्दर चित्र निम्नांकित पंक्तियों में मिलता है।

हों बौरी औ दुलहिन, पीउ तरुन सह तेज।
ना जानौं कस होइहिं, चढ़त कंते के सेज।।

विरह-वर्णन— जायसी का विरह-वर्णन अद्वितीय है। नागमती और पद्मावती दोनों के विरह चित्र हमें ‘पद्मावत’ में मिलते हैं। यद्यपि इस वर्णन, में अत्युक्तियों का सहारा भी लिया गया है, पर उसमें जो वेदना की तीव्रता है, वह हिन्दी-साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। उसका एक-एक पद विरह का अगाध सागर है। पति के प्रवासी होने पर नागमती बहुत दुःखी है। वह सोचती है कि वे स्त्रियाँ धन्य हैं, जिनके पति उनके पास हैं

जिन्ह घर कता ते सुखी, तिन्ह गारी औ गर्न।
कन्त पियारा बाहिरे, हम सुख भूला सर्व।।

करुणरस— श्रृंगार के उपरान्त करुण रस का जायसी ने विशेष वर्णन किया है। करुणा का प्रथम दृश्य वहाँ आता है, जहाँ रत्नसेन योगी बनकर घर से निकलने लगता है और उसकी माता-पत्नी विलाप करती हुई उसे समझाती

रोवत मायन बहुरत बारा। रतन चला घर भा अँधियारा॥
रोवहिं रानी तजहिं पराना। नोचहिं बार करहिं खरिहाना॥

रहस्यवाद— कविवर जायसी ने अपने ‘पद्मावत’ नामक महाकाव्य में लौकिक प्रेम के माध्यम से अलौकिक प्रेम का चित्रण किया है। ‘पद्मावत’ में ऐसे अनेक स्थल हैं, जहाँ लौकिक पक्ष से अलौकिक की ओर संकेत किया गया है। नागमती का हृदयद्रावक सन्देश निम्नलिखित पंक्तियों में द्रष्टव्य है।

पिउ सौ कहेउ सँदेसड़ा, हे भौंरा ! हे काग।
सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहि क धुवाँ हम्ह लाग॥

प्रकृति-चित्रण— मानव-प्रकृति के चित्रण के अतिरिक्त जायसी ने बाह्य दृश्यों का भी बहुत ही उत्कृष्ट चित्रण किया है। यद्यपि इनके काव्य में प्रकृति का आलम्बन रूप में चित्रण नहीं मिलता, तथापि उद्दीपन और मानवीकरण अलंकारों के रूप में प्रकृति के अनेक रम्य चित्र उपलब्ध होते हैं। भावपक्ष के उपर्युक्त विवेचन से सिद्ध होता है कि जायसी वास्तव में रससिद्ध कवि हैं।

कलापक्ष की विशेषताएँ

भावपक्ष के साथ ही जायसी का कलापक्ष भी पुष्ट, परिमार्जित और प्रांजल है, जिसका विवेचन निम्नवत् है-

छन्दोविधान— जायसी ने अपने काव्य के लिए दोहा-चौपाई की पद्धति चुनी है। इस पद्धति में कवि ने चौपाई की सात पंक्तियों के बाद एक दोहे का क्रम रखा है, जब कि तुलसी ने आठ पंक्तियों के बाद। इस छन्द-विधान के लिए जायसी तुलसी के पथ-प्रदर्शक भी माने जा सकते हैं।

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मलिक मोहम्मद जायसी की भाषा शैली

भाषा – जायसी की भाषा ठेठ अवधी है। इसमें बोलचाल की अवधी का माधुर्य पाया जाता है। इसमें शहद की। सहज मिठास है, मिश्री को परिमार्जित स्वाद नहीं। लोकोक्तियों के प्रयोग से इसमें प्राण-प्रतिष्ठा भी हुई है। कहीं-कहीं शब्दों को तोड़-मरोड़ दिया गया है और कहीं एक ही भाव या वाक्य के कई स्थानों पर प्रयुक्त होने के कारण पुनरुक्ति दोष भी आ गया है। भाषा की स्वाभाविकता, सरसता और मनोगत भावों की प्रकाशन-पद्धति ने जायसी को अवधी साहित्य के क्षेत्र में मान्य बना दिया है।

‘पद्मावत’ की भाषा की प्रशंसा करते हुए डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने कहा था- “जायसी की अवधी भाषाशास्त्रियों के लिए स्वर्ग है, जहाँ उनकी रुचि की अपरिमित सामग्री सुरक्षित है। मैथिली के लिए जो स्थान विद्यापति का है। मराठी के लिए जो महत्त्व ज्ञानेश्वरी का है, वही महत्त्व अवधी के लिए जायसी की भाषा का है।”

शैली – काव्य-रूप की दृष्टि से जायसी ने प्रबन्ध शैली को अपनाया है। उस समय फारसी में मसनवी शैली और हिन्दी में चरितकाव्यों की एक विशेष शैली प्रचलित थी। जायसी ने दोनों का समन्वय कर एक नवीन शैली को जन्म दिया। ‘पद्मावत’ में शैली का यही मिश्रित-नवीन रूप मिलता है। ‘पद्मावत’ के आरम्भ में मसनवी शैली और भाषा, छन्द आदि में चरित-काव्य की शैली मिलती है। इन्होंने चौपाई और दोहा छन्दों में भाषा-शैली को सुन्दर निर्वाह किया है। समग्र रूप में जायसी की भाषा-शैली सरल, सशक्त एवं प्रवाहपूर्ण है।

अलंकार – अलंकारों का प्रयोग जायसी ने काव्य-प्रभाव एवं सौन्दर्य के उत्कर्ष के लिए ही किया है, चमत्कार-प्रदर्शन के लिए नहीं। इनके काव्य में सादृश्यमूलक अलंकारों की प्रचुरता है। आषाढ़ के महीने के घन गर्जन को विरहरूपी राजा के युद्ध-घोष के रूप में प्रस्तुत करते हुए बिजली में तलवार का और वर्षा की बूंदों में बाणों की कल्पना कर कितना सुन्दर रूपक बाँधा गया है।

खड़गे बीजु चमकै चहुँ ओरा। बूंद बान बरसहिं घन घोरा॥

यहाँ रूपक के साथ-साथ अनुप्रास का भी सुन्दर एवं कलात्मक प्रयोग हुआ है।

मलिक मुहम्मद जायसी का साहित्य में स्थान

साहित्य में स्थान – डॉ० वासुदेवशरण अग्रवाल ने जायसी की सराहना करते हुए लिखा है कि, जायसी अत्यन्त संवेदनशील कवि थे। संस्कृत के महाकवि बाण की भाँति वे शब्दों के चित्र लिखने के धनी हैं। वे अमर कवि हैं।

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FAQs. मलिक मुहम्मद जायसी जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. मलिक मोहम्मद जायसी का जन्म और मृत्यु कब हुई?

मलिक मुहम्मद जायसी का जन्म सन् 1492 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के जायस नामक ग्राम में हुआ था और इनकी मृत्यु सन् 1542 ईस्वी को अमेठी, उत्तर प्रदेश में हुई थी।

2. मलिक मोहम्मद जायसी का प्रसिद्ध महाकाव्य कौन सा है?

‘पद्मावत’ हिन्दी-साहित्य के अन्तर्गत सूफी परम्परा का प्रसिद्ध महाकाव्य है। इसके रचनाकार मलिक मुहम्मद जायसी हैं।

3. मलिक मोहम्मद जायसी की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी है?

मलिक मुहम्मद जायसी की प्रमुख रचनाएं – ‘पद्मावत’, ‘अखरावट’, ‘आखिरी कलाम’, ‘चित्ररेखा’ आदि जायसी की प्रसिद्ध रचनाएँ हैं।

4. मलिक मुहम्मद जायसी के गुरु कौन है?

मलिक मुहम्मद जायसी के गुरु सूफी संत शेख मोहिदी और सैयद अशरफ जहाँगीर है।

5. मलिक मोहम्मद जायसी के कितने पुत्र थे?

मलिक मुहम्मद जायसी एक सन्त प्रकृति के गृहस्थी कवि थे। इनके सात पुत्र थे लेकिन किसी कारणवश उनकी आसमायिक मृत्यु हो जाने के कारण से इनमें वैराग्य जाग गया और ये फ़कीर बन गये।

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