महाकवि भूषण – जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “महाकवि भूषण का जीवन परिचय” (kavi bhushan biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने भूषण का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, दोहे, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और भूषण किस रस के कवि हैं? आदि को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने कवि भूषण जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

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महाकवि भूषण का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने भूषण जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
महाकवि भूषण की जीवनी –

नामकवि भूषण
वास्तविक नामपतिराम
जन्मसंवत् 1670 वि० (सन् 1613 ई०)
जन्म स्थानउत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के तिकवाँपुर ग्राम में
मृत्युसंवत् 1772 वि० (सन् 1715 ई०)
पिता का नामपंडित रत्नाकर त्रिपाठी
साहित्य कालरीतिकाल
भाषाब्रजभाषा
प्रमुख रसवीर रस
प्रमुख रचनाएंशिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रसाल दशक आदि।
साहित्य में स्थानवीर रस के सर्वश्रेष्ठ कवि और हिन्दी साहित्य के प्रथम राष्ट्रीय कवि के रूप में।

महाकवि भूषण का जीवन परिचय

कविवर भूषण का जन्म कानपुर जिले के तिकवाँपुर ग्राम में सन् 1613 ईस्वी (संवत् 1670 वि०) में हुआ था। इनके पिता पण्डित रत्नाकर त्रिपाठी संस्कृत के महान् विद्वान् एवं ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे। ये कान्यकुब्ज ब्राह्मण एवं दुर्गाजी के अनन्य भक्त थे। हिन्दी के प्रसिद्ध रससिद्ध कवि चिन्तामणि और मतिरामजी इन्हीं के पुत्र थे। ‘भूषण’ इनकी कवि उपाधि थी जो इन्हें चित्रकूट के सोलंकी महाराजा रुद्रदेव से प्राप्त हुई थी। इनका वास्तविक नाम ‘पतिराम’ कहा जाता है।

महाकवि भूषण
महाकवि भूषण का जीवन परिचय

महाकवि भूषण जी के जीवन का प्रारम्भिक चरण अकर्मण्यता से ग्रसित था। कहा जाता है कि भाभी के कटु व्यंग्य से मर्माहत होकर इन्होंने घर छोड़ दिया। कहाँ गये, कैसे रहे, इसका कुछ पता नहीं चलता, पर जब ये दस वर्षों के बाद घर लौटे तो इनमें पाण्डित्य एवं कवित्व-शक्ति का पर्याप्त विकास हो चुका था, जिसका राज्याश्रयों में उत्तरोत्तर विकास होता रहा। ये कई राजदरबारों में रहे, परन्तु इन्हें सन्तुष्टि न मिली। अन्त में मनोवांछित आश्रयदाताओं के रूप में इन्हें वीर शिवाजी व छत्रसाल मिले। इन दोनों ने भूषण को पर्याप्त सम्मान दिया। सन् 1715 ईस्वी (संवत् 1772 वि०) के लगभग इनकी मृत्यु हो गयी।

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महाकवि भूषण का साहित्यिक परिचय

भूषण मध्य युग के वीर रस के कवि हैं। विलासिता और परतन्त्रता के युग में स्वतन्त्रता, ओजस्विता, तेजस्विता एवं राष्ट्रीयता का स्वर हम भूषण के मुख से ही सर्वप्रथम सुनते हैं। अपने समकालीन कवियों की तरह भूषण ने विलासी आश्रयदाताओं के मनोरंजन के लिए श्रृंगारी काव्य की रचना न करके अपनी वीरोपासक मनोवृत्ति के अनुकूल अन्याय और संघर्ष के दमन में तत्पर, ऐतिहासिक महापुरुष शिवाजी एवं छत्रसाल जैसे वीरनायकों का अपनी ओजस्वी कविता द्वारा लोमहर्षक गुणगान किया। यद्यपि ये अपने युग की लक्षण-ग्रन्थ परम्परा तथा प्रवृत्तियों से सर्वथा मुक्त नहीं थे, तथापि जातीय, राष्ट्रीय भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति इनके काव्य की सबसे बड़ी विशेषता रही है। सच तो यह है कि भूषण हिन्दी साहित्य के प्रथम राष्ट्रीय कवि हैं। भारतमाता के अमर पुत्र छत्रपति शिवाजी एवं छत्रसाल बुन्देला जैसे लोकोपकारी महापुरुषों के चरित-गायन में ही इन्होंने अपने जीवन को सार्थक समझा। इन्हीं महापुरुषों की दानशीलता, युद्ध-वीरता, दयालुता एवं धर्मपरायणता का महाकवि भूषण के द्वारा उदात्त चित्रण किया गया है। इन्हीं चरितनायकों के शौर्य-वर्णन या वीर रसात्मक उद्गार विशाल भारतीय जनता की सम्पत्ति हैं।

महाकवि भूषण की प्रमुख रचनाएं

भूषण की कीर्ति के आधारस्तम्भ इनके तीन काव्य-ग्रन्थ है— (1) शिवराज भूषण, (2) शिवा बावनी और (3) छत्रसाल दशक। शिवसिंह सरोज ने ‘भूषण-हजारा’ व ‘भूषण-उल्लास’ नामक दो अन्य रचनाओं को भी भूषणकृत माना है, परन्तु उनका यह मत प्रमाणपुष्ट नहीं है।

महाकवि भूषण की काव्यगत विशेषताएं

भूषण की कविता में प्रधानतया वीर रस का ही परिपाक हुआ है। वीर रस के सहकारी रौद्र और भयानक हैं। अपने प्रिय रस के निरूपण में भूषण ने त्रास या भय के अनेक रूपों की व्यंजना अनेक प्रकार की रसात्मक स्थितियों की कल्पना के साथ की है। इनमें नवीन उद्भावना की क्षमता अच्छी थी। विपक्ष की दीनता, व्याकुलता और खीझ आदि की सहायता से शिवाजी के आतंक की व्यंजना में नूतनोद्भावना के अनेक प्रयोग भूषण की रचना में हैं। वीभत्स की व्यंजना में पारम्परिक वर्णन है। युगीन प्रवृत्तियों के अनुरूप भूषण ने श्रृंगार रस का भी वर्णन किया है, पर इसमें भी इन्होंने नवीन उद्भावनाएँ की हैं।

भूषण की रचना दृश्य-चित्रण में भी श्रेष्ठ है, यद्यपि इसके लिए मुक्तक में स्थान कम ही होता है। वीर रस की कृति में युद्धस्थल का चित्रण आ सकता है, पर युद्धस्थल में अनेक दृश्यों के त्वरित गति से संघटित होने के कारण चित्रण की विशेष विधि ही काम में आ सकती है। अनेक दृश्यों का सुगुंफित चित्रण मुक्तक में प्रायः नहीं आ पाता। फिर भी भूषण ने ‘ताव दै दै मूँछन कंगूरन पै पाँव दै-दै, घाव दै-दै अरिमुख कूदि परै कोट में’ जैसे चित्रणों में सफलता प्राप्त की है। युद्धस्थल-वर्णन की अपेक्षा युद्धस्थल प्रस्थान-वर्णन ही भूषण की रचना में अधिक है।

महाकवि भूषण की भाषा शैली

भूषण की कविता ब्रजभाषा में है परन्तु इसमें ब्रजभाषा के माधुर्य की नहीं, ओज की प्रधानता है। इनकी भाषा में स्थानीय पुट भी अनायास आ गया है। इन्होंने अरबी-फारसी के शब्दों का भी निःसंकोच प्रयोग किया है। भूषण अलंकारों के भी मर्मज्ञ थे। ‘शिवराज भूषण’ एक अलंकार ग्रन्थ है। अलंकारों लक्षण दोहों में दिये गये हैं। एक छन्द में कई-कई अलंकारों का प्रयोग किया गया है। स्थान-स्थान पर लोकोक्तियों और मुहावरों के प्रयोग से भाषा सजीव एवं सशक्त हो गयी है।

महाकवि भूषण का साहित्य में स्थान

भूषण की कविता का भावपक्ष एवं कलापक्ष दोनों ही दृष्टियों से श्रेष्ठ है तथा हिन्दी के वीर रसात्मक काव्य में अद्वितीय स्थान की अधिकारिणी है। या कहें कि भक्ति और रीतिकाल के वीर काव्यकारों में भूषण का स्थान अद्वितीय है और जब कभी-कभी हिन्दी के पाठकों या विद्वानों में कवि-चर्चा होती है तो वीर रस के कवि के रूप में भूषण का नाम तुरन्त आ पहुँचता है। वास्तव में भूषण की वीर रस की कविता अन्य कवियों से बढ़-चढ़ कर है, जिसमें वीर रस का परिपाक बड़े सुन्दर ढंग से हुआ है, जिससे वीर भाव की विविध श्रेणियाँ बल, ओज और आतंक के साथ खड़ी दिखायी देती हैं, जिसमें भाषा वीर भावों के पीछे-पीछे चलती हुई दर्शकों को आकृष्ट करती है।

FAQs. महाकवि भूषण जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. भूषण का जन्म कब हुआ था?

महाकवि भूषण का जन्म संवत् 1670 वि० (सन् 1613 ई०) को उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के तिकवाँपुर (त्रिविक्रमपुर) ग्राम में हुआ था।

2. भूषण का असली नाम क्या है?

कवि भूषण का असली नाम पतिराम था।

3. महाकवि भूषण की रचना कौन सी है?

महाकवि भूषण जी की रचनाएँ विद्वानों ने इनके छह ग्रंथ माने हैं- शिवराजभूषण, शिवाबावनी, छत्रसालदशक, भूषण उल्लास, भूषण हजारा, दूषनोल्लासा। परन्तु इनमें शिवराज भूषण, छत्रसाल दशक व शिवा बावनी ही उपलब्ध हैं।

4. 4 कवि भूषण के प्रिय नायक कौन हैं?

यहाँ भूषण के दोनों प्रिय नायकों – छत्रपति शिवाजी और छत्रसाल से संबंधित दो कवित्त दिए जा रहे हैं जिनमें उनके शौर्य का ओजस्वी बखान है। इनमें वह शिवाजी की विशेषता पहचान सके थे।

5. कवि भूषण का वास्तविक नाम क्या है?

भूषण का वास्तविक नाम क्या था, इसकी कोई जानकारी नहीं मिलती। एक दोहे से विदित होता है कि चित्रकूट के सोलंकी राजा रुद्रदेव ने इन्हें ‘भूषण’ की उपाधि दी थी। कदाचित कालान्तर में ये ‘भूषण नाम से इतने विख्यात हुए कि इनका वास्तविक नाम ही विलुप्त हो गया।

6. भूषण की मृत्यु कब हुई थी?

महाकवि भूषण की मृत्यु संवत् 1772 वि० (सन् 1715 ई०) में हो थी।

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