मीराबाई : जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं एवं भाषा शैली | Mirabai Biography in Hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको “मीराबाई का जीवन परिचय” (Mirabai Biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देने जा रहा है। इसमें हम आपको मीराबाई का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां और उनकी भाषा शैली तथा साहित्य में स्थान को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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मीराबाई का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने मीरा बाई की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
मीराबाई की जीवनी –

नाम मीराबाईमीराबाई
जन्मतिथिसन् 1498 ई. में
जन्मस्थानराजस्थान में मेड़ता के पास चौकड़ी (कुड़की) ग्राम में
मृत्युतिथिसन् 1547 ई. में
मृत्युस्थानद्वारका, गुजरात
पिता का नामरत्नसिंह राठौड़
माता का नामवीर कुमारी
पति का नामराणा भोजराज सिंह
व्यवसायकृष्ण भक्त, संत, कवित्री, गायिका
भाषाब्रजभाषा
शैलीपदशैली
प्रमुख रचनाएंमीराबाई की मल्हार, गीत-गोविंद की टीका, राग सोरठ के पद, नरसीजी का मायरा, गरवा गीत, राग विहाग एवं फुटकर पद आदि।
उपाधिमरुस्थल की मंदाकिनी
गुरुसंत रैदास
साहित्य कालभक्तिकाल

मीराबाई 16वीं सदी की महान् भारतीय रहस्यवादी कवयित्री और भगवान श्री कृष्ण जी की भक्त थी। उन्हें भारत में भक्तिकाल आंदोलन की सबसे प्रमुख शख्सियतों में से एक माना जाता है। मीरा बाई की श्री कृष्ण जी के प्रति भक्ति और प्रेम को उनकी मार्मिक और भावुक कविता के माध्यम से मनाया जाता है जो कि आज भी लोगों को प्रेरित करती है।

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मीराबाई का जीवन परिचय

मीराबाई, जिन्हें मीरा बाई या मीरा के नाम से भी जाना जाता है, ये 16वीं शताब्दी की प्रसिद्ध भारतीय कवयित्री, संत और श्री कृष्ण जी की भक्त थी। उनका जन्म सन् 1498 ई. के लगभग भारत के वर्तमान राजस्थान में मेड़ता के पास एक गांव चौकड़ी (कुड़की) में एक राजपूत शाही परिवार में हुआ था, उनके पिता का नाम रत्नसिंह राठौड़ और माता का नाम वीर कुमारी था। तथा ये जोधपुर के संस्थापक राव जोधा की प्रपौत्री थी।

मीराबाई
मीराबाई का जीवन परिचय

बचपन में ही मीराबाई की माता की मृत्यु हो गई थी। अतः ये अपने पितामह राव दूदा जी के पास रहती थी, यहीं पर मीरा बाई ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा भी अपने दादाजी के पास रहकर ही प्राप्त की थी। उनके दादा राव दूदा जी एक बड़े धार्मिक और उदार प्रवृत्ति के व्यक्ति थे जिनका प्रभाव मीरा के जीवन पर भी पड़ा था। बचपन से ही मीरा जी श्री कृष्ण की आराधिका जी थीं।

मीराबाई का बहुत कम उम्र में ही विवाह उदयपुर के राणा साॅंगा के पुत्र राणा भोजराज सिंह के साथ हुआ था। विवाह के कुछ वर्षों बाद ही उनके पति की मृत्यु हो गई थी तब से ही मीराबाई ने अपने जीवन को श्रीकृष्ण जी की भक्ति में लगा दिया। जब से ही मीराबाई अपने भक्ति गीतों के लिए जानी जाती है, जो भगवान श्रीकृष्ण जी को समर्पित थे। मीराबाई की मृत्यु द्वारका (गुजरात) में सन् 1547 ई. के आसपास मानी जाती हैं।

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मीराबाई का साहित्यिक परिचय

मीरा बाई के साहित्यिक जीवन की किंतदन्तियों और वृतान्तों के अनुसार, कृष्ण के साथ आध्यात्मिक मिलन की खोज में उन्हें कई चुनौतियों और बाधाओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने ऐसे भजन, भक्ति गीत बनाए और गाये जो कृष्ण के प्रति उनके प्रेम, लालसा और समर्पण को व्यक्त करते थे। मीरा के गीत बेहद लोकप्रिय हुए और पूरे क्षेत्र में फैल गए जिससे उनके अनुयायी और प्रशंसक आकर्षित हुए।

छोटी उम्र से ही मीराबाई ने भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गहरी भक्ति और प्रेम को दिखाया। एक रूढ़िवादी राजपूत परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति को आगे बढ़ाने के लिए सामाजिक मानदंडों और धार्मिक परंपराओं को चुनौती दी। मीरा बाई की भक्ति अक्सर उनके परिवार की अपेक्षाओं से टकराती थी और उन्हें अपने ससुराल वालों और समुदाय से विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ा था।

मीराबाई के साहित्यिक जीवन में कई नाटकीय मोड़ आए उन्हें अपने ससुराल वालों द्वारा शत्रुता का सामना भी करना पड़ा। और मीरा बाई को जहर देने का प्रयास किया गया लेकिन वह चमत्कारिक रूप से बच गई। इसके बाद, मीरा बाई ने इस भौतिक संसार को त्यागने और एक सन्यासी के रूप में जीवन जीने का फैसला किया। जोकि पूर्ण रूप से कृष्ण के प्रति अपने प्रेम के लिए समर्पित थी। मीरा बाई ने कृष्ण से जुड़े विभिन्न तीर्थ स्थलों जैसे कि वृन्दावन और मथुरा का दौरा करते हुए एक बड़े पैमाने पर यात्रा की।

मीराबाई की रचनाएं

मीरा बाई जिन श्री कृष्ण की भक्ति पदों को गाती थी तथा भाव विभोर होकर नृत्य करती थी वहीं गेय पद उनकी रचनाएं कहलाती हैं जोकि निम्नलिखित है –
(1). मीराबाई की मल्हार, (2). नरसीजी का मायरा, (3). राग सोरठ के पद, (4). राग विहाग एवं फुटकर पद, (5). राग-गोविंद, (6). गीत-गोविंद की टीका तथा (7). गरवा गीत आदि मीराबाई की प्रसिद्ध रचनाएं हैं। इसके अलावा, मीरा की रचनाओं का प्रसिद्धि आधार “मीरा पदावली” एक महत्वपूर्ण कृति है।

मीराबाई की कविताएं और गीत आज भी पूरे भारत में लोकप्रिय हैं और दिव्य प्रेम की अभिव्यक्ति के रूप में संजोए जाते हैं। उनकी कविताएं लालसा, अलगाव, भक्ति और परमात्मा के साथ मिलन की लालसा के विषयों को व्यक्त करती हैं।

मीराबाई की भाषा शैली

मीरा बाई ने काव्य भाषा शुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा को अपनाकर अपने गीतों की रचना की है। इनके द्वारा प्रयुक्त उस भाषा पर राजस्थानी, गुजराती, पश्चिमी हिंदी एवं पंजाबी भाषा का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। उनकी काव्य भाषा अत्यंत मधुर, सरस और प्रभावपूर्ण है। इनके सभी पद गेय पद हैं।

मीराबाई ने गीतिकाव्य की भावपूर्ण शैली अथवा मुक्तक शैली को अपनाया है। उनकी शैली में हृदय की तन्मयता, लयात्मकता एवं संगीतात्मकता स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।

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FAQs. मीराबाई के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. मीराबाई का जन्म कब और कहां हुआ था?

मीराबाई का जन्म सन् 1498 ई. को राजस्थान में मेड़ता के पास स्थित कुड़की (चौकड़ी) ग्राम में हुआ था।

2. मीराबाई का बचपन का नाम क्या है?

मीराबाई का बचपन का नाम पेमल है।

3. मीराबाई के माता पिता का क्या नाम था?

मीराबाई की माता का नाम वीर कुमारी तथा पिता का नाम रत्नसिंह राठौड़ था।

4. मीराबाई की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

मीराबाई की मृत्यु सन् 1547 ई. को द्वारका में हुई थी।

5. मीराबाई का विवाह कब हुआ?

मीराबाई का विवाह सन् 1516 ई. में मेवाड़ के राजकुमार भोजराज सिंह के साथ हुआ था।

6. मीराबाई की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी हैं?

मीराबाई की प्रमुख रचनाएं इस प्रकार से हैं – नरसीजी की मायरा, राग गोविंद, राग सोरठ के पद, गीतगोविंद की टीका, मीराबाई की मल्हार, राग विहाग एवं फुटकर पद तथा गरवा गीत आदि।

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