यूरोपीय परिदृश्य (1919 ई.- 1923 ई.), NCERT सार संग्रह | European landscape in Hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको संक्षिप्त इतिहास NCERT सार संग्रह “महेश कुमार वर्णवाल” Book का अध्याय “यूरोपीय परिदृश्य (1919 ई. – 1923 ई.)” (European landscape in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। इसमें हम आपको सन् 1919 में यूरोप में क्या हुआ था?, यूरोप में नए राज्यों का गठन और 1924 से 1936 ई. तक के यूरोप को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

यूरोपीय परिदृश्य (1919 ई.- 1923 ई.) (European landscape in Hindi)

यूरोप में नए राज्य-

  • प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ कई यूरोपीय राष्ट्र स्वतंत्र राज्यों के रूप में उदित हुए। ये राज्य थे-एस्टोनिया, लाटविया, लिथुआनिया, फिनलैंड, पोलैंड और चेकोस्लोवाकिया। साथ ही कुछ नए राज्य पुराने राज्य में नए क्षेत्र मिलाने से बने, जैसे- यूगोस्लाविया।
  • 1922 ई. में आयरलैंड को, जो इंग्लैण्ड से स्वतंत्र होने के लिए संघर्ष कर रहा था, विभाजित किया गया।
  • आयरिश फ्री स्टेट को अधिराजत्व (डोमिनियन) का दर्जा दिया गया, जबकि उत्तरी आयरलैंड ने, जिसमें छह काउंटियाँ थीं, ब्रिटेन से अपना सम्बंध बनाए रखा।
  • आयरिश फ्री स्टेट ने स्वंय को आयर के नाम से एक संप्रभुता युक्त राज्य, जो आगे चलकर आयरलैंड गणतंत्र बना तथा हंगरी और ऑस्ट्रिया दो अलग राज्य बन गए।

सर्वसत्तावादी शासनों का उदय

  • जिन देशों ने अपने यहाँ सर्वसत्तावादी सरकारें कायम नहीं होने दीं उनमें स्कैंडिनेवियाई देशों के अलावा ब्रिटेन, फ्रांस और चेकोस्लोवाकिया थे। लेकिन इन देशों को भी जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ा।
  • ब्रिटेन में 20 लाख बेरोजगार लोग थे। लेबर पार्टी ने बेरोजगारी दूर करने के लिए कदम उठाने, अमीरों पर भारी कर लगाने, मजदूरी बढ़ाने, बड़े पैमाने पर निर्माण कार्यक्रम आरंभ करके आवासों की कमी को दूर करने आदि के लिए अभियान चला रखी थी।
  • इस काल में फ्रांसीसी सरकार पर बड़े उद्योगपति और बैंकर हावी थे। फ्रांस की महत्वाकांक्षा यूरोप की परम शक्ति बनने की थी। इस उद्देश्य से उसने जर्मनी के संसाधनों को अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश की।
  • नवोदित राज्य चेकोस्लोवाकिया को गणतंत्र घोषित किया गया जिसका अध्यक्ष (राष्ट्रपति) तामस मसारिक बना।
  • 1919 ई. में चेकोस्लोवाकिया ने एक संविधान अपनाया। वहाँ अनेक महत्वपूर्ण सुधार लागू किए गए और जहाँ पूर्वी तथा दक्षिणी यूरोप के ज्यादातर देश दो युद्धों के मध्य के काल में आर्थिक दृष्टि से पिछड़े रहे, वहीं चेकोस्लोवाकिया का तीव्र औद्योगिक विकास हुआ।

वाइमर गणतंत्र

  • जर्मनी में 1919 ई. में एक संसदीय गणतंत्र स्थापित किया गया। इसे लोग वाइमर गणतंत्र के नाम से जानते हैं। इसका कारण यह है कि वाइमर नगर में ही उस संविधान सभा का अधिवेशन हुआ था, जिसमें नया संविधान निर्मित हुआ।
  • इस संविधान में अनेक विशेषाधिकारों से संपन्न एक राष्ट्र‌पति (प्रेसिडेंट), संसद के प्रति जिम्मेदार एक चांसलर (प्रधानमंत्री) तथा सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित राइक्सरा नामक संसद को व्यवस्था की गई थी।
  • उग्र राष्ट्रवाद का विरोध करने वाले समाजवादी लोकतांत्रिक दल (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी) और साम्यवादी दल (कम्युनिस्ट पार्टी) प्रबल राजनीतिक दलों के रूप में उभरे। समाजवादी लोकतांत्रिक दल 1930 ई. तक जर्मनी के शासक दलों में से एक था। इस बीच सर्वसत्तावादी मंडलिया और दल उभरने लगे थे।
  • वे लोकतंत्र के निंदक थे और वर्साय की संधि को अस्वीकार कर देने को हिमायत करते थे तथा युद्ध की महिमा का बखान किया करते थे।
  • उन्होंने लोकतांत्रिक पद्धति से निर्वाचित सरकार का तख्ता पलट कर उसके स्थान पर तानाशाही स्थापित करने के षड्यंत्र रचे।
  • उन्होंने युद्ध में जर्मनी की पराजय के लिए यहूदियों और साम्यवादियों को दोषी बताया और देश को उनके प्रभाव से मुक्त कराने के लिए हत्याओं और आतंक की योजनाएँ बनाई।
  • 1920 ई. में उन्होंने षड्यंत्र के द्वारा सत्ता प्राप्त करने का प्रयास किया।
  • एक षड्यंत्रकारी संगठन के स्वयंसेवकों तथा सेना में उनके समर्थकों ने बर्लिन पर अधिकार कर लिया। समाजवादी लोकतांत्रिक दल की सरकार को भंग कर दिया गया और काप नाम से एक व्यक्ति के अधीन एक नई सरकार स्थापित कर दी।

🔺1919 ई. में नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी (राष्ट्रवादी समाजवादी जर्मन श्रमिक दल) का गठन किया गया था, जिसे संक्षेप में नाजी दल कहा जाता था।

  • एडोल्फ हिटलर के नेतृत्व में इस दल ने 1923 ई. में एक विद्रोह करने का प्रयास किया था, जिसका दमन कर दिया गया।

वाइमर गणतंत्र की आर्थिक समस्याएँ

  • जर्मनी को मित्र-शक्तियों को क्षतिपूर्ति के तौर पर 600 करोड़ पौंड देने थे। 1921 में उसने 5 करोड़ पौंड को पहली किस्त चुका दी लेकिन आगे की किस्तों की पूरी अदायगी करने में का असमर्थ था।
  • अनियंत्रित मुद्रा-स्फीति के कारण जर्मन अर्थव्यवस्था बुरी तरह ध्वस्त हो गई थी। 1921 ई. का अंत होते-होते जर्मन मुदा मार्क का मूल्य गिरकर पहले के मुकाबले 50वां हिस्सा रह गया था।
  • पहले 20 मार्क एक ब्रिटिश पौंड के बराबर हो गए थे। 1922 ई. में उसमें और भी गिरावट आई। जनवरी 1923 ई. में बेल्जियम और फ्रांस की सेनाओं ने रूस घाटी पर अधिकार कर लिया, जो जर्मनी के कोयला तथा धातु उद्योगों का केंद्र थी।
  • उन्होंने यह कार्रवाई जर्मनी के कोयला और इस्पात से अपनी क्षतिपूर्ति की रकमों की भरपाई के लिए की थी।
  • जर्मन सरकार ने बेशुमार कागजी मुद्रा छापना प्रारम्भ कर दिया, जिससे भारी संकट उपस्थित हो गया।
  • नवंबर 1923 ई. तक जर्मन मुद्रा कौड़ी के मोल भी नहीं रह गई थी। अब एक ब्रिटिश पौंड की कीमत 5 अरब मार्क हो गई थी।
  • 1923 ई. के अंत में एक मुद्रा सुधार कार्यक्रम लागू किया गया। सुधार अनिवार्य हो गया था लेकिन जर्मन लोगों को कई वर्गों के लिए यह विनाशकारी साबित हुआ।
  • एक नई मुद्रा का चलन आरंभ कर दिया गया। इसका मतलब यह था कि लाखों लोगों की बचतें देखते-देखते शून्य हो गई।
  • सबसे बुरा हाल मध्य वर्ग तथा निम्न मध्य वर्ग यानी वेतन-भोगी लोगों का हुआ। लाखों लोग अचानक निर्धन हो गए। इस विपत्ति से सबसे ज्यादा लाभ नाजी दल को हुआ। हताश होकर अपने ऋण के लिए बहुत से लोग इस दल की ओर उन्मुख हुए।
  • 1924 ई. में संयुक्त राज्य और अन्य देशों से मिलने वाले ऋणों के बल पर जर्मन अर्थव्यवस्था संभलने लगी। इन ऋणों से जर्मनी ने नए सिरे से अपनी अर्थव्यवस्था का निर्माण करना आरंभ किया और साथ ही क्षतिपूर्ति की रकमें भी अदा करने लगा।

इटली में फासीवाद

  • इटली में युद्ध के शीघ्र बाद के वर्षों के दौरान बेरोजगारी और जनक्षोभ व्यापक रूप से फैला हुआ था। इटली में एक लोकतंत्र विरोधी हिंसक आंदोलन अर्थात् फासीवादी आंदोलन का जन्म हो चुका था।

🔺राष्ट्र के शत्रु माने जाने वाले लोगों ख़ासकर समाजवादियों, साम्यवादियों तथा श्रमिकों एवं किसानों के आंदोलन के नेताओं को आतंकित करने के लिए सशस्त्र दल खड़े किए गए जो फासिस्ट कहलाते थे।

  • इटली की औपनिवेशिक तथा महान शक्ति कहलाने की अपनी महत्वाकांक्षाएँ थीं, जिन्हें मित्र शक्तियां संतुष्ट नहीं कर पाई।
  • यूरोप में इटली को ऑस्ट्रिया के कुछ प्रदेश मिले थे, लेकिन उपनिवेशों में हिस्सा पाने की उसकी आकांक्षा अतृप्त रह गई थी।
  • शासक वर्गों को फासीवादी आंदोलन के रूप में अपनी महत्वाकांक्षाएँ पूरी करने का एक उपकरण नजर आया।

🔺नवंबर 1921 में राष्ट्रीय फासीवादी पार्टी स्थापित की गई। जिसका नेता बेनितो मुसोलिनी था।

  • हड़तालें तोड़ने और साम्यवादी तथा समाजवादी नेताओं की हत्या कराने के लिए हजारों काला कुर्ताधारी (ब्लैक शर्टस्) भर्ती किए गए। सरकार बढ़‌ती हुई फासीवादी हिंसा के प्रति उदासीन रही।
  • फासीवादी 1919 ई. में संसद में एक भी स्थान नहीं जीत पाए थे जबकि 1921 ई. में उन्होंने 35 स्थान जीते।
  • फासीवादियों ने बोलोना और मिलान नगरों पर बलपूर्वक अधिकार स्थापित कर लिया।
  • 24 अक्टूबर, 1924 को उन्होंने रोम की ओर एक प्रयाण मार्च का आयोजन किया।
  • इन सशस्त्र प्रयाणियों के दमन के बदले सरकार ने उनके सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
  • इटली के राजा वेनिटो मुसोलिनी को, जो स्वयं इस प्रयाण में शामिल भी नहीं था, सरकार बनाने के लिए निमंत्रित किया गया।
  • उसने शीघ्र हो तानाशाही अधिकार हस्तगत कर लिए और काले कुर्ताधारी गिरोहों द्वारा मचाए गए आतंक के बीच 1924 ई. में चुनाव करवाए।
  • 1926 ई. में सभी गैर फासीवादी दलों तथा संगठनों को अवैध घोषित करके भंग कर दिया गया।

1924 से 1936 ई. तक यूरोप

यूरोप पर अर्थिक मंदी का प्रभाव-

  • 1920 के दशक के मध्य से आर्थिक समुत्थान का जो दौर आरंभ हुआ था, यह 1929 ई. में समाप्त हो गया।
  • 1929-30 ई. की कालावधि को दुःस्वप्न का प्रारब्ध कहा गया है। यह दुःस्वप्न 1933 ई. तक जारी रहा, जिसके बाद फिर से इसके समुत्थान का काल प्रारम्भ हुआ।
  • यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं पर उपस्थित संकट 1929 ई. में संयुक्त राज्य में आई महामंदी का सीधा परिणाम था।
  • अमेरिका ने यूरोप को कर्ज देना बिल्कुल बंद कर दिया और लगातार कर्ज मिलते रहने से जिन देशों की अर्थव्यवस्था का विकास हुआ था उन पर इसका सबसे बुरा प्रभाव पड़ा जैसे-जर्मनी।
  • अमेरिका की तरह यूरोप में भी उधोग-धंधे बंद होने लगे और करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए।
  • 1932 ई. में जर्मनी में 60 लाख लोग बेरोजगार थे और लगभग आधी आबादी विपन्न थी। ब्रिटेन में बेरोजगारों की संख्या 30 लाख थी।
  • जो यूरोपीय देश बुनियादी तौर पर कृषि प्रधान रह गए थे, उन पर भी इसका बहुत बुरा असर हुआ। उनका भार उनके कृषि-उत्पादों के निर्यात पर निर्भर था। कृषि-उत्पादों की कीमतों में भारी गिरावट से उनकी अर्थव्यवस्था पर ऋणात्मक प्रभाव पड़ा।
  • हर देश ने अपने यहाँ के आयात पर प्रतिबंध लगा दिए जिसके गंभीर परिणाम हुए।
  • यूरोप के आर्थिक संकट के राजनीतिक परिणाम लोकतंत्र के लिए विनाशकारी साबित हुए।
  • इस सदी के समाप्त होते-होते यूरोप के अधिकांश देशों में सर्वसत्तावादी, अर्द्ध-फासीवादी तथा फासीवादी शासन कायम हो चुके थे और जिन देशों में लोकतंत्र बचा भी रहा, उनमें भी फासीवादी शक्तियों के प्रभाव में वृद्धि हुई।
  • जर्मनी में आधुनिक काल का सबसे बर्बरतापूर्ण शासन स्थापित हुआ।

ब्रिटेन का घटनाचक्र

  • अर्थव्यवस्था में आमूल परिवर्तन करने के वादे के बल पर 1924 ई. में ब्रिटेन में लेबर पार्टी को प्रथम सरकार बनी। वह कुछ भी करके दिखा नहीं पाई और दस महीने में समाप्त हो गई।
  • भय फैलाने के लिए लिखे गए एक जाली पत्र ने इस सरकार के पतन में कुछ योगदान किया।
  • यह पत्र जिनोवीव के नाम से लिया गया था जो उन दिनों कोमिंटर्न का अध्यक्ष था। उसमें ब्रिटेन के साम्यवादियों को वहाँ विद्रोह कराने और ब्रिटिश थल सेना तथा नौ सेना में आन्तरिक व्यवधान उत्पन्न करने की चेतावनी दी गई थी।
  • कंजर्वेटिव पार्टी ने लेबर पार्टी पर साम्यवादियों का हमदर्द होने का आरोप लगाकर उस पर प्रहार किए और अक्टूबर में उसने पुनः सत्ता प्राप्त कर ली। उसकी सरकार 1929 ई. तक कायम रही।
  • इसी दौर में ब्रिटिस इतिहास की सबसे बड़ी हड़ताल हुई जो कि नाकामयाब रही।
  • मई 1926 में मजदूरी में कटौती और काम के घंटों में बढ़ोत्तरी की आशंका के खिलाफ ब्रिटेन के कोयला खान मजदूरों ने हड़ताल कर दी।
  • ब्रिटिश सरकार ने पूरे तौर पर कोयला खान मालिकों का पक्ष लिया। 4 मई, 1926 को 30 लाख श्रमिकों ने कोयला खान के श्रमिकों के प्रति सहानुभूति में हड़‌ताल की।

🔺हड़तालियों में रेलकर्मी, परिवहन मजदूर, इस्पात उद्योग श्रमिक तथा कुछ अन्य उधोगों के मजदूर शामिल हुए। इस हड़ताल को आम हड़ताल के नाम से जाना जाता है।

  • हड़‌ताल के प्रति सरकार के पूर्णत: विरोधी रवैये तथा आम जनता को उसके विरुद्ध खड़ा करने के लिए किए गए भारी प्रचार के फलस्वरूप 12 मई को आम हड़ताल वापस ले ली गई।
  • फिर भी खान मजदूरों की हड़‌ताल कई महीने चलती रही जो आखिर में पूरी असफलता के साथ समाप्त हो गई। श्रमिकों को कम मजदूरी तथा काम के अधिक घंटों को शर्त पर काम पर लौटने को विवश होना पड़ा।
  • जब ब्रिटेन आर्थिक संकट की चपेट में आया तब लेबर प्रधानमंत्री ने वेतन और मजदूरी में कटौती तथा बेरोजगारी राहत और समाज कल्याण के अन्य कार्यक्रमों में कमी करके इससे मुकाबला करना चाहा।
  • अधिकांश मंत्रियों ने इसमें उसका साथ देने से मना कर दिया। फलत: उसने त्यागपत्र दे दिया। अब एक राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया, जिसमें ज्यादातर मंत्री कंजर्वेटिव पार्टी के थे।
  • इस बीच ब्रिटेन में एक फासीवादी आंदोलन उभरा, जो यहूदियों के विरुद्ध हिंसा की हिमायत करता था और जिसने अव्यवस्था तथा उपद्रव फैलाए।
  • 1931 ई. में ब्रिटिश साम्राज्य को गोरे अधिराज्य (डोमिनियन) अर्थात् गोरों से आबाद देशों के ब्रिटिश अधिराज्य लगभग स्वतंत्र हो गए। वे ब्रिटिश राष्ट्रकुल (ब्रिटिश कॉमनवेल्थ ऑफ नेशंस) के सदस्य तो बने रहे, लेकिन अब ब्रिटिश कानून उन पर लागू नहीं रहे और वे अपनी स्वतंत्र नीतियों पर चलने लगे।
  • अन्य पश्चिमी देशों की तरह ब्रिटिश सरकार ने भी फासीवाद के तुष्टीकरण को नीति अपनाई।

फ्रांस में राजनीतिक अस्थिरता

  • फ्रांस में यह अस्थिरता का समय था। फ्रांस के मन में यूरोप की सर्वप्रमुख शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा पल रही थी और उसने भारी शस्त्रीकरण कार्यक्रम आरंभ कर दिया था।
  • जर्मनी के कोयला तथा इस्पात उद्योगों को हथियाने के लिए फ्रांस द्वारा रूस घाटी पर कब्जा कर लिया गया। 1924 ई. के बाद फ्रांस को रूस से वापस चला जाना पड़ा।
  • 1933 ई. में फ्रांस एक भारी घोटाले में डाँवाडोल हो उठा। एलेक्जेंडर स्ताविस्की नामक एक सटोरिए ने लोगों को ठग कर साठ करोड़ फ्रैंक की विशाल संपत्ति ग्रहण कर ली थी।
  • इस घोटाले को बहाना बनाकर फासीवादियों ने पेरिस पर अधिकार करके सरकार को भंग कर सत्ता हथियाने का प्रयास किया। लेकिन साम्यवादियों तथा समाजवादियों ने इस फासीवादी षड्यंत्र को विफल करने के लिए श्रमिकों को लामबंद कर दिया।
  • 1936 ई. में फासीवाद के खतरे का मुकाबला करने और खास तौर से श्रमिकों के कल्याण के लिए फिर आवश्यक आर्थिक सुधार करने के उद्देश्य से साम्यवादियों, समाजवादियों तथा आमूल परिवर्तनवादी समाजवादियों का एक जनमोर्चा गठित किया गया।
  • जनमोर्चे ने चुनावों में विजय पाई और साम्यवादियों, समाजवादियों और आमूल परिवर्तनवादी समाजवादियों ने मिलकर जनमोर्चा सरकार बनाई।
  • अपने शासन के प्रथम वर्ष में जब लियो ब्लूम प्रधानमंत्री था तब जनमोर्चा सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।
  • शस्त्र उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया गया, मजदूरी तथा वेतन में कटौती समाप्त कर दी गई और श्रमिकों के लिए सप्ताह भर के लिए 40 घंटे का कार्यकाल सुनिश्चित किया गया।
  • फ्रांस की विदेश नीति का उद्देश्य अपनी महाशक्ति बनने की आकांक्षाओं की पूर्ति करना तथा जर्मनी की ओर से किसी भी प्रकार के संभावित अतिक्रमण से अपनी रक्षा की व्यवस्था करना था।
  • उसकी शह पर रोमानिया, यूगोस्लाविया तथा चेकोस्लोवाकिया के बीच एक गठबन्धन कायम हुआ था, जो लघु सुदृढ़ संघ के नाम से प्रसिद्ध है।

🔺1920 के दशक में फ्रांस ने कई सुरक्षा दुर्ग बनवाए जिससे जर्मनी से युद्ध होने पर वह फ्रांस में तेजी से आगे न बढ़ पाए। यह रक्षा प्रणाली मगिनो रेखा के नाम से विख्यात है।

  • 1935 में उसने सोवियत संघ के साथ एक द्विपक्षीय सहायता समझौता किया।
  • एडुअर्ड दलादिया के नेतृत्व में जो सरकार बनी, उसने ब्रिटिश सरकार की तरह फासीवादी देशों के तुष्टीकरण की नीति अपनाई।

पुर्तगाल तथा स्पेन

  • हंगरी, पोलैंड, रोमानिया, यूगोस्लाविया तथा अन्य देशों में सर्वसत्तावादी और अर्द्ध-फासीवादी सरकारें स्थापित की जा चुकी थीं।
  • 1930 के दशक के आरंभ में पुर्तगाल में सालाजार ने सेना की मदद से फासीवादी तानाशाही कायम की थी।
  • जर्मनी और इटली की फासीवादी सरकारों से वह हमदर्दी रखता था और ब्रिटेन से मैत्रीपूर्ण सम्बंध रखते हुए उसने स्पेन में गणतंत्रवादियों को उखाड़ने में योगदान किया।
  • स्वयं को गणतंत्र घोषित करने के बाद स्पेन को अनेक गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वहाँ फेलंजे नामक एक फासीवादी आंदोलन जोर पकड़ने लगा। इस आंदोलन को कैथोलिक चर्च का समर्थन प्राप्त था। स्पेनी फासीवादियों ने राजनीतिक हत्याएँ कीं और सेना में अपने कई समर्थक तैयार कर लिए।
  • 1936 ई. में स्पेन में चुनाव हुए। फासीवाद के खतरे का सामना करने के लिए एक जनमोर्चा खड़ा किया गया।
  • जनमोर्चा चुनावों में विजयी हुआ। इस मोर्चे में सभी समाजवादी दल, साम्यवादी दल, अराजकतावादी (एनार्किस्ट) तथा वामपंथी गणतंत्रवादी शामिल थे।
  • जनमोर्चा सरकार ने हजारों राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया और महत्वपूर्ण आर्थिक तथा राजनीतिक कदम उठाए।
  • स्पेनी फासीवादी फेलंजे सेना के जनरलों के साथ जा मिले और स्पेन में विनाशकारी गृह-युद्ध आरंभ हो गया।

जर्मनी में नाजीवाद की विजय

  • इस काल की सबसे गंभीर घटना जर्मनी में फासीवाद की विजय थी। फासीवाद का जर्मन रूप नाजीवाद सबसे अधिक बर्बरतापूर्ण था।
    🔺इटली के फासीवाद की तरह जर्मनी का नाजीवाद भी राजनीतिक लोकतंत्र तथा नागरिक स्वतंत्रता को तिरस्कृत दृष्टि से देखता था और युद्ध की महिमा का गुणगान करता था।
  • जिस प्रकार इटली के फासीवादी रोमन साम्राज्य के वैभव के पुनः प्रतिष्ठित करने का नारा लगाते थे, उसी प्रकार जर्मनी के नाजीवादी प्राचीन ट्यूटोनी साम्राज्य की महानता को फिर से वापस लाना चाहते थे।
  • नाजियों ने गैर-यहूदी जर्मनों में सामी (सेमिटिक) जाति यानी यहूदियों के प्रति विरोध की भावना को उभारा। उनका मानना था कि प्रथम विश्व युद्ध में जर्मनी की हार के लिए यहूदी जिम्मेदार थे।
  • उन्होंने जर्मन जाति की शुद्धता और सुनहली आर्य नस्ल का ढिंढोरा पीटा। उनका ध्येय जर्मन नस्ल के सभी लोगों को एक राज्य में संगठित करने का था जिससे महान जर्मनी का निर्माण किया जा सके।
  • उन्होंने अपने लोगों के भरण-पोषण के लिए भूमि और प्रदेशों का दावा किया। उनका कहना था कि अतिरिक्त जर्मन आबादी को बसाने के लिए अधिक भूमि और प्रदेश आवश्यक हैं।
  • नाजियों ने जर्मन लोगों के युद्ध में पराजित होने के अपमान को आधार बना कर स्वयं के हितों की व उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयोग किया।
  • उन्होंने लोगों को थोपी गई शांति की उन अन्यायपूर्ण धाराओं की याद दिलाई जिनके तहत जर्मनी को युद्ध-अपराध स्वीकार करने और क्षतिपूर्ति पर राजी होना पड़ा था। उन्होंने लोगों को इस सबका मार्जन करके राष्ट्रीय स्वाभिमान वापस दिलाने का सब्जबाग दिखाया।
  • इन विचारों को सेना से भी काफी समर्थन मिला, जिसके ज्यादातर अफसर जमींदार वर्ग के थे। ये लोग अपनी हार का बदला लेना चाहते थे।
  • सबसे मुख्य बात यह हुई कि उन्हें जर्मन उद्योगपतियों का पूरा समर्थन मिला, क्योंकि समाजवादी तथा साम्यवारी दलों के प्रबल होने से ये लोग चितित हो उठे थे।
  • इटालवी फासीवादियों की तरह नाजियों में भी सशस्त्र स्वयंसेवक तैयार किए जिनमें एस ए कहा जाता था। इनको साधारणतया भूरी शर्टधारी कहा जाता था।
  • ये लोग दिनों-दिन बढ़ते पैमाने पर फासीवाद विरोधियों तथा यहूदियों की पिटाई और हत्या करने लगे, उनकी संपत्ति नष्ट करने लगे तथा उन्हें तरह-तरह से सार्वजनिक रूप से अपमानित करने लगे।
  • 1930 ई. तक भूरी शर्टधारियों की संख्या लगभग एक लाख पर पहुँच गई। उनके और साम्यवादियों के बीच अक्सर झड़पें हो जाती थीं। लेकिन नाजियों को बढ़‌ती नृशंसता को रोकने के लिए सरकार ने कुछ नहीं किया।
  • फिर भी 1929 ई. के आर्थिक संकट के पूर्व तक नाजियों का जन समर्थन सीमित था। 1928 के चुनावों में उन्होंने राइक्सटाग में केवल बारह सीटें जीती थी।
  • उन्हें समाजवादी लोकतंत्रवादियों के 90 लाख और साम्यवादी पार्टी के 30 लाख वोटों के मुकाबले सिर्फ 8 लाख के आस-पास वोट मिले थे।
  • 1930 ई. के चुनावों में उनको प्राप्त मतों की संख्या 65 लाख पर पहुँच गई थी।
  • अप्रैल 1932 में राष्ट्रपति-पद के चुनाव में पॉल फॉन हिण्डेनबर्ग, जिसने प्रथम विश्व युद्ध में जर्मन सेना का नेतृत्व किया था और अब अस्सी की उम्र पार कर चुका था, एक करोड़ पच्चासी लाख मत प्राप्त करके विजयी हुआ। इस चुनाव में हिटलर को एक करोड़ दस लाख वोट मिले थे।
  • जुलाई 1932 में राइ‌क्सटाग के लिए जो चुनाव हुए, उसमें नाजी पार्टी सबसे बड़े एकल दल के रूप में उभरी।
  • 30 जनवरी 1933 को हिण्डेनबर्ग ने हिटलर को जर्मनी का चांसलर (प्रधानमंत्री) नियुक्त किया।
  • हिटलर ने हिंडनबर्ग की राइक्सटाग को भंग करके 5 मार्च, 1933 को उसे नए चुनाव कराने के लिए मना लिया।
  • चुनाव के 5 दिन पहले 27 फरवरी, 1933 को राइक्सटाग को इमारत में आग लगा दी गई। आनन फानन में हजारों लोग गिरफ्तार कर लिए गए जिनमें जॉर्जी दिमित्रोव भी शामिल था।
  • दिमित्रोव बुल्गारिया के साम्यवादी दल का नेता था और उन दिनों जर्मनी में ही था।
  • कुछ महीनों के अंदर हिटलर ने अपनी तानाशाही की जड़ें जमा लीं। उसने समाजवादी लोकतंत्रवादियों, साम्यवादियों, श्रमिक नेताओं तथा अन्य नाजी-विरोधियों को आतंकित करने और उनकी हत्या कराने का रास्ता अपनाया।
  • समाजवादी लोकतंत्रवादी दल साम्यवादी दल पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया।
  • 1934 ई. में हिटलर जर्मनी का राष्ट्रपति बन बैठा। सत्तारूढ़ होते ही हिटलर ने गोपनीय रूप से देश को पुनः हथियारबंद करना प्रारम्भ कर दिया।
  • अक्टूबर 1933 में जर्मनी राष्ट्र संघ से अलग हो गया। जर्मनी ने वायुसेना का गठन आरंभ कर दिया, जबकि वर्साय की संधि में इस पर स्पष्ट पाबंदी लगा दी गई थी।
  • मार्च 1935 में हिटलर ने घोषणा की कि वर्साय की संधि ने जर्मन सैनिक शक्ति पर जो प्रतिबंध लगाए थे, उनसे अब जर्मनी बॅंधा हुआ नहीं है।
  • उसने थलसेना तथा वायुसेना के पुनर्गठन के साथ ही एक नौसेना का निर्माण भी आरंभ कर दिया। जुलाई 1936 में विसैन्यीकृत राइनलैंड पर जर्मन सेना का प्रभुत्व स्थापित हो गया।
  • वर्साय की संधि की शर्तों का पूर्ण उल्लंघन करने वाले इन कदमों का किसी भी पश्चिमी ताकत ने कोई विरोध नहीं किया।

राष्ट्रसंघ (यूरोपीय परिदृश्य)

  • राष्ट्रसंघ की स्थापना के समय 44 सदस्य थे। रूस और जर्मनी, जिन्हें कि इरादतन बाहर रखा गया था, इसमें शामिल नहीं थे।
  • यूरोप के बहुत से देश, लैटिन अमेरिका के अधिकांश देश, एशिया से ईरान, जापान, चीन, थाईलैंड और भारत (जो कि अब तक एक उपनिवेश था), आफ्रीका से दक्षिण अफ्रीकी संघ, इथियोपिया और लाइबेरिया उभा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड इसके सदस्य थे।
  • राष्ट्र संघ की एक महासभा एक परिषद् तथा एक सचिवालय था। महासभा में सभी देशों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था और प्रत्येक देश को एक मत देने का अधिकार था।
  • आरंभ में परिषद् के 9 सदस्य थे, जिनमें से ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका ये 5 देश स्थायी सदस्य और शेष चार अस्थायी सदस्य थे।
  • 1926 ई. में जर्मनी को सम्मिलित किया गया तथा से 5वाँ स्थायी सदस्य बनाया गया।
  • जर्मनी को लोकार्नों (स्विट्‌जरलैंड) में 1925 ई. में आयोजित बैठक में दाखिला दिया गया था। बैठक में जर्मनी सहित 7 यूरोपीय देश शामिल हुए थे। लेकिन सोवियत संघ को बाहर रखा गया।
  • इस बैठक में एक समझौते पर भी हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत जर्मनी व फ्रांस और जर्मनी व बेल्जियम के मध्य को मौजूदा सीमाओं को स्थायी माना गया। 1928 ई. तक यूरोप के सभी देश राष्ट्रसंघ के सदस्य बन चुके थे।
  • सोवियत संघ को 1934 ई. में दाखिला दिया गया। तब तक जर्मनी और जापान संघ का त्याग कर चुके थे। संघ में युरोपीय देशों का, खास तौर से ब्रिटेन और फ्रांस का प्रभुत्व था।
  • जिस किसी विवाद से कोई बड़ी ताकत उलझी होती थी, उसमें अतिक्रमण को रोकने, सदस्य देशों की स्वतंत्रता तथा प्रादेशिक अखंडता की रक्षा करने और शांति की हिफाजत करने में सर्वथा असमर्थ सिद्ध हुआ।
  • जापान ने मंचूरिया पर अधिकार करके वहाँ मंचूकू नाम की एक कठपुतली सरकार स्थापित कर दी।
  • प्रथम विश्व युद्ध के बाद यह नग्न अतिक्रमण की पहली बड़ी कार्रवाई थी।
  • लीग ने मंचूकू सरकार को मान्यता देने से इन्कार कर दिया लेकिन जापान से उससे यह कहते नहीं बना कि वह 1931 ई.से पूर्व की व्यवस्था पुनः स्थापित कर दे और अपना अतिक्रमण वापस ले। कुछ साल बाद ही जापान ने चीन पर भारी हमले शुरू कर दिए।
  • अक्टूबर 1935 में इटली ने छह लाख की विशाल सेना लेकर इथियोपिया पर आक्रमण किया।
  • नवंबर में संघ ने इटली के खिलाफ सीमित आर्थिक प्रतिबंध की घोषणा की।
  • मई 1936 में इथियोपिया के प्रबल प्रतिरोध के बावजूद इटली ने संघ के इस सदस्य राज्य को अपने राज्य में मिला लिया। जुलाई 1936 में सीमित आर्थिक प्रतिबंध वापस ले लिए गए।
  • सोवियत संघ ऐसा एकमात्र देश था जिसने अतिक्रमण को रोकने के लिए शक्ति-प्रयोग और ब्रिटेन तथा फ्रांस के साथ फासीवाद-विरोधी मोर्चा कायम करने की हिमायत की।

🔺अक्टूबर 1936 में इटली और जर्मनी ने एक राजनीतिक सहयोग पर समझौता किया। यह समझौता रोम-बर्लिन धुरी (रोम-बर्लिन ऐक्सिस) के नाम से प्रसिद्ध है।

  • नवंबर 1936 में जर्मनी और जापान के बीच एक कोमिंटर्न-विरोधी समझौता हुआ था। 1937 ई. में इटली राष्ट्रसंघ से बाहर आ गया।

स्पेन का गृह-युद्ध

  • इटली और जर्मनी के संयुक्त अतिक्रमण का यूरोप में पहला शिकार स्पेन हुआ। जुलाई 1936 में फासीवादियों ने देश के अंदर स्पेनी उपनिवेशों में सैनिक विद्रोह करवा दिए।
  • विद्रोहियों का प्रमुख नेता जनरल फ्रैंकों था। वह स्पेन के मोरक्को स्थित उपनिवेश से अपनी सेना को लेकर विद्रोहियों का साथ देने स्पेन पहुँच गया। तीन साल तक भीषण गृह-युद्ध निरंतर चलता रहा।
  • इस बीच गणतंत्र विरोधी फासीवादी शक्तियों और उनके सहयोगियों ने, जो स्वय को राष्ट्रवादी कहते थे, गणतांत्रिक सरकार को अपदस्थ करने के लिए इटली और जर्मनी की सहायता प्राप्त कर ली थी।
  • स्पेनी गृह-युद्ध ने यूरोप के दो फासीवादी देशों को एक साथ जोड़ दिया। उन्होंने स्पेनी फासीवादियों की सहायता से भारी मात्रा में शस्त्र, गोला-बारूद और विमान स्पेन में झोंक दिए और अपनी फौजें भी वहाँ उतार दीं।
  • विद्रोहियों ने विदेशी सहायता से देश के कई हिस्सों पर अधिकार कर लिया और उन सभी लोगों के खिलाफ, जिन पर किसानों तथा गणतंत्रवादियों का समर्थन करने का संदेह था, आतंक का नग्न-नृत्य मचा दिया। ऐसे नाजुक समय में इंग्लैंड, फ्रांस और संयुक्त राज्य अमेरिका अहस्तक्षेप की नीति पर कायम रहे।
  • इस नीति का मतलब यह था कि गणतंत्रवादियों को कोई मदद नहीं मिल सकती थी और उधर फ्रैंको को जर्मनी तथा इटली की सैनिक सहायता निर्वाध मिलती रही।
  • गणतंत्रवादियों के समर्थन में आगे आने वाला एकमात्र देश सोवियत संघ था। गणतंत्रवादियों ने नागरिकों की सहायता से अपनी प्रतिरक्षा का संगठन किया।
  • नवंबर 1936 में उन्होंने राजधानी मैड्रिड की रक्षा अपनी जान की बाजी लगाकर की और फ्रैंको की सेना को उस पर अधिकार नहीं करने दिया। स्पेनी गृह-युद्ध ने दुनिया की अंतरात्मा को झकझोर दिया।
  • 50 से ज्यादा देशों के फासीवाद विरोधी लोगों ने स्पेनी गणतंत्र की रक्षा के निमित्त लड़ने के लिए अपने नाम स्वंयसेवकों के रूप में दर्ज कराए। 40,000 स्वयंसेवकों की एक अंतर्राष्ट्रीय ब्रिगेड तैयार कर ली गई।
  • स्पेन में लड़ते हुए उनमें से हजारों लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इनमें जर्मन और इटालवी फासीवाद विरोधी लोग भी शामिल थे।
  • जर्मन स्वयंसेवकों की बटालियन का नाम थालमान बटालियन रखा गया। थालमान जर्मन साम्यवादी नेता था, जिसे नाजियों ने यातना शिविर में भेज दिया था और बाद में मार डाला था।
  • स्पेन के गृह-युद्ध को मात्र एक स्पेनी मामले के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि उसे फासीवाद तथा आक्रामक प्रवृत्तियों के खतरे से ग्रस्त सम्पूर्ण विश्व का मामला माना गया।

🔺स्पेनी गणतंत्रवादियों को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की सहानुभूति का आश्वासन देने जवाहर लाल नेहरू स्पेन गए थे।

  • विश्व के विभिन्न भागों के बहुत से लेखक, कवि और कलाकार स्पेनी गृहयुद्ध में लड़े और उन्होंने विश्व लोकमत को गणतंत्र के समर्थन में लामबंद किया।
  • 20वीं सदी के सबसे बड़े चित्रकार पिकासो का गुयेरनिका का चित्र बहुत महत्वपूर्ण कलाकृति माना जाता है।
  • गुयेरनिका स्पेन का एक शहर था, जिसे फासीवादियों के विमानों ने बमबारी करके नष्ट कर दिया था। फरवरी 1939 ई. तक स्पेन का अधिकतर भाग फासीवादियों के हाथों में आ चुका था।
  • ब्रिटेन तथा फ्रांस ने और कुछ समय बाद संयुक्त राज्य ने भी फ्रैंको की सरकार को मान्यता दे दी।
  • मैड्रिड नगर मार्च के अंत तक प्रतिरोध करता रहा लेकिन इस नगर के पतन के साथ ही स्पेन पर फासीवादी सत्ता पूर्णरूप से स्थापित हो गई।

मुसोलिनी का उदय

  • मुसोलिनी में मिलान नगर में फासी दल की स्थापना की थी (मार्च 23, 1919)। इसके पश्चात् 1921-22 ई. के मध्य के काल में उसने आर्थिक संकट एवं कमजोर मंत्रिमंडल से लाभ उठाया।
  • 1921 के चुनाव में उसने भाग लिया और उसे 35 सीटें मिली। लेकिन इसके बावजूद विभिन्न कारणों से असंतुष्ट लोगों का सहयोग उसे मिलता रहा और वह साम्यवाद के विरुद्ध एक सशक्त मोर्चे की तरह प्रस्तुत हो गया।
  • बुर्जुआ वर्ग का पूरा समर्थन मिल रहा था। कम्युनिस्टों से भयभीत सरकार स्वयं चुपके-चुपके मदद करती थी। फासी दल को शाखाएं पूरे देश में खुल गयी और इस तरह फासी दल एक राष्ट्रीय शक्ति के रूप में उदित हुआ।
  • मुसोलिनी ने पार्टी को रोम चलो का नारा दिया। प्रधानमंत्री जिओलिति ने आपातकाल की घोषणा कर इससे सख्ती से निबटना चाहा।
  • मुसोलिनी की सफलता का प्रमुख कारण यह था कि पहले की तरह उदारवादी समाजवादी मुसोलिनी के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाते में असफल रहे थे।
  • इटली के सभी दल मुसोलिनी को एक मोहरे के रूप में एक-दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल करना चाहते थे।
  • लेकिन ये सभी दल मुसोलिनी के वास्तविक उद्देश्य और उसकी वास्तविक शक्ति से परिचित नहीं थे।

मुसोलिनी की गृह नीति

  • सरकार बनाने के पश्चात् मुसोलिनी ने पहले सरकार और देश का फासीवादी करण किया। सभी पार्टियों पर प्रतिबंध लगा दिए गए।
  • सभी समाजवादी व अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया और आवश्यक समझा गया तो उनकी हत्या करवा दी गई। संसदीय व्यवस्था पर पूर्ण नियंत्रण, कायम कर लिया गया। विश्वास, आज्ञा पालन और संघर्ष के नारों के साथ, फासिस्ट दल पूरे देश और तंत्र पर प्रभावी होता गया।

🔺विरोधियों के दमन के लिए ओवरा नामक गुप्तचर संस्था का गठन किया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य दल के विरोधियों को समाप्त करना था।

  • वर्ग संघर्ष के स्थान पर वर्ग सहयोग का नारा देकर ट्रेड यूनियन भंग कर दी गई और मजदूरों पर नियंत्रण कायम कर दिया गया। कृषि, उद्योग ऋण बीमा व्यवसाय तथा अन्य पेशों के क्षेत्र में राष्ट्रीय आयोग बना दिए गए। आर्थिक जीवन में सिण्डीकेट और कॉर्पोरेशन का एक नया प्रयोग शुरू हुआ जो योग्यता के नाम पर विशिष्टों को बढ़ावा देता है।
  • 1922 ई. में सभी फासिस्ट सिंडिकेटों को 5 कॉर्पोरेशन के अंदर संगठित किया गया। कुछ समय पश्चात् इनका संघ बना दिया गया। 1926 ई. में सिंडीकेट व्यवस्था को राष्ट्रव्यापी रूप दिया गया।
  • मुसोलिनी इटली के बहुसंख्यक कैथोलिक जनता की भावनाओं का दोहन करने के लिए रोम के तात्कालिक पोप पिअस-XI से एक समझौता कर लिया जिसके तहत मुसोलिनी ने वेटिकन सिटी को एक स्वंतत्र राज्य मान लिया और उसे समुचित मुआवजा भी दिया। बदले में पोप ने इटली को मान्यता प्रदान कर दी।

मुसोलिनी की विदेश नीति

  • देश की आन्तरिक समस्याओं से निजात पाने के पश्चात् उसने अपना ध्यान विदेश नीति की ओर केन्द्रित किया। पेरिस शांति सम्मेलन के निर्णयों से इटली के प्रादेशिक विस्तार की इच्छा पूर्ण नहीं हुई थी।
  • अतः मुसोलिनी के विदेश नीति के दो स्पष्ट उद्देश्य थे-अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में इटली को सम्मानित स्थान दिलाना एवं महान शक्तियों के समानांतर इटली को स्थापित करना।
  • 1920 के दशक में इटली में वृहत्त पैमाने पर अमेरिकी पूँजी का निवेश हुआ था, परंतु आर्थिक मंदी के फलस्वरूप अमेरिका द्वारा निवेश वापस लिया जा रहा था।
  • अफ्रीका में इरीट्रिया, सोमालीलैण्ड एवं लीबिया में इटाली के साम्राज्य पहले से स्थापित थे। 1935 ई. में मुसोलिनी ने अबीसीनिया पर आक्रमण कर दिया अतः राष्ट्र संघ ने उसे आक्रमण देश घोषित कर उस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया।
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