रसखान – जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

रीतिकालीन एवं सगुण काव्यधारा की कृष्ण-भक्तिशाखा के कवियों में रसखान हिन्दी साहित्य के आकाश में उदित होने वाले महान् एवं श्रेष्ठतम् कवि माने जाते है, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको रसखान जी के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “रसखान का जीवन परिचय” (Raskhan biography in Hindi) के बारे में बताया है। इसमें हमने रसखान का जीवन परिचय भाव पक्ष कला पक्ष अथवा साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली, काव्यगत विशेषताएं एवं हिंदी साहित्य में स्थान और रसखान जी का संबंध किस काव्यधारा से है को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है।

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इसके अलावा, इसमें हमने रसखान जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप भी खान जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

रसखान का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने खान जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
रसखान की जीवनी –

नामरसखान
असली नामसैयद इब्राहीम
जन्मसन् 1548 ई.
जन्म स्थानदिल्ली
मृत्युसन् 1628 ई.
मृत्यु स्थानब्रजभूमि
गुरुगोस्वामी विट्ठलनाथ
पैशाकवि, कृष्णा-भक्त, गायक
उपाधि‘रसखान’ संज्ञा की उपाधि
काल/अवधिरीतिकाल
भक्ति शाखाकृष्ण-भक्तिशाखा
भक्ति आन्दोलनसगुण भक्तिधारा
धर्मइस्लाम (मुस्लिम)
रसभक्ति, श्रृंगार
छंदकवित्त, सवैया, दोहा और सोरठा
भाषासरल एवं परिभार्जित ब्रजभाषा
शैलीमुक्तक छन्द शैली
प्रमुख रचनाएंसुजान रसखान, प्रेमवाटिका, बाल लीला, अष्टयाम।
साहित्य में योगदानकृष्ण भक्ति का काव्य में अत्यन्त मार्मिक चित्रण करके रसखान का स्थान भक्त कवियों में विशेष महत्वपूर्ण है।
रसखान की जीवनी

प्रस्तावना— सगुण काव्यधारा की कृष्ण-भक्ति शाखा के कवि रसखान हिन्दी साहित्य के आकाश में उदित होने वाले प्रभा-पुंज में से एक अद्भुत आभा से युक्त प्रकाश स्तम्भ हैं, जो मुसलमान होते हुए भी भगवान कृष्ण के प्रति अलौकिक भक्ति-भाव रखते हैं।

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रसखान का जीवन परिचय

जीवन-परिचय— हिंदी साहित्य के कृष्ण-भक्तिशाखा के कवि रसखान का पूरा नाम सैयद इब्राहिम था। इनका जन्म सन् 1548 ईस्वी के आस-पास मुगल राजवंश से संबंधित एक प्रतिष्ठित पठान परिवार में दिल्ली में हुआ था। मूलतः मुसलमान होते हुए भी ये जीवन-भर कृष्ण की भक्ति में डूबे रहे। इनकी भगवद्भक्ति को देखकर गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया। ये बचपन से ही प्रेमी स्वभाव के थे। बड़े होकर वही प्रेमी मुसलमान स्वभाव ईश्वरीय प्रेम में बदल गया। कहते हैं कि इन्हें श्रीनाथ जी के मन्दिर में कृष्ण के साक्षात् दर्शन हुए, तभी से ये ब्रजभूमि में रहने लगे। और फिर आजीवन भर वहीं रहे। यहाँ रहकर इन्होंने भाव-विभोर होकर कृष्ण का गुणगान किया।

रसखान
रसखान का जीवन परिचय

रसखान को ‘दो सौ बाबन वैष्णवन की वार्ता’ में उच्चकोटि का वैष्णव कृष्ण भक्त स्वीकार किया गया है। इनकी कविता में इनका कृष्ण प्रेम सम्पूर्ण आवेग, तन्मयता और गहराई के साथ व्यक्त हुआ है। इनकी कामना थी कि ‘अगले जन्म में ब्रज में ही शरीर धारण करेंगे। सन् 1628 ईस्वी के आस-पास इनका शरीर मिट्टी में विलीन हो गया।

रसखान का साहित्यिक परिचय

साहित्यिक-विशेषताएँ— रसखान की काव्य-रचना का विषय है— कृष्ण भक्ति । ये कृष्ण से संबंधित प्रत्येक वस्तु पर मुग्ध हैं। कृष्ण का रूप सौंदर्य, वेशभूषा, मुरली और बाल-क्रीड़ाएँ इनकी अभिव्यक्ति का आधार हैं। इन्हें कृष्ण की जन्मभूमि, ब्रज का यमुनातट, वहाँ के वन-बाग, पशु-पक्षी, पर्वत, नदी आदि से अगाध प्रेम है। ये उसी व्यक्ति का जीवन सफल मानते हैं, जो कृष्ण की भक्ति में डूबा हो। कृष्ण के सिवाय इन्हें इस संसार में कुछ अच्छा नहीं लगता। इनका प्रेम अत्यंत पवित्र, निश्छल और अनुग्रह-प्रधान है। इनकी रचनाओं में इनकी भक्ति, भावुकता और तल्लीनता देखते ही बनती है ।

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रसखान की प्रमुख रचनाएँ

रचनाएँ एवं कृतियां— रसखान की दो काव्य रचनाएँ प्रसिद्ध हैं— सुजान रसखान और प्रेमवाटिका । ‘प्रेमवाटिका’ में प्रेमविषयक-दोहे हैं तथा ‘सुजान रसखान’ में कृष्ण प्रेम पर कवित्त और सवैये हैं ।

कुल मिलाकर, रसखान की कुल चार पुस्तकें हैं, ‘सुजान रसखान’, ‘प्रेमवाटिका’, ‘बाल लीला’, ‘अष्टयाम’ आदि। ‘सुजान रसखान’ की रचना कवित्त और सवैया छन्दों में हुई है तथा ‘प्रेमवाटिका’ की दोहा छन्द में ‘सुजान रसखान’ भक्ति और प्रेम-विषयक मुक्तक काव्य है तथा इसमें 139 भावपूर्ण छन्द हैं। ‘प्रेमवाटिका’ में 25 दोहों में प्रेम के स्वरूप का काव्यात्मक वर्णन है। अन्य कृष्ण भक्त कवियों की भाँति इन्होंने परम्परागत पद शैली का अनुसरण नहीं किया। इनकी मुक्तक छन्द-शैली की परम्परा रीतिकाल तक चलती रही।

रसखान की भाषा शैली

भाषा-शैली— रसखान अपनी सुमधुर, सरल और सरस ब्रज भाषा के लिए प्रसिद्ध हैं। इनकी भाषा में कहीं शब्दों का आडम्बर नहीं, कहीं अलंकारों की भरमार नहीं। इनके शब्दों में झरने-सा-मधुर प्रवाह है। मुहावरों के प्रयोग ने इनकी वाणी को मधुर बना दिया है। रसखान जी के काव्य जैसी सहजता और प्रवाह और कहीं मिलना दुर्लभ है। दोहा, कवित्त और सवैया – तीनों छंदों पर इनका पूरा अधिकार है। वास्तव में रसखान रस की खान हैं।

रसखान की काव्यगत विशेषताएँ

काव्यगत-विशेषताएँ— रसखान के काव्य के भाव पक्ष व कला पक्ष की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

भाव पक्ष— रसखान के आराध्य कृष्ण थे। कृष्ण के साथ ही कृष्ण की लीलाभूमि ब्रज प्रदेश से इन्हें गहरा अनुराग है इसीलिए कहते हैं-

“मानुष हौं तो वही रसखानि।
बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन॥”

सौन्दर्य के उपासक-रसखान श्रीकृष्ण के रूप-सौन्दर्य और उनकी विहार-भूमि ब्रज की छटा पर समान रूप से मुग्ध थे। रसखान का प्रेम विशुद्ध प्रेम है। इनका विश्वास है कि कृष्ण प्रेम के अतिरिक्त कोई दूसरी साधना करना मूर्खता है—

“सोई है गंवार जिन कीन्हों नहीं प्यार।
नहीं सेयो दरबार यदि नन्द के कुमार को।।”

रसखान सच्चे अर्थों में रस की खान हैं। रस की सरस धारा इनके काव्य में प्रवाहित हुई है। वात्सल्य और श्रृंगार इनके प्रिय रस हैं।

कला पक्ष— रसखान की काव्य भाषा मधुर ब्रज भाषा है। इन्होंने हृदय की मधुर अनुभूतियों में प्रेम और भक्ति के जो मनोरम रंग भरे हैं, वे चित्ताकर्षक हैं। मुहावरों के प्रयोग से भाषा में सुन्दरता आ गयी है। इनकी मुक्तक छन्द शैली की परम्परा रीतिकाल तक चलती रही। इनकी वर्णन शैली में चित्रोपमता का गुण विद्यमान है। रसखान ने उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का बड़ा स्वाभाविक प्रयोग किया है। यमक और अनुप्रास अलंकारों का प्रयोग अधिक मिलता है। रसखान की छन्द योजना बहुत सुन्दर और विषय के अनुरूप है। इन्होंने कवित्त, सवैया, दोहा, सोरठा आदि छन्दों का प्रयोग किया है।

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रसखान का साहित्य में स्थान

साहित्य में योगदान— रसखान का स्थान भक्त कवियों में विशेष महत्त्वपूर्ण है। इनके काव्य में भावनाओं की तीव्रता, गहनता और आवेशपूर्ण तन्मयता को देखकर ही तो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने कहा था-

“इन मुसलमान हरि जनन पै।
कोटिन हिन्दुन वारिये॥”

FAQs. रसखान जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. रसखान का जीवन परिचय कैसे लिखें?

जीवन-परिचय— हिंदी साहित्य और ब्रजभाषा प्रेमी कृष्णभक्त मुसलमान कवियों में रसखान अग्रगण्य है। विद्वानों द्वारा इनका मूल नाम सैयद इब्राहीम माना जाता है। इनका जन्म सन् 1548 ईस्वी में दिल्ली में हुआ माना जाता है। इनका जीवन व्रत अभी भी अंधकार में है अर्थात् विद्वानों के बीच इनके जन्म के संबंध में अभी भी मतभेद हैं। इनके द्वारा रचित ग्रंथ ‘प्रेम-वाटिका’ से प्राप्त संकेत के आधार पर इनका संबंध दिल्ली राजवंश से माना जाता है। रसखान रात-दिन श्रीकृष्ण भक्ति में तल्लीन रहते थे। इन्होंने गोवर्धन धाम अर्थात् गोकुल में जाकर अपना जीवन श्रीकृष्ण के भजन-कीर्तन में लगा दिया। ऐसा कहा जाता है कि इनकी कृष्णभक्ति से प्रभावित होकर गोस्वामी विट्ठलनाथ जी ने इन्हें अपना शिष्य बना लिया। इन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से बल्लभ संप्रदाय के अंतर्गत पुष्टिमार्ग दीक्षा ली। इन्हें वैष्णव धर्म में दीक्षा लेने पर इनका लौकिक प्रेम अलौकिक प्रेम में बदल गया और रसखान श्रीकृष्ण के अनन्य भक्त बन गए। ऐसी मान्यता है कि “प्रेमवाटिका” (सन् 1614 ईस्वी) इनकी अंतिम काव्य कृति है। संभवतः इस रचना के कुछ वर्ष बाद सन् 1628 ईस्वी में इनकी मृत्यु हो गई थी।

2. रसखान की प्रमुख रचना कौन सी है?

रसखान की दो काव्य रचनाएँ प्रसिद्ध हैं— सुजान रसखान और प्रेमवाटिका। ‘प्रेमवाटिका’ में प्रेमविषयक-दोहे हैं तथा ‘सुजान रसखान’ में कृष्ण प्रेम पर कवित्त और सवैये हैं।

3. रसखान का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

रसखान का जन्म सन् 1548 ईस्वी को मुगल राजवंश से संबंधित एक प्रतिष्ठित पठान परिवार में दिल्ली में हुआ था।

4. रसखान के गुरु कौन थे?

गोस्वामी विट्ठलदास रसखान के गुरु थे।

5. रसखान का धर्म क्या था?

रसखान इस्लाम (मुस्लिम) धर्म से थे।

6. रसखान का दूसरा नाम क्या था?

रसखान का असली नाम सैयद इब्राहिम था।

7. रसखान किसकी भक्ति करते थे?

रसखान मुसलमान होते हुए भी ये कृष्ण की भक्ति में डूबे रहते थे।

8. रसखान की मृत्यु कहाँ हुई?

रसखान की मृत्यु ब्रजभूमि में सन् 1628 ईस्वी को हुई थी।

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