रामधारी सिंह दिनकर – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

रामधारी सिंह दिनकर (Ramdhari Singh Dinkar) भारत के एक प्रसिद्ध हिंदी कवि, लेखक, निबंधकार और शिक्षाविद् थे। इन्होंने 20वीं सदी के दौरान हिंदी साहित्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दिनकर जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार और पद्मभूषण सहित कई साहित्यिक पुरस्कार मिले, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको डॉ० रामधारी सिंह दिनकर जी के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय” (Ramdhari Singh Dinkar biography in Hindi) के बारे में बताया है। इसमें हमने रामधारी सिंह दिनकर का व्यक्तित्व एवं कृतित्व अथवा जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली, पुरस्कार एवं सम्मान, हिंदी साहित्य में स्थान और डॉ० रामधारी सिंह दिनकर का संबंध किस काव्यधारा से है को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है।
इसके अलावा, इसमें हमने श्री रामधारी सिंह दिनकर जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप भी ‘दिनकर’ जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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रामधारी सिंह दिनकर का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने दिनकर जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
रामधारी सिंह दिनकर की जीवनी –

नामरामधारी सिंह ‘दिनकर’
उपनामदिनकर
जन्म तिथि30 सितम्बर, 1908 ई. में
जन्म स्थानबिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक ग्राम में
मृत्यु तिथि24 अप्रैल, 1974 ई. में
मृत्यु स्थानमद्रास (चेन्नई), भारत
पिता का नामश्री रवि सिंह
माता का नामश्रीमती मनरूप देवी
पत्नी का नामश्रीमती श्यामवती देवी
संतानएक पुत्र
पैशालेखक, कवि, आलोचक, विचारक एवं निबन्धकार
शिक्षाबी० ए०, पटना विश्वविद्यालय
प्रसिद्धिराष्ट्रकवि के रूप में
साहित्य कालआधुनिक काल (छायावादोत्तर युग)
लेखन विधानिबंध, संस्कृति ग्रंथ, आलोचना, काव्य ग्रंथ
भाषाशुद्ध साहित्यिक, संस्कृतनिष्ठ, प्रांजल, प्रौढ़ तथा सुबोध खड़ीबोली
शैलीभावात्मक, समीक्षात्मक, सूक्ति-परक तथा विवेचनात्मक
प्रमुख रचनाएंरेणुका, रसवन्ती, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, कुरुक्षेत्र, उर्वशी, अर्द्धनारीश्वर, उजली आग, संस्कृति के चार अध्याय, मिट्टी की और, शुद्ध कविता की खोज आदि।
पुरस्कारसाहित्य अकादमी पुरस्कार (1959), पद्म भूषण (1959), ज्ञानपीठ पुरस्कार (1972), डी०-लिट्०।
हिन्दी साहित्य में स्थानइन्हें हिंदी साहित्य जगत में “राष्ट्रकवि” की ख्याति प्राप्त थी।
रामधारी सिंह दिनकर की जीवनी

डॉ० रामधारी सिंह दिनकर (30 सितम्बर, 1908 – 24 अप्रैल, 1974) हिंदी के महान् कवि, प्रसिद्ध विचारक, कुशल समीक्षक और सफल निबन्धकार के रूप में विख्यात हैं। अपने निबंधों और ग्रंथों के माध्यम से इन्होंने अपने भारतीय संस्कृति, दर्शन, साहित्य कला आदि का गंभीर विवेचन प्रस्तुत किया है।

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रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय

हिन्दी-साहित्य के दिनकर एवं राष्ट्रकवि श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 30 सितंबर, सन् 1908 ईस्वी (संवत् 1965 वि०) को बिहार राज्य के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक ग्राम में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रवि सिंह और माता का नाम श्रीमती मनरूप देवी था। इनकी 2 वर्ष की अवस्था में ही पिता का देहांत हो गया था, अतः बड़े भाई वसंत सिंह और माता की छत्रछाया में ही ये बड़े हुए। दिनकर जी की आरंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला में ही सम्पन्न हुई। अपने विद्यार्थी जीवन से ही इन्हें आर्थिक कष्ट झेलने पड़े। विद्यालय के लिए घर से पैदल 10 मील रोज आना-जाना इनकी विवशता थी। इन्होंने मैट्रिक (हाई स्कूल) की परीक्षा मोकामा घाट स्थित रेलवे हाई स्कूल से उत्तीर्ण की और हिंदी में सर्वाधिक अंक प्राप्त करके ‘भूदेव’ स्वर्ण पदक जीता। सन् 1932 ई. में पटना से इन्होंने बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की।

रामधारी सिंह दिनकर
रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय

ग्रामीण परंपराओं के कारण रामधारी सिंह दिनकर जी का विवाह किशोरावस्था में ही श्रीमती श्यामवती देवी के साथ हो गया था, इनसे इन्हें एक पुत्री भी प्राप्त हुआ। अपने पारिवारिक दायित्वों के प्रति दिनकर जी जीवन भर सचेत रहे और इसी कारण इन्हें कई प्रकार की नौकरी करनी पड़ी। सन् 1933 ई. में बी०ए० करने के बाद ये एक नए स्कूल में अध्यापक बने। सन् 1934 ई. में इस पद को छोड़कर ये सीतामढ़ी में सब-रजिस्टर बने। सन् 1950 ई. में बिहार सरकार ने इन्हें मुजफ्फरपुर के स्नातकोत्तर महाविद्यालय में हिन्दी-विभागाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया। सन् 1952 ई. से सन् 1963 ई. तक ये राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए। इन्हें केंद्रीय सरकार की हिन्दी समिति का परामर्शदाता भी बनाया गया। सन् 1964 ई. में ये भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इसके पश्चात भारत सरकार के गृह-विभाग में हिन्दी-सलाहकार के रूप में भी ये दीर्घकाल तक हिंदी के संवर्धन एवं प्रचार-प्रसार में लगे रहे।

रामधारी सिंह दिनकर जी को कवि के रूप में पर्याप्त सम्मान मिले। ‘पद्म-भूषण’ की उपाधि, ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘द्विवेदी पदक’, डी०-लिट्० की मानद उपाधि, राज्यसभा की सदस्यता आदि इनके कृतित्व की राष्ट्र द्वारा स्वीकृति के प्रमाण हैं। सन् 1972 ई. में इन्हें ‘उर्वशी’ (महाकाव्य) के लिए एक लाख रुपए का ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया था। तत्पश्चात् इनके जवान बेटे की मृत्यु ने इस ओजस्वी व्यक्तित्व को सहसा खंडित कर दिया और तिरुपति के देव विग्रह को अपनी व्याथा-कथा समर्पित करते हुए डॉ० रामधारी सिंह दिनकर जी 24 अप्रैल, सन् 1974 ईस्वी (संवत् 2031 वि०) को मद्रास (चेन्नई) में परलोक सिधार गए।

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रामधारी सिंह दिनकर का साहित्यिक परिचय

दिनकर जी ओजस्वी कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं तथा देश और विदेश में इनकी प्रसिद्धि का मुख्य आधार कविता रहा है। लेकिन गद्य-लेखन में भी ये आगे रह रहे तथा अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना करके हिन्दी-साहित्य की श्रीवृद्धि की। इसका ज्वलंत उदाहरण है- ‘संस्कृति के चार अध्याय’ जो साहित्य अकादमी से पुरस्कृत है। दिनकर जी की सबसे प्रमुख विशेषता उनकी परिवर्तनकारी सोच रही है। इनकी कविता का उद्भव छायावादी युग में हुआ और वह प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नई कविता आदि के युगो से होकर गुजरी। इस दीर्घकाल में जो आरंभ से अंत तक इनके काव्य में रही, वह है इनका राष्ट्रीय स्वर।

रामधारी सिंह दिनकर जी राष्ट्रीय भावनाओं के ओजस्वी गायक रहे हैं। इन्होंने देशानुराग की भावना से ओत-प्रोत पीड़ितों के प्रति सहानुभूति की भावना से परिपूर्ण तथा क्रान्ति की भावना जगाने वाली रचनाएं लिखी है। ये लोक के प्रति निष्ठावान, समाजिक दायित्व के प्रति सजग तथा जनसाधारण के प्रति समर्पित कवि रहे हैं। सन् 1959 ई. में भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने इन्हें पद्म-भूषण की उपाधि से अलंकृत किया। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक कृति पर इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया और सन् 1972 ई. में काव्य रचना ‘उर्वशी’ के लिए इन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। प्रतिनिधि लेखक व कवि के रूप में इन्होंने अनेक विदेश-यात्राएं भी की हैं।

रामधारी सिंह दिनकर की प्रमुख रचनाएं

दिनकर जी ने गद्य और पद्य दोनों ही क्षेत्रों में उच्चकोटि की रचनाओं का सृजन किया है, इनकी प्रमुख कृतियों का वर्गीकरण कुछ इस प्रकार से है –
काव्य-संग्रह – ‘प्रणभंग’, ‘रेणुका’, ‘रसवन्ती’, ‘द्वन्द्वगीत’, ‘धूप-छाँह’, ‘हुंकार’, ‘बापू’, ‘एकायन’, ‘इतिहास के आँसू’, ‘परशुराम की प्रतीक्षा’, ‘रश्मिरथी’, ‘चक्रवाल’, ‘कविश्री’, ‘सीपी और शंख’, ‘स्मृति-तिलक’, ‘हारे को हरिनाम’, ‘नील कुसुम’, ‘नीम के पत्ते’, ‘सीपी और शंख’, ‘सामधेनी’, ‘धूप और धुआं’, ‘कुरुक्षेत्र’ तथा ‘उर्वशी’ आदि।
निबन्ध-संग्रह – ‘अर्द्धनारीश्वर’, ‘रेती के फूल’, ‘बट पीपल’, ‘उजली आग’, ‘विवाह की मुसीबतें’ आदि।
दार्शनिक और सांस्कृतिक निबन्ध – ‘धर्म’, ‘भारतीय संस्कृति की एकता’, ‘संस्कृति के चार अध्याय’ आदि।
आलोचना – ‘मिट्टी की ओर’, ‘शुद्ध कविता की खोज’, ‘काव्य की भूमिका’, ‘पंत, प्रसाद और मैथिलीशरण’ आदि।
यात्रा-वृत्तान्त – ‘देश – विदेश’, ‘मेरी यात्राएँ’ ।
महाकाव्य – ‘कुरुक्षेत्र’ तथा ‘उर्वशी’।
बाल-साहित्य – ‘धूप-छाॅंह’, ‘मिर्च का मजा’ और ‘सूरज का ब्याह’ आदि।
रेडियो-रूपक – ‘हे राम’ ।
दिनकर के संस्मरण – ‘शेष – निःशेष’ ।

रामधारी सिंह दिनकर कविताएं

दिनकर जी की रचनाएं एवं कृतियों का विवरण निम्नवत् है-

बारदोली-विजय संदेश (1928)सीपी और शंख (1957)संस्कृति के चार अध्याय (1956)
प्रणभंग (1929)नये सुभाषित (1957)उजली-आग (1956)
रेणुका (1935)लोकप्रिय कवि दिनकर (1960)देश-विदेश (1957)
हुंकार (1938)उर्वशी (1961)राष्ट्र भाषा और राष्ट्रीय एकता (1955)
रसवन्ती (1939)परशुराम की प्रतीक्षा (1963)काव्य की भूमिका (1958)
द्वंद्वगीत (1940)आत्मा की आँखें (1964)पन्त प्रसाद और मैथिलीशरण (1958)
कुरूक्षेत्र (1946)कोयला और कवित्व (1964)वेणुवन (1958)
धूप-छाँह (1947)मृत्ति-तिलक (1964)धर्म, नैतिकता और विज्ञान (1969)
सामधेनी (1947)दिनकर की सूक्तियाँ (1964)वट-पीपल (1961)
बापू (1947)हारे को हरिनाम (1970)लोकदेव नेहरू (1965)
इतिहास के आँसू (1951)संचियता (1973)शुद्ध कविता की खोज (1966)
धूप और धुआँ (1951)दिनकर के गीत (1973)साहित्य-मुखी (1968)
मिर्च का मजा (1951)रश्मिलोक (1974)राष्ट्रभाषा आंदोलन और गांधीजी (1968)
रश्मिरथी (1952)उर्वशी तथा अन्य शृंगारिक कविताएँ (1974)हे राम! (1968)
दिल्ली (1954)मिट्टी की ओर (1946)संस्मरण और श्रद्धांजलियाँ (1970)
नीम के पत्ते (1954)चित्तौड़ का साका (1948)भारतीय एकता (1971)
नील-कुसुम (1955)अर्द्धनारीश्वर (1952)मेरी यात्राएँ (1971)
सूरज का ब्याह (1955)रेती के फूल (1954)दिनकर की डायरी (1973)
चक्रवाल (1956)हमारी सांस्कृतिक एकता (1955)चेतना की शिला (1973)
कवि-श्री (1957)भारत की सांस्कृतिक कहानी (1955),
भारत एक है
विवाह की मुसीबतें (1973),
आधुनिक बोध (1973)

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रामधारी सिंह दिनकर की भाषा शैली

दिनकर जी की भाषा शुद्ध साहित्यिक, संस्कृतनिष्ठ, प्रांजल, प्रौढ़, सुबोध तथा परिमार्जित खड़ीबोली है। इन्होंने तद्भव और देशज शब्दों तथा मुहावरों और लोकोक्तियों का भी सहज स्वाभाविक प्रयोग किया है। इनकी शैलियों में विवेचनात्मक, समीक्षात्मक, भावात्मक, सूक्तिपरक शैली प्रमुख रूप से हैं।

गद्य-शैली– दिनकर जी की शैली के विविध रूप देखने को मिलते हैं-

(अ) विवेचनात्मक शैली- ‘दिनकर’ जी ने गम्भीर विषयों के विवेचन के लिए विवेचनात्मक शैली को अपनाया है। ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में यह शैली दर्शनीय है।
(ब) आलोचनात्मक शैली- आलोचनात्मक निबन्धों एवं समीक्षात्मक रचनाओं में दिनकर जी ने आलोचनात्मक शैली को अपनाया है। इस शैली के उदाहरण ‘मिट्टी की ओर’ तथा ‘शुद्ध कविता की खोज’ में मिलते हैं।
(स) भावात्मक शैली- कुछ भावपूर्ण विषयों को स्पष्ट करने में दिनकर जी ने भावात्मक शैली अपनायी है। इसमें काव्यात्मकता, सरसता, आलंकारिकता तथा भाषागत लालित्य दर्शनीय है।
(द) सूक्ति-परक शैली- कुछ स्थानों पर दिनकर जी ने सूक्ति-परक शैली भी अपनायी है। इसका एक उदाहरण देखें-‘ईर्ष्या की बड़ी बेटी का नाम निन्दा है।’

रामधारी सिंह दिनकर का हिंदी साहित्य में योगदान

साहित्य में स्थान– दिनकर जी का स्थान आधुनिक हिन्दी के शीर्षस्थ साहित्यकारों में है। छायावादोत्तर हिन्दी काव्यधारा के प्रमुख कवि, आलोचक, विचारक और निबन्धकार के रूप में हिन्दी-जगत् में दिनकर जी आदर के साथ स्मरण किये जाते रहेंगे।
रामधारी सिंह दिनकर जी की सबसे बड़ी विशेषता है, इनका समय के साथ निरन्तर गतिशील रहना। यह इनके क्रान्तिकारी व्यक्तित्व और ज्वलन्त प्रतिभा का परिचायक है। फलतः गुप्त जी के बाद ये ही राष्ट्रकवि पद के सच्चे अधिकारी बने और इन्हें ‘युग-चरण’, ‘राष्ट्रीय चेतना का वैतालिक’ और – ‘जन-जागरण का अग्रदूत’ जैसे विशेषणों से विभूषित किया गया। ये हिन्दी के गौरव हैं, जिन्हें पाकर सचमुच हिन्दी कविता धन्य हुई।

रामधारी सिंह दिनकर के पुरस्कार

  1. ‘संस्कृति के चार अध्याय’ नामक कृति के लिए इन्हें सन् 1959 ई. में “साहित्य अकादमी पुरस्कार” से सम्मानित किया गया।
  2. भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद द्वारा इन्हें सन् 1959 ई. में “पद्म-विभूषण” की उपाधि से सम्मानित किया गया।
  3. दिनकर जी को इनकी रचना ‘कुरुक्षेत्र’ के लिए “काशी नागरी प्रचारिणी सभा” से सम्मानित किया गया।
  4. भागलपुर विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलाधिपति और बिहार के राज्यपाल जाकिर हुसैन, जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने, ने इन्हें “डॉक्ट्रेट” (डी०-लिट्०) की मानद उपाधि से सम्मानित किया। तथा गुरू महाविद्यालय ने इन्हें “विद्या वाचस्पति” के लिये चुना।
  5. सन् 1968 ई. में राजस्थान विद्यापीठ ने इन्हें “साहित्य-चूड़ामणि” से सम्मानित किया।
  6. सन् 1972 ई. में काव्य रचना ‘उर्वशी’ के लिए इन्हें “ज्ञानपीठ पुरस्कार” से सम्मानित किया गया।
  7. सन् 1952 ई. में ये राज्यसभा के लिए चुने गये और लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य रहे।

रामधारी सिंह दिनकर की रचना ‘ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से’ पाठ का सारांश

‘ईर्ष्या, तू न गयी मेरे मन से’ पाठ ‘अर्द्धनारीश्वर’ से संकलित किया गया है। प्रस्तुत पाठ में लेखक ने ईर्ष्या की उत्पत्ति के कारण एवं उससे होनेवाली हानियों का सचित्र और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। ईर्ष्या से विमुक्ति के साधन भी प्रस्तुत किए गए हैं। दिनकर जी की भाषा पूर्णरूपेण व्यावहारिक एवं सजीव है। उनकी शैली में निरालापन है।

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FAQs. रामधारी सिंह दिनकर जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. रामधारी सिंह दिनकर का जन्म कब और कहां हुआ था?

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म 30 सितंबर, सन् 1908 ईस्वी को बिहार राज्य के मुंगेर जिले के सिमरिया नामक ग्राम में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था।

2. रामधारी सिंह दिनकर के माता पिता का नाम क्या था?

रामधारी सिंह दिनकर के पिता का नाम श्री रवि सिंह और माता का नाम श्रीमती मनरूप देवी था।

3. रामधारी सिंह दिनकर की पहली रचना क्या है?

रामधारी सिंह दिनकर जी का पहला काव्य-संग्रह ‘बारदोली-विजय संदेश’ जो सन् 1928 ई. में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद इन्होंने कई रचनाएं की इनकी कुछ प्रमुख रचनाएं ‘परशुराम की प्रतीक्षा’, ‘हुंकार’ और ‘उर्वशी’ हैं।

4. रामधारी सिंह दिनकर को क्या कहा जाता है?

रामधारी सिंह दिनकर को ‘राष्ट्रकवि’ के नाम से जाना जाता था। दिनकर जी के साहित्यिक जीवन की विशेषता यह थी कि वे राजनीति में शामिल होने के बावजूद सरकारी सेवा में रहते हुए स्वतंत्र रूप से साहित्य की रचना करते रहे। उनकी साहित्यिक चेतना उसी प्रकार राजनीति से विलग रही जिस प्रकार कमल जल में रहकर भी जल से पृथक रहता है।

5. दिनकर जी को कौन सा पुरस्कार दिया गया था?

रामधारी सिंह दिनकर को संस्‍कृति के चार अध्‍याय कृति पर साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार मिला। इसके अलावा इन्हें पद्मभूषण, डी०-लिट्० एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

6. रामधारी सिंह दिनकर का संबंध किस काव्यधारा से है?

रामधारी सिंह दिनकर जी छायावादोत्तर हिन्दी-काव्यधारा के प्रमुख कवि, आलोचक, विचारक और निबन्धकार के रूप में हिन्दी-जगत् में विशिष्ट स्थान के अधिकारी हैं।

7. रामधारी सिंह दिनकर की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी हैं?

रामधारी सिंह दिनकर की प्रमुख रचनाएं – रेणुका, रसवन्ती, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतीक्षा, कुरुक्षेत्र, उर्वशी, अर्द्धनारीश्वर, उजली आग, संस्कृति के चार अध्याय, मिट्टी की और, शुद्ध कविता की खोज आदि।

8. रामधारी सिंह दिनकर की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

रामधारी सिंह दिनकर की मृत्यु 24 अप्रैल, सन् 1974 ईस्वी को मद्रास (चेन्नई) में हुई थी।

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