राय कृष्णदास – जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “राय कृष्णदास का जीवन परिचय” (Rai Krishna Das biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने रायकृष्णदास का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, निबन्ध, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और राय कृष्णदास किस युग के लेखक हैं आदि को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने कृष्णदास जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

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राय कृष्णदास का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने कृष्णदास जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
राय कृष्णदास की जीवनी –

नामराय कृष्ण दास
उपनामनेही
जन्मसन् 1892 ईस्वी
जन्म स्थानकाशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश
मृत्युसन् 1980 ईस्वी
पिता का नामश्री राय प्रह्लाददास
साहित्य में पहचानचित्रकला, मूर्तिकला एवं पुरातत्त्व के रूप में।
पुरस्कारपद्म-भूषण (1980)
प्रमुख रचनाएंब्रजरज, साधना, छायापथ, अनाख्या, सुधांशु, आंखों की थाह आदि।

राय कृष्णदास का जीवन परिचय

हिन्दी गद्य-गीत के प्रवर्तक एवं महान् चित्रकार श्री राय कृष्णदास जी का जन्म काशी (उत्तर प्रदेश) के प्रसिद्ध राय परिवार में सन् 1892 ईस्वी में हुआ था। इनका परिवार कला, संस्कृति और साहित्य-प्रेम के लिए विख्यात रहा है। भारतेन्दु परिवार से सम्बन्धित होने के कारण राय साहब के पिता राय प्रह्लाददास में अटूट हिन्दी-प्रेम था।

राय कृष्णदास
राय कृष्णदास का जीवन परिचय

इस प्रकार राय कृष्णदास जी को हिन्दी प्रेम पैतृक दाय के रूप में प्राप्त हुआ है। राय साहब की स्कूली शिक्षा बहुत स्वल्प हुई, पर इनमें उत्कट ज्ञान-लिप्सा थी। इन्होंने स्वतंत्र रूप से हिन्दी, संस्कृत तथा अंग्रेजी आदि भाषाओं का अध्ययन किया और इनमें अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली। सन् 1980 ई० में भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से अलंकरण एवं सम्मानित किया और सन् 1980 ईस्वी में ही इनका निधन हो गया था।

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राय कृष्णदास का साहित्यिक परिचय

राय साहब की साहित्यिक रुचि के विकास में काशी का तत्कालीन वातावरण भी बहुत दूर तक प्रेरक रहा है। साहित्यिक गतिविधियों के कारण बहुत प्रारम्भ में ही इनकी घनिष्ठता जयशंकर प्रसाद, मैथिलीशरण गुप्त, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल आदि प्रमुख कवियों एवं आलोचकों से हो गयी। कुछ समय बाद ये काशी नागरी प्रचारिणी सभा के कार्यक्रमों में भी प्रमुख रूप से भाग लेने लगे। भारतीय कला आन्दोलन में भी राय साहब का अप्रतिम स्थान रहा है।

राय कृष्णदास जी ने ‘भारत कला भवन’ नामक एक विशाल संग्रहालय की स्थापना की, जो अब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का एक विभाग है। इस संग्रहालय की गणना संसार के प्रमुख संग्रहालयों में की जाती है। इन्होंने भारतीय कलाओं का प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत किया है। भारत की चित्रकला तथा भारतीय मूर्तिकला इनके प्रामाणिक ग्रन्थ हैं। प्राचीन भारतीय भूगोल एवं पौराणिक वंशावली पर इन्होंने विद्वत्तापूर्ण शोध निबंध प्रस्तुत किये हैं।

राय कृष्णदास की रचनाएँ

राय साहब ने परम्परागत ब्रजभाषा में कविताएँ लिखी हैं, जो ‘ब्रजरज’ में संगृहीत हैं। इनके ‘भावुक’ नामक खड़ीबोली काव्य-संग्रह पर छायावाद का स्पष्ट प्रभाव है। राय साहब हिन्दी साहित्य में अपने गद्य-गीतों के लिए प्रसिद्ध हैं। इनके गद्य-गीतों के संग्रह ‘साधना’ और ‘छायापथ’ के नाम से प्रकाशित हैं। ‘संलाप’ और ‘प्रवाल’ में इनके संवाद शैली के निबंध संगृहीत हैं। इनकी कहानियाँ ‘अनाख्या’, ‘सुधांशु’ और ‘आँखों की थाह’ नामक संग्रहों में संकलित हैं। इन्होंने खलील जिब्रान के ‘दि मैड मैन’ का ‘पगला’ नाम से हिन्दी में सुन्दर अनुवाद किया है।

राय कृष्णदास गद्य साहित्य के किस युग के लेखक हैं

कोमल भावनाओं को सजीव शब्द में प्रकट करना राय साहब की गद्य शैली की प्रमुख विशेषता है। इनकी गद्य-शैली भावात्मक, सांकेतिक और कवित्वपूर्ण है। इन्होंने हिन्दी गद्य को एक नया आयाम प्रदान करके अपनी मौलिकता का परिचय दिया है। हिन्दी में गद्य-गीत की विधा का प्रवर्तन राय साहब ही ने किया है। आधुनिक युग को गद्य का युग कहा जाता है, जिसकी विशेषता यह है कि गद्य ने अपनी शक्ति के द्वारा पद्य को भी आत्मसात् कर लिया है।

वास्तव में पद्म व गद्य को पूर्णतः पृथक् नहीं किया जा सकता। इसका प्रमाण हमें इनके गद्य-गीतों में मिलता है। इन गीतों में पद्य की तरह तुक तो नहीं है परन्तु लय और संगीत पूर्णतः विद्यमान है। शब्द चयन, वाक्य-विन्यास और अलंकारों के प्रयोग ने इन गद्य-गीतों को भव्यता प्रदान कर दी है। आत्मा और प्रकृति के सौन्दर्य का प्रकाश इन गद्य-गीतों में बिखरा हुआ दिखलायी पड़ता है। ये गीत सरल, सुगम और आकार में लघु हैं। काव्य की जटिलता से ये दूर हैं। इन्हें भले ही गाया न जा सके, पर गुनगुनाया जा सकता है।

राय कृष्णदास अपने गद्य-काव्य की मधुर एवं रमणीय शैली द्वारा पर्याप्त कीर्ति अर्जित कर चुके हैं। ‘साधना’ के निबंधों में जीवन और परमात्मा के बीच की क्रीड़ाओं के रेखांकन में राय साहब को अभूतपूर्व सफलता मिली है। इन निबंधों में मनमोहक ढंग से प्रिय और प्रिया की आँखमिचौनी के सजीव चित्र प्रस्तुत हुए हैं।

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राय कृष्णदास की भाषा शैली

राय साहब की भाषा-शैली कवित्वपूर्ण होते हुए भी सहज और सरल है। न तो उसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का आग्रह है और न ही बोलचाल के सामान्य शब्दों की उपेक्षा। इसी प्रकार इनके वाक्य विन्यास में भी कोई जटिलता नहीं है। कोमल भावनाओं को सजीव शब्दों में प्रकट कर देना राय साहब की गद्य-शैली की प्रमुख विशेषता है। इनकी गद्य- शैली भावात्मक, सांकेतिक और कवित्वपूर्ण है। इन्होंने संस्कृत शब्दों के साथ-साथ उर्दू के व्यावहारिक शब्दों का भी प्रयोग किया है। प्रान्तीय और ग्रामीण शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। अलंकरण का प्रयोग सहज रूप में हुआ है, किसी बनावट के साथ नहीं। मीरा के गीतों के समान भावुक हृदय की सहज अनुभूतियाँ इनके गीतों में प्रकट हुई हैं।

राय कृष्णदास का प्रमुख गद्य गीत

प्रस्तुत ‘आनन्द की खोज, पागल पथिक’ नामक गद्य-गीत में यह बताया गया है कि आनन्द का स्रोत अपने अन्दर ही विद्यमान है। प्रायः लोग आनन्द की खोज वस्तुजगत् में करते हैं। उनकी यह खोज पता नहीं कितने जन्मों से चल रही है। लेकिन एक पल के लिए भी मनुष्य यदि अपने भीतर निहार ले तो निश्चित रूप से उसे आनन्द के अक्षय स्रोत का पता लग जायेगा। मनुष्य अशेष सृष्टि के साथ ज्यों ही आत्मीय सम्बन्ध स्थापित कर लेता है, त्यों ही उसे अपने सही स्वरूप का बोध हो जाता है। इस संसार का प्रत्येक व्यक्ति एक भ्रांत पथिक है।

वह अशेष सुख और आनन्द की तलाश में है। उसकी तलाश निरंतर जारी है। लेकिन वह पूर्ण सुख और आनन्द की खोज के लिए जिस कल्पना लोक के स्वप्न रचता है, उस रचना का मुख्याधार यहीं वस्तुजगत् है। हम वस्तुजगत् के आधार पर ही कल्पना करते हैं। हमारी कल्पना समाज एवं बाह्य परिवेश से निरपेक्ष नहीं होती। अतः दूसरे लोक की कल्पना करते समय इस जगत् से कट जाना भ्रांति है। सच्चाई तो यह है कि इस जागृति के भीतर ही हमें पूर्ण सुख और आनन्द की प्राप्ति हो सकती है, लेकिन इसके लिए हमें अपने सही स्वरूप को जानने का प्रयास अवश्य करना पड़ेगा।

राय कृष्णदास जी का साहित्य में स्थान

हिंदी साहित्य में स्थान- राय कृष्णदास जी भारतीय चित्रकला के पारखी और साहित्य के साधक है। हिंदी साहित्य जगत् में विशेष रूप से गद्य-गीत के लेखक के रूप में प्रसिद्ध है। इन्हें गद्य-गीत विधा का प्रथम रचनाकार माना जाता है। भारतीय साहित्य में इन्हें हिंदी के प्रतिनिधि कहानिकारों में भी गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है।

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FAQs. राय कृष्णदास जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. राय कृष्ण दास कौन थे?

राय कृष्णदास हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक और भारतीय चित्रकला के अग्रणी थे। 1920 में, राय कृष्ण दास जी ने भारतीय ललित कला, शिल्प, वस्त्र, पुरातत्त्व और मुद्राशास्त्र को समर्पित एक संग्रहालय के रूप में बनारस में भारत कला भवन की स्थापना की। भारत कला भवन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय परिसर, वाराणसी में स्थित है।

2. राय कृष्णदास का जन्म कब और कहां हुआ था?

हिन्दी गद्यगीत के प्रवर्तक श्री राय कृष्णदास जी का जन्म 13 नवम्बर, सन् 1892 ईस्वी को वाराणसी (काशी), उत्तर प्रदेश में हुआ था।

3. राय कृष्णदास की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

राय कृष्णदास जी की मृत्यु 21 जुलाई, सन् 1980 ईस्वी को भारत में हुई थी।

4. राय कृष्णदास के माता पिता का नाम क्या था?

राय कृष्णदास जी के पिता का नाम श्री राय प्रह्लाददास तथा माता का नाम हमें ज्ञात नहीं है।

5. राय कृष्णदास को कौन सा पुरस्कार मिला था?

सन् 1980 ई० में भारत सरकार ने राय कृष्णदास जी को ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया था।

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