राष्ट्रीय आंदोलन (1923 ई.- 1939 ई.), NCERT सार संग्रह | National Movement in Hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको संक्षिप्त इतिहास NCERT सार संग्रह “महेश कुमार वर्णवाल” Book का अध्याय “राष्ट्रीय आंदोलन (1923 ई.- 1939 ई.)” (National Movement (1923-1939 AD) in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। इसमें हम आपको राष्ट्रीय आंदोलन को कितने चरणों में बांटा गया?, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन नोट्स PDF, कांग्रेस के द्वारा चलाए गए राष्ट्रीय आंदोलन को कितने चरणों में बांटा जाता है एवं भारत और भारतीय आंदोलन का इतिहास क्या है? को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

राष्ट्रीय आंदोलन, स्वराज पार्टी

  • असहयोग आंदोलन के समय कांग्रेस द्वारा विधानपरिषदों के बहिष्कार का निर्णय लिया गया था। परन्तु, इस विषय में कांग्रेस में दो मत थे।
  • चितरंजन दास तथा मोती लाल नेहरू के नेतृत्व में एक वर्ग का मत था कि, कांग्रेस को चुनावों में भाग लेना चाहिए।
  • वल्लभभाई पटेल, डॉ. अन्सारी और राजेंद्र प्रसाद के नेतृत्व वाला वर्ग इस प्रस्ताव का विरोधी था। ये लोग चाहते थे कि, कांग्रेस चुनावों में भाग न लेकर रचनात्मक कार्यों में लगी रहें।
  • 1922 ई. में कांग्रेस का अधिवेशन गया में सम्पन्न हुआ। जिसके अध्यक्ष चितरंजन दास थे। इस अधिवेशन ने परिषदों में न जाने के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
  • इस प्रस्ताव के समर्थकों ने 1923 ई. में अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में दिल्ली में आयोजित विशेष अधिवेशन में कांग्रेस ने स्वराजियों को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दी।
  • स्वराजियों ने केंद्रीय और प्रांतीय परिषदों में 101 सीटों में से 42 सीटों पर विजय प्राप्त की।
  • ब्रिटिश शासकों द्वारा प्रस्तुत उनकी नीतियों और प्रस्तावों के लिए परिषदों की सहमति प्राप्त करना लगभग असंभव बना दिया।
  • सरकार ने 1928 ई. में विधानपरिषद् में एक ऐसा विधेयक प्रस्तुत किया, जिसके अन्तर्गत वह भारत की आजादी के संघर्ष को समर्थन देने वाले किसी भी गैर-भारतीय को देश से निकाल सकती थी। परन्तु यह विधेयक पारित नहीं हुआ। सरकार ने पुनः इस विधेयक को (पब्लिक सेफ्टी बिल) पेश करने का प्रयास किया तो विधान परिषद् के अध्यक्ष विठ्ठलभाई पटेल ने इस विधेयक को पेश करने की अनुमति नहीं दी।
  • परिषदों में होने वाली चर्चा में भारतीय सदस्य अक्सर सरकार को पछाड़ देते थे और उसकी निंदा करते थे।
  • फरवरी, 1924 में गाँधीजी जेल से रिहा हुए और रचनात्मक कार्यक्रम को बढ़ावा दिया। जिसे कांग्रेस के दोनों गुटों ने स्वीकार किया था।
    🔺रचनात्मक कार्यक्रम के सबसे प्रमुख घटक थे- खादी का प्रचार, हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत बनाना और अस्पृश्यता को दूर करना।
  • किसी भी कांग्रेस कमेटी के सदस्य के लिए यह अनिवार्य हो गया कि यह हाथों से काते और बुने गए खादी का प्रयोग करे तथा प्रतिमाह 2,000 गज सूत काते।
  • गाँधीजी ने अखिल भारतीय खादी संगठन की स्थापना की तथा देश भर में खादी भंडार खोले गए।
  • गाँधीजी खादी को गरीबों की दरिद्रता से मुक्ति देने वाला और देश के आर्थिक उत्थान का साधन मानते थे।
  • इसने आजादी के संघर्ष के संदेश को देश के प्रत्येक हिस्से में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँचाने में योगदान दिया।
  • चरखा आजादी के आंदोलन का प्रतीक बन गया।

✴️ किसानों और मजदूरों का आदोलन -• आजादी के प्रथम वास्तविक जन-आंदोलन (असहयोग आंदोलन) में किसानों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

  • देश को विभिन्न भागों में किसान सभाएँ हुई और उन्होंने जमींदारों तथा ब्रिटिश अधिकारियों के दमन के विरुद्ध लड़ाईयां लड़ीं।
    🔺किसानों को संगठित करने वाले कुछ नेता- बाबा रामचंद्र, विजय सिंह पथिक, सहजानंह सरस्वती और एन. जी. रंगा थे।
  • अल्लुरी सीतारामराजू ने आंध्र के किसानों तथा आदिवासियों के विद्रोह का नेतृत्व किया।
  • किसान आंदोलन के दो पक्ष थे तथा दोनों का आजादी के राष्ट्रीय संघर्ष से सम्बंध था। एक पक्ष था किसानों का आजादी के संघर्ष में शामिल होना। जबकि, दूसरा पक्ष किसानों की शिकायतों से संबधित था। जैसे- जमींदारों, सरकार तथा महाजनों द्वारा किसानों का शोषण।

बारदोली सत्याग्रह (1928 ई.)

  • गुजरात में स्थित बारदोली के किसानों ने सरकार द्वारा बढ़ाये गये 30% कर के विरोध में बल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में सत्याग्रह किया।
  • बाद में बारदोली सत्याग्रह की सफलता के बाद 30% लगान बढ़ोत्तरी को गलत बताते हुए इसे घटाकर 6.03% कर दिया।
  • सरदार पटेल के नेतृत्व में बारदोली सत्याग्रह के सफल होने के बाद बारदोली की महिलाओं ने बल्लभ भाई पटेल को सरदार को उपाधि प्रदान की।
  • औद्योगिक मजदूर भारतीय समाज में एक नए वर्ग के रूप में उभरे थे। 1918 ई. में स्थापित मद्रास लेबर यूनियन आरंभिक दौर का एक प्रमुख मजदूर संगठन था।
  • बी. पी. वाडिया और थिरू वी. कल्याणसुंदरम् चक्कराई चेटि्टयार इसके प्रमुख नेता थे।
  • भारत में ट्रेड यूनियन (Trade Union) आंदोलन के अग्रणी नेता नारायण मल्हार जोशी थे। जिन्होंने मजदूरों के पहले अखिल भारतीय ऑल इंडिया ट्रेड युनियन काग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • इस संगठन की स्थापना बम्बई में 1920 ई. में हुई थी। इसके प्रथम अधिवेशन के अध्यक्ष लाला लाजपत राय थे। चितरंजन दास, जवाहरलाल नेहरू और सुभाष शचन्द्र बोस जैसे दिग्गज नेता ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के अध्यक्ष बने।
  • भारत के समाजवादी आंदोलन के नेताओं ने मजदूरों और किसानों को संगठित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • 11 अप्रैल, 1936 को प्रथम अखिल भारतीय किसानसभा का गठन लखनऊ में हुआ जिसके अध्यक्ष स्वामी सहजानंद सरस्वती को तथा महासचिव एन.जी, रंगा को बनाया गया।

समाजवादी विचारों का प्रसार

  • समाजवादी विचारों एवं उन पर आधारित आंदोलनों का लक्ष्य पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा निर्मित असमानताओं को समाप्त करना था।
  • समाजवादी आंदोलन अपने दृष्टिकोण में अंतर्राष्ट्रीयतावादी थे, अर्थात् वे सभी देशों के आम लोगों और मजदूरों को भाई-भाई मानते थे तथा एक देश द्वारा दूसरे पर शासन करने के विरोधी थे।
  • उन्होंने दुनिया के सभी भागों में सामाजिक व आर्थिक समानता स्थापित करने में प्रयत्नशील आंदोलनों और साम्राज्यवादी शासन से मुक्ति पाने के लिए किए जा रहे संघर्षों को समर्थन दिया।
  • रूसी क्रांति ने रूस के सम्राट (जार) के निरंकुश शासन को खत्म करके सोवियत संघ में समाजवाद के निर्माण का कार्य शुरू कर दिया था।
  • रूसी क्रांति ने घोषणा की कि, प्रत्येक देश को अपना लक्ष्य निर्धारित करने का अधिकार है। रूसी क्रांति ने आजादी के लिए संघर्ष कर रहे सभी लोगों को अपना समर्थन दिया।
  • भारत के बाहर रह रहे क्रांतिकारी मानवेंद्रनाथ राय ने कई देशों की कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा स्थापित कम्युनिस्ट इंटरनेशल में कई वर्षों तक सक्रिय रूप से भाग लिया।
  • समाजवादी विचारों और रूसी क्रांति से प्रभावित होकर भारत में समाजवादी विचारों का प्रचार करने के उद्देश्य से कई समाजवादी तथा कम्युनिस्ट संगठनों की स्थापना हुई।
  • इन संगठनों के अधिकांश नेताओं ने असहयोग आंदोलन में भाग लिया था। इन समूहों के कुछ नेता थे- श्रीपाद अमृत डांगे, एम. सिंगारवेलू, शौकत उस्मानी और मुजफ्फर अहमद।
  • इनमें से कुछ समूह एक-दूसरे के नजदीक आए और उन्होंने 1925 ई. में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की।
  • मजदूरों और किसानों को संगठित करने में कम्युनिस्टों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • समाजवादी विचारों और रूसी क्रांति का देश के युवाओं तथा राष्ट्रीय आंदोलन के युवा नेताओं पर गहरा प्रभाव पड़ा।
  • भारत में समाजवादी विचारों को लोकप्रिय बनाने वाले राष्ट्रीय आंदोलन के सबसे प्रमुख नेता जवाहरलाल नेहरू थे।
  • जवाहरलाल नेहरू के प्रभाव में 1934 ई. में कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना हुई। जिसने कांग्रेस के साथ जुड़कर काम किया।
  • इसने किसानों एवं मजदूरों को संगठित करने में तथा आजादी के संघर्ष के समाजिक व आर्थिक उद्देश्यों से सम्बंधित कांग्रेस की नीतियों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

क्रांतिकारी आदोलन

  • असहयोग आंदोलन को वापस लेने से जो निराशा फैली थी उससे 1920 के दशक में क्रांतिकारी गतिविधियाँ पुनः आरम्भ हुई।
  • शचीन्द्र नाथ सान्याल, योगेश चटर्जी, रामप्रसाद बिस्मिल, राजेन्द्र लाहिड़ी, चन्द्रशेखर आजाद आदि ने मिलकर सन् 1924 में कानपुर में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन नामक एक संगठन स्थापित किया, जिसका मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन को खत्म करने के लिए सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व करना था।

✴️ काकोरी कांड (9 अगस्त, 1925 ई.) -• एच.आर.ए. द्वारा 9 अगस्त, 1925 को उत्तर रेलवे के लखनऊ-सहारनपुर संभाग के काकोरी नामक स्थान पर 8 डाउन ट्रेन पर डकैती डालकर सरकारी खजाने को लूट लिया गया। यह घटना काकोरी काण्ड के नाम से प्रसिद्ध हुई।

  • इस सम्बंध में 29 क्रान्तिकारियों को गिरफ्तार कर उन पर काकोरी षड्‌यंत्र कांड के तहत् मुकदमा चलाया गया। 17 लोगों को लम्बी सजाएँ, 4 को आजीवन कारावास तथा 4 क्रांतिकारियों- राम प्रसाद बिस्मिल, रोशनलाल, अशफाक उल्ला खाँ तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को क्रमशः गोरखपुर, इलाहाबाद, फैजाबाद व गोण्डा में फाँसी दे दी गई।

✴️ हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (H.S.R.A) -• काकोरी काण्ड के पश्चात् हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (H.R.A.) का अस्तित्व समाप्त हो गया, अतः इस संगठन को पुनः संगठित करने के लिए चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में बैठक की।

  • बैठक में हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन (एच.आर.ए.) का नाम बदलकर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन (एच.एस.आर.ए.) कर दिया गया।
  • इस संगठन का उद्देश्य, भारत में एक समाजवादी गणतंत्रात्मक राज्य की स्थापना करना था।
  • इस संगठन के सक्रिय सदस्यों में भगवती चरण बोहरा, विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, भगत सिंह, जयदेव कपूर एवं सुखदेव आदि प्रमुख थे।

✴️ साण्डर्स की हत्या (17 दिसम्बर, 1928 ई.) -• हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का उद्देश्य, लाहौर के पुलिस अधीक्षक स्कॉट की हत्या करना था। जेम्स ए. स्कॉट ने 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में साइमन कमीशन विरोधी अभियान के दौरान लाला लाजपत राय पर लाठी चार्ज करवाकर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया था। 17 दिसम्बर, 1928 में लाहौर रेलवे स्टेशन पर भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद और राजगुरु ने स्कॉट के भ्रम में सहायक पुलिस अधीक्षक साण्डर्स की हत्या कर दी।

सेण्ट्रल लेजिस्लेटिव असेम्बली बमकांड

  • सबसे नाटकीय घटना 8 अप्रैल, 1929 में केन्द्रीय विधान सभा में घटित हुई। जब सभा में सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (Public Safety Bill) तथा व्यापार विवाद विधेयक (Trade Disputes Bill) पर बहस चल रही थी। तब भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधान सभा में दो बम और कुछ पर्चे फेंके, पर्चे में लिखा हुआ था- बहरों को सुनाने के लिए बगों की आवश्यकता है।
  • भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने भागने की कोशिश नहीं की। वे वहीं पर खड़े रहे और इन्कलाब जिंदाबाद के नारा लगाते रहे।
  • जेल में अपने साथ बुरा बर्ताव किए जाने के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू की। भूख हड़ताल के 64वें दिन एक क्रांतिकारी जतिन दास की मृत्यु हो गई।
  • मुकदमे के दौरान क्रांतिकारियों ने बड़े साहस का परिचय दिया और वे आख्यान पुरुष बन गए।

✴️ लाहौर षड्यंत्र मुकदमा (1929 ई.) -• भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त की गिरफ्तारी के कारण अनेक एच.एस.आर.ए. क्रांतिकारी गिरफ्तार किए गए और उन पर लाहौर षड्यंत्र कांड में संयुक्त रूप से मुकदमा चलाया गया।
🔺लाहौर षड्‌यंत्र कांड में अधिकांश क्रांतिकारियों को दोषी पाया गया। और उनमें से तीन क्रान्तिकारियों भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को 23 मार्च, 1931 ई. को फाँसी दे दी गई।

  • फाँसी के समाचार से भारतीय जनता को बड़ा आघात लगा। सम्पूर्ण देश में हड़तालें हुई, जूलूस निकाले गए और शोक-सभाएँ हुई।
  • चंद्रशेखर आजाद पुनः भाग निकालने में सफल हुए, किन्तु बाद में इलाहाबाद के आल्फ्रेड पार्क में पुलिस के साथ हुई एक मुठभेड़ में उन्होंने अपने आपको गोली मार ली।

✴️ चटगाँव आर्मरी रेड -• बंगाल के नए क्रांतिकारी संगठनों में सूर्यसेन द्वारा स्थापित इंडियन रिपब्लिकन एसोसिएशन (I.R.A.) का विशिष्ट स्थान था। सूर्यसेन ने असहयोग आन्दोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया था। आगे चलकर वह एक राष्ट्रीय स्कूल के शिक्षक बन गाए और इसलिए यह सामान्यतः मास्टर दा के नाम से प्रसिद्ध हुए।

  • पूर्वी बंगाल के चटगाँव नामक बन्दरगाह पर सूर्यसेन के नेतृत्व में वहाँ के युवक और युवतियों ने विद्रोह किया। सूर्यसेन ने इंडियन रिपब्लिकन एसोसिएशन (I.R.A.) की ओर से एक घोषणा पत्र जारी किया। जिसमें चटगांव, मेमन सिंह, बारीसाल के शस्त्रागारों पर एक ही समय में हमला करने की योजना बनाई थी।
  • इन क्रांतिकारियों ने पुलिस शस्त्रागार, सहायक टुकड़ी पर अधिकार करने, टेलीफोन एक्सचेंज और तारघरों को नष्ट करने के लिए चार जत्थे भेजे थे। 65 युवक और युवतियों ने ब्रिटेन की भारतीय सेना की वर्दी पहनकर पुलिस शस्त्रागार पर 18 अप्रैल, 1930 को हमला किया।
  • पंजाब में हरिकिशन ने पंजाब के गवर्नर की हत्या की कोशिश की। वंदेमातरम् और इंकलाब जिन्दाबाद के नारों के बीच तिरंगा फहराया गया और कार्यवाहक क्रांतिकारी सरकार के गठन की घोषणा की, जिसके राष्ट्रपति सूर्यसेन थे। यह घटना चटगांव आर्मरी रेड के नाम से जानी जाती है।
  • दिसंबर 1930 ई. में तीन जवानों विनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश करके कारागार महानिरीक्षक की हत्या कर दी।
  • आर्मरी रेड मुकदमें के फलस्वरूप कई क्रान्तिकारियों को अंडमान में आजीवन कारावास की सजा दी गई।
    🔺इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली दो तरूण लड़कियों प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्त थीं। अंग्रेजों के हाथ न पड़े इसलिए प्रीतिलता ने जहर खा लिया एवं कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा दी गई।
  • 1920 के दशक के आरंभ में कांतिकारी गतिविधियाँ पुनः शुरू हुईं, जो अगले कुछ वर्षों तक देश के विभिन्न भागों में जारी रहीं। इस बीच क्रांतिकारी यह अनुभव करने लगे कि हिंसात्मक घटनाओं से कोई दीर्घकालीन लाभ नहीं होगा। समय के साथ अधिकांश क्रांतिकारी समाजवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हुए।
  • भगत सिंह और उनके मित्रों ने देश में समाजवादी क्रांति लाने के लिए किसानों और मजदूरों को संगठित करने पर जोर दिया।
  • राष्ट्रीय आंदोलन के अधिकांश नेता क्रांतिकारियों के तरीकों के विरोधी थे तथा अधिकांश लोगों ने संघर्ष का अहिंसात्मक तरीका अपनाया।
  • जब जन संघर्ष शिथिल पड़ गया था, तब क्रांतिकारियों की गतिविधियों ने देश में लड़ाकू वातावरण पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

✴️ नये नेताओं का उदय -• 20वीं सदी के तीसरे दशक में युवा नेताओं के एक नाए समूह का उदय हुआ, जिसने राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण की भूमिका अदा की। इन तरुण नेताओं ने जनता को संगठित करने पर जोर दिया। उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के उद्देश्यों को स्पष्ट करने में योगदान दिया।

  • नये नेताओं ने इस बात पर बल दिया कि, सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित है और राष्ट्रीय आंदोलन को आम जनता की आकांक्षाओं के साथ जोड़ने पर ही यह सफल हो सकता है।
  • उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की दरिद्रता और पिछड़ेपन को दूर करने के लिए आजादी प्राप्त करना आवश्यक है।
  • उनके अनुसार राष्ट्रीय आंदोलन का उद्देश्य भारतीय समाज की पुनर्संरचना करना, दरिद्रता व पिछड़ेपन को समाप्त करना एवं समानता तथा न्याय पर आधारित समाज की स्थापना करना था। इन नये नेताओं ने देश के जवानों को अधिक प्रभावित किया।
  • राष्ट्रीय आंदोलन के तरुण नेताओं पर समाजवादी विचारों तथा रूसी क्रांति का गहरा प्रभाव था।
  • सोवियत संघ की साम्राज्यवाद विरोधी विदेश नीति ने और रूसी क्रांति के बाद सोवियत संघ के एशियाई भागों की प्रगति ने उन्हें अधिक प्रभावित किया था।
  • नई पीढ़ी के नेताओं में सबसे प्रमुख जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस थे। जवाहरलाल नेहरू, मोती लाल नेहरू के बेटे थे। मोलीलाल नेहरू कांग्रेस के एक प्रमुख नेता थे।

✴️ पंडित जवाहरलाल नेहरू -• जवाहरलाल नेहरू का जन्म 1889 ई. में हुआ था और उन्होंने इंग्लैण्ड में शिक्षा प्राप्त की थी।

  • भारत लौटने पर वे गाँधीजी के सम्पर्क में आए। जवाहरलाल नेहरू गाँधी जी से प्रभावित होकर आजादी के संघर्ष में शामिल हो गए। उनकी दृष्टि में जनता की स्थिति में सुधार के लिए संघर्ष आवश्यक था।
  • वे पहले ऐसे राष्ट्रीय नेता थे, जिन्होंने भारतीय राजाओं द्वारा शासित राज्यों की जनता के कष्टों को महसूस किया।
  • जवाहरलाल नेहरू ने राजाओं द्वारा शासित राज्यों में आरम्भ हुए जनता के संघर्ष को आजादी के राष्ट्रीय आंदोलन का अंग बनाने में मदद की।
  • गाँधीजी के पश्चात् जवाहरलाल नेहरू भारतीय जनता की आजादी के संघर्ष के सबसे बड़े नेता बन गए।

✴️ सुभाषचन्द्र बोस -• सुभाषचंद्र बोस का जन्म कटक (ओडिशा) में 1897 ई. में हुआ था। उनके पिता वकील थे और उन्हें राय बहादुर को पदवी दी गई थी, जो उन्होंने बाद में लौटा दी थी। सुभाषचन्द्र बोस इंडियन सिविल सर्विस की तैयारी करने के लिए इंग्लैंड गए।
🔺1920 ई. में सुभाष चन्द्र बोस इंडियन सिविल सर्विस ने चुने गए। उन्होंने सफल विद्यार्थियों में चौथा स्थान प्राप्त किया था।

  • जलियाँवाला बाग हत्याकांड (1919) का सुभाष चन्द्र बोस को गहरा आघात पहुँचा था। अप्रैल, 1921 ई. में वे भारत लौट आए और राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े।
  • उन्होंने असहयोग आंदोलन (सन् 1920-22) में भाग लिया और इस दौरान वे चितरंजन दास के सम्पर्क में आए।
  • वे राष्ट्रीय आंदोलन के एक बहुत बड़े नेता थे जो नेताजी के नाम से लोकप्रिय हुए।
  • 1924 ई. में उन पर क्रांतिकारियों की मदद करने का आरोप लगाया गया और तीन साल जेल में रखा गया।
  • जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस राष्ट्रीय आंदोलन की एक नई विचारधारा के नेता थे। वे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष को अधिक तीव्र बनाना चाहते थे।
  • वे कांग्रेस के स्वराज के उद्देश्य से संतुष्ट नहीं थे। स्वराज का अर्थ साम्राज्य के अंतर्गत स्वशासन प्राप्त करना था।
  • अतः यह पूर्ण आजादी नहीं थी, उन्होंने जोर देकर कहा कि, राष्ट्रीय आंदोलन का उद्देश्य पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त करना होना चाहिए और आम जनता के सक्रिय सहयोग से ही इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

✴️ साइमन कमीशन (Simon Commission) -• ब्रिटिश सरकार ने 1919 ई. के इंडिया एक्ट के कामकाज की जाँच करने के लिए एक कमीशन (आयोग) की नियुक्ति की।

  • उस कमीशन के अध्यक्ष सर जॉन साइमन थे, इसलिए वह साइमन कमीशन (Simon Commission) के नाम से जाना जाता है। कमीशन के सभी सदस्य अंग्रेज थे, उनमें एक भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया था। कमीशन की नियुक्ति से सारे देश में विरोध की लहर दौड़ गई।
  • 1927 ई. में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन मद्रास में हुआ था। इस अधिवेशन में कांग्रेस ने कमीशन का बहिष्कार करने का निर्णय लिया। मुस्लिम लीग ने भी कमीशन का बहिष्कार करने का फैसला किया।
    🔺इस कमीशन में कोई भारतीय सदस्य नहीं था इसी कारण इम कमीशन को व्हाइट कमीशन कहा गया।
  • कमीशन 3 फरवरी, 1928 को भारत पहुँचा। उस दिन देश के लगभग सभी भागों में हड़ताल हुई। उसी दिन दोपहर को कमीशन के बहिष्कार की घोषणा करने के लिए सारे देश में सभाएँ आयोजित की गयीं।
  • कमीशन जिस स्थान पर भी गया, वहाँ उसके विरुद्ध तीव्र प्रदर्शन हुए और हड़तालें भी हुईं। लखनऊ में, अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ, जवाहरलाल नेहरू और गोविंद बल्लभ पंत को भी पुलिस की बर्बरता झेलनी पड़ी।
  • डा. एम. ए. अंसारी की अध्यक्षता में मद्रास में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में एक प्रस्ताव पास करके घोषणा की गई थी कि, भारतीय जनता का लक्ष्य पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त करना है।
  • यह प्रस्ताव जवाहरलाल नेहरू ने पेश किया था और एस. सत्यमूर्ति ने इसका अनुमोदन किया था।
  • पूर्ण स्वराज की माँग को तेज करने के लिए इंडियन इंडिपेंडेंस लीग नामक एक संगठन की स्थापना (1942) की गई थी।
  • जवाहरलाल नेहरू, सुभाषचन्द्र बोस, आयंगर, सत्यमूर्ति और शरतचंद बोस जैसे कई नेता इस लोग का नेतृत्व कर रहे थे।
  • दिसंबर, 1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में कई नेताओं ने पूर्ण स्वाधीनता की माँग करने के लिए कांग्रेस पर जोर डाला।

✴️ पूर्ण स्वाधीनता की माॅंग -• दिसंबर, 1929 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन लाहौर में सम्पन्न हुआ जिसके अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू बने।

  • गांधीजी द्वारा 31 दिसंबर, 1929 को एक प्रस्ताव पेश किया गया, जिसमें घोषणा की गई कि कांग्रेस के संविधान की धारा-1 में स्वराज शब्द का अर्थ होगा- पूर्ण स्वाधीनता
    🔺कांग्रेस ने 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।
  • 26 जनवरी, 1930 का दिन सम्पूर्ण देश में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया जिसे भारतीय जनता के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
  • 26 जनवरी के विशिष्ट महत्व के कारण ही इसे संविधान लागू करने के दिन के रूप में चुना गया और यह प्रति वर्ष गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

सविनय अवज्ञा आंदोलन

  • 1930 ई. में स्वाधीनता दिवस मनाने के बाद गाँधीजी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930) आरम्भ हुआ। यह आंदोलन गाँधीजी को प्रसिद्ध दांडी यात्रा से आरम्भ हुआ।
  • 12 मार्च, 1930 को गाँधीजी ने अहमदाबाद के अपने साबरमती आश्रम से 78 सदस्यों के साथ दांडी की ओर पैदल यात्रा शुरू की।
  • दांडी, अहमदाबाद से करीब 385 किमी. दूर भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित है।
  • गाँधीजी और उनके साथी 6 अप्रैल, 1930 को दांडी पहुँचे। समुद्र के पानी के वाष्पीकरण के बाद बने नमक को उठाकर गाँधीजी ने नमक कानून को तोड़ा।
  • नमक के उत्पादन पर सरकार का एकाधिकार था, इसलिए किसी के लिए भी नमक बनाना गैर-कानूनी था।
  • नमक कानून को तोड़ने के बाद सम्पूर्ण देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।

🔺तमिलनाडु में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने दांडी-यात्रा की तरह त्रिचनापल्ली से वेदराण्यम् तक की यात्रा की।

  • धरासना (गुजरात) में सरोजिनी नायडू (जो एक प्रसिद्ध कवयित्री और कांग्रेस की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष थीं) ने नमक के सरकारी भंडार ग्रहों तक अहिंसात्मक सत्याग्रहियों की यात्रा का नेतृत्व किया था।
  • देश भर में प्रदर्शन हुए, हड़तालें हुई, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हुआ और बाद में लोगों ने कर देने से मना कर दिया।
  • सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार किया गया और कांग्रेस पर प्रतिबंध लगाया गया।
  • आंदोलन शुरू होने के एक वर्ष के भीतर करीब 90,000 लोगों को जेल में बंद कर दिया गया।
  • पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में इस आंदोलन का नेतृत्व खान अब्दुल गफ्फार खां ने किया। वे सीमांत गांधी के नाम से प्रसिद्ध हुए।
  • साइमन कमीशन द्वारा सुझाए गए सुधारों पर विचार करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नवंबर, 1930 में लंदन में पहला गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया।
  • कांग्रेस ने उस सम्मेलन का बहिष्कार किया, परन्तु भारतीय राजाओं, मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और कुछ अन्य संगठनों के प्रतिनिधि उसमें शामिल हुए।
  • वायसराय इरविन ने 1931 ई. में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने के लिए कांग्रेस को सहमत करने का प्रयास किया।
  • गाँधीजी और इरविन के मध्य एक समझौता हुआ, जिसके अन्तर्गत सरकार ने उन सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करना स्वीकार कर लिया जिनके खिलाफ हिंसा के आरोप नहीं थे।
  • कांग्रेस ने भी सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस लेना स्वीकार कर लिया।
  • बल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में मार्च, 1931 में करांची में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में समझौते को मान लेने और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में शामिल होने का निर्णय लिया गया।
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के लिए गाँधीजी को कांग्रेस का प्रतिनिधि चुना गया। यह सम्मेलन 7 सितंबर, 1931 से 1 दिसम्बर, 1931 तक चला।
  • कांग्रेस के करांची अधिवेशन (1931 ई.) में मौलिक अधिकारों और आर्थिक नीति के बारे में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव स्वीकार किया गया।
  • प्रस्ताव में उन मौलिक अधिकारों की बात कही गई थी जिन्हें, जाति तथा धर्म के भेदभाव के बिना जनता को प्रदान करने का वादा किया गया था।
  • प्रस्ताव में कुछ उद्योगों के राष्ट्रीयकरण, भारतीय उद्योगों के विकास और मजदूरों एवं किसानों के लिए कल्याणकारी योजनाओं को स्वीकार किया गया था।
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने वाले कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि गाँधीजी थे। गाँधीजी के अतिरिक्त अन्य भारतीयों ने भी सम्मेलन में भाग लिया। उनमें भारतीय राजा, हिंदू, मुसिलम एवं सिक्ख संप्रदायों के नेता शामिल थे।
  • द्वितीय गोलमेज सम्मेलन असफल रहा। गाँधीजी के भारत लौटने के पश्चात् 28 दिसम्बर, 1931 को सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः आरम्भ कर दिया गया। जिसके कारण गाँधीजी और दूसरे नेता गिरफ्तार हुए। लगभग एक साल में 1,20,000 लोगों को जेल में बंद कर दिया गया। आंदोलन को मई, 1934 में वापस ले लिया गया।

✴️ देशी रियासतों के विरुद्ध आंदोलन -• भारत में अंग्रेजों द्वारा शासित प्रदेशों (ब्रिटिश भारत) के अतिरिक भारतीय नवाबों-राजाओं द्वारा शासित रियासतें भी थीं।

  • ये रियासतें पूर्णतः स्वतंत्र नहीं थीं। अंग्रेजों ने अपने शासन को मजबूत करने के लिए इन रियासतों को बनाए रखा था।
  • इन रियासतों की संख्या करीब 562 थी और इनमें भारत की करीब 20% आबादी बसी हुई थी।
  • इनमें जम्मू व कश्मीर, मैसूर और हैदराबाद जैसे कुछ राज्य तत्कालीन यूरोप के कुछ राज्यों से भी बड़े थे।
  • अधिकांश रियासतों में जनता की दशा शेष देश की जनता की दशा से निम्नतर थी।
  • अधिकतर राजा अपनी रियासतों को अपनी निजी सम्पत्ति समझते थे। ये राजा विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहे थे।
  • शिक्षा के प्रसार, गरीबी दूर करने और जनता का जीवन स्तर सुधारने का कोई प्रयत्ल नहीं किया गया था।
  • अनेक रियासतों में अभी भी कई अमानवीय प्रथाएँ जारी थीं, जैसे- बेगारी की प्रथा, यानी बिना मजदूरी दिए लोगों से काम करवाना। ब्रिटिश भारत में राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ तो रियासतों के लोगों में जागरूकता आने लगी। वे जनतांत्रिक अधिकारों और जनतांत्रिक सरकार की माँग करने लगे।
  • लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए इन राज्यों में प्रजा मंडल जैसे संगठन स्थापित किए गये। आरंभिक संगठन प्रजावर्मा आदि के नेतृत्व में राजस्थान की रियासतों में स्थापित हुए।
  • रियासतों की जनता के ये सभी संगठन ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स काँफ्रेंस में एकीकृत हुए। बलवंत राय मेहता जिन्होंने भावनगर (गुजरात) में प्रजा मंडल की स्थापना की थी, इस नए संगठन को सचिव बने।
  • इस संगठन ने माँग की कि, भारतीय रियासतों को भारतीय राष्ट्र का अंग माना जाना चाहिए। बीसवीं सदी के चौथे दशक में भारतीय रियासतों की जनता का आंदोलन अत्यधिक शक्तिशाली बना।
  • इस आन्दोलन के कुछ प्रमुख नेता थे- राजस्थान में जयनारायण व्यास तथा जमनालाल बजाज, ओडिशा में सारंगधर दास, त्रावणकोर में एन्नी मस्करेने तथा पद्यमथानु पिल्लई, जम्मू-कश्मीर में शेख मुहम्मद अब्दुल्ला तथा हैदराबाद में स्वामी रामानंद तीर्थ।
  • राजा-महाराजाओं ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को कुचलने में भी अंग्रेजों की मदद की। ब्रिटिश सरकार ने आजादी के आंदोलन को कमजोर करने के लिए भारतीय रियासतों का इस्तेमाल किया।
  • जब देश आजादी प्राप्त करने की स्थिति में पहुँचा तो कई राजा-महाराजाओं ने दावा किया कि, उनकी रियासतें स्वतंत्र है, उन्हें स्वतंत्र रहने का अधिकार है।
  • कांग्रेस ने कई वर्षों तक रियासतों के मामलों में हस्तक्षेप न करने की नीति अपनाई।
  • सुभाषचंद्र बोस की अध्यक्षता में 1938 ई. में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में घोषणा की गई कि, पूर्ण स्वराज का लक्ष्य रियासतों सहित सम्पूर्ण देश के लिए है।
    🔺जवाहरलाल नेहरू को, जो कई वर्षों से रियासतों की जनता के संघर्ष को सहयोग दे रहे थे, 1939 ई. में ऑल इंडिया स्टेट्स पीपुल्स कांफ्रेंस का अध्यक्ष चुना गया।
  • ब्रिटिश सरकार ने अपना शासन कायम रखने के लिए और राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर करने के लिए भारतीय जनता में फूट डालने के प्रयास किए। उनकी एक चाल सांप्रदायिकता को प्रोत्साहन देना भी था।
  • सांप्रदायिकता से ही प्रेरित होकर मुस्लिम लीग (1906 ई.) तथा हिंदू महासभा (1915 ई.) को स्थापना हुई थी। सांप्रदायिकता का जहर 1920 ई. के बाद तेजी से फैलने लगा। हिंदुओं और मुसलमानों में धर्म-परिवर्तन के आंदोलन शुरू हुए। इन्होंने विभिन्न जातियों में अक्सर तनाव पैदा किया।
  • 1920 के दशक में धर्म के नाम पर दंगे हुए और अनेक बेकसूर लोग मारे गए। 1924 ई. में गाँधीजी ने 21 दिन का अनशन करके शांति स्थापित करने का प्रयास किया।
    🔺1931 ई. में कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हुए। राष्ट्रीय आंदोलन के एक प्रमुख नेता गणेश शंकर विद्यार्थी शांति स्थापित करने के लिए दंगाग्रस्त क्षेत्रों में गए। पान्तु उन दंगों के दौरान हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए वे शहीद हो गए।
  • 1916 ई. से कुछ वर्ष तक मुस्लिम लीग और कांग्रेस ने मिलकर काम किया था। मुस्लिम लीग ने अपने अधिवेशन उसी स्थान और उसी समय करने शुरू किए, जहाँ कांग्रेस के अधिवेशन होते थे।
  • 1924 ई. में यह प्रथा बंद हो गई। उसी समय हिंदू महासभा भी सक्रिय हो गई। सिक्खों के बीच में सांप्रदायिक नेता सांप्रदायिक माँग करने लगे।
  • मुसलमानों के लिए सांप्रदायिक निर्वाचन की जो प्रथा पहले आरम्भ की गई थी उसे 1932 ई. में सिक्खों पर भी लागू कर दिया गया।
  • जिस दौर में आजादी के संघर्ष में भाग लेने के लिए हजारों लोग जेल में पहुँच गए थे, उस समय सांप्रदायिक संगठन अलग रहे। कभी-कभी उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग किया।
  • साइमन कमीशन के विरुद्ध आंदोलन के समय सांप्रदायिक दलों के कुछ नेताओं ने साइमन कमीशन का स्वागत किया।
  • राष्ट्रीय आंदोलन ने सभी भारतीयों को समानता के आधार पर भारतीय समाज के पुनर्निर्माण पर जोर दिया, परन्तु सांप्रदायिक दल सामाजिक सुधारों के विरुद्ध थे। उनके मतानुसार सभी भारतीयों के हित समान नहीं थे।
  • मुहम्मद अली जिन्ना, जो बीसवीं सदी के आरंभिक वर्षों में एक राष्ट्रवादी नेता थे, बाद में मुस्लिम लीग के सबसे प्रमुख नेता बन गये। ज्यादातर मुसलमानों ने पृथक राज्य की माँग का विरोध किया।
  • आजादी के संघर्ष में, दूसरे समुदायों के लोगों की तरह, मुसलमानों ने भी भाग लिया था और ब्रिटिश सरकार के दमन को उन्होंने भी झेला था।
    🔺अशफाक उल्ला खाँ पहले मुस्लिम नेता थे, जिन्हें स्वतंत्रता सपर्ष के दौरान फांसी दी गई थी।
  • कांग्रेस मुस्लिमों की अत्यधिक संख्या थी। किसानों और मजदूरों के संगठनों ने समान सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक लक्ष्यों के लिए सभी समुदायों के लोगों को एकजुट किया था।
  • राष्ट्रीय आंदोलन में अनेक महान नेता मुस्लिम थे। मुसलमानों के अधिकांश धार्मिक नेता मुस्लिम लीग और पृथक राज्य की माँग के विरोधी थे। उन्होंने पहचाना कि मुसलमानों का भविष्य अन्य भारतीयों के साथ जुड़ा हुआ है तथा तात्कालिक समस्या विदेशी शासन को समाप्त करना है।
    🔺मुसलमानों, हिंदुओं, सिक्खों, ईसाईयों और दूसरे धर्मों के लोगों के सामने एक समान समस्याएँ थीं- गरीबी, पिछड़ेपन और असमानता की समस्याएँ।
  • 1930 के दशक के अंत तक मुस्लिम लीग और हिंदुओं के सांप्रदायिक संगठनों का कोई खास प्रभाव नहीं था।

दलित वर्गों के आंदोलन

  • सुधार आंदोलनों का एक प्रमुख उद्देश्य हिंदुओं को मध्य तथाकथित निम्न जातियों का उद्धत करना था। इन आंदोलनों ने तथाकथित निम्न जातियों के उत्पीड़न के प्रति लोगों को जागरूक करने में और विशेषकर अस्पृश्यता की शर्मनाक प्रथा के खिलाफ एक महपूर्ण भूमिका अदा की।
  • अछूत जातियों के लोगों के मंदिर प्रवेश के लिए महाराष्ट्र, केरल और तमिलनाडू में कई अभियान आयोजित किए गए।
  • पेरियार के नाम से लोकप्रिय ई. वी. रामास्वामी नायकर ने आत्म-सम्मान आंदोलन (सेल्फ रेस्पेक्ट मूवमेंट) शुरू किया। दलित वर्गों के आंदोलन के प्रमुख नेता डा. भीमराव आंबेडकर थे।
  • दलित वर्गों के उद्धार और उत्थान के लिए उन्होंने कई ग्रंथ लिखे, पत्र-पत्रिकाएँ निकलीं तथा संस्थाएँ स्थापित कीं। उन्होंने गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया और दलित वर्गों के हितों की माँगे उठाई।
  • गाँधीजी ने अस्पृश्यता की कुप्रथा को समाप्त करने के काम को बड़ा महत्व दिया था। उन्होंने अस्पृश्यता विरोधी कई संगठन स्थापित किए थे।
    🔺अस्पृश्यों को उन्होंने हरिजन नाम दिया था और इसी नाम की एक पत्रिका निकाली थी। 1932 ई. में ब्रिटिश सरकार ने तथाकथित अस्पृश्यों के लिए पृथक निर्वाचन की घोषणा कर दी।
  • राष्ट्रीय नेताओं ने सरकार की इस नई घोषणा का विरोध किया। गाँधीजी उस समय जेल में थे। उन्होंने जेल में इस निर्णय के विरुद्ध अनशन आरंभ कर दिया।
    🔺गाँधी जी ने कहा मैं चाहता हूँ कि अस्पृश्यता का जड़-मूल से उच्छेवन हो। इसी के लिए मेरा जीवन समर्पित है और इसके लिए जीवन त्यागने में मुझे प्रसन्नता होगी।
  • अंततः एक समझौता हुआ, जिसके अन्तर्गत पृथक निर्वाचन के निर्णय को वापस ले लिया गया। उसी के साथ यह तय हुआ कि तथाकथित अस्पृश्य जातियों के लोगों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की जाएगी।
  • राष्ट्रीय आंदोलन और दलित वर्गों का संगठन भारतीय समाज के दलित समुदायों के उद्धार के लिए कार्य करते रहे।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन और विश्व

  • राष्ट्रीय आंदोलन ने बहर की दुनिया की घटनाओं और विचारों से प्रेरणा ग्रहण की थी। दूसरे कई देशों के लोगों ने भारत की आजादी के लिए सहयोग दिया तथा दूसरे देशों में भारतीयों ने स्थानीय लोगों की मदद से संगठन स्थापित किए।
  • दादा भाई नौरोजी ने भारतीय माँगों हेतु प्रबुद्ध अंग्रेजों का समर्थन जुटाने के लिए 19वीं सदी के अंतिम दौर में इंग्लैंड में एक संगठन स्थापित किया था। बाद में ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य देशों में इंडिया लीग की स्थापना हुई।
  • ब्रिटेन की इंडिया लीग के साथ अनेक मजदूर, समाजवादी नेता और विचारक संबंधित रहे।
    🔺भारत की आजादी के लिए ब्रिटिश जनता का सहयोग प्राप्त करने में वी. के. कृष्ण मेनन ने प्रमुख भूमिका निभाई।
  • भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एक प्रमुख विशेषता यह थी कि, इसने किसी भी अन्य देश या ब्रिटेन को जनता के विरुद्ध घृणा पैदा नहीं की। इसका महान श्रेय गांधीजी को जाता है, जिन्होंने प्रेम व विश्वबंधुत्व का प्रचार किया और घृणा पर आधारित कार्यों की निंदा की।
  • भारतीय जनता ने अपने संघर्ष को अन्य लोगों द्वारा स्वाधीनता, जनतंत्र और सामाजिक समानता के लिए किए जा रहे संघर्ष का एक भाग समझा।
    🔺भारतीय जनता में अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण विकसित करने में जवाहरलाल नेहरू ने प्रमुख भूमिका निभाई।
  • उन्होंने भारतीय जनता को विश्व में हो रहे विकास से अवगत कराया तथा आजादी और जनतंत्र के लिए लड़ रही दूसरे देशों की जनता के साथ सम्बंध स्थापित किए।
  • उन्होंने कहा था कि, आजादी अविभाज्य है अर्थात्, किसी भी देश की आजादी तब तक सुरक्षित नहीं रह सकती, जब तक प्रत्येक राष्ट्र आजाद न हो। उसी प्रकार, जनतंत्र खुशहाली तथा शांति अविभाज्य हैं।
  • राष्ट्रीय आंदोलन ने दूसरे लोगों के संघर्ष के साथ संबंध जोड़े तथा 1927 ई. में उत्पीड़ित समुदायों के लिए कांग्रेस ने ब्रुसेल्स में एक बैठक आयोजित की जिसमें जवाहर लाल नेहरू ने भाग लिया।
  • लीग अगेंस्ट इंपीरियलिज्म (साम्राज्यवाद विरोधी संघ) नामक एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना हुई। जिसने साम्राज्यवाद को सर्वत्र समाप्त करने के लिए प्रयास किए गये।
  • अनेक विश्वविख्यात हस्तियाँ और कई देशों की आजादी के आंदोलनों के नेता लीग से जुड़ गए थे। इनमें अल्बर्ट आइंस्टाइन तथा ज्यूलियोक्यूरी जैसे वैज्ञानिक और मैक्सिम गोर्की जैसे साहित्यकार भी जुड़े थे। कांग्रेस भी इस लीग से जुड़ गई थी।
  • जापान अब एक साम्राज्यवादी शक्ति बन गया था। उसने 1931 ई. में चीन पर आक्रमण किया। भारतीय राष्ट्रवादियों ने जापान के विरुद्ध चीनी जनता का समर्थन किया। उन्होंने जापानी वस्तुओं का बहिष्कार करने को कहा।
  • इस आक्रमण के पश्चात् भारतीय चिकित्सकों का एक दल चीन गया और उसने वहाँ की जनता के कष्ट निवारण के लिए काम किया।
    🔺इसी समय एक ऐसे हिंसात्मक आंदोलन का उदय हुआ जो खुले तौर पर जनतंत्र तथा मानव-समानता का विरोधी और युद्ध का पोषक था। इसे फासिस्ट आंदोलन कहते हैं।
  • इटली और जर्मनी में फासिस्ट सरकारें बनीं। इन सरकारों ने अपनी ही जनता के विरुद्ध आतंकवादी कार्रवाईयां की और जनता के मूलभूत अधिकार तक छीन लिए।
  • हिटलर जर्मनी में सत्तारूढ़ हुआ था। उसने यहूदियों का सम्पूर्ण विनाश आरम्भ कर दिया।
  • अन्य देशों के विरुद्ध युद्ध की योजना बनाने में जापान भी इटली और जर्मनी के साथ मिल गया।
  • स्पेन के फासिस्टों ने वहाँ की जनतांत्रिक सरकार के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इटली और जर्मनी ने स्पेन के फासिस्टों को सक्रिय मदद दी। इससे सारी दुनिया को जनता में रोष फैल गया।
  • भारत के राष्ट्रवादी नेता अन्य देशों की आजादी और शांति के लिए फ़ासिज़्म के खतरे को समझते थे।
  • उन्होंने फ़ासिज़्म के विरुद्ध लड़ रही स्पेनवासी जनता का समर्थन किया। भारत सहित कई देशों के लोग स्पेनवासियों के साथ मिलकर उनकी आजादी के लिए लड़ने हेतु स्पेन गये।
  • जवाहरलाल नेहरू तथा वी.के. कृष्ण मेनन भी स्पेन गए और उन्होंने वहाँ की जनता को भारतीय जनता के सहयोग का आश्वासन दिया।
  • इटली ने अबीसीनिया (इथियोपिया) पर आक्रमण किया। परिचमी देशों के साथ आपसी सहमति करके हिटलर ने चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा कर लिया।
  • जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने पश्चिमी देशों के तानाशाहों की तुष्टीकरण की नीति की निंदा की। इटली के तानाशाह मुसोलिनी ने नेहरू से मिलने की इच्छा व्यक्त की, तो नेहरू ने उससे मिलने से इन्कार कर दिया।
    🔺वैश्विक स्तर पर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग पाने के लिए लाला हरदयाल ने वर्ष 1913 में गदर पार्टी की स्थापना की थी।
  • भारत को राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं ने फिलिस्तीन की जनता की आजादी के संघर्ष को समर्थन दिया।

✴️ 1935 ई. का कानून और राष्ट्रीय आंदोलन -• कांग्रेस ने केवल द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। कांग्रेस ने घोषणा की थी कि, देश की सरकार का संविधान किस तरह का हो इसका निर्णय केवल भारत की जनता हो कर सकती है।

  • सरकार ने कांग्रेस की माँग की उपेक्षा की और अगस्त 1935 ई. में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट के अनुसार, भारत एक संघ राज्य बनेगा, यदि 50 प्रतिशत रियासतें इसमें शामिल हो जाये।
  • एक्ट ने भारत को स्वतंत्र उपनिवेश के स्वरूप की सरकार देने का उल्लेख नहीं किया। 1935 ई. का कानून तत्कालीन स्थिति में बेहतर था। उसने प्रांतीय स्वायत्तता की व्यवस्था लागू की।
  • प्रांतीय सरकारों के मंत्री विधानसभा के प्रति उत्तरादायी हो गए। विधानसभा के अधिकारों को भी बढ़ा दिया गया परन्तु, मताधिकार सीमित था।
  • गवर्नर-जनरल और गवर्नरों की नियुक्ति का अधिकार ब्रिटिश सरकार के हाथों में रहा।
  • जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में लखनऊ में 1936 ई. में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में 1935 ई. के एक्ट को अस्वीकार कर दिया गया। अधिवेशन में संविधान सभा गठित करने की माँग की गई तथा 1937 ई. में होने वाले प्रांतीय चुनावों में भाग लेने का निर्णय लिया गया।
  • अधिवेशन में निर्णय लिया कि, वह एक्ट को वापस लेने की माँग करेगी। चुनावों में कांग्रेस की भारी विजय हुई। पाँचो प्रांतों में उसे पूर्ण बहुमत मिला तीन अन्य प्रांतों में वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई।
  • मुस्लिम लीग में, जो अपने को सभी मुसलमानों का प्रतिनिधि संगठन मानती थी, उसके लिए सुरक्षित स्थानों में से एक चौथाई से भी कम स्थान प्राप्त किए।
  • पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में, जहाँ खान अब्बूल गफ्फार खाँ के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन अत्यन्त शक्तिशाली हो गया था, वहाँ मुस्लिम लीग में एक भी स्थान प्राप्त नहीं किया।
  • हिंदू सांप्रदायिक दलों की समाप्ति हो गयी। कांग्रेस ने 11 प्रांतों में से 7 प्रांतों में कांग्रेसी मंत्रिमंडल बनाए। उसने दो अन्य प्रांतों में अन्य दलों की सहायता में सरकार बनाई।
  • केवल दो प्रांतों में ही गैर-कांग्रेसी मंत्रिमंडल बना। कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने कुछ अच्छे कार्य भी किए।
  • कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने शिक्षा का प्रसार किया और किसानों की हालत में सुधार किया। उन्होंने राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया। समाचारपत्रों पर से प्रतिबंध हटा दिया।
  • इन मंत्रिमंडलों ने भारतीय रियासतों की जनता को भी प्रभावित किया। राजाओं-नवाबों के निरंकुश शासन में कष्ट भोग रही जनता ने देखा कि भारत के कई प्रांतों की सरकार जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चलाई जा रही है।
  • जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचन्द्र बोस जैसे कई नेता कांग्रेस के औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत मंत्रिमंडल बनाने के विरोधी थे। देश में किसानों और मजदूरों के संगठनों का प्रभाव बढ़ गया था।
  • आचार्य नरेंद्र देव एवं जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं के मार्गदर्शन में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी का प्रभाव भी बड़ गया था।
    🔺क्रान्तिकारी समाजवादी (R.S.P.)
    🔘 संस्थापक :- योगेश चन्द्र चटर्जी
    🔘 स्थापना :- 19 मार्च, 1940 ई. (बंगाल में)
    🔘 उद्देश्य :- अंग्रेजों को शक्ति द्वारा भारत से बाहर निकाल कर देश में समाजवाद की स्थापना करना। इस पार्टी ने त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन में सुभाष चन्द्र बोस का समर्थन तथा ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ का स्वागत किया था।
  • इस समय तक कम्युनिस्ट पार्टी काफी मजबूत हो गई थी। इस प्रकार उन लोगों का प्रभाव बढ़ गया था जो ब्रिटिश सरकार के साथ समझौता करने के पक्ष में नहीं थे। वे पूर्ण स्वाधीनता के पक्ष में थे और इसके लिए आंदोलन करना चाहते थे।
  • सुभाषचंद्र बोस 1938 ई. में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए एक नरमवादी नेता पट्टाभि सीता रमैय्या के विरुद्ध पुनः चुनाव लड़े और विजयी हुए। परन्तु उन्होंने जल्दी ही कांग्रेस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दे दिया और बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक (1939) की स्थापना की।
    🔺फारवर्ड ब्लाॅक
    🔘 संस्थापक :- सुभाषचन्द्र बोस
    🔘 स्थापना :- 3 मई, 1939 मुकर, उन्नाव में
    🔘 उद्देश्य :- सभी साम्राज्यवाद विरोधी शक्तियों को संगठित करना और अनिवार्य संघर्ष की पूर्ति हेतु तत्पर रहना।
    🔘 अन्य सदस्य :- देवव्रत विश्वास (महासचिव), विश्वम्भर दयाल त्रिपाठी (राष्ट्रीय महामंत्री) तथा स्वामी सहजानन्द।
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