राहुल सांकृत्यायन – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हिन्दी के महान् उपासक एवं महापण्डित राहुल सांकृत्यायन जी को हिन्दी यात्रा साहित्य का जनक (प्रवर्तक) माना जाता है। ये एक प्रतिष्ठित बहु-भाषाविद् थे। राहुल जी ने हिन्दी भाषा और साहित्य की बहुमुखी सेवा की है। इनका अध्ययन जितना विशाल था, साहित्य-सृजन भी उतना ही विराट् था। ये छत्तीस एशियाई और यूरोपीय भाषाओं के ज्ञाता थे और लगभग 150 ग्रंथों का प्रणयन करके इन्होंने राष्ट्रभाषा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको राहुल जी के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “राहुल सांकृत्यायन का जीवन परिचय” (Rahul Sankrityayan biography in Hindi) के बारे में बताया है। इसमें हमने राहुल सांकृत्यायन का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, यात्रा वृत्तांत, भाषा शैली, पुरस्कार एवं हिंदी साहित्य में स्थान और राहुल सांकृत्यायन की साहित्यिक विशेषताएँ को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है।

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इसके अलावा, इसमें हमने महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप भी राहुल जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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राहुल सांकृत्यायन का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने राहुल जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
राहुल सांकृत्यायन की जीवनी –

नामराहुल सांकृत्यायन
वास्तविक नामकेदारनाथ पाण्डे
जन्म09 अप्रैल, सन् 1893 ईस्वी
जन्म स्थानउत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के पन्दहा ग्राम में
मृत्यु14 अप्रैल, सन् 1963 ईस्वी
पिता का नामश्री गोवर्धन पाण्डे
माता का नामश्रीमती कुलवन्ती देवी
लेखन विधाकहानी, उपन्यास, दर्शन, पुराण, इतिहास, भाषा एवं यात्रा वृत्त
साहित्य कालआधुनिक काल
प्रमुख रचनाएंलंका, तिब्बत यात्रा, जापान, सिंह सेनापति, मेरी जीवन यात्रा, विश्व की रूपरेखा, मध्य एशिया का इतिहास आदि।

राहुल सांकृत्यायन का जीवन परिचय

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का जन्म 09 अप्रैल, सन् 1893 ईस्वी को अपने ननिहाल पन्दहा ग्राम (जिला आजमगढ़), उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनके पिता पण्डित गोवर्धन पाण्डे एक कट्टरपन्थी अधर्मनिष्ठ ब्राह्माण थे। ये कनैला नामक ग्राम में निवास करते थे। इनकी माता श्रीमती कुलवन्ती देवी सरल और सात्विक विचारों की महिला थीं। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा रानी की सराय और निजामाबाद में हुई। राहुल जी का बचपन का नाम ‘कदारनाथ पाण्डे’ था। बौद्ध धर्म में आस्था होने के कारण इन्होंने अपना नाम बदलकर बुद्ध के पुत्र के नाम पर ‘राहुल’ रख लिया। ‘सांकृत्य’ इनका गोत्र था, इसीलिए ये ‘राहुल सांकृत्यायन’ कहलाये।

राहुल सांकृत्यायन
राहुल सांकृत्यायन का जीवन परिचय

सन् 1907 ई० में मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् इन्होंने वाराणसी में संस्कृत की उच्च शिक्षा प्राप्त की। यहीं इन्हें पालि साहित्य के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ और अपने नाना पं० रामशरण पाठक द्वारा सुनाई गयी कहानियों से यात्रा के प्रति प्रेम अंकुरित हुआ। इस्माइल मेरठी का निम्नलिखित शेर इनके घुमक्कड़ी जीवन के लिए प्रेरक सिद्ध हुआ—

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिन्दगानी फिर कहाँ ।
जिन्दगानी गर रही, तो नौजवानी फिर कहाँ ॥

इन्होंने पाँच बार सोवियत संघ, श्रीलंका और तिब्बत की यात्रा की। छः मास ये यूरोप में रहे। एशिया को तो इन्होंने छान ही डाला था। कोरिया, मंचूरिया, ईरान, अफगानिस्तान, जापान, नेपाल आदि देशों का पर्यटन करने में इन्होंने अपना बहुत-सा समय बिताया। इन्होंने भारत के तो कोने-कोने का भ्रमण किया। बद्रीनाथ, केदारनाथ, कुमाऊँ गढ़वाल से लेकर कर्नाटक, केरल, कश्मीर, लद्दाख तक भ्रमण किया। राहुल जी मुक्त विचारों के व्यक्ति थे। घुमक्कड़ी ही इनकी पाठशाला थी। यही इनका विश्वविद्यालय था। इन्होंने विश्वविद्यालय की चौखट पर पैर भी नहीं रखा था। भारत का यह पर्यटन प्रिय साहित्यकार 14 अप्रैल, सन् 1963 ईस्वी को संसार त्यागकर परलोक सिधार गया।

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राहुल सांकृत्यायन का साहित्यिक परिचय

हिन्दी के महान् उपासक राहुल जी ने हिन्दी भाषा और साहित्य की बहुमुखी सेवा की है। इनका अध्ययन जितना विशाल था, साहित्य-सृजन भी उतना ही विराट् था। ये छत्तीस एशियाई और यूरोपीय भाषाओं के ज्ञाता थे और लगभग 150 ग्रंथों का प्रणयन करके इन्होंने राष्ट्रभाषा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। अपनी ‘जीवन-यात्रा’ में राहल जी ने स्वीकार किया है कि उनका साहित्यिक जीवन सन् 1927 ई0 से प्रारम्भ होता है। वास्तविक बात तो यह है कि इन्होंने किशोरावस्था पार करने के बाद ही लिखना शुरू कर दिया था। इन्होंने धर्म, भाषा, यात्रा, दर्शन, इतिहास, पुराण, राजनीति आदि विषयों पर अधिकार के साथ लिखा है। हिन्दी-भाषा और साहित्य के क्षेत्र में इन्होंने ‘अपभ्रंश काव्य साहित्य’, ‘दक्खिनी हिन्दी साहित्य’ आदि श्रेष्ठ रचनाएँ प्रस्तुत की थीं। इनकी रचनाओं में एक ओर प्राचीनता के प्रति मोह और इतिहास के प्रति गौरव का भाव विद्यमान है, तो दूसरी ओर इनकी अनेक रचनाएँ स्थानीय रंग लेकर मनमोहक चित्र उपस्थित करती हैं।

राहुल सांकृत्यायन को सबसे अधिक सफलता यात्रा साहित्य लिखने में मिली है। जीवन-यात्रा लिखने के प्रयोजन को ये इन शब्दों में प्रकट करते हैं, “अपनी लेखनी द्वारा मैंने उस जगत की भिन्न-भिन्न गतियों और विचित्रताओं को अंकित करने की कोशिश की है, जिसका अनुमान हमारी तीसरी पीढ़ी बहुत मश्किल से करेगी।” सचमुच जीवन-यात्रा में स्वयं राहुल जी के बारे में कम मगर दसरों के बारे में, परिवेश के बारे में अधिक जानकारी मिलती है।

राहुल सांकृत्यायन जी की प्रमुख रचनाएं

राहुल जी ने विभिन्न विषयों पर 150 से अधिक ग्रन्थों की रचना की, जिनमें से 129 प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं—

  • कहानी-संग्रह ⇒ वोल्गा से गंगा, सतमी के बच्चे, बहुरंगी मधुपुरी, कनैल की कथा आदि।
  • उपन्यास ⇒ सिंह सेनापति, जय यौधेय, विस्मृत यात्री, सप्तसिन्धु, जीने के लिए, मधुर स्वप्न आदि।
  • आत्मकथा ⇒ मेरी जीवन यात्रा आदि।
  • दर्शन ⇒ दर्शन दिग्दर्शन, वैज्ञानिक भौतिकवाद, बौद्ध दर्शन आदि।
  • विज्ञान ⇒ विश्व की रूपरेखा आदि।
  • इतिहास ⇒ मध्य एशिया का इतिहास, इस्लाम धर्म की रूपरेखा, आदि-हिन्दी की कहानियाँ, दक्खिनी हिन्दी काव्यधारा आदि।
  • यात्रा-साहित्य ⇒ लंका तिब्बत यात्रा, मेरी लद्दाख यात्रा, रूस और ईरान में पच्चीस मास, जापान यात्रा के पन्ने, घुमक्कड़शास्त्र आदि।
  • संस्मरण ⇒ बचपन की स्मृतियाँ, असहयोग के मेरे साथी, जिनका मैं कृतज्ञ आदि।
  • कोश ⇒ शासन शब्दकोश, राष्ट्रभाषा कोश, तिब्बती हिन्दी कोश आदि।
  • देश-दर्शन ⇒ सोवियत भूमि, किन्नर देश, हिमालय प्रदेश, जौनसार, देहरादून आदि ।
  • जीवनी साहित्य ⇒ सरदार पृथ्वीसिंह, नये भारत के नये नेता, वीर चंद्रसिंह गढ़वाली आदि ।
  • अनूदित रचनाएँ ⇒ विस्मृति के गर्भ से, सोने की टाल, सूदखोर की मौत, शैतान की आँखें आदि।

राहुल सांकृत्यायन की भाषा-शैली

राहुल जी की भाषा-शैली में कोई बनावट या साहित्य-रचना का प्रयास नहीं है। सामान्यतः संस्कृतनिष्ठ परन्तु सरल और परिष्कृत भाषा को ही इन्होंने अपनाया है। न तो संस्कृत के क्लिष्ट या समासयुक्त शब्दों को इन्होंने प्रश्रय दिया है। और न ही लम्बे-लम्बे वाक्यों को। संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वानु होते हुए भी ये जन साधारण की भाषा लिखने के पक्षपाती थे। इनकी शैली का रूप विषय और परिस्थिति के अनुसार बदलता रहता है। इनकी शैली के वर्णनात्मक, विवेचनात्मक, व्यंग्यात्मक, उद्बोधन एवं उद्धरण आदि रूप देखने को मिलते हैं।

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राहुल सांकृत्यायन की साहित्यिक विशेषताएँ

राहुल जी उच्चकोटि के विद्वान् और अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। इन्होंने धर्म, दर्शन, पुराण, इतिहास, भाषा एवं यात्रा पर ग्रन्थों की रचनाएँ की। हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में इन्होंने ‘अपभ्रंश काव्य-साहित्य’ और ‘दक्षिणी हिन्दी-साहित्य’ आदि श्रेष्ठ रचनाएँ प्रस्तुत की। इनकी रचनाओं में प्राचीनता का पुनरावलोकन, इतिहास का गौरव और तत्सम्बन्धी स्थानीय रंगत विद्यमान है। इनकी साहित्यिक विशेषताओं का निरूपण निम्नलिखित रूपों में किया जा सकता है

निबन्धकार के रूप में— निबन्धकार के रूप में राहुल जी ने भाषा और साहित्य से सम्बन्धित निबन्धों की रचना की, जिनमें धर्म, इतिहास, राजनीति और पुरातत्त्व प्रमुख हैं। इन्होंने रूढ़ियों के बन्धन ढीले करने के लिए धर्म, ईश्वर, सदाचार आदि विषयों पर निबन्ध लिखे। अपने निबन्धों में इन्होंने हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने पर पर्याप्त बल दिया तथा उर्दू-मिश्रित हिन्दी का विरोध किया।

उपन्यासकार के रूप में— राहुल जी ने अपने उपन्यासों में भारत के प्राचीन इतिहास का गौरवशाली रूप प्रस्तुत किया है। इन्होंने ‘सिंह सेनापति’ नामक उपन्यास में राजतन्त्र और गणणतन्त्र की तुलना करते हुए गणतन्त्र को श्रेष्ठ सिद्ध से किया है।

कहानीकार के रूप में— राहुल जी के कहानी-संग्रहों में ‘वोल्गा से गंगा’ और ‘सतमी के बच्चे’ श्रेष्ठ संग्रह हैं। ‘वोल्गा से गंगा’ में इन्होंने पिछले आठ हजार वर्षों के मानव जीवन का विकास कहानी के रूप में प्रस्तुत किया है। ‘सतमी के बच्चे’ कहानी संग्रह में आकर्षक और कलात्मक ढंग से (लघु मानव) के प्रति राग और ममता को प्रस्तुत किया गया है।

अन्य विधा-लेखक के रूप में— इनके अतिरिक्त राहुल जी ने जीवनी, संस्मरण और यात्रा-साहित्य की विधाओं पर भी प्रभावशाली रीति से सुन्दर रचनाएँ लिखीं। ‘मेरी जीवन यात्रा’ नामक इनका आत्मकथात्मक ग्रन्थ पाँच खण्डों में विभक्त है। ‘बचपन की स्मृतियाँ’, ‘असहयोग के मेरे साथी’ आदि संस्मरणात्मक रचनाओं में इनका व्यक्तित्व उभरा है। इन्हें यात्रा-साहित्य लिखने में सर्वाधिक सफलता मिली है। इनकी रचनाओं में देश-विदेश की यात्राओं का वर्णन है। घुमक्कड़शास्त्र में घुमक्कड़ी का महत्त्व बताया गया है।

राहुल सांकृत्यायन का यात्रा-साहित्य

प्रस्तुत लेख ‘अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा’ राहुल जी की पुस्तक ‘घुमक्कड़-शास्त्र’ से लिया गया है। इस लेख में इन्होंने घुमक्कड़ी की सीमा किसी शास्त्र से कम नहीं मानी है और उसका गौरव शास्त्र के समान ही स्थापित किया है। इन्होंने आदिम काल से लेकर आधुनिक काल तक के अनेक महापुरुषों की सफलता का रहस्य घुमक्कड़ी में सिद्ध किया है।

राहुल सांकृत्यायन का साहित्य में स्थान

भाषा के प्रकाण्ड पण्डित राहुल सांकृत्यायन जी ने अपने अनुभव पर आधारित विशद लेखन से हिन्दी-साहित्य के विकास में अपर्व योगदान दिया है। इन्होंने अपनी साहित्यिक रचनाओं में प्राचीन इतिहास एवं वर्तमान जीवन के उन अंशों पर भी लिखा है, जिन पर आमतौर पर अन्य लेखकों की दृष्टि भी नहीं गयी थी।

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FAQs. राहुल सांकृत्यायन जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. राहुल सांकृत्यायन का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन जी का जन्म 09 अप्रैल, सन् 1893 ईस्वी को अपने ननिहाल, उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के पन्दहा नामक ग्राम में हुआ था।

2. राहुल सांकृत्यायन का दूसरा नाम क्या है?

राहुल जी का बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डे था। सांकृत्य इनका गोत्र था। इसी के आधार पर सांकृत्यायन कहलाये। बौद्ध धर्म में आस्था होने पर इन्होंने अपना नाम बदल कर महात्मा बुद्ध के पुत्र के नाम पर ‘राहुल’ रख लिया। इसीलिए ये राहुल सांकृत्यायन कहलाये जाने लगें।

3. राहुल सांकृत्यायन के माता पिता का नाम क्या था?

राहुल सांकृत्यायन के पिता का नाम पण्डित गोवर्धन पाण्डे था जो कि एक कट्टरपंथी ब्राह्माण थे तथा इनकी माता का नाम श्रीमती कुलवन्ती देवी था इनकी माता एक सरल और सात्विक विचारों की महिला थीं।

4. राहुल सांकृत्यायन की प्रथम पत्नी का क्या नाम था?

राहुल सांकृत्यायन जी ने अपने जीवन में कुल तीन शादियां की थी। इनकी पहली शादी तो बचपन में ही हो गई थी। राहुल जी की पहली पत्नी का नाम श्रीमती संतोषी देवी था, जिनसे वे अपने जीवन काल में सिर्फ एक बार मिले थे। जब वे रूस में सन् 1937-38 ई. में लेनिनग्राद यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए गये थे।

5. राहुल सांकृत्यायन कितने भाषा जानते थे?

राहुल सांकृत्यायन जी लगभग 36 एशियाई और यूरोपीय भाषाओं के ज्ञाता थे और लगभग 150 ग्रंथों का प्रणयन करके इन्होंने राष्ट्रभाषा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

6. राहुल सांकृत्यायन की रचनाएं कौन कौन सी है?

राहुल सांकृत्यायन जी की मुख्य रचनाएँ हैं- लंका, तिब्बत यात्रा, जापान, ईरान और रूस में पच्चीस मास। इनके कुछ अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ इस प्रकार हैं- 1. बोल्गा से गंगा (कहानी संग्रह), 2. सिंह सेनापति और 3. जय यौधेय (उपन्यास), 4. मेरी जीवन यात्रा (आत्मकथा) 5. दर्शन दिग्दर्शन (दर्शन), 6. विश्व की रूपरेखा (विज्ञान), मध्य एशिया का इतिहास (इतिहास) तथा 8. शासन शब्द कोश, 9. राष्ट्रभाषा कोश और 10. तिब्बती हिन्दी कोश (कोश)।

7. राहुल सांकृत्यायन की मृत्यु कब और कहां हुई?

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन जी की मृत्यु 14 अप्रैल, सन् 1963 ईस्वी को दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल मे हुई थी।

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