शिवप्रसाद सिंह – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली | Shiv Prasad Singh biography in hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “शिवप्रसाद सिंह का जीवन परिचय” (Shiv Prasad Singh biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने शिव प्रसाद सिंह का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली एवं साहित्य में स्थान और शिव प्रसाद सिंह किस युग के कवि हैं को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने शिवप्रसाद जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

शिवप्रसाद सिंह का जीवन परिचय

शिवप्रसाद जी का जन्म 19 अगस्त, सन् 1928 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के जलालपुर गाॅंव के एक किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री चन्द्रिकाप्रसाद सिंह था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा वाराणसी के उदय-प्रताप विद्यालय में हुई। इसके बाद इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम०ए० एवं पी-एच० डी० की उपाधियाँ प्राप्त कीं। शिवप्रसाद जी ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्राचार्य के पद पर भी कार्य किया। इन्होंने आलोचना, शोध, सम्पादन, जीवनी, कहानी, नाटक एवं उपन्यास आदि सभी दिशाओं में काम किया है। इनकी प्रसिद्ध कहानी ‘कर्मनाशा की हार’ का अनुवाद डेनिश, अँग्रेजी, उर्दू, रूसी, जर्मन आदि विदेशी भाषाओं में हो चुका है। 28 सितम्बर, सन् 1998 ईस्वी को काशी में इनका असामयिक देहावसान हो गया।

शिवप्रसाद सिंह का साहित्यिक परिचय

शिवप्रसाद जी की कहानियों में सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन के समसामयिक चित्रों का अंकन किया गया है। ग्रामांचलों के प्रति इनकी विशेष रुचि रही है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक समस्याओं तथा रूढ़ियों से ग्रस्त मानव के प्रति इन्हें गहन संवेदना है। ये समन्वयशील विचारक हैं। जीवनीय यथार्थ को ये नैतिक समाधान देते हैं। प्राचीन नैतिक आदर्शों पर आधारित नैतिकता, बौद्धिकता और तर्क की कसौटी पर भी खरी उतरती हैं। इनकी कहानियों में निम्न वर्ग के प्रतिनिधि पात्र स्थान पाते रहे हैं। चरित्र-चित्रण व्यक्तिपरक तथा मनोवैज्ञानिक होता है। समस्यात्मक पृष्ठभूमि पर आधारित पात्रों के मनोद्वन्द्व को उभारने में ये सिद्धहस्त रहे हैं।

शिवप्रसाद सिंह की प्रमुख रचनाएं

शिवप्रसाद जी ने अनेक विधाओं में लेखनी की है। इनकी प्रमुख रचनाएं निम्नलिखित है—
कहानी-संग्रह — ‘आर-पार की माला’, ‘कर्मनाशा की हार’, ‘मुरदा सराय’, ‘इन्हें भी इन्तजार है’, ‘भेड़िए’ आदि।
नाटक — ‘घाटियाँ गूॅंजती हैं’ आदि।
उपन्यास — ‘अलग-अलग वैतरणी’ और ‘गली आगे मुड़ती है’ आदि।

इसके अलावा, ‘दादी माँ’, ‘पाप जीवी’, ‘बिंदा महाराज’, ‘हाथ का दाग’, ‘केवड़े का फूल’, ‘सुबह के बादल’, ‘अरुन्धती’, ‘मुरदा सराय’ आदि भी इनकी श्रेष्ठ कहानियाँ हैं।

शिवप्रसाद सिंह की भाषा शैली

शिवप्रसाद जी की कहानियों की भाषा प्रांजल है किन्तु व्यावहारिक और लोक जीवन की शब्दावली का सटीक प्रयोग मिलता है। इनकी रचना शैली सरलता, सहजता तथा चित्रात्मकता से युक्त है। भावात्मकता एवं कवित्वपूर्ण वर्णनों के कारण इनकी कहानियाँ अति मोहक एवं मर्मस्पर्शी बन पड़ी हैं।

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One thought on “शिवप्रसाद सिंह – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली | Shiv Prasad Singh biography in hindi

  1. हिंदी साहित्यकार का परिचय और भाषा शैली और वह किस युग से संबंधित है

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