शिवमंगल सिंह सुमन – जीवन परिचय, रचनाएं, भाषा शैली, पुरस्कार व साहित्य में स्थान

डॉ शिवमंगल सिंह सुमन एक प्रसिद्ध भारतीय हिंदी कवि, लेखक, शिक्षाविद् और स्वतंत्रता सेनानी थे। इन्होंने हिंदी भाषा में काव्य, कविता और कहानियों की रचनाएं की और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भूमिका निभाई, तो आइए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको “डॉ शिवमंगल सिंह सुमन की जीवनी” (Shivmangal Singh Suman biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, इस लेख में हमने शिवमंगल सिंह सुमन का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, कविताएं, भाषा शैली, उपलब्धियां एवं पुरस्कार तथा शिवमंगल सिंह सुमन का साहित्य में स्थान को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है। इसके अलावा, सुमन जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए गए हैं।

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शिवमंगल सिंह सुमन का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने डॉ सुमन जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
शिवमंगल सिंह सुमन की जीवनी –

शिवमंगल सिंह सुमन की जीवन
पूरा नामडॉ शिवमंगल सिंह सुमन
उपनामसुमन
जन्म5 अगस्त, 1915 ई.
जन्म स्थानग्राम-झगरपुर, जनपद-उन्नाव, उत्तर प्रदेश
मृत्यु27 नवंबर, 2002 ई.
मृत्यु स्थानउज्जैन, मध्य प्रदेश
पिता का नामबख्श सिंह ठाकुर साहब
माता का नामज्ञात नहीं
व्यवसायकवि, लेखक, शिक्षाविद्, समाज विचारक
शिक्षाएम०ए० (हिंदी में), पीएचडी
विद्यालयकाशी हिन्दू विश्वविद्यालय
नागरिकताभारतीय
साहित्य कालआधुनिक काल (प्रगतिवादी युग)
भाषासरल, व्यावहारिक
शैलीओज, प्रसादगुणों की प्रधानता
प्रमुख रचनाएंमिट्टी की बारात, हिल्लोल, जीवन के गान, विश्वास बढ़ती ही गया, पर आंखें नहीं भरी, विन्ध्य हिमालय आदि।
पुरस्कारदेव पुरस्कार (1958), सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार (1974), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974), पद्मश्री (1974), शिखर सम्मान (1993), भारत भारती पुरस्कार (1993), पद्म-भूषण (1999)।
हिंदी साहित्य में स्थानकवि, लेखक, शिक्षाविद् और सामाजिक सुधारक के रूप में
शिवमंगल सिंह सुमन की जीवनी

डॉ शिवमंगल सिंह सुमन (Shivmangal Singh Suman) (5 अगस्त 1915 -27 नवंबर 2002) एक प्रख्यात हिंदी कवि, लेखक और शिक्षाविद थे, जिन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को उजागर किया। वह आधुनिक भारतीय काव्य के प्रमुख संदर्भ और उदात्त आदर्शों के प्रचारक रहे हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज के जीवन में सामाजिक न्याय, स्वतंत्रता, भाषा, विचारधारा और मानवीयता के मुद्दों को उजागर और जागृत किया।

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शिवमंगल सिंह सुमन का जीवन परिचय

शिवमंगल सिंह सुमन, जिन्हें ‘सुमन’ के नाम से भी जाना जाता है, ये एक भारतीय हिंदी कवि, लेखक, शिक्षाविद् एवं सामाजिक विचारक थे। इनका जन्म 05 अगस्त, सन् 1915 ईस्वी (संवत् 1972 श्रवण मास शुक्ल पक्ष नागपंचमी) को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के झगरपुर गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम ठाकुर साहब बख्श सिंह था। इनकी माता का नाम हमें ज्ञात नहीं है।

शिवमंगल सिंह सुमन
शिवमंगल सिंह सुमन का जीवन परिचय

शिवमंगल सिंह सुमन जी ने अधिकांश रूप से रीवा, ग्वालियर आदि स्थानों में रहकर प्रारंभिक शिक्षा से लेकर कॉलेज तक की शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् सन् 1940 ई. में इन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से परास्नातक (एम० ए०, हिंदी में) की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1942 ई. में इन्होंने विक्टोरिया कॉलेज में हिंदी प्रवक्ता के पद पर कार्य करना प्रारंभ कर दिया था। सन् 1948 ई. में माधव कॉलेज उज्जैन में हिंदी विभाग के अध्यक्ष पद पर नियुक्त हुए। 2 वर्षों के बाद सन् 1950 ई. में इनको ‘हिंदी गीतिकाव्य का उद्भव विकास और हिन्दी साहित्य में उसकी परंपरा’ शोध प्रबन्ध पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने इन्हें “डी०-लिट्०” (डॉक्टर्स ऑफ़ लेटर्स) की उपाधि प्रदान की। और सन् 1954 – 56 ई. तक इन्होंने होल्कर कॉलेज इंदौर में हिंदी विभाग के अध्यक्ष पद पर भी सुचारू रूप से कार्य किया। और सन् 1956 – 61 ई. तक नेपाल स्थित भारतीय दूतावास में इन्हें सांस्कृतिक और सूचना विभाग का कार्यभार भी सौंपा गया।

सन् 1961 – 68 ई. तक माधव कॉलेज उज्जैन में डॉ शिवमंगल सिंह सुमन जी प्राचार्य के पद पर कार्य करते रहे। इन 8 वर्षों के बीच सन् 1964 ई. में ये विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में कला संकाय के डीन तथा व्यवसायिक संगठन शिक्षण समिति एवं प्रबन्धकारिणी सभा के सदस्य भी रहे। सन् 1968 – 70 ई. तक सुमन जी विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन में कुलपति के पद पर आसीन रहें। सन् 1958 ई. में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा इनके काव्य-संग्रह ‘विश्वास बढ़ता ही गया’ पर इन्हें “देव” पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तथा सन् 1974 ई. को ‘मिट्टी की बारात’ नामक काव्य-संग्रह पर सुमन जी को “साहित्य अकादमी पुरस्कार” से सम्मानित किया गया। और सन् 1974 ई. में भारत सरकार द्वारा इन्हें “पद्मश्री” की उपाधि से भी विभूषित किया गया था। 27 नवम्बर, सन् 2002 ईस्वी को डॉ शिवमंगल सिंह सुमन जी का 87 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया था।

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शिवमंगल सिंह सुमन का साहित्यिक परिचय

डॉ सुमन जी प्रगतिवादी कवि के रूप में हमारे समक्ष अपनी काव्य रचनाओं के माध्यम से उपस्थित होते हैं। सुमन जी की कविताओं में दलित, पीड़ित, शोषित एवं वंचित श्रमिक वर्ग का समर्थन किया गया है। साथ ही सामान्य रूप से पूंजीपति वर्ग तथा उनके अत्याचारों का खंडन भी अपनी रचनाओं के माध्यम से किया है। सामयिक समस्याओं का विवेचन उनकी कविताओं का प्रमुख अंग रहा है। सुमन जी की कविताओं में आस्था और विश्वास का स्वर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। डॉ सुमन जी ने समाज की रूढ़ीवादी परंपराओं तथा वर्ण जातिगत विषमताओं एवं भाग्यवादी विचारधारा का खण्डन भी किया है।

डॉ शिवमंगल सिंह सुमन जी को मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उनके काव्य संग्रह ‘विश्वास बढ़ता ही गया’ के लिए ‘देव पुरस्कार’ प्राप्त हुआ। और ‘मिट्टी की बारात’ नामक काव्य संग्रह पर सुमन जी को “साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तथा भारत सरकार द्वारा इन्हें ‘पद्मश्री’ की उपाधि से भी अलंकृत किया गया था। डॉ सुमन जी ने अक्टूबर सन् 1974 ई. में नागपुर विश्वविद्यालय महाराष्ट्र में दीक्षांत भाषण दिया। पुनः 24 अप्रैल सन् 1977 ईस्वी को राष्ट्रीय संग्रहालय नई दिल्ली में पंचम् दिनकर स्मृति व्याख्यान माला के अंतर्गत भाषण के लिए सुमन जी को आमंत्रित किया गया था।

डॉ शिवमंगल सिंह सुमन जी को सन् 1975 ई. में राष्ट्रकुल विश्वविद्यालय परिषद् के लंदन विश्वविद्यालय स्थित मुख्यालय में कार्यकारिणी परिषद् के सदस्य के रूप में इनकी नियुक्ति की गई। 17-18 जनवरी, सन् 1977 ई. को भारतीय विश्वविद्यालय परिषद् को कोयम्बटूर (तमिलनाडु) में हुए 52वें वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता की। पुनः 15-16 जनवरी, सन् 1978 ई. को सौराष्ट्र विश्वविद्यालय राजकोट में भारतीय विश्वविद्यालय परिषद् के 53वें अधिवेशन की अध्यक्षता की। और सन् 1993 ई. में सुमन जी को “भारत भारती” पुरस्कार और “शिखर सम्मान” से भी सम्मानित किया गया था। इसके अलावा, सन् 1999 ई. में भारत सरकार के राष्ट्रपति द्वारा डॉ शिवमंगल सिंह सुमन जी को “पद्म-भूषण” की उपाधि से विभूषित किया गया था।

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शिवमंगल सिंह सुमन की प्रमुख रचनाएं

सुमन जी की प्रमुख रचनाएं एवं कृतियां निम्नलिखित हैं –
हिल्लोल ⇒ यह सुमन जी के प्रेम-गीतों का प्रथम काव्य-संग्रह है। इसमें हृदय की कोमल भावनाओं को चित्रित किया गया है।
जीवन के गान, प्रलय सृजन, विश्वास बढ़ता ही गया ⇒ इन सभी संग्रहों की कविताओं में क्रांतिकारी भावनाएं व्याप्त हैं। इन कविताओं में पीड़ित मानवता के प्रति सहानुभूति तथा पूंजीवाद के प्रति आक्रोश है।
विन्ध्य हिमालय ⇒ इसमें देश-प्रेम तथा राष्ट्रीयता की कविताएं शामिल हैं।
पर ऑंखें नहीं भरीं ⇒ यह प्रेम-गीतों का संग्रह है।
मिट्टी की बारात ⇒ इस काव्य-संग्रह पर सुमन जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

शिवमंगल सिंह सुमन के काव्य संग्रह

  • हिल्लोल (सन् 1939 ई.)
  • जीवन के गान (सन् 1942 ई.)
  • युग का मोल (सन् 1945 ई.)
  • विश्वास बढ़ता ही गया (सन् 1948 ई.)
  • प्रलय-सृजन (सन् 1950 ई.)
  • विन्ध्य हिमालय (सन् 1960 ई.)
  • मिट्टी की बारात (सन् 1972 ई.)
  • वाणी की व्यथा (सन् 1980 ई.)
  • कटे ॲंगूठों की बंदनवाटें (सन् 1991 ई.) आदि।

शिवमंगल सिंह सुमन की गद्य रचनाएं

  • महादेवी की काव्य साधना
  • गीतिकाव्य – उधम और विकास

शिवमंगल सिंह सुमन के नाटक

  • प्रकृति पुरुष कालिदास

शिवमंगल सिंह सुमन की कविताएं

  • पर ऑंखें नहीं भरीं
  • मैं नहीं आया तुम्हारे द्वार
  • पतवार
  • मैं बढ़ता ही जा रहा हूॅं
  • आभार
  • सूनी साॅंझे
  • विवशता
  • असमंजस
  • चलना हमारा काम है
  • सांसो का हिसाब
  • मृतिका दीप
  • बाद की बात
  • हम पंक्षी उन्मुक्त गगन के
  • वरदान माॅंगूंगा नहीं
  • तूफानों की ओर घुमा दो नाविक
  • मेरा देश जल रहा कोई नहीं बुझाने वाला
  • मैं अकेला और पानी बरसाता है
  • चल रही उसकी कुदाली
  • अंगारे और धुआं
  • मिट्टी की महिमा
  • रणभेरी
  • जल रहे हैं दीप जलती है जवान ⇒ भाग-1, भाग-2, भाग-3
  • सहमते स्वर-1, 2, 3, 4, 5 आदि।

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शिवमंगल सिंह सुमन की भाषा शैली

भाषा सुमन जी की भाषा जनजीवन के समीप सरल तथा व्यावहारिक भाषा है। छायावादी रचनाओं की भाषा अलंकरण, दृढ़ता, अस्पष्टता, वयवीयता आदि आपकी रचनाओं में नहीं है। इसके विपरीत स्पष्टता और सरलता है। जनसाधारण में प्रस्तुत होने वाली भाषा का प्रयोग हुआ है। भाषा में उर्दू शब्दों को पर्याप्त प्रश्रय मिला है।
सुमन जी ने अनेक नये शब्दों का निर्माण भी किया है, जिन्हें हम तीन भागों में बाँट सकते हैं- (क) नवीन सन्धि, शब्द, (ख) सरल सामाजिक योजना तथा (ग) देशज शब्द ।
भाषा को प्रभविष्णु बनाने के लिए सुमन जी ने पुनरुक्ति को भी अपनाया है।

शैली – सुमन जी की शैली में ओज और प्रसाद गुणों की प्रधानता है। उन्होंने अपनी रचनाओं में लाक्षणिकता का भी प्रयोग किया है। सुमन जी की कविताओं की अभिव्यक्ति सौन्दर्य की एक विशेषता काव्यवाद का निर्वहन भी है। इसके अन्तर्गत जीवन की वर्तमान समस्याओं का पौराणिक घटनाओं से साम्य स्थापित किया है। आपकी कविताओं में प्रतीक विधान भी दर्शनीय हैं। सुमन जी की कविताओं में अलंकारों की समास योजना नहीं है। अनायास ही जो अलंकार आपकी कविताओं में आ गये हैं, ये भावोत्कर्ष में सहायक हुए हैं।

शिवमंगल सिंह सुमन के पुरस्कार

  1. सन् 1958 ई. में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उनके काव्य संग्रह ‘विश्वास बढ़ता ही गया’ पर “देव” पुरस्कार दिया गया।
  2. सन् 1964 ई. में ‘पर ऑंखें नहीं भरी’ काव्य संग्रह पर “नवीन” पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  3. सन् 1974 ई. में भारत सरकार द्वारा उन्हें “पद्मश्री” की उपाधि से विभूषित किया गया।
  4. सन् 1973 ई. में भागलपुर विश्वविद्यालय बिहार द्वारा “डी०-लिट्०” की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया।
  5. सन् 1950 ई. में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने “डी०-लिट्०” की उपाधि से अलंकृत किया।
  6. सन् 1974 ई. में उन्हें “सोवियत लैण्ड नेहरू” पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  7. सन् 1974 ई. को ‘मिट्टी की बारात’ नामक काव्य संग्रह पर “साहित्य अकादमी पुरस्कार” से सम्मानित किया गया।
  8. सन् 1993 ई. में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा “शिखर सम्मान” से सम्मानित किया गया।
  9. सन् 1993 ई. में उन्हें “भारत-भारती” पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
  10. सन् 1999 ई. में भारत के राष्ट्रपति द्वारा डॉ शिवमंगल सिंह सुमन जी को “पद्म-भूषण” की उपाधि से भी अलंकृत किया गया था।

शिवमंगल सिंह सुमन का साहित्य में स्थान

‘सुमन’ जी भारतीय माटी की वह गन्ध हैं, जिसमें जीवन रस- आनन्द सर्वत्र महकता रहता है । जिस प्रकार पृथ्वी की अभिव्यक्ति वनस्पतियों द्वारा होती है उसी प्रकार वनस्पतियों के रस से जीवित मानव प्राणी की अभिव्यक्ति उसकी कलात्मकता और वैज्ञानिकता में होती है। ‘सुमन’ जी भारतीय संस्कृति के अभिवक्ता हैं। प्रकृति के रूप, रस, गन्ध आदि के चितेरे भी हैं। जीवन रस की मादकता के गायक हैं। जनसामान्य के दुःख-दर्द से द्रवित होने वाले मानव और परम्परागत गौरव गरिमा के संरक्षक हैं। उनके इन्हीं विशिष्ट रूपों को काव्य में पहचाना गया है। एक युग विशेष की मानसिकता की झाँकी उनके काव्य के गुणों से परिपूर्ण एवं प्रभावशाली है ।

अंत में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ‘सुमन’ जी का हिन्दी साहित्य में अपना एक विशिष्ट स्थान है। वे हिन्दी साहित्य को ऐसी निधि प्रदान कर गये हैं जो कभी भी नष्ट नहीं हो सकती है। शरीर तो नश्वर है लेकिन वैचारिक शरीर शाश्वत रूप से जीवित रहता है । सुमन जी अपनी कृतियों के माध्यम से हिन्दी साहित्य के प्रेमियों के मानस पटल पर सदैव नित नवीन रूप में मुस्कराते रहेंगे।

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FAQs. शिवमंगल सिंह सुमन जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. शिवमंगल सिंह सुमन का जन्म कब और कहां हुआ था?

शिवमंगल सिंह सुमन जी का जन्म 05 अगस्त, सन् 1915 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के झगरपुर ग्राम में हुआ था।

2. शिवमंगल सिंह जी का उपनाम क्या है?

‘सुमन’ शिवमंगल सिंह जी का उपनाम है।

3. शिवमंगल सिंह की मृत्यु कब हुई थी?

शिवमंगल सिंह सुमन जी की मृत्यु 27 नवम्बर, सन् 2002 ईस्वी को मध्यप्रदेश के उज्जैन में हुई थी।

4. शिवमंगल सिंह सुमन कौन से युग के कवि हैं?

शिवमंगल सिंह सुमन जी आधुनिक काल के प्रगतिवादी काव्यधारा युग के कवि हैं।

5. शिवमंगल सिंह सुमन के पिता का नाम क्या है?

शिवमंगल सिंह सुमन जी के पिता का नाम ठाकुर साहब बख्श सिंह है।

6. शिवमंगल सिंह सुमन को कौनसे पुरस्कार मिले हैं?

शिवमंगल सिंह सुमन जी को निम्न पुरस्कारों से नवाजा गया है जो कि इस प्रकार है – देव पुरस्कार (1958), डी०-लिट्० (1973), सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार (1974), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1974), पद्मश्री (1974), शिखर सम्मान (1993), भारत भारती पुरस्कार (1993), पद्म-भूषण (1999)।

7. शिवमंगल सिंह सुमन की रचना कौन हैं?

शिवमंगल सिंह सुमन की प्रमुख रचनाएं – जीवन के गान, विश्वास बढ़ता ही गया, मिट्टी की बारात, हिल्लोल, पर ऑंखें नहीं भरी, विन्ध्य हिमालय, युग का मोल, प्रलय-सृजन, महादेवी की काव्य साधना, गीतिकाव्य – उधम और विकास आदि।

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