श्यामसुंदर दास: जीवन परिचय, साहित्यिक, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल में हमने “श्यामसुंदर दास का जीवन परिचय” (Shyamsundar Das biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। इसमें हमने डॉ श्यामसुन्दरदास का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, निबन्ध, भाषा शैली, उपाधि व साहित्य में स्थान और हिन्दी भाषा के विकास को लेकर बाबू श्याम सुन्दर दास के विचार मत पर प्रकाश डालिए? आदि को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया गया है, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें। इसके अलावा इसमें हमने श्यामसुन्दर जी के जीवन से जुड़े प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

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श्यामसुंदर दास का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने श्यामसुन्दर जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
श्यामसुंदर दास की जीवनी –

पूरा नामडॉ० श्यामसुन्दर दास
जन्मसन् 1875 ईस्वी में
जन्म स्थानकाशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश में
मृत्युसन् 1945 ईस्वी में
पिता का नामश्री देवीदास खत्री
शिक्षाबी० ए० (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)
पैशालेखक, साहित्यकार, संपादक, अध्यापक
लेखन विधाग्रन्थ, अनुवाद, पत्रिका, कविता, इतिहास
साहित्य कालआधुनिक काल (द्विवेदी युग)
प्रसिद्धि‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ के संस्थापक
उपाधि‘साहित्य वाचस्पति’ और ‘डी०-लीट्०’
भाषाशुद्ध, साहित्यिक हिन्दी और संस्कृत भाषा
शैलीविचारात्मक, गवेषणात्मक तथा व्याख्यात्मक
प्रमुख रचनाएंहिंदी कोविद रत्नमाला, साहित्यालोचन, रूपक-रहस्य, भाषा-रहस्य, भाषा-विज्ञान आदि।
साहित्य में स्थानद्विवेदी युग के महान् गद्यकार के रूप में इनका हिंदी-साहित्य जगत् में विशेष स्थान है।

श्यामसुंदर दास का जीवन परिचय (shyamsundar das ka jivan parichay)

द्विवेदी युग के महान् साहित्यकार बाबू श्यामसुन्दरदास का जन्म सन् 1875 ईस्वी को उत्तर प्रदेश के काशी (वाराणसी) के प्रसिद्ध खत्री नामक परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री देवीदास तथा माता का नाम हमें ज्ञात नहीं है। श्यामसुन्दरदास जी का बचपन बड़े सुख और आनन्द में बीता। सर्वप्रथम इन्होंने संस्कृत की शिक्षा प्राप्त की। तत्पश्चात् परीक्षाएँ उत्तीर्ण करते हुए सन् 1897 ई० में इन्होंने स्नातक, बी० ए० पास किया। बाद में आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण चन्द्रप्रभा प्रेस में 40 रु० मासिक वेतन पर नौकरी की।

श्यामसुंदर दास
श्यामसुंदर दास का जीवन परिचय

इसके बाद श्यामसुंदर दास जी ने काशी के हिन्दू स्कूल में सन् 1899 ई० में कुछ दिनों तक अध्यापन कार्य किया। इसके बाद ये लखनऊ के कालीचरण हाईस्कूल में प्रधानाध्यापक हो गये। इस पद पर नौ वर्ष तक कार्य किया। इन्होंने 16 जलाई, सन् 1893 ई० को विद्यार्थी काल में ही अपने दो सहयोगियों रामनारायण मिश्र और ठाकुर शिवकुमार सिंह की सहायता से ‘नागरी प्रचारिणी सभा’ की स्थापना की। अन्त में काशी हिन्दु विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष हो गये और अवकाश ग्रहण करने तक इसी पद पर बने रहे। निरन्तर कार्य करते रहने के कारण इनका स्वास्थ्य खराब हो गया और सन् 1945 ईस्वी में इनकी मृत्यु हो गयी।

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श्यामसुंदर दास का साहित्यिक परिचय

श्यामसुन्दरदास जी अपने जीवन के पचास वर्षों में अनवरत रूप से हिन्दी की सेवा करते हुए उसे कोश, इतिहास, काव्यशास्त्र, भाषा-विज्ञान, शोधकार्य, उपयोगी साहित्य, पाठ्य-पुस्तक और सम्पादित ग्रन्थ आदि से समृद्ध किया, उसके महत्त्व की प्रतिष्ठा की, उसकी आवाज को जन-जन तक पहुँचाया, उसे खण्डहरों से उठाकर विश्वविद्यालयों के भव्य भवनों में प्रतिष्ठित किया। वह अन्य भाषाओं के समकक्ष बैठने की अधिकारिणी हुई। हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने इन्हें “साहित्य वाचस्पति” और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने “डी० लिट्०” की उपाधि देकर इनकी साहित्यिक सेवाओं की महत्ता को स्वीकार किया।

श्यामसुंदर दास की रचनाएँ

डॉ श्यामसुन्दरदास जी की प्रमुख रचनाएं एवं कृतियां कुछ इस प्रकार से हैं— (1). साहित्यालोचन, (2). हिन्दी कोविद रत्नमाला, (3). रूपक रहस्य, (4). भाषा रहस्य, (5). भाषा विज्ञान, (6). हिन्दी भाषा और साहित्य, (7). गोस्वामी तुलसीदास, (8). साहित्यिक लेख, (9). मेरी आत्म-कहानी, (10). हिन्दी साहित्य निर्माता, (11). भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, (12). नागरी वर्णमाला और (13). गद्य कुसुमावली, (14). कबीर ग्रंथावली इनकी प्रमुख मौलिक कृतियाँ हैं। इसके अतिरिक्त सम्पादित ग्रन्थ, संकलित ग्रन्थ एवं पाठ्य-पुस्तकों की संख्या भी बहुत है।

श्यामसुंदर दास जी की भाषा

बाबू श्यामसुन्दरदास की भाषा सिद्धान्त निरूपण करनेवाली सीधी, ठोस, भावुकता विहीन और निरलंकृत होती है। विषय प्रतिपादन की दृष्टि से ये संस्कृत शब्दों का प्रयोग करते हैं और जहाँ तक बन पड़ा है, विदेशी शब्दों के प्रयोग से बचते रहे हैं। कहीं-कहीं पर इनकी भाषा दुरूह और अस्पष्ट भी हो जाती है। उसमें लोकोक्तियों का प्रयोग भी बहुत ही कम है। वास्तव में इनकी भाषा का महत्त्व उपयोगिता की दृष्टि से है और उसमें एक विशिष्ट प्रकार की साहित्यिक गुरुता है। इनकी प्रारम्भिक कृतियों में भाषा-शैथिल्य दिखायी देता है किन्तु धीरे-धीरे वह प्रौढ़, स्वच्छ, परिमार्जित और संयत होती गयी है।

श्यामसुंदर दास जी की शैली

बाबू साहब ने अत्यन्त गंभीर विषयों को बोधगम्य शैली में प्रस्तुत किया है। संस्कृत के तत्सम शब्दों के साथ तद्भव शब्दों का भी यथेष्ट प्रयोग करके इन्होंने शैली को दुरूह बनने से बचाया है। इनकी शैली में सुबोधता, सरलता और विषय-प्रतिपादन की निपुणता है, इनके वाक्य-विन्यास जटिल और दुर्बोध नहीं हैं। इनकी भाषा में उर्दु फारसी के शब्दों तथा मुहावरों का प्रायः अभाव है। व्यंग्य, वक्रोक्ति तथा हास-परिहास से इनके निबंध प्रांयः शुन्य हैं। विषय प्रतिपादन के अनुरूप इनकी शैली में वैज्ञानिक पदावली का समीचीन प्रयोग हुआ है। हिन्दी भाषा को सर्वजन सुलभ, वैज्ञानिक और समृद्ध बनाने में इनका योगदान अप्रतिम है। इन्होंने विचारात्मक, गवेषणात्सक तथा व्याख्यात्मक शैलियों का व्यवहार किया है। आलोचना, भाषा-विज्ञान, भाषा का इतिहास, लिपि का विकास आदि विषयों पर इन्होंने वैज्ञानिक एवं सैद्धांतिक विवेचन प्रस्तुत कर हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया है।

श्यामसुंदर दास का निबंध

प्रस्तुत निबंध ‘भारतीय साहित्य की विशेषताएँ’ में लेखक ने भारतीय साहित्य की अनेक विशेषताओं का वर्णन किया है। पहली विशेषता समन्वय की है। भारतीय दर्शन में परमात्मा तथा जीवात्मा में कोई अन्तर नहीं माना जाता। लेखक के अनुसार इसी दार्शनिक मान्यता के आधार पर कला व साहित्य में समन्वय का आदर्श प्रमुख बना। दूसरी विशेषता धार्मिक भावों की प्रचुरता है। इस दूसरी विशेषता के कारण लौकिक जीवन की अनेकरूपता प्रदर्शित न हो सकी। इन दो मुख्य विशेषताओं के अतिरिक्त देश की जलवायु और भौगोलिक स्थिति का भी साहित्य पर प्रभाव पड़ता है। जातिगत तथा देशगत विशेषताओं की ओर लेखक ने ध्यान आकृष्ट करते हुए इनका प्रभाव साहित्य के भावपक्ष एवं कलापक्ष पर स्पष्ट किया है। सम्पूर्ण निबंध में लेखक ने आलोचनात्मक दृष्टि अपनायी है।

श्यामसुंदर दास जी का साहित्य में स्थान

साहित्य में स्थान- द्विवेदी युग के महान् गद्यकार डॉ० श्यामसुन्दरदास जी ने निरंतर साहित्य साधना करते हुए हिंदी-साहित्य जगत् में अपूर्व वृद्धि की। इन्होंने हिन्दी भाषा को परिष्कृत रूप प्रदान करने और मातृभाषा का प्रचार करने की दृष्टि से भी अविस्मरणीय योगदान दिया। हिंदी साहित्य में बाबू श्यामसुन्दरदास जी का हिन्दी प्रचारक और हिन्दी उन्नायक के रूप में विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है।

FAQs. डॉक्टर श्यामसुंदर दास जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. श्यामसुंदर दास का जन्म काल क्या है?

द्विवेदी युग के महान् साहित्यकार बाबू श्यामसुन्दर दास का जन्म उत्तर प्रदेश के काशी में सन् 1875 ईस्वी को हुआ था।

2. श्यामसुंदर दास कौन से युग के लेखक हैं?

डॉ श्यामसुन्दरदास जी द्विवेदी युग (आधुनिक काल) के लेखक हैं।

3. कबीर ग्रंथावली श्यामसुंदर दास प्रकाशन वर्ष?

कबीरदास जी के अध्ययन पर सबसे प्रामाणिक और संपूर्ण रचना मानी जाने वाली “कबीर ग्रंथावली” का संशोधित संस्करण 4 जून को कबीर की 626वीं जयंती के अवसर प्रदान किया। कबीर की रचनाओं की सदियों पुरानी हस्तलिखित प्रतियों के आधार पर बाबू श्यामसुंदर दास जी ने सन् 1928 ईस्वी में पहली बार पुस्तक का संपादन किया था।

4. साहित्यालोचन के लेखक का नाम क्या है?

‘डाॅक्टर श्यामसुंदर दास’ जी ने ‘साहित्यालोचन’ नामक रचना का प्रकाशन सन् 1923 ई० में किया था।

5. श्यामसुंदर दास के पिता का नाम क्या था?

श्यामसुन्दर दास जी के पिता का नाम श्री देवीदास खत्री तथा माता का नाम हमें ज्ञात नहीं है।

6. श्यामसुंदर दास की मृत्यु कब हुई थी?

डाॅ श्यामसुन्दर दास जी का स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण सन् 1945 ईस्वी में इनकी मृत्यु हो गयी थी।

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