श्रीराम शर्मा: जीवन परिचय, रचनाएं, प्रमुख विचार एवं भाषा शैली

हेलो दोस्तों, इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको “श्रीराम शर्मा का जीवन परिचय” (Shriram Sharma biography in Hindi) के बारे में बताएंगे। इसमें हम आपको श्रीराम शर्मा का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, प्रमुख रचनाएं, भाषा शैली, श्रीराम शर्मा का जन्म कब और कहां हुआ तथा उनके अनमोल वचन के बारे में विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

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श्रीराम शर्मा का संक्षिप्त परिचय

इसमें पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया गया है।
श्रीराम शर्मा की जीवनी –

पूरा नामपंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
जन्मतिथि20 सितंबर, 1911 ई.
जन्म स्थानआंवलखेड़ा ग्राम, आगरा (उत्तर प्रदेश)
मृत्यु02 जून, 1990 ई.
पिता का नामपंडित श्री रूपकिशोर शर्मा
माता का नामश्रीमती दानकुंवारी देवी
पत्नी का नामश्रीमती भगवती देवी
पुत्र व पुत्रीश्री मृत्युञ्जज्य शर्मा, श्री ओमप्रकाश शर्मा, श्रीमती दयावती, शैलबाला पंड्या, श्रद्धा
संस्थापकअखिल विश्व गायत्री परिवार
व्यवसायलेखक, पत्रकारिता
साहित्य युगशुक्लोत्तर युग
संपादनविशाल भारत
प्रमुख रचनाएंशिकार साहित्य, सन् बयालीस के संस्मरण, जंगल के जीव, प्राणों का सौदा, बोलती प्रतिमा
भाषासरल, प्रवाहपूर्ण, सशक्त
शैलीवर्णनात्मक विवेचनात्मक आत्मकथात्मक

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी एक भारतीय दर्शनिक, समाज सुधारक, योगी, विचारशील और आध्यात्मिक गुरु थे। उन्होंने वैदिक सनातन संस्कृति के प्रचारक और समाज के विभिन्न क्षेत्रों में प्रगटन के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया था। वे आर्य समाज, योग, ध्यान, संत-महात्माओं के आदर्शों और आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से मानव सेवा को प्रोत्साहित करने के लिए अपने जीवन के दौरान विशेष महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

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श्रीराम शर्मा का जीवन परिचय

श्रीराम शर्मा, जिन्हें पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के नाम से भी जाना जाता है। ये भारत के एक प्रख्यात आध्यात्मिक नेता, दार्शनिक, समाज सुधारक और लेखक थे, उनका जन्म 20 सितंबर, 1911 ई. को उत्तर प्रदेश राज्य में आगरा जिले के आंवलखेड़ा ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री रूपकिशोर और माता का नाम दानकुंवारी देवी था। शर्मा जी का जन्म एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। एक बच्चे के रूप में भी उन्होंने आध्यात्मिकता और गहन चिंतन की ओर झुकाव प्रदर्शित किया। उन्हें प्राचीन भारतीय धर्मग्रंथों और योगाभ्यासों में बहुत रुचि थी।

श्रीराम शर्मा
श्रीराम शर्मा का जीवन परिचय

श्रीराम शर्मा जी ने “शिकार साहित्य” के सर्वाधिक प्रसिद्ध ग्रंथ लेखक थे। यथार्थ में उनके इस लेखन दिशा में किया गया कार्य सर्वप्रथम में ही सफल प्रयास था। इसके बाद भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय ने आचार्य जी के पवित्र सूत्र समारोह की शुरूआत की और उन्हें गायत्री मंत्र की दीक्षा दी। मात्र 15 वर्ष की अल्पायु से 24 वर्ष की आयु तक श्रीराम शर्मा जी हर वर्ष 24 लाख बार गायत्री मंत्र का जप किया करते थे।

इसके बाद, उन्होंने महात्मा गांधी जी के विचारों और वाराणसी के संतो से प्रभावित होकर स्वदेशी आंदोलन में भाग लेने का अवसर प्रदान किया और फिर शर्मा जी ने अपने जीवन को सामाजिक सुधार और आध्यात्मिक के क्षेत्र में समर्पित कर दिया। दुर्भाग्य से एक बीमारी के कारण 02 जून, 1990 ई. को श्रीराम शर्मा आचार्य का देहांत हो गया था।

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श्रीराम शर्मा का साहित्यिक योगदान

श्रीराम जी ने ‘विशाल भारत’ नामक एक पत्रिका का संपादन किया था। शर्मा जी का पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। इसके अलावा, उन्होंने शिकार साहित्य, जीवनी लेखन एवं संस्मरण जैसी विधाओं में भी कुशलतापूर्वक कार्य किया है।
सन् 1926 ई. में श्रीराम शर्मा को हिमालय की यात्रा के दौरान गहन आध्यात्मिक जागृति का अनुभव हुआ। इस घटना ने उनके जीवन को बदल दिया और उन्हें आध्यात्मिक अन्वेषण और मानवता की सेवा के मार्ग पर स्थापित किया। उन्होंने खुद को आध्यात्मिक ज्ञान, ध्यान और आत्म-साक्षात्कार की खोज के लिए समर्पित कर दिया। इस घटना के दौरान उन्होंने चार बार हिमालय की यात्रा की और फिर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में समाज को जागरूक करने के लिए लग गए।

उन्होंने आर्य समाज के आदर्शों और वेदांतिक ज्ञान के प्रचार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वे स्वयं को भारतीय संस्कृति, योग, आध्यात्मिकता और समाज सेवा के माध्यम से लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य किया। उन्होंने अपनी आत्मीयता और विचारधारा को आदर्शवाद के रूप में प्रकट किया जिसमें वे मानवता की उन्नति और सामरिक प्रगति के लिए वैदिक मूल्यों, संस्कृति, सद्भाव, स्वदेशी, विश्व मित्रता और प्रेम को महत्व देते थे।

श्रीराम शर्मा जी ने आलोकित वृत्ति और आर्य समाज के विचार जैसी कई पुस्तकें लिखी जिनमें वे वेदांत योग और सामाजिक विषयों पर विचार करते थे‌। उन्होंने भारतीय धर्म संस्कृति और दर्शन के प्रचार में विशेष रूप से कार्य किया है। शर्मा जी ने ‘सन् बयालीस के संस्मरण’ और ‘सेवाग्राम की डायरी’ आत्मकथा की शैली में लिखी हुई उनकी प्रसिद्ध कृतियां हैं।

श्रीराम शर्मा का सामाजिक योगदान

सन् 1940 ई. में श्रीराम शर्मा ने अखिल विश्व गायत्री परिवार की स्थापना की जो एक आध्यात्मिक संगठन है जो प्राचीन गायत्री मंत्र पर आधारित अभ्यास के एक रूप गायत्री साधना के सिद्धांतों को फैलाने के लिए कार्य करता है। और उसका उद्देश्य आध्यात्मिक जागृति नैतिक मूल्यों और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देना है।

श्रीराम शर्मा के अध्यात्मिकता दर्शन विज्ञान और सामाजिक मुद्दों और आत्म विकास सहित विभिन्न विषयों पर लगभग 3,000 से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। उनके लेखन को ज्ञानवर्धक और परिवर्तनकारी माना जाता है और उन्होंने जटिल अवधारणाओं को सरल और व्यवहारिक तरीके से व्यक्त किया है। उनके कुछ उल्लेखनीय कार्यों में “अखंड ज्योति”, “दिव्य परिवर्तन” और “विचार और सूत्र” शामिल हैं। और उनके ‘अखंड ज्योति’ शीर्षक से उनका प्रथम चरण “विचार क्रांति” की भी शुरुआत हुई थी।

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श्रीराम शर्मा की रचनाएं

पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी की शिकार संबंधी रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं – शिकार, प्राणों का सौदा, बोलती प्रतिमा, जंगल के जीव आदि इनकी प्रमुख कृतियां हैं। और अन्य उनकी उपयोग होने वाली किताबें जैसे – गायत्री एवं यज्ञ, विचार क्रांति, अध्यात्म और संस्कृति, प्रेरणाप्रद कथा-गाथाएं, जीवन देवता की साधना आराधना और मन स्थिति बदले तो परिस्थिति बदले आदि। इनके कुछ वांग्मय ग्रंथ है जैसे – यज्ञ का ज्ञान विज्ञान, गायत्री महाविद्या, भारतीय संस्कृति के आधार-भूत तत्व आदि।

इसके अतिरिक्त श्रीराम शर्मा जी ने 4 वेदों, 108 उपनिषदों, 6 दर्शनों, 18 पुराणों, 20 स्मृतियों, 24 गीता, योग वशिष्ठ, व्याकरण, निरुक्त और सैकड़ों आरण्यक एवं ब्राह्मणों का संपादन और अनुवाद किया था। इसके अलावा उन्होंने दैनिक जीवन में हंसमुख रवैया और मानसिक भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ्य पर लगभग 3,000 से अधिक पुस्तकें भी लिखी हैं।

श्रीराम शर्मा के प्रमुख विचार

  • लक्ष्य के अनुरूप भाव उदय होता है तथा उसी स्तर का प्रभाव क्रिया में पैदा होता है।
  • लोभी मनुष्य की कामना कभी पूरी नहीं होती।
  • मनुष्य के कार्य ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है।
  • हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे युग सुधरेगा।
  • जीवन में सफलता पाने के लिए आत्मा-विश्वास उतना ही जरूरी है जितना जीने के लिए भोजन। कोई भी सफलता बिना आत्म-विश्वास के मिलना असम्भव है।

भाषा शैली

श्रीराम शर्मा जी की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण एवं प्रभावपूर्ण है। भाषा की दृष्टि से शर्मा जी को मुंशी प्रेमचंद का निकटवर्ती माना जाता है। व्यावहारिकता उनकी भाषा का विशेष गुण है उसमें उर्दू के प्रचलित शब्दों को अपनाया गया है। उन्होंने मुहावरों एवं लोकोक्तियों का भी प्रयोग किया गया है जिससे कि भाषा में सजीवता आए और वाक्य प्रायः छोटे-छोटे हैं। चित्रात्मकता का गुण भी इनकी भाषा में विद्यमान है।

शैली पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी की कृतियों में निम्न प्रकार की शैलियों का प्रयोग होता है जैसे – वर्णनात्मक शैली, आत्मकथात्मक शैली तथा विवेचनात्मक शैली।

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FAQs. पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य से संबंधित प्रश्न उत्तर

1. श्रीराम शर्मा का जन्म कब और कहां हुआ था?

श्रीराम शर्मा का जन्म 20 सितंबर, 1911 ई. को उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के आंवलखेड़ा गाॅंव में हुआ था।

2. श्रीराम शर्मा के माता-पिता का क्या नाम था?

श्रीराम शर्मा की माता का नाम श्रीमती दानकुंवारी देवी शर्मा तथा पिता का नाम श्री रूपकिशोर शर्मा था।

3. श्रीराम शर्मा की मृत्यु कब हुई थी?

श्रीराम शर्मा की मृत्यु 02 जून 1990 ई. को हुई थी।

4. श्रीराम शर्मा ने किस पत्रिका का संपादन किया था?

श्रीराम शर्मा ने “विशाल भारत” नामक मासिक पत्रिका का संपादन किया था।

5. गायत्री परिवार के संस्थापक कौन है?

गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी है।

6. श्रीराम शर्मा की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी हैं?

श्री राम शर्मा जी की प्रमुख रचनाएं – शिकार, प्राणों का सौदा, बोलती प्रतिमा, जंगल के जीव, सन् बयालीस के संस्मरण, सेवाग्राम की डायरी आदि।

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