संत रैदास (रविदास) – जीवन परिचय, साहित्य, रचनाएं, भाषा शैली, जन्म व मृत्यु

हेलो दोस्तों, आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको “संत रैदास का जीवन परिचय” (Sant Ravidas biography in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं। इसमें हम आपको रैदास का जीवन परिचय इन हिंदी, रैदास का साहित्यिक परिचय, संत रैदास की रचनाएं एवं कृतियां और रैदास की भाषा शैली तथा इसके अलावा, संत रविदास जी का संपूर्ण इतिहास को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक जरूर पढ़ें।

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संत रैदास का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि नीचे दी गई सारणी में हमने संत रैदास जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया।
संत रैदास की जीवनी –

असली नामसंत रविदास
अन्य नामरैदास, रयदास, रदास, रयिदास
जन्मलगभग सन् 1398 ई. (संवत् 1471)
जन्म स्थानमड़ुवाडीह-ग्राम, काशी (वाराणसी), उत्तर प्रदेश
मृत्युलगभग सन् 1528 ई. (संवत् 1597)
मृत्यु स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेश
पिता का नामश्री संतोष दास
माता का नामश्रीमती कलसा देवी
दादा का नामश्री कालूराम
दादी का नामश्रीमती लखपती देवी
पत्नी का नामश्रीमती लोना देवी
संतानविजय दास (पुत्र)
गुरु का नामस्वामी रामानन्द
व्यवसायसंत, कवि, समाज सुधारक
काल/अवधिभक्तिकाल
भाषाअवधी एवं ब्रजभाषा
शैलीप्रतीकात्मक लाक्षणिक शैली
प्रमुख रचनाएंरैदास की वाणी, संत रैदास और उनका काव्य, भागवत प्रेम, अनन्यता, आत्मवेदन और सरल हृदय आदि।
संत रविदास जयंतीमाघ पूर्णिमा के दिन
संत रैदासकबीर के गुरुभाई थे।
संत रैदास की जीवनी

संत रैदास (Sant Ravidas), जिन्हें गुरु रविदास या रयदास के नाम से भी जाना जाता है, ये भारतीय भक्ति कालीन युग के एक श्रद्धेय संत, कवि और समाज सुधारक थे। इनका जन्म 15वीं सदी की शुरुआत में वाराणसी क्षेत्र में हुआ था। रैदास जी को भक्ति आंदोलन के प्रमुख संतो में से एक माना जाता है, जो एक सामाजिक धार्मिक आंदोलन के थे। जिनसे एक चुने हुए देवता के प्रति व्यक्तिगत शक्ति पर जोर दिया और जाति व पंथ जैसे सामाजिक विभाजन को खत्म कर दिया था।

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संत रैदास का जीवन परिचय

भक्ति कालीन कवियों में संत रैदास जी का महत्वपूर्ण स्थान है, किंतु सटीक साक्ष्यों के अभाव में आज भी इनका जीवन अन्धकार पूर्ण है। रैदास जी की अनेक कृतियों में उनके अनेक नाम देखने को मिलते हैं। देश के विभिन्न भागों में उनके ऐसे अनेक नाम प्रचलित हैं जिनमें उच्चारण की दृष्टि से बहुत थोड़ा अंतर है। रैदास (पंजाब में), रविदास (आधुनिक नाम), रयदास, रदास (बीकानेर की प्रतियों में) और रयिदास आदि नाम इस उच्चारण की भिन्नता को ही प्रकट करते हैं।

संत रैदास
संत रैदास का जीवन परिचय

इसलिए, लोक-प्रचलन और सुविधा की दृष्टि से उनका मूल नाम रैदास ही स्वीकार किया जाता है। भक्तिमाल में कहा गया है कि संत रैदास जी, रामानन्द के शिष्य थे। स्वतः रैदास जी की वाणी में भी ऐसे उद्धरण उपलब्ध हैं जहां उन्होंने स्वामी रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार किया है –

“रामानन्द मोहि गुरु मिल्यो, पायो ब्रह्मविसस।
रस नाम अमीरस पिऔ, रैदास ही भयौ पलास।।”

रैदास का जन्म कब हुआ

संत रैदास जी के जन्म के संदर्भ में विद्वानों की आम राय यह है कि रविदास, स्वामी रामानन्द के 12 शिष्यों में से एक थे। उनका नाम रैदास प्रचलित है। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के काशी (वाराणसी) में मड़ुवाडीह ग्राम में संवत् 1471 में माघी पूर्णिमा को रविवार के दिन हुआ था। रविवार को जन्म होने के कारण उनका नाम रविदास पड़ा।

संत रैदास जी के माता-पिता के बारे में प्रमाणिक रूप से कुछ कहना कठिन जान पड़ता है, लेकिन कुछ विद्वानों के अनुसार, संत रैदास जी के पिता का नाम श्री संतोष दास तथा माता का नाम श्रीमती कलसा देवी था। अतः इनके दादा का नाम श्री कालूराम और इनकी दादी का नाम श्रीमती लखपती देवी था। विद्वानों ने रैदास जी के विवाह के संबंध में उनकी पत्नी का नाम श्रीमती लोना देवी बताया। और उनकी एक संतान भी थी, जिसका नाम विजय दास (पुत्र) बताया जाता है।

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संत रविदास की मृत्यु कब हुई

रविदासी सम्प्रदाय तथा भक्तों में संत रैदास जी की निर्वाण-तिथि चेत बदी चतुर्दशी मानी जाती है। किसी अन्य प्रमाण के अभाव में हम भी इसी तिथि को संत रैदास जी की निर्वाण-तिथि मान सकते हैं जहां तक रैदास के निर्वाण के वर्ष प्रशन है, कुछ विद्वानों ने रैदास का मृत्यु वर्ष संवत् 1597 माना है। परन्तु ‘मीरा-स्मृति-ग्रंथ’ में उनका मृत्यु वर्ष संवत् 1576 माना गया है। हां, यह बात अवश्य है कि रैदास के निर्वाण के संबंध में इन वर्षों को मानने वाले श्रद्धालु भक्तों ने उनकी आयु 130 वर्ष तक मानकर उनको कबीर से भी ज्येष्ठ सिद्ध करने की चेष्टा अवश्य की है।

संत रविदास जी का संपूर्ण इतिहास

स्वामी रामानन्द का समय 14वीं शताब्दी के मध्य से 15वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक माना जाता है, किन्तु इसकी विरोधी धारणा यह भी प्रचलित है किस संत रैदास जी मीराबाई के गुरु थे। मीरा का समय 16वीं शताब्दी के मध्य से 17वीं शताब्दी के आरंभ तक माना गया है। प्रायः सभी विद्वानों की धारणा है कि संत रैदास जी कबीरदास (जन्म संवत् 1455) के समकालीन थे।

संत रैदास जी के निर्वाण की तिथि तथा स्थल के विषय में कोई प्रमाणिक सूचना नहीं मिलती। चित्तौड़ के रविदासी भक्तों का कथन है कि चित्तौड़ में कुंभन श्याम के मंदिर के निकट जो रविदास की छतरी बनी हुई है वहीं पर उनके निर्वाण का स्थल है। उस छतरी में संत रैदास जी के निर्वाण की स्मृति स्वरूप रैदास जी के चरण-चिन्ह भी बने हुए हैं।

संत रैदास

रैदास-रामायण के रचयिता ने लिखा है कि रैदास गंगा तट पर तपस्या करते हुए जीवन मुक्त हुए। दोनों ही विचारधारा वाले लोग रैदास का ‘सदेह गुप्त’ होने मानते हैं। श्रद्धालु भक्त महापुरुषों का सदेह गुप्त होना ही मान सकते हैं, किन्तु इस सदेह गुप्त होने से एक संशय उत्पन्न होता है। वस्तुतः रैदास जी के निर्वाण को किसी ने देखा नहीं और इसलिए, उनकी मृत्यु को श्रद्धा पूर्वक ‘सन्देह गुप्त’ अथवा ‘सदेह गुप्त’ कह दिया गया।

वस्तुतः संत रैदास जी अचानक किसी स्थल पर अनायास स्वर्गवासी हो गए होंगे और भक्तों को ज्ञात नहीं हो सका होगा, इसलिए उनके विषय में श्रद्धा पूर्वक सदेह गुप्त होने की बात चल पड़ी। रैदास जी के मृत्यु-स्थल का किसी को भी पता नहीं है।

रैदास का साहित्यिक परिचय

संत रैदास जी उन महान् सन्तों में स्थान रखते हैं जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। इनकी वाणी ज्ञानाश्रयी होते हुए भी ज्ञानाश्रयी एवं प्रेमाश्रयी शाखाओं के मध्य सेतु की तरह है। रैदास जी एक मोचियों के परिवार से थे, जिन्हें उस समय निम्न जाति समुदाय का हिस्सा माना जाता था। अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि के बावजूद उन्होंने छोटी उम्र से ही असाधारण आध्यात्मिक और दार्शनिक ज्ञान दिखाया।

संत रैदास जी ने भक्ति आंदोलन को अपनाया, एक भक्ति आंदोलन जिसने सामाजिक और धार्मिक बाधाओं को पार करते हुए ईश्वर के साथ सीधा संबंध स्थापित करने की मांग की। वह भगवान के प्रति कट्टर भक्त बन गए और उन्होंने भगवान के साथ प्रेम पूर्ण रिश्ते और सभी मनुष्यों की समानता के महत्व पर जोर दिया, चाहे उनकी जाति या सामाजिक स्थिति कुछ भी हो। उनकी शिक्षाएं क्रांतिकारी थी क्योंकि उन्होंने समाज में प्रचलित जाति आधारित भेदभाव और असमानताओं की चुनौती दी थी।

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संत रैदास की रचनाएं

रैदास जी की प्रमुख रचनाएं निम्नलिखित हैं –
रैदास की वाणी, अनन्यता, आत्मवेदन, भागवत्-प्रेम, देनय और सरल हृदय आदि। इसके अलावा, उन्होंने अपने बहुत से पद मुख्य “गुरु-ग्रन्थ-साहिब” में भी संकलित किए हैं।

अतः अनेक विद्वानों ने रैदास जी की वाणियों का संकलन करके रचना की है जो निम्न प्रकार हैं –
(1). आदि ग्रन्थ में उपलब्ध रैदास की वाणी
(2). रैदास की वाणी, वेलवेडियर प्रेस
(3). संत रैदास और उनका काव्य (संपादक: रामानन्द शास्त्री तथा वीरेन्द्र पाण्डेय)
(4). सन्त सुधारक (सम्पादक: वियोगी हरि)
(5). सन्त-काव्य (परशुराम चतुर्वेदी)
(6). सन्त रैदास: व्यक्तित्व एवं कृतित्व (संगमलाल पाण्डेय)
(7). सन्त रैदास (डॉक्टर जोगिन्दर सिंह)
(8). रैदास दर्शन (संपादक: आचार्य पृथ्वीसिंह आजाद)
(9). सन्त रविदास (श्री रत्नचंद)
(10). सन्त रविदास: विचारक और कवि (डॉ० पदम गुरुचरण सिंह)
(11). सन्त गुरु रविदास वाणी (डॉक्टर वेणीप्रसाद शर्मा) आदि।

रैदास की भाषा शैली

संत रैदास जी की भाषा वस्तुतः तत्कालीन उत्तर भारत की सामान्य जनता के प्रति ग्राहन भाषा बनकर राष्ट्रीय एक सूत्रता की भाषा बन गई थी। इनकी भाषा में अवधि एवं ब्रजभाषा के शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग हुआ है। इनकी शैली भी प्रसाद गुण संपन्न और मुख्यतः अभिधात्मक ही रही है। संत रैदास जी के काव्य में भावातिरेक की मात्रा अधिक थी अतः उनकी रचनाओं में उस अतिरेक को प्रकट करने के लिए प्रतीकात्मक लाक्षणिक शैली अनेक स्थलों पर सहायक सिद्ध हुई हैं।

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FAQs. संत रैदास जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. संत रविदास का जन्म कब और कहां हुआ था?

संत रविदास जी का जन्म उत्तर प्रदेश के काशी में मड़ुवाडीह ग्राम में संवत् 1471 में माघ पूर्णिमा को रविवार के दिन हुआ था। रविवार को जन्म होने के कारण इनका नाम रविदास पड़ा।

2. रैदास के माता-पिता का नाम क्या है?

संत रैदास जी के पिता का नाम संतोष दास तथा माता का नाम कलसा देवी था।

3. रैदास की भाषा कौन सी है?

संत रैदास जी के काव्य रचनाओं में सरल, व्यवहारिक ब्रजभाषा और अवधी के शब्दों का अधिकाधिक प्रयोग किया गया है।

4. संत रविदास जी के गुरु कौन थे?

संत रैदास जी के गुरु स्वामी रामानन्द जी थे।

5. रैदास की रचनाएं कौन कौन सी हैं?

रैदास जी की प्रमुख रचनाएं – रैदास की वाणी, अनन्यता, आत्मवेदन, भागवत्-प्रेम, देनय और सरल हृदय आदि। इसके अलावा, उन्होंने अपने बहुत से पद मुख्य “गुरु-ग्रन्थ-साहिब” में भी संकलित किए हैं।

6. रविदास जी की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

संत रैदास जी की मृत्यु कुछ विद्वानों ने रैदास जी का मृत्यु वर्ष संवत् 1597 माना है परंतु ‘मीरा-स्मृति-ग्रंथ’ में उनका मृत्यु वर्ष संवत् 1576 माना गया है।

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