सूरदास – जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं, भाषा शैली व साहित्य में स्थान

कृष्ण-भक्ति शाखा के कवियों में अष्टछाप के कवि ही प्रधान हैं। और उनमें भी श्रेष्ठतम कवि हिन्दी साहित्य के सूर्य सूरदास जी है, तो चलिए आज के इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको सूरदास जी के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे, ताकि आप परीक्षाओं में ज्यादा अंक प्राप्त कर सकें।

तो दोस्तों, आज के इस लेख में हमने “सूरदास का जीवन परिचय” (Surdas biography in Hindi) के बारे में बताया है। इसमें हमने सूरदास का जीवन परिचय भाव पक्ष कला पक्ष अथवा साहित्यिक परिचय, रचनाएं एवं कृतियां, भाषा शैली, काव्यगत विशेषताएं एवं हिंदी साहित्य में स्थान और सूरदास जी का संबंध किस काव्यधारा से है को भी विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाया है।

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इसके अलावा, इसमें हमने सूरदास जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं जो अक्सर परीक्षाओं में पूछे जाते हैं। यदि आप भी सूर जी के जीवन से जुड़े उन सभी प्रश्नों के उत्तर के बारे में जानना चाहते हैं तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

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सूरदास का संक्षिप्त परिचय

विद्यार्थी ध्यान दें कि इसमें हमने सूर जी की जीवनी के बारे में संक्षेप में एक सारणी के माध्यम से समझाया है।
सूरदास की जीवनी –

नामसूरदास
अन्य नामसूर, सूरध्वज, मदन-मोहन
जन्म तिथिसंवत् 1535 वि० (सन् 1478 ई०) में
जन्म स्थानरुनकता नामक ग्राम में
मृत्यु तिथिसंवत् 1640 वि० (सन् 1583 ई०) में
मृत्यु स्थानपारसौली में
पिता का नामश्री रामदास
माता का नामश्रीमती जमुनादास बाई
गुरु का नाममहाप्रभु वल्लभाचार्य
निवासश्रीनाथजी के मंदिर में
पैशाकवि, कृष्ण-भक्त और गायक
काल/अवधिभक्तिकाल
भक्ति शाखाकृष्ण-भक्ति शाखा
ब्रह्म का स्वरूपसगुण
रसवात्सल्य, श्रृंगार
भाषाब्रजभाषा
शैलीगीति काव्य की सरस पद शैली
प्रमुख रचनाएंसूरसागर, सूर-सारावली, साहित्य-लहरी
अन्य रचनाएंगोवर्धन लीला, नाग लीला, पद-संग्रह, सूर पच्चीसी आदि।
साहित्य में स्थानअष्टछाप एंव भक्तिकाल के कवियों में सूर का सर्वश्रेष्ठ स्थान है।
सूरदास की जीवनी

प्रस्तावना– मनोवैज्ञानिकता के साथ रस का पूर्ण सामंजस्य स्थापित करने वाले भक्त कवि सूरदास (Surdas in Hindi) भक्तिकाल की सगुण काव्य धारा की कृष्ण-भक्ति शाखा के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। इन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का बड़ा ही विशुद्ध और मनोरम वर्णन किया है। इनका बाल वर्णन विश्व साहित्य की अमर निधि बन गया है।

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सूरदास का जीवन परिचय (Surdas ka Jivan Parichay)

सगुणमार्गीय कृष्ण-भक्तिशाखा के प्रमुख कवि सूरदास, हिन्दी साहित्य के अन्य कवियों की भाँति सूर की जन्मतिथि भी सन्दिग्ध है। सूर का जीवन-वृत्त अभी तक शोध का कार्य बना हुआ है। अनेक साक्ष्यों के अवलोकन के उपरान्त सूरदास जी का जन्म सं0 1535 वि० (सन् 1478 ईस्वी) में बैसाख शुक्ल पक्ष पंचमी गुरुवार को मानना उपयुक्त जान पड़ता है। कुछ विद्वान् सूर का जन्म-स्थान “सीही” मानते हैं, तो बहुतेरे “रुनकता”। ‘आईने अकबरी’ के आधार पर इनके पिता का नाम श्री रामदास तथा माता का नाम श्रीमती जमुनादास बाई था। इनके जन्म एवं स्थान आदि को पद्य में एक साथ इस प्रकार समेटा जा सकता है-

“रामदास सुत सूरदास ने, जन्म रुनकता में पाया।
गुरु वल्लभ उपदेश ग्रहण कर, कृष्णभक्ति सागर लहराया॥”

कहा जाता है कि सूर जन्मान्ध थे। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भी इन्हें जन्मान्ध बताया है- “वह इस असार संसार को न देखने के वास्ते आँखें बन्द किये थे।” भगवद्-भक्ति की इच्छा से सूर अपने पिता की अनुमति प्राप्त कर यमुना के तट गऊघाट पर रहने लगे। वृन्दावन की तीर्थयात्रा पर जाते हुए इनकी भेंट महाप्रभु वल्लभाचार्य से हुई, जिनसे सूरदास ने दीक्षा ली। सूरदास जी श्री वल्लभाचार्य जी को अपना गुरु मानते थे। और महाप्रभु इन्हें अपने साथ ले गये और गोवर्धन पर स्थापित मन्दिर में अपने आराध्य श्रीनाथजी की सेवा में कीर्त्तन करने को नियुक्त किया।

सूरदास
सूरदास का जीवन परिचय

सूरदास जी ने नित्य नया पद बनाकर और इकतारे पर गाकर भगवान् की स्तुति करते थे। कहा जाता है कि इन्होंने सवा लाख पद रचे, जिनमें से लगभग दस सहस्र ही अब तक उपलब्ध हो सके हैं, परन्तु यह संख्या भी इन्हें हिन्दी का श्रेष्ठ महाकवि सिद्ध करने में पर्याप्त है। सूरदास जी को अपने अन्तिम समय का आभास हो गया था। एक दिन ये श्रीनाथ जी के मन्दिर में आरती करके पारसौली चले गये और वहीं पर सं0 1640 वि० (सन् 1583 ई0) में इनकी जीवन लीला समाप्त हो गयी।

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सूरदास का साहित्यिक परिचय

सूरदास जी ने कृष्ण की बाल लीलाओं का बड़ा ही विशद् तथा मनोरम वर्णन किया है। बालजीवन का कोई पक्ष ऐसा नहीं, जिन पर इस कवि की दृष्टि न पड़ी हो। इसीलिए उनका बाल-वर्णन विश्व-साहित्य की अमर निधि बन गया है। गोपियों के प्रेम और विरह का वर्णन भी बहुत आकर्षक है। संयोग और वियोग दोनों का मर्मस्पर्शी चित्रण सूरदास ने किया है। सूरसागर का एक प्रसंग भ्रमर-गीत कहलाता है। इस प्रसंग में गोपियों के प्रेमभाव ने ज्ञानी उद्धव को भी प्रेमी एवं भक्त बना दिया। सूर के काव्य की सबसे बड़ी विशेषता है उनकी तन्मयता । ये जिस प्रसंग का वर्णन करते हैं, उसमें आत्म-विभोर कर देते हैं। इनके विरह-वर्णन में गोपियों के साथ ब्रज की प्रकृति भी विषाद-मग्न दिखाई देती है।

सूर की भक्ति मुख्यतः सखा-भाव की है। उसमें विनय, दाम्पत्य और माधुर्य-भाव का भी मिश्रण है। इन्होंने अपने काव्य में भक्ति, वात्सल्य एवं श्रृंगार की त्रिवेणी बहाई है। वात्सल्य रस का तो वे कोना-कोना झाँक आए हैं।

सूरदास ने कृष्ण की लीलाओं का ही विशद वर्णन किया है। महाभारत के राजनीतिज्ञ एवं योगिराज कृष्ण के वर्णन में इनकी मनोवृत्ति अधिक नहीं रम सकी।

सूरदास की प्रमुख रचनाएं

कृतियाँ — कृष्ण भक्ति काव्यधारा के भक्त शिरोमणि सूरदास ने लगभग सवा लाख पदों की रचना की थी। ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ की खोज तथा पुस्तकालय में सुरक्षित नामावली के अनुसार सूरदास के ग्रन्थों की संख्या 25 मानी जाती है, किन्तु इनके तीन ग्रन्थ ही उपलब्ध हुए हैं- (1) सूरसागर, (2) सूरसारावली, (3) साहित्य-लहरी ।

(1) सूरसागर — ‘सूरसागर’ सूरदास जी की एकमात्र प्रामाणिक कृति है। ये श्रीमद्भागवत् के आधार पर रचित ‘सूरसागर’ के सवा लाख पदों में से अब लगभग आठ-दस हजार पद ही उपलब्ध बताये जाते हैं, जिनमें कृष्ण की बाल लीलाओं, गोपी-प्रेम, गोपी-विरह, उद्धव-गोपी संवाद का बड़ा मनोवैज्ञानिक और सरस वर्णन है। सम्पूर्ण ‘सूरसागर’ एक गीतिकाव्य है। इसके पद तन्मयता के साथ गाये जाते हैं तथा यही ग्रन्थ सूरदास की कीर्ति का स्तम्भ है।

(2) सूरसारावली — यह ग्रन्थ अभी तक विवादास्पद स्थिति में है, किन्तु कथावस्तु, भाव, भाषा, शैली और रचना की दृष्टि से निःसन्देह यह सूरदास की प्रामाणिक रचना है। इसमें 1,107 छन्द हैं।

(3) साहित्य-लहरी — ‘साहित्य-लहरी’ में सूरदास के 118 दृष्टकूट- पदों का संग्रह है। इसमें मुख्य रूप से नायिकाओं एवं अलंकारों की विवेचना की गई है। कहीं-कहीं पर श्रीकृष्ण की बाललीला का वर्णन तथा एक-दो स्थलों पर महाभारत की कथा के अंशों की भी झलक है।

इसके अतिरिक्त, सूरदास के पदों का संग्रह ‘सूरसागर’ है। ‘साहित्य-लहरी’ इनका दूसरा प्रसिद्ध काव्य-ग्रन्थ है। सूरदास द्वारा रचित ‘सूर सारावली’, ‘गोवर्धन लीला’, ‘नाग लीला’, ‘पद संग्रह’, ‘सूर पच्चीसी’ आदि ग्रन्थ भी प्रकाश में आये हैं। परन्तु ‘सूरसागर’ से ही ये जगत्-विख्यात हुए हैं। ‘सूरसागर’ के वर्ण्य-विषय का आधार ‘श्रीमद्भागवत’ है। फिर भी इनके साहित्य में अपनी मौलिक उद्भावनाएँ हैं। सूर ने भागवत के कथा-चित्रों में न केवल सरसता तथा मधुरता का संचार किया है, अपितु अनेक नवीन प्रकरणों का सृजन भी किया है। राधा-कृष्ण के प्रेम को लेकर सूर ने जो रस का समुद्र उमड़ाया है, इसी से इनकी रचना का नाम सूरसागर सार्थक होता है।

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सूरदास की काव्यगत विशेषताएँ

काव्यगत विशेषताएँ— सूर के काव्य में युग-जीवन की प्रबुद्ध आत्मा का स्पन्दन मिलता है। श्रृंगार के इस अप्रतिम कवि ने अपने ‘सूरसागर’ में राधा-कृष्ण के प्रेम को लेकर रस का सागर उमड़ाया है। ‘भ्रमरगीत’ उनकी अनूठी कल्पना है, जिसमें ज्ञान और योग के आडम्बर को दूर कर प्रेम और भक्ति के महत्त्व को प्रकाशित किया है। सूर ने श्रृंगार के दोनों पक्षों-संयोग और वियोग का मार्मिक चित्रण किया है। सूर की गोपियों का कहना है—

“ऊधो मन न भये दस बीस,
एक हुतो सो गयौ स्याम संग।
को अवराधे ईश ॥”

सूर का बाल वर्णन, बाल्यावस्था की चित्ताकर्षक झाँकियाँ प्रस्तुत करता है तो उनके वात्सल्य-वर्णन में माता यशोदा के मातृ-हृदय के प्रत्येक कोने के दर्शन हो जाते हैं। जहाँ तक भक्ति का प्रश्न है सूर की भक्ति सखा-भाव की भक्ति है परन्तु उसमें विनय, दाम्पत्य और माधुर्य का भी वर्णन है। कृष्ण के चरणों में अपनी अनन्य भक्ति को प्रकट करते हुए वे कहते हैं-

मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज को पंछी फिरि जहाज पै आवै॥

सूरदास की भाषा शैली

भाषा-शैली— सूर की कविता का कलापक्ष भी अत्यन्त उच्चकोटि का है। इन्होंने ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। मधुरता, सजीवता और प्रवाह इनकी भाषा की विशेषताएँ हैं। इनका सम्पूर्ण काव्य संगीत की राग-रागनियों में बंधा हुआ एवं शैली गीति काव्य की सरस पद शैली है। अलंकारों के स्वाभाविक प्रयोग के साथ-साथ उसमें भावों का जगमगाता रूप भी मिलता है। पद-शैली में कृष्ण की लीलाओं के गान की जो परम्परा सूरदास ने अपनायी, वह हिन्दी काव्य में आधुनिक काल तक चलती रही है।

सूरदास जी का साहित्य में स्थान

हिन्दी साहित्य में स्थान— कृष्ण भक्त कवियों में सूर का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। सूरदास वात्सल्य और शृंगार के सम्राट हैं। सम्भवत: इसी कारण से किसी कवि ने कहा है-

सूर-सूर तुलसी ससी, उड्डगन केशवदास ।
अब के कवि खद्योत सम, जहं तहं करत प्रकाश ॥

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सूरदास के काव्य सौंदर्य पर प्रकाश डालिए

ब्रजभाषा सूर के हाथों से जिस सौष्ठव के साथ ढली है, वैसा काव्य सौन्दर्य उसे बिरले ही कवि दे सके। सूर वात्सल्य रस के सम्राट् माने जाते हैं। जन्म से लेकर किशोरावस्था तक कृष्ण का चरित्र-चित्रण तो ‘स्वर्ग को भी ईर्ष्यालु’ बनाने की क्षमता रखता है। बाललीलाओं, गोचारण, वन से प्रत्यागमन, माखन-चोरी आदि का अत्यन्त मनोहारी चित्रण सूर के पदों में प्राप्त होता है। विरह-सागर इनके पदों में इस प्रकार उमड़ पड़ा है कि ज्ञान उस अतल में लापता हो गया है। इनके काव्य में उपमा, उत्प्रेक्षा, प्रतीप, व्यतिरेक, रूपक, दृष्टान्त आदि अलंकारों का प्रचुर प्रयोग हुआ है।

श्रृंगार के ये अप्रतिम कवि हैं। इनके अतिरिक्त किसी अन्य कवि ने श्रृंगार के दोनों विभागों-संयोग एवं विप्रलम्भ का इतना उत्कृष्ट वर्णन नहीं किया। इनका बाल-वर्णन बाल्यावस्था की चित्ताकर्षक झाँकियाँ प्रस्तुत करता है। इस प्रकार के पदों में उल्लास, उत्कण्ठा, चिन्ता, ईर्ष्या आदि भावों की जो अभिव्यक्ति हुई है वह बड़ी स्वाभाविक, मनोवैज्ञानिक तथा हृदयग्राही है। भ्रभर गीत सूरदास की अनूठी कल्पना है। इसमें इन्होंने ज्ञान और योग के आडम्बर को दूर कर प्रेम और भक्ति के महत्त्व को प्रकाशित किया है।

अष्टछाप क्या है?, अष्टछाप के सर्वश्रेष्ठ कवि कौन है

महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी विट्ठलनाथ ने चार शिष्य (कुम्भनदास, सूरदास, परमानंददास, कृष्णदास) अपने पिता के और चार अपने शिष्यों (गोविंदस्वामी, नंददास, छीतस्वामी, चतुर्भुजदास) को मिलाकर आठ बड़े भक्त कवियों का ‘अष्टछाप’ बनाया था। सूरदास उन कवियों में अग्रगण्य हैं। अष्टछाप के भक्त कवियों में सबसे ज्येष्ठ कुम्भनदास है और सबसे कनिष्ठ नंददास है। काव्य सौष्ठव की दृष्टि से सर्वप्रथम स्थान ‘सूरदास’ जी का है। तथा द्वितीय स्थान नंददास का है, सूरदास पुष्टिमार्ग के नायक कहें जाते हैं। ये वात्सल्य रस एवं श्रृंगार रस के अप्रतिम कवि माने जाते हैं।

वास्तव में कृष्ण भक्त कवियों में सूर की रचना श्रीमद्भागवत जैसा सम्मानित स्थान पाती रहेगी। शब्दों द्वारा अपने चरित्र नायक की माधुर्यमयी मूर्ति को पाठकों के नयनों के सम्मुख उपस्थित करने में सूर की सफलता अद्वितीय है। सूर ने तत्कालीन परिस्थितियों से खिन्न समाज का मन भगवान् की हँसती-खेलती, लोकरंजक मूर्ति दिखाकर बहलाया और इस प्रकार आगे चलकर भगवान् के लोकरक्षक स्वरूप की प्रतिष्ठा हेतु बड़ी ही अच्छी पृष्ठभूमि उपस्थित की। सूर भक्त कवि थे और इनकी भक्ति सखा-भाव की थी। इन्होंने अपने इष्टदेव के परम रमणीय रूप तथा लीला के वर्णन में जो कुछ कहा है उसकी स्वाभाविकता, सरलता, तल्लीनता आदि इतनी बढ़ी चढ़ी है कि हिन्दी साहित्य में इस विषय में कोई भी कवि इनके समकक्ष नहीं है।

FAQs. सूरदास जी के जीवन से जुड़े प्रश्न उत्तर

1. सूरदास जी कौन थे?

कृष्ण-भक्ति शाखा के कवियों में अष्टछाप के कवि ही प्रधान हैं और उनमें भी श्रेष्ठतम कवि हिन्दी साहित्य के सूर्य सूरदास जी है। ये 16वीं सदी के जन्मान्ध कृष्ण-भक्तिशाखा के कवि और गायक थे, जो सर्वोच्च भगवान कृष्ण की प्रशंसा में लिखे गए अपने कार्यों के लिए जाने जाते थे।

2. सूरदास का जन्म कब और कहां हुआ था?

सूरदास जी का जन्म सन् 1478 ईस्वी को आगरा से मथुरा जाने वाली सड़क पर स्थित रुनकता नामक ग्राम में हुआ था।

3. सूरदास के माता पिता का नाम क्या था?

सूरदास के पिता का नाम श्री रामदास तथा माता का नाम श्रीमती जमुनादास बाई था।

4. सूरदास जी के बचपन का नाम क्या था?

सूरदास जी के बचपन का नाम मदन-मोहन था।

5. सूरदास किसकी पूजा करते थे?

सूरदास जी श्री कृष्ण जी के भक्त थे और ये अपने जीवन में कृष्ण जी की पूजा एवं भक्ति करते रहते थे।

6. सूरदास की प्रमुख रचनाएं कौन कौन सी हैं?

सूरदास जी की प्रमुख रचनाएं – (1) सूरसागर, (2) सूरसारावली, (3) साहित्य-लहरी आदि।

7. सूरदास की मृत्यु कब और कहां हुआ था?

सूरदास जी की मृत्यु पारसौली नामक ग्राम में सन् 1583 ईस्वी में हुई थी।

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