स्वतंत्र भारत, का इतिहास, NCERT सार संग्रह | Independent India in Hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको संक्षिप्त इतिहास NCERT सार संग्रह “महेश कुमार वर्णवाल” Book का अध्याय “स्वतंत्र भारत” (Independent India in Hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। इसमें हम आपको स्वतंत्र भारत का इतिहास, भारत का स्वतंत्रता संघर्ष महत्वपूर्ण तथ्य pdf एवं स्वतंत्र भारत के प्रथम व अंतिम गवर्नर जनरल कौन थे को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

स्वतंत्र भारत, द्वितीय विश्वयुद्ध एवं राष्ट्रीय आंदोलन

  • फासिस्ट देशों की आक्रामक और विस्तारवादी नीतियों के कारण द्वितीय विश्वयुद्ध हुआ। सितंबर, 1939 में हिटलर की सेना द्वारा पोलैंड पर हमला करने के कारण द्वितीय विश्वयुद्ध आरम्भ हुआ। इस युद्ध का प्रभाव राष्ट्रीय आदोलन पर व्यापक रूप से पड़ा।
  • यह मानवता के इतिहास का सबसे व्यापक और नृशंस युद्ध साबित हुआ। युद्ध की स्थिति पैदा हो जाने पर ब्रिटेन ने भारतीय जनता से सलाह लिए बिना, भारत को युद्ध में शामिल कर लिया।
  • भारतीय राष्ट्रवादी नेता फ़ासिज़्म के खतरे को पहचानते थे। उन्होंने फासिस्ट शक्तियों के विरुद्ध चीन, स्पेन, इथियोपिया और अन्य देशों की जनता को समर्थन दिया था।
  • उन्होंने युद्ध के बढ़ते खतरे से जनता को सचेत किया और घोषणा की थी कि, दुनिया की शांति एवं प्रगति के लिए फ़ासिज़्म और साम्राज्यवाद, दोनों को समाप्त कारना आवश्यक है।
  • भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने फासिस्ट देशों के प्रति पाश्चात्य साम्राज्यवादियों की नितियों की निंदा की थी।
  • साम्राज्यवादी देशों ने फासिस्ट देशों के खतरे को नजर-अंदाज कर दिया। कम्युनिज्म के प्रति उनकी घृणा अत्यधिक थी इसलिए उन्होंने फासिस्ट देशों की कड़ी निंदा नहीं की।
  • यद्यपि फासिस्ट देश भारतीय जनता पर शासन कर रहे ब्रिटेन के विरुद्ध लड़ रहे थे, फिर भी देश की जनता जानती थी कि, फासिस्ट देश उसके मित्र नहीं हो सकते।
  • वह जानती थी कि, यदि फासिस्ट देशों की विजय होती है तो किसी भी देश की स्वाधीनता सुरक्षित नहीं रह सकती।
  • कांग्रेस ने माँग की कि जल्दी ही राष्ट्रीय सरकार बनाई जाए और ब्रिटेन यह स्वीकार करे कि युद्ध समाप्त होने के पश्चात् ही भारत स्वतंत्र हो जाए‌गा। परन्तु ब्रिटिश सरकार ने यह माँग अस्वीकार कर दी।
  • ब्रिटेन अपने साम्राज्यवादी लक्ष्यों के लिए युद्ध लड़ यहा था। प्रांतों में मंत्रिमंडलों ने नवंबर, 1939 में त्यागपत्र दे दिए।
  • भारत को युद्ध में शामिल करने के विरुद्ध देश के विभिन्न भागों में हड़‌तालें तथा प्रदर्शन हुए।
  • मार्च, 1940 में कांग्रेस का रामगढ़ अधिवेशन हुआ जिसका अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद को बनाया गया। काग्रेस ने भारत की स्वातंत्रता की मांग की और निर्णय लिया कि इसके लिए वह सविनय अवज्ञा आंदोलत आरम्भ कर देगी। अक्टूबर, 1940 में कांग्रेस व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन शुरू कर दिया।
  • इसका उद्देश्य यह था कि, कांग्रेस द्वारा चुने गए सत्याग्रही, एक-एक करके सार्वजनिक स्थलों पर पहुँचेंगे युद्ध के विरुद्ध भाषण देंगे और अपनी गिरफतारी देंगे।
    🔺इस आंदोलन के लिए चुने गए पहले सत्याग्रही विनोबा भावे थे।
  • कुछ समयान्तराल में ही करीब 25000 सत्याग्रही गिरफ्तार होकर जेल में बंद हो गए। 1942 ई. के आरंभ में युद्ध की स्थिति ने अंग्रेजों को भारतीय नेताओं से वार्तालाप के लिए विवश कर दिया।
  • जापानी सेना ने दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों में ब्रिटिश सेना को भारी क्षति पहुंचायी थी तथा भारत के कुछ भागों पर हवाई हमले भी किए थे।
  • ब्रिटिश, एक वास्तविक राष्ट्रीय सरकार की स्थापना को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्होंने राजाओं के हितों को बढ़ावा देने का भी प्रयास किया।
  • उन्होंने संविधान सभा की माँग को तो स्वीकार कर लिया, परन्तु कहा कि गवर्नर द्वारा शासित राज्यों को छोड़‌कर स्थानीय राजाओं द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि ही संविधान सभा में भाग लेंगे। रियासतों की जनता को संविधान सभा में प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942 ई.)

  • अप्रैल, 1942 में क्रिप्स मिशन के लौटने के कुछ समय के पश्चात् आजादी के लिए भारतीय जनता का तीसरा महान संघर्ष शुरू हुआ। इस संघर्ष को भारत छोड़ो आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
  • वर्धा में 8 अगस्त, 1942 को आयोजित अखिल भारतीय काग्रेस कमेटी ने एक प्रस्ताव पास किया। प्रस्ताव में घोषणा की गई कि, भारत में ब्रिटिश शासन को जल्दी से समाप्त करना अति आवश्यक हो गया है।
  • प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि, स्वतंत्र हो जाने पर भारत अपने संपूर्ण साधनों सहित उन देशों के साथ विश्वयुद्ध में शामिल हो जाएगा जो फ़ासिज़्म देशों के साथ संघर्ष कर रहे हैं। प्रस्ताव ने देश की आजादी के लिए सबसे व्यापक स्तर पर अहिंसात्मक जन-आंदोलन आरम्भ करने को स्वीकृति दे दी।
  • 7 अगस्त, 1942 को बम्बई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की वार्षिक बैठक हुई जिसकी अध्यक्षता मौलाना अबुल कलाम आजार ने की थी।
  • 14 जुलाई, 1942 को वर्धा में कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक हुई जिसमें महात्मा गांधी के संघर्ष के निर्णय की पुष्टि कर दी गई।
  • कांग्रेस कार्य समिति की वर्धा बैठक में एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसे सामान्यतया भारत छोड़ो प्रस्ताव कहा जाता है।
  • भारत छोड़ो प्रस्ताव को अगस्त प्रस्ताव भी कहा जाता है।
    🔺आन्दोलन की सार्वजनिक घोषणा से पूर्व 1 अगस्त, 1942 ई. को इलाहाबाद में तिलक दिवस मनाया गया।
  • 9 अगस्त, 1942 की सुबह कांग्रेस के अधिकांश नेता ऑपरेशन जीरो ऑवर के अन्तर्गत गिरफ्तार कर लिए गए और उन्हें देश के विभिन्न जेलों में बंद कर दिया गया। साथ ही, कांग्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। देश भर में हड़तालें तथा प्रदर्शन हुए। परिणामास्वरूप सरकार द्वारा उनका दमन किया गया तथा उनकी गिरफ्तारियाँ की गयी।
  • महात्मा गांधी एवं सरोजनी नायडू को गिरफ्तार करके आगा खाँ पैलेस में बन्द कर दिया गया।
  • आंदोलन के प्रति सरकार की दमनात्मक नीति के विरुद्ध गांधी जी ने आगा खाँ पैलेस में 10 फरवरी, 1943 को 21 दिन के उपवास की घोषणा कर दी।
    🔺भारत छोड़ो प्रस्ताव के पास हो जाने पर गांधी जी ने अपने भाषण में कहा मैं आपको एक संक्षिप्त मंत्र देता हूँ, इसे आप हृदय में बिठा लीजिए और अपनी प्रत्येक साँस के साथ इसे व्यक्त होने दीजिए। मंत्र है- करो या मरो (Do or Die)। इस प्रयास से हम या तो आजाद होंगे या मर मिटेंगे।
  • भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान करो या मरो और भारत छोड़ो का शंखनाद सभी जगह सुनाई पड़ने लगा। जनता भी हिंसा पर उतर आयी। लोगों ने सरकारी सम्पत्ति पर हमले किए, रेल पटरियों को तोड़ा और डाक-तार व्यवस्था में व्यवधान पैदा कर दिया।
  • अनेक स्थानों पर पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई। आंदोलन के बारे में समाचारों के प्रकाशन पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया। अनेक अखबारों ने अपना प्रकाशन बंद कर दिया, क्योंकि उन्हें प्रतिबंध स्वीकार नहीं थे।
  • 1942 ई. के अंत तक करीब 60,000 लोग जेल में बंद हो गए और सैकड़ों की मृत्यु हो गई। मरने वालों में अनेक बच्चे और वृद्ध महिलाएँ भी थीं।
  • जिस समय गांधी जी रिहा हुए, उससे पूर्व उनकी पत्नी कस्तुरबा और निजी सचिव महादेव देसाई की मृत्यु हो चुकी थी।
  • प्रदर्शन में भाग लेने पर तामलुक (बंगाल) में 73 साल की मातंगिनी हजारा को, गांहपुर (असम) में 13 साल की कनकलता बरूआ को, पटना (बिहार) में सात तरूण विद्यार्थियों को और अन्य सैकड़ों को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया।
  • देश के कुछ भाग जैसे उत्तर प्रदेश में बलिया, बंगाल में तामलुक महाराष्ट्र में सतारा, कर्नाटक में धारवाड़ और उड़ीसा (ओडिशा) में बालासोर तथा तलचर-ब्रिटिश शासन से मुक्त कर लिए गए तथा वहाँ की जनता ने अपनी सरकारें स्थापित कीं।
  • भारत छोड़ो आंदोलन के समय देश के अनेक क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया और समानान्तर सरकारें स्थापित हो गई।
  • बलिया में गाँधीवादी चित्तूपांडे के नेतृत्व में पहली समानांतर सरकार स्थापित हुई।
  • बंगाल के मिदनापुर जिले के तामलुक नामक स्थान पर जातीय सरकार 1944 ई. तक चली, वहीं महाराष्ट्र के सतारा में 1945 ई. तक समानांतर सरकार चली।
  • पूरे विश्वयुद्ध के दौरान जयप्रकाश नारायण, अरूणा आसफ अली, एम. एन. जोशी, राममनोहर लोहिया आदि अनेक नेताओं द्वारा आयोजित क्रांतिकारी गतिविधियाँ जारी रहा।
  • भारत छोड़ो आन्दोलन अपने पूर्ववर्ती आंदोलनों जैसे असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन, व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन आदि को तुलना में स्वत:स्फूर्त अधिक था।
  • जिस तरह सन् 1857 ई. का महाविप्लव अंग्रेजी शासन के विरूद्ध सिपाहियों का विद्रोह था उसी प्रकार वर्ष 1942 का आंदोलन मूलतः युवा वर्ग, मजदूरों और विद्यार्थियों का विद्रोह था।

आजाद हिंद फौज

  • आजाद हिंद फौज का विचार सबसे पहले मोहन सिंह के मन में आया। वे ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी थे।
  • जब ब्रिटिश सेना पीछे हट रही थी तब मोहन सिंह ने जापानियों का साथ दिया। सिंगापुर पर जापान की विजय के पश्चात् मोहन सिंह के प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत 45 हजार लोग आजाद हिंद फौज में शामिल होने के इच्छुक थे।
  • 1 सितंबर, 1942 को मोहन सिंह के अधीन आजाद हिंद फौज के प्रथम डिवीजन का गठन 16,300 सैनिकों को लेकर किया गया। जापानी तब तक भारत पर हमला करने के बारे में सोचने लगे थे और उन्हें भारतीयों का सैनिक रूप से संगठित होना लाभप्रद लग रहा था।
  • लेकिन दिसंबर, 1942 तक आते-आते आजाद हिंद फौज की भूमिका के बारे में जापानी तथा भारतीय अधिकारियों के मध्य गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए। वास्तव में जापानी चाहते थे कि भारतीय फौज 2,000 सैनिकों की हो जबकि मोहन सिंह उसे 2 लाख तक ले जाना चाहते थे। अततः मोहन सिंह तथा निरंजन सिंह मिल को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • आजाद हिंद फौज के गठन में एक जापानी सैन्य अधिकारी मेजर फूजीवारा का महत्वपूर्ण योगदान था। उन्होंने ही मोहन सिंह को इसके लिए तैयार किया कि, वह भारत की स्वतंत्रता के लिए जापान के साथ मिलकर काम करें।
  • मार्च, 1942 में टोक्यों में भारतीयों की एक कान्फ्रेंस बुलाई गई जिसमें इंडियन लीग की स्थापना की गई। इसके बाद बैंकाक में जून, 1942 में एक बैठक हुई, जिसमें रास बिहारी बोस को लीग का अध्यक्ष चुना गया।
  • ये 1915 ई. से ही जापान में निर्वासित जीवन जी रहे थे। यही पर आजाद हिंद फौज के गठन का निर्णय लिया गया।
  • आजाद हिंन्द फौज का द्वितीय चरण तब प्रारंभ हुआ, जब सुभाष चन्द्र बोस सिंगापुर लाए गए। सुभाष चन्द्र बोस ने वर्ष 1941 में बर्लिन में इण्डियन लीजन की स्थापना की।
    🔺अस्थायी सरकार –
    🔘 राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सेना अध्यक्ष :- सुभाष चंद्र बोस
    🔘 वित्त विभाग :- एस. सी. चटर्जी
    🔘 प्रचार विभाग :- एस.ए. अय्यर
    🔘 महिला संगठन कार्यभार :- लक्ष्मी स्वामीनाथन (विवाह उपरांत लक्ष्मी सहगल)
    🔘 मुख्यालय :- रंगून
    🔘 मान्यता प्रदान करने वाले देश :- जर्मनी, जापान तथा उनके समर्थक देशों ने मान्यता प्रदान की।
  • 1943 ई. में आजाद हिन्द फौज का नेतृत्व सुभाष चन्द्र बोस को सौंपा गया। 21 अक्टूबर, 1943 की सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर में स्वतंत्र भारत की अस्थायी सरकार का गठन किया, जिसका मुख्यालय रंगून था।
  • सुभाष चंद्र बोस ने रंगून एवं सिंगापुर में आई.एन.ए. के मुख्यालय स्थापित किए। आजाद हिंद फौज द्वारा कुछ ही महीनों में तीन लड़ाकू ब्रिगेड खड़ी कर ली गई, जिनके नाम गांधी, आजाद तथा नेहरू पर रखे गए। शीघ्र ही अन्य ब्रिगेड स्थापित किये गए जिनके नाम सुभाष ब्रिगेड तथा रानी झांसी ब्रिगेड रखा गया। इनमें रानी झांसी ब्रिगेड महिलाओं के लिए स्थापित की गयी।
  • नेता जी की संपूर्ण फौज में उनके अतिरिक्त शाहनवाज खान, गुरुबख्श़ सिंह ढिल्लों एवं प्रेम कुमार सहगल आदि महत्वपूर्ण कमांडर थे।
    🔺6 जुलाई, 1944 को आजाद हिन्द फौज के रेडियो के एक प्रसारण में महात्मा गांधी को संबोधित करते हुए सुभाष ने कहा- भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतिम युद्ध प्रशाम्भ हो चुका है। राष्ट्रपिता। भारतीय स्वतंत्रता के इस पवित्र युद्ध में हमें आपका आशीर्वाद चाहिए।
  • मार्च-जून, 1944 के बीच आजाद हिंद फौज भारतीय भूमि पर सक्रिय रही।
  • शाहनवाज खान ने जापान के साथ इण्डो-बर्मा क्षेत्र को घेरा और इम्फाल का अभियान चलाया। 18 अगस्त, 1945 को फारमोसा द्वीप (ताइपे) के पास हुई हवाई दुर्घटना में सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु हो गयी।

✴️ लाल किले का मुकदमा (नवम्बर, 1945 ई.) -• पहला मुकदमा नवंबर, 1945 में आजाद हिन्द के सैनिकों पर चलाया गया। नवंबर, 1945 के मुकदमें में शाहनवाज खान, गुरुबख्श़ सिंह ‘ढिल्लो’ तथा प्रेम कुमार सहगल को एक साथ मुकदमे चलाने के लिए लाल किले में बनी अदालत में खड़ा किया गया।

  • जब लाल किले में ऐतिहासिक मुकदमा शुरू हुआ तो भूलाभाई देसाई बचाव पक्ष की अगुवाई कर रहे थे। तेज बहादूर सप्रू, कैलाश नाथा काटजू तथा आसफ अली उनके सहायकों में थे। कार्यवाही के पहले दिन जवाहर लाल नेहरू भी 25 साल पश्चात् वकीलों की पोशाक पहनकर अदालत में उपस्थित थे।
  • इस आंदोलन को यूनियनवादी, अकाली दल, जस्टिस पार्टी, हिंदू महासभा, सिख लीग तथा अहरार पार्टी का भी समर्थन प्राप्त था।
  • अंततः सरकार को इस दबाव के आगे झुकना पड़ा तथा अपनी नीति को संशोधित करते हुए घोषणा करनी पड़ी कि, आजाद हिंद फौज के केवल उन्हीं सदस्यों पर मुकदमा चलाया जायेगा, जिनके विरुद्ध हत्या एवं बर्बरता का अभियोग है।
  • इसके तुरंत बाद जनवरी, 1946 में कैदियों के प्रथम समूह के विरुद्ध दिया गया फैसला वापस ले लिया गया। फरवरी, 1946 में आजाद हिंद फौज के राशिद अली को सात साल की कैद की सजा के विरुद्ध कलकत्ता में मुस्लिम लीग से संबद्ध छात्रों ने 1 फरवरी, 1946 को हड़ताल का आह्वान किया।
    🔺आजाद हिन्द फौज ने जयहिंद और दिल्ली चलो का नारा दिया। सुभाष चंद्र बोस का सबसे प्रसिद्ध नारा था- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा।

युद्ध के बाद राष्ट्रीयता की लहर

  • द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ विश्व इतिहास में एक नए युग का आरम्भ हुआ। दुनिया का राजनीतिक नक्शा बदल गया था।
  • सभी साम्राज्यवादी देशों की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति कमजोर हो गई। समूचे एशिया और अफ्रीका में स्वाधीनता के लिए जनता की एक व्यापक लहर उठी।
  • ब्रिटिश शासन को खत्म करने के लिए प्रदर्शनों और हड़तालों का सिलसिला जारी रहा। जनता आजादी की अंतिम लड़ाई में कूद पड़ीं। नौसेना में भी असंतोष फैला हुआ था।
  • फरवरी, 1946 में रॉयल इंडियन नेवी के नाविकों ने अनकों स्थानों पर विद्रोह किया। नाविकों तथा उनके समर्थकों और ब्रिटिश फौज तथा पुलिस के बीच जो संघर्ष हुए जिसमें लगभग 300 लोगों की मृत्यु हुई।

स्वतंत्र भारत का उदय

  • 19 फरवरी, 1946 को भारत-सचिव पैथिक लाॅरेंस ने घोषणा की कि, सरकार शीघ्र ही भारतीय नेताओं के सहयोग से भारत में स्वराज स्थापित करना चाहती है।
  • ब्रिटिश मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों का एक दल, जिसे कैबिनेट मिशन के नाम से जाना जाता है, सत्ता के हस्तांतरण के बारे में भारतीय नेताओं से बातचीत करने के लिए भारत आया। उसने अंतरिम सरकार बनाने और संविधान सभा बुलाने का प्रस्ताव रखा।
  • प्रस्ताव में कहा गया कि संविधान सभा में प्रांतीय विधान सभाओं द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि और भारतीय रियासतों के शासकों द्वारा मनोनीत व्यक्ति होंगे। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार बनी।
  • संविधान सभा ने दिसम्बर, 1946 में अपना काम शुरू कर दिया, परन्तु मुस्लिम लीग और राजाओं ने उसमें भाग लेने से इन्कार कर दिया।
  • मुस्लिम लीग ने पृथक पाकिस्तान की माँग पर जोर दिया।
  • 1946 ई. में बंगाल, बिहार, बम्बई तथा अन्य स्थानों पर दंगे हुए जिनमें हजारों हिंदुओं तथा मुसलमानों की जानें गई।
    🔺लॉर्ड माउंटबेटन ने जो मार्च, 1947 में नया वायसराय बनकर भारत आया था, भारत को दो स्वतंत्र राष्ट्रों- हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बाँटने की योजना प्रस्तुत की। इसे माउण्टबेटेन योजना कहते है। विभाजन की घोषणा के बाद और भी दंगे हुए, विशेषकर पंजाब में कुछ ही महीनों में करीब 5,00,000 हिंदू और मुसलमान मारे गए। लाखों लोग बेघर हो गए।
  • सांप्रदायिक दलों द्वारा फैलाई गई घृणा के परिणाम समाने आए। ब्रिटिश शासकों ने इन सांप्रदायिक दलों को प्रोत्साहन दिया था। दंगों के दौरान मानवता को भुला दिया गया और अत्यंत शर्मनाक तथा नृशंस घटनाएँ घटित हुई।
  • इसको शांत कराने के लिए गांधी जी ने अथक प्रयास किए थे। शांति स्थापित करने के लिए उन्होंने दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया।
  • कांग्रेस शुरू से ही एकीकृत स्वतंत्र भारत के लिए प्रयास करती आ रही थी, परन्तु अंत में उसने भारत के विभाजन को मान लिया।
  • कांग्रेस ने दो राष्ट्रों के सिद्धांत को अस्वीकार कर दिया था, परन्तु महसूस किया कि, आजादी प्राप्त करने और बिगड़‌ती स्थिति को रोकने के लिए विभाजन को स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है।
    🔺14 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान एक पृथक राष्ट्र बना।
  • भारतीय जनता ने लगभग एक सदी के संघर्ष के बाद विदेशी शासन का समूल नष्ट कर दिया, हालांकि यह भयंकर दुःखद घटनाओं के बीच हुआ।
    🔺जवाहरलाल नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। आधी रात को जब 15 अगस्त का दिन शुरू होने के साथ ही जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में भारत में जीवन और स्वतंत्रता का उदय हुआ।
  • संविधान सभा स्वतंत्र भारत की संसद के रूप में भी काम करने लगी। 14 अगस्त, 1947 को नेहरू ने संविधान सभा में भाषण देते हुए भारतीय जनता के भावी कार्यों और कर्त्तव्यों के बारे में बताया।

🔘 अंतरिम सरकार का मंत्रिमंडल-

सदस्यविभाग
1.जवाहरलाल नेहरूकार्यकारी परिषद् के उपाध्यक्ष, विदेश मामले एवं राष्ट्रमंडल से सम्बंधित मामले
2.सरदार बल्लभ भाई पटेलगृह सूचना एवं प्रसारण विभाग तथा रियासत संबंधी मामले
3.बलदेव सिंहरक्षा विभाग
4.जॉन मथाईउद्योग एवं आपूर्ति विभाग
5.चक्रवर्ती राजगोपालाचारीशिक्षा विभाग
6.सी. एच. भाभाकार्य, खान तथा बंदरगाह
7.डॉ.राजेन्द्र प्रसादखाद्य एवं कृषि विभाग
8.आसफ अलीरेल विभाग
9.जगजीवन रामश्रम विभाग
10.लियाकत अली खाँवित्त विभाग
  • ये कार्य थे- गरीबी, अज्ञानता, रोग और अवसर की असमानता को दूर करना। उन्होंने भारत, भारत की जनता और उससे भी बढ़कर मानवता की सेवा करने का व्रत लेने को कहा।
  • उन्होंने स्वतंत्र भारत के लिए एक ऐसा भव्य प्रासाद बनाने को कहा जहाँ भारत के सभी बच्चे रह सकें। 15 अगस्त की सुबह लाल किले पर स्वंतत्र भारत का झंडा फहराया गया। भारत के लोग स्वयं अपने भाग्य के निर्माता बन गए। नए भारत के निर्माण का कार्य आरम्भ हो गया।

भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र

  • स्वतंत्र भारत को जिस मार्ग पर आगे बढ़‌ना था, वह आजादी के संघर्ष के दौरान ही निश्चित हुआ था। आजादी की लड़ाई भारतीय जनता को प्रभुसत्ता-संपन्न बनाने के उद्देश्य से लड़ी गई थी।
  • यह लड़ाई एक ऐसा जनतंत्र स्थापित करने के लिए थी, जिसमें सारी सत्ता समूची जनता के हाथों में थी, न कि किसी एक या दूसरे समूह के हाथों में।
    •भारत में विभिन्न धर्मों को मानने वाले, विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले और विभिन्न रीति-रिवाजों का अनुसरण करने वाले लोग थे। यद्यपि देश में विभेद पैदा करने वाले सांप्रदायिक दलों जैसे तत्व मौजूद थे, परन्तु आजादी के आंदोलन को किसी एक या दूसरे समुदाय का आंदोलन बनाने में उन्हें सफलता नहीं मिली। इस प्रकार, राष्ट्रीय आंदोलन एक धर्मनिरपेक्ष आंदोलन था।
    •प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार दिया गया। किसी भी धर्म को कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया।
  • धर्म-निरपेक्षता, प्रत्येक जनतांत्रिक आंदोलन का अभिन्न अंग होती है। जनतंत्र में सब नागरिक बराबर होते हैं, अर्थात् सबके समान अधिकार होते हैं।
  • राष्ट्रीय आंदोलन में एक न्यायोचित समाज की स्थापना के लिए भारतीय समाज के पुनर्निर्माण का लक्ष्य अपने सामने रखा था। यह लक्ष्य समाजवादी विचारों के प्रसार के साथ अधिक स्पष्ट हो गया था।
  • इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु स्वतंत्र भारत को समाज में व्याप्त असमानताओं को दूर करने के लिए, तेजी से आर्थिक विकास करने के लिए और आर्थिक शक्ति के सकेंद्रण को रोकने के लिए कड़ा संघर्ष करना था।
  • राष्ट्रीय आंदोलन ने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के विषय में एक नीति बनाई थी। यह सभी लोगों की समानता के सिद्धान्त पर आधारित थी। इसका अर्थ यह था कि, स्वतंत्र भारत सभी लोगों को सहयोग देगा, जो राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए लड़ रहे हैं।
  • राष्ट्रीय आंदोलन का दृढ़ विश्वास था कि स्वतंत्रता अविभाज्य है और जब तक प्रत्येक एक देश स्वतंत्र नहीं होता तब तक किसी भी देश को स्वातंत्रता सुरक्षित नहीं है।
  • भारत ने शांति की नीति पर जोर दिया क्योंकि शांति से रहने पर ही पुनर्निर्माण का कार्य पूरा हो सकता है और विश्वबंधुत्व की भावना का विकास किया जा सकता है।
  • शांति की नीति इस विश्वास पर भी आधारित थी कि, विश्व के सभी आम लोगों के हितों में कोई विरोध नहीं है। इस तरह, आजादी और शांति स्वतंत्र भारत की विदेश नीति का आधार बन गई।
  • इन सिद्धान्तों से प्रेरित होकर भारत की जनता ने 1947 ई. में एक स्वतंत्र राष्ट्र की जीवन यात्रा आरंभ की।

स्वतंत्र भारत की तात्कालिक चुनौतियाँ

  • स्वतंत्र भारत के सामने कई तात्कालिक चुनौतियाँ थी। जिसमें से पहली चुनौती देश में राजनीतिक एकता स्थापित करना था। जब ब्रिटिश शासन का समाप्त होना निश्चित हो गया, तो राजा-महाराजाओं ने अपने दमन में वृद्धि कर दी। जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद, त्रावणकोर तथा राजस्थान की कुछ रियासतों में यह दमन अधिक बर्बर था।
  • कुछ राजाओं ने स्वतंत्र शासक बनने की योजना बनाई थी। राष्ट्रीय आंदोलन ने, राज्यों की जनता की मदद से, उनकी योजना को विफल कर दिया। राज्यों का विभाग सरदार बल्लभभाई पटेल के जिम्मे था। उनके प्रयास से भारत के स्वतंत्र होने से पहले ही सभी राज्यों को भारत में मिला लिया गया था।
  • केवल तीन ही राज्य 15 अगस्त, 1947 तक भारत में नहीं मिले थे। वे तीन राज्य थे जम्मू और कश्मीर, हैदराबाद तथा जूनागढ़।
  • स्वतंत्रता के तत्काल बाद कश्मीर पर पाकिस्तान ने हमला कर दिया, परन्तु जम्मू-कश्मीर की जनता अपने को भारत का अंग समझती थी। उसने पाकिस्तानी हमलावरों का डटकर मुकाबला किया।
  • पाकिस्तानी हमलावरों को मार भगाने के लिए भारतीय सेना वहाँ भेजी गई। जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। फरवरी, 1948 में जूनागढ़ की जनता ने भारत में मिल जाने के पक्ष में मत दिया।
  • हैदराबाद के निजाम ने मान लिया कि जनता के प्रतिनिधियों द्वारा बनाई गई एक सरकार भारत में मिल जाने के बारे में फैसला करेगी। मगर उसने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाए। इसके विपरीत, उसने हथियारबंद धर्मांधों को जनता पर जुल्म करने के लिए उकसाया। सितंबर, 1948 में भारतीय सैनिक सिकंदराबाद में घुसे और निजाम ने आत्मसमर्पण कर दिया। बाद में यह राज्य भारत में मिल गया।
  • फ्रांसीसी शासन के अंतर्गत पांडिचेरी, कराईकल, यनम, माहे तथा चंद्रनगर और पुर्तगाली शासन के अंतर्गत गोवा, दमन दीव तथा दादरा-नगर हवेली में भी आजादी के आंदोलन का और शेष भारत के साथ मिल जाने का लम्बा इतिहास है।
  • परन्तु इन क्षेत्रों में विदेशी शासन का अंत भारत के स्वतंत्र होने के कई वर्ष बाद हुआ।
  • फ्रांस के भारतीय उपनिवेशों में आजादी के लिए संघर्ष काफी पहले आरम्भ हो गया था, परन्तु द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात् यह ज्यादा तीव्र हो गया।
  • 1948 ई. में माहे में विद्रोह हुआ और प्रशासन ने समर्पण कर दिया। 1949 ई. में चन्द्रनगर भारत में मिल गया। 1954 ई. में फ्रांस द्वारा शासित क्षेत्रों की जनता ने भारी बहुमत से भारत में मिलने का फैसला किया। तब भारत और फ्रांस के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत सभी फ्रांस-शासित क्षेत्र भारत में मिल गए।
  • पुर्तगाली उपनिवेशों में भी सशस्त्र संघर्ष काफी पहले आरम्भ हो गया था जो अठारहवीं, उन्नीसवीं और बीसवीं सदी तक जारी रहा।
  • गोवा में राष्ट्रीय आंदोलन के पिता त्रिस्ताओं ब्रेगेंजा कुन्हा थे। उन्होंने 1928 ई. में कांग्रेस कमेटी की स्थापना की थी। गोवा के अनेक स्वाधीनता सेनानियों को यातनाएँ दी गई तथा जेलों में डाल दिया गया। उनमें से कुछ को अनेक वर्षों तक पुर्तगाल की जेलों में रखा गया। तथा कुछ को अनेक को मृत्युदंड दिया गया।
  • 1954 ई. में स्वाधीनता सेनानियों ने दादरा और नगर हवेली को पुर्तगाली शासन से मुक्त करा लिया।
  • भारत सरकार लंबे समय तक पुर्तगाल की सरकार को समझाती रही कि, वह अपने उपनिवेश छोड़ दे।
  • उस समय पुर्तगाल, यूरोप का एक सबसे पिछड़ा हुआ देश था और उस पर एक तानाशाह का शासन था। इसके बावजूद इसका अनेक पाश्चात्य देश समर्थन कर रहे थे। अमेरिका भी पुर्तगाल के इस दावे का समर्थन करता रहा कि गोवा पुर्तगाल का एक प्रांत है।
  • 1955 ई. में एक सत्याग्रह आंदोलन आरम्भ हुआ। निहत्थे सत्याग्रहियों ने गोवा में प्रवेश किया। पुर्तगाली सैनिकों ने उन पर गोलियां चलाई और उनमें से अनेक लोगों को मार दिया।
  • पुर्तगाल के शासन को उखाड़ फेंकने के लिए गोवा के कुछ लोगों ने सशस्त्र दल बनाए। अंत में दिसंबर, 1961 में भारतीय सेना गोवा में पहुँची और पुर्तगालियों ने समर्पण कर दिया। गोवा भारत का अंग बन गया। उसके साथ ही सम्पूर्ण भारत स्वतंत्र हो गया।
  • कुछ साल बाद पुर्तगाल की जनता ने अपने देश की उस तानाशाही को खत्म कर दिया जिसने उनका कई दशकों तक दमन किया था।
  • गाँधी जी ने आजादी की लड़ाई में भारतीय जनता का अनेक वर्षों तक नेतृत्व किया। इन्हीं के नेतृत्व में भारत ने आजादी की लड़ाई लड़ी और अंत में आजादी प्राप्त की। इसीलिए उन्हें राष्ट्र‌पिता माना जाता है।
  • जिन कार्यों के लिए उन्होंने अपना जीवन अर्पित किया था उनमें से एक प्रमुख कार्य था- हिंदू-मुस्लिम एकता का कार्य।
  • जब कलकत्ता में सांप्रदायिक दंगे भड़के तो उन्होंने दंगाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा किया तथा शांति एवं सांप्रदायिक मैत्री स्थापित करने के लिए प्रेम तथा बंधुत्व का उपदेश दिया।
  • जिस दिन भारत स्वतंत्र हुआ उस दिन गांधीजी कलकत्ता के दंगा प्रभावित क्षेत्र में थे। हिंदुओं तथा मुसलमानों की हत्याओं से और देश के विभाजन से उन्हें अत्यंत दुःख हुआ था। कुछ लोग प्रेम और बंधुभाव के उनके संदेश को पसंद नहीं करते थे। दूसरे समुदायों के प्रति उनके मस्तिष्क में घृणा थी।
  • 30 जनवरी, 1948 में गांधीजी की एक धर्मांध हिंदू नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।
  • भारतीय जनता विगत वर्ष में हुई सांप्रदायिक हत्याओं तथा विनाश के आघात से जैसे-तैसे अपने को संभालने का प्रयास कर रही थी, पुनः गहन शोक में डूब गई।
    🔺जवाहर लाल नेहरू ने कहा कि, हमारे जीवन से प्रकाश गायब हो गया है।
  • गाँधीजी कलह से भरे विश्व में प्रेरणा के स्त्रोत और प्रकाश के स्तंभ थे। वे सम्पूर्ण विश्व में महात्मा के नाम से जाने जाते थे। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति के आँसू पोंछने और प्रत्येक जगह से दुःख दूर करने के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया था। उनके सपने को पूरा करना हम सबका कर्त्तव्य है।
  • स्वतंत्र भारत के सामने एक प्रमुख तात्कालिक समस्या थी, विस्थापितों को फिर से बसाना जो विभाजन के कारण पाकिस्तान में चले गये थे।
  • इन शरणार्थियों को सहायता तथा रोजगार देने और बसाने की समस्या उत्पन्न हुईं। इन्होंने अनेक कठिनाईयों का सामना साहस के साथ किया और स्थिर होकर नई जिंदगी आरंभ कर दी।
  • देश के विभाजन ने कई आर्थिक समस्याएँ पैदा की। कई उद्योगों के लिए कच्चे माल का अभाव हो गया।
  • जूट तथा सूती कपड़े के अधिकांश कारखाने भारत में रह गए परन्तु जूट तथा कपास का उत्पादन करने वाले अधिकांश क्षेत्र पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से (अब बांगलादेश) में चले गए। परिणामस्वरूप जूट और सूती कपड़े के कई कारखाने बंद हो गए। गेहूं और चावल पैदा करने वाला विशाल क्षेत्र पाकिस्तान में चला गया था। इसलिए कुछ दिनों क भारत में अन्न का अभाव भी रहा।
  • द्वितीय विश्वयुद्ध और विभाजन के कारण देश की परिवहन व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो गई थी।
  • इसी बीच स्वतंत्र भारत के लिए संविधान बनाने का कार्य भी चल रहा था। संविधान सभा ने अपना कार्य 26 नवंबर, 1949 को पूरा किया।
    🔺26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और इसी के साथ भारत एक गणतंत्र (Republic) राष्ट्र बन गया। इससे पूर्व 1929 ई. प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जा रहा था।

पंचशील समझौता (1954 ई.)

  • 29 अप्रैल, 1954 को भारत ने चीन के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह एक न्यायपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का आधार बन गया।
    🔺पंचशील समझौते के उदेश्य
    1.एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान,
    2.एक-दूसरे के भू-भाग पर आक्रमण नहीं करना।
    3.एक-दुसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना।
    4.समानता के स्तर को स्वीकार करते हुए पारस्परिक लाभ के लिए प्रयास करना।
    5.शांति पूर्ण सह अस्तित्व।

गुटनिरपेक्ष आन्दोलन (1961 ई.)

  • गुटनिरपेक्ष आन्दोलन में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
  • 1955 ई. के बांडुग सम्मेलन के पश्चात् गुटनिरपेक्ष शब्द सामने आया। वैसे गुटनिरपेक्ष शब्द की व्युत्पत्ति के संदर्भ में मतभेद है। एक दृष्टि के अनुसार वी.पी. मेनन ने वर्ष 1953-54 में इस शब्द का प्रयोग किया था जबकि दूसरे मत के अनुसार, कांग्रेस के वर्ष 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में गुटनिरपेक्षता की बात उठाई गयी थी।
  • इसके पश्चात् एशिया तथा अफ्रीका के नवोदित राष्ट्रों ने दोनों ध्रुवों के साथ संयुक्त हुए बिना अपने स्वतंत्र राष्ट्रीय विकास के लिए 1961 ई. में बेलग्रेड में एक सम्मेलन का आयोजन किया। इसी के साथ गुटनिरपेक्ष आन्दोलन का आरम्भ हुआ। मार्शल टीटो (यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति) ने इस सम्मेलन की अध्यक्षता की थी।
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