स्वराज के लिए संघर्ष, NCERT सार संग्रह | Struggle for Swaraj in hindi

हेलो दोस्तों, आज के इस लेख में हम आपको संक्षिप्त इतिहास NCERT सार संग्रह “महेश कुमार वर्णवाल” Book का अध्याय “स्वराज के लिए संघर्ष” (Struggle for Swaraj in hindi) के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे। इसमें हम आपको स्वराज की मांग करने वाला पहला व्यक्ति कौन था?, स्वराज आंदोलन किसने प्रारंभ किया एवं स्वराज पर गांधी जी के विचारों को विस्तार पूर्वक सरल भाषा में समझाएंगे, तो आप इस आर्टिकल को अंत तक अवश्य पढ़ें।

स्वराज के लिए संघर्ष, गरम दल और नरम दल

  • 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में राष्ट्रीय आंदोलन में नई प्रवृत्तियों एवं नए नेताओं का उदय हुआ। ये नेता तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं की अनुनय-विनय की नीति के विरोधी थे तथा ब्रिटिश सरकार के प्रबल पक्षधर थे। उनका मानना था कि सरकार से केवल अनुनय-विनय करके भारतीय अपने अधिकार प्राप्त नहीं कर सकते। उन्होंने जनता में संघर्ष एवं देशप्रेम की भावना जागृत की।
  • वंदे मातरम् सम्पूर्ण देश में राष्ट्रगीत के रूप में लोकप्रिय हो गया। यह गीत बंकिमचंद्र च‌ट्टोपाध्याय ने लिखा था। इसने मातृभूमि के प्रति जनता की भावना को व्यक्त किया।
  • नए नेताओं में बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष प्रमुख थे। ये सभी गरम दल के नेता के रूप में प्रसिद्ध हुए।
  • कांग्रेस के सुरेंद्रनाथ बनर्जी, गोपाल कृष्ण गोखले, फिरोजशाह मेहता और अन्य पुराने नेता नरम दल के नेता कहलाए।
  • ब्रिटिश सरकार के प्रति जैसे-जैसे जनता में रोष बढ़ता जा रहा था। वैसे-वैसे गरम दल के नेताओं का प्रभाव बढ़ता गया।

विश्व की घटनाओं का प्रभाव

  • 1896 ई. में इटली की इथियोपियाई जनता के हाथों हार (एक यूरोपीय देश की पराजय) से भारतीयों को खुशी हुई।
  • इटली की पराजय के करीब दस साल बाद 1905 ई. के एक युद्ध में जापान ने रूस को पराजित किया। यह पहला मौका था जब एक एशियाई देश ने एक यूरोपीय देश को युद्ध में पराजित किया था।
  • जापान की विजय का भारतीय राष्ट्रवादियों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा और ब्रिटिश शासन के प्रति भारतीय जनता की घृणा बढ़ती गई।
  • 1905 ई. में रूस में एक क्रांति हुई। उन दिनों रूस पर एक निरंकुश बादशाह का शासन था और जनता अधिकारों से वंचित थी।
  • रूसी जनता शासक के विरुद्ध उठ खड़ी हुई। क्रांति को हालांकि कुचल दिया गया, परन्तु इसने विदेशी शासन में कष्ट झेल रही भारतीय जनता को प्रेरणा दी।
  • आयरलैंड की जनता ब्रिटिश आधिपत्य से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रही थी।

बंगाल का विभाजन

  • राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्यों और तरीकों को प्रभावित करने और राष्ट्रीय आन्दोलन की दिशा बदलने में मंगाल के विभाजन ने सबसे प्रभावकारी भूमिका निभाई। उस समय बंगाल भारत का सबसे बड़ा प्रांत था, जिसमें सम्पूर्ण बिहार और उड़ीसा (वर्तमान ओडिशा) के हिस्से शामिल थे। उस समय बंगाल की आबादी 7 करोड़ 80 लाख थी।
    🔺ब्रिटिश प्रशासन के अनुसार, इतने बड़े प्रांत के प्रशासन को संभालना कठिन है, इसलिए इसका विभाजन आवश्यक है।
  • बंगाल में राष्ट्रीय आंदोलन बहुत मजबूत था। ब्रिटिश शासकों का मानना था कि, प्रांत का विभाजन करके वे इस आंदोलन को कमजोर बनाने में सफल हो जाएंगे।
स्वराज के लिए संघर्ष
  • अंग्रेजों का दूसरा उद्देश्य हिंदुओं और मुसलमानों में फूट पैदा करना था। वे कहने लगे कि, नए प्रांत में मुसलमानों का बहुमत होगा, इसलिए यह उनके हित में होगा।
  • अंग्रेजों का विचार था कि, इस तरह से वे मुसलमानों को राष्ट्रीय आंदोलन से अलग करने में सफल होंगे।
  • 20 जुलाई, 1905 को बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा हुई जिसके परिणामस्वरूप 7 अगस्त, 1905 को कलकत्ता के टाउन हाल में स्वदेशी आन्दोलन आरम्भ हुआ। इसी बैठक में ऐतिहासिक बहिष्कार प्रस्ताव स्वीकृत हुआ।
  • 16 अक्टूबर, 1905 में कर्जन की घोषणा के साथ ही बंगाल विभाजन प्रभावी हो गया। इसके विरोध में हुए आंदोलन को बंग-भंग विरोधी आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
  • विभाजन के अन्तर्गत बगाल के पूर्वी हिस्सों को अलग करके असम के साथ मिला दिया गया। इस प्रकार, पूर्वी बंगाल और असम, बंगाल का नया प्रांत बना।
  • विभाजन के कारण सम्पूर्ण बंगाल में रोष की लहर दौड़ गई। विभिन्न शहरों में बड़ी सभाएँ और तीव्र प्रदर्शन हुए, विभाजन के विरुद्ध आंदोलन आरम्भ हुआ।
  • गरम दल और नरम दल के नेताओं ने मिलकर इस आंदोलन का नेतृत्व किया। सुरेंद्रनाथ बनर्जी, विपिनचंद्र पाल और अब्दुल रसूल आदि नेताओं ने आन्दोलन का नेतृत्व संभाला।
    🔺विभाजन का दिन अर्थात् 16 अक्टूबर को सम्पूर्ण बंगाल में शोक-दिवस के रूप में मनाया गया। महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर के सुझाव पर वह दिन जन-एकता और मैत्री-दिवस या राखी-दिवस के रूप में मनाया गया। सम्पूर्ण बंगाल के लोगों ने एक-दूसरे को राखी बांधी।
  • बंगाल के विभाजन को समाप्त करने के लिए आरम्भ किए गए आंदोलन के दौरान संघर्ष के नए तरीके अपनाए गए। उन तरीकों में स्वदेशी और बहिष्कार प्रमुख थे। राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्य भी पहले की अपेक्षा अधिक क्रांतिकारी हो गए।

स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन

  • स्वदेशी का अर्थ है, संघर्ष के दौरान देश में उत्पादित वस्तुओं का इस्तेमाल करना। स्वदेशी अपनाने से भारतीय उद्योगों को बढ़ावा मिलता तथा राष्ट्र मजबूत बनता। यह देशभक्ति बढ़ाने का एक प्रभावकारी तरीका था।
  • इस आन्दोलन में स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने के साथ-साथ विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने का नारा दिया गया।
  • इस बात पर जोर दिया गया कि, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने से (अधिकांश विदेशी वस्तुएँ इग्लैंड से आती थीं) इंग्लैंड के आर्थिक हितों को क्षति पहुँचेगी और तब ब्रिटिश सरकार को भारतीय माँगें स्वीकार करने के लिए मजबूर किया जा सकेगा।
  • स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन केवल बंगाल तक सीमित न रहकर देश के अनेक भागों में फैल गया।
  • ब्रिटिश कपड़ों, चीनी तथा अन्य वस्तुओं का बहिष्कार किया गया। लोग समूह बनाकर दुकानों पर जाते और दुकानदारों से विदेशी सामान न बेचने का अनुरोध करते। वे दुकानों के बाहर खड़े रहकर ग्राहकों से विदेशी सामान न खरीदने का आग्रह करते।
  • इस आंदोलन में स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
  • उन्होंने केवल स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना आरंभ कर दिया और लोगों को प्रेरित किया कि, वे विदेशी वस्तुओं का प्रयोग न करें।
  • सरकार ने दमन के कई तरीके अपनाये। अनेक विद्यार्थियों को स्कूल-कॉलेजों से निकाल दिया गया। कई विद्यार्थियों को पीटा गया और जेल में डाल दिया गया।
  • स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन केवल विदेशी सामान तक सीमित नहीं रहा बल्कि अब स्वदेशी का अर्थ उस सब से हो गया जो भारतीय है। तथा बहिष्कार का अर्थ उस सबसे हो गया जिसका सम्बंध ब्रिटिश शासन से है।

कांग्रेस और स्वराज का लक्ष्य

  • गरम दल और नरम दल सहित कांग्रेस के भीतर के सभी दल बंगाल विभाजन के विरुद्ध एकजुट हुए।
  • वाराणसी में 1905 ई. में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष गोपाल कृष्णा गोखले थे। इस अधिवेशन ने स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन को समर्थन दिया।
  • परन्तु नरम दल और गरम दल में मतभेद कायम रहे। नरम दल वालों का मत था कि, बहिष्कार जैसे तरीकों का इस्तेमाल विशेष उद्देश्यों के लिए विशेष परिस्थिति में होना चाहिए। वे नहीं चाहते थे कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध इन तरीकों का इस्तेमाल हमेशा किया जाए।
  • गरम दल के नेताओं का विश्वास था कि, बहिष्कार को व्यापक बनाना आवश्यक है। उन्होंने सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों का बहिष्कार करने और देशभक्ति को उभारने के लिए स्वदेशो शिक्षा-संस्थाएँ शुरू करने पर जोर दिया।
  • गरम दल के नेता ब्रिटिश शासन के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन प्रारंभ करना चाहते थे। जबकि नरमदल के नेता इसे बंगाल तक ही सीमित रखना चाहते थे।
  • कलकत्ता में 1906 ई. में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन के समय गरम दल और नरम दल के बीच मतभेद बढ़ते जा रहे थे।
  • उस समय दादाभाई नौरोजी कलकत्ता अधिवेशन के अध्यक्ष थे।
  • एक प्रस्ताव के जरिए कांग्रेस ने स्वदेशी और बहिष्कार को अपना समर्थन प्रदान किया। इस अधिवेशन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्ध यह थी कि, स्वराज-प्राप्ति को कांग्रेस का लक्ष्य घोषित किया गया।
  • स्वराज का अर्थ था, ब्रिटेन के अधीन कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे स्वशासित उपनिवेशों की तरह सरकार स्थापित करना। परन्तु गरम दल और नरम दल एक जुट नहीं रह सके। सूरत में 1907 ई. में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में दोनों दलों में संघर्ष हुआ।

कांग्रेस का सूरत अधिवेशन (1907 ई.)

  • यह अधिवेशन 26 दिसंबर, 1907 को ताप्ती नदी के किनारे सूरत में संपन्न हुआ। इस अधिवेशन में कांग्रेस स्पष्ट रूप से नरमपंथियों व गरमपंथियों में विभाजित हुई।
  • विवाद का केन्द्र रासबिहारी घोष थे, जिन्हें इस अधिवेशन का अध्यक्ष चुना गया।
  • उग्रवादी लाला लाजपत राय को काग्रेस का अध्यक्ष बनाना चाहते थे, वहीं उदारवादी रासबिहारी घोष को अध्यक्ष बनाना चाहते थे। अंततः रास बिहारी घोष अध्यक्ष बने।
  • कांग्रेस में नरम दल का प्रमुख चुन लिए जाने के बावजूद गरम दल के विचार देशभर में फैलने लगे। गरम दल का अधिक दमन होने लगा। परिणामस्वरूप 1907 ई. में लाला लाजपत राय को गिरफ्तार करके वर्मा निर्वासित कर दिया गया।
  • विपिनचंद्र पाल को छः महीने के लिए जेल में बंद कर दिया गया। 1908 ई. में बाल गंगाधर तिलक को गिरफ्तार करके छः साल के लिए बर्मा निर्वासित कर दिया गया।
  • चिदंबरम पिल्लई पर अत्याचार किए गए और उन्हें जेल में डाल दिया गया।
  • सरकारी दमन का जनता ने कड़ा मुकाबला किया। बाल गंगाधर तिलक को दण्ड देने पर बम्बई के मजदूरों ने हड़ताल की।

मार्ले-मिंटो सुधार

  • सरकार ने एक ओर दमन की नीति को तीव्र बनाया, तो दूसरी ओर नरम दल वालों को संतुष्ट करने की कोशिश की।
    🔺1909 ई. में इंडियन कौंसिल एक्ट की घोषणा की गई। इसे मार्ले-मिंटो सुधार के नाम से जाना जाता है। उस समय मार्ले भारत सचिव और मिंटो वायसराय थे।
  • इस एक्ट के अनुसार, केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों (सभाओं) में सदस्यों की संख्या बढ़ा दी गई। परन्तु इन परिषदों में निर्वाचित सदस्यों की संख्या बहुत कम थी।
  • ये निर्वाचित सदस्य जनता द्वारा नहीं बल्कि जमींदारों, व्यापारियों, विद्यालयों और स्थानीय संस्थाओं द्वारा चुने गए थे।
  • अंग्रेजों ने इन सुधारों के अन्तर्गत सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था प्रारंभ की। जिसका उद्देश्य हिंदुओं और मुसलमानों में मतभेद पैदा करना था।
  • परिषदों में कुछ सीटें मुसलमान मतदाताओं द्वारा चुने जाने वाले मुस्लिम प्रतिनिधियों के लिए सुरक्षित रखी गईं। राष्ट्रीय आंदोलन को कमजोर बनाने के लिए अंग्रेजों ने भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया।
  • कांग्रेस ने 1909 ई. के अपने अधिवेशन में इन सुधारों का स्वागत किया, परन्तु धर्म पर आधारित पृथक प्रतिनिधित्व का विरोध किया। भारत सचिव ने कहा कि, भारत में संसदीय सरकार की स्थापना करने की उनकी कोई इच्छा नहीं है।
  • 1857 ई. के विद्रोह के बाद जो निरंकुश सरकार स्थापित हुई थी, वह मार्ले-मिंटो सुधार के बाद भी कायम रही।
    🔺 सत्येन्द्रनाथ सिन्हा गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद् के पहले भारतीय सदस्य बने। सत्येंद्र नाथ सिन्हा को बिहार और उड़ीसा का गवर्नर बनाया गया। समूचे ब्रिटिश शासन के दौरान इसने ऊंचे पद पर पहुंचने वाले वे एकमात्र भारतीय थें।

✴️ दिल्ली दरबार (1911 ई.) -• 1911 ई. में दिल्ली में दरबार का आयोजन हुआ। जिसमें ब्रिटेन के राजा जाॅर्ज पंचम और उनकी रानी ने भाग लिया था।

  • इस अवसर पर दो महत्वपूर्ण घोषणाएं की गईं। प्रथम घोषणा में 1905 ई. में किए गए बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया गया। जबकि दूसरी घोषणा में ब्रिटिश भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दी गई।
    🔺 दिल्ली 1 अप्रैल, 1912 ई. को भारत की राजधानी बनीं।

क्रांतिकारी राष्ट्रवादी

  • देश के कुछ भागों में क्रांतिकारियों के कुछ ऐसे समूह थे, जो ब्रिटिश शासन को सशस्त्र क्रांति के जरिए खत्म करने में विश्वास रखते थे।
  • क्रांतिकारियों ने अनेक गुप्त संगठन बनाये जिसमें ये अपने सदस्यों को गोला बारूद बनाने और हथियार चलाने का प्रशिक्षण देते थे। ये संगठन महाराष्ट्र और बंगाल में अधिक सक्रिय थे। जिनमें महाराष्ट्र में अभिनव भारत सोसायटी और बंगाल में अनुशीलन समिति प्रमुख थे।
  • इनके सदस्यों ने ब्रिटिश अफसरों, पुलिस अफसरों, मजिस्ट्रेटों, मुखबिरों, गवर्नरों तथा वायसरायों के विरुद्ध हिंसात्मक कार्रवाइयां की।

✴️ मुजफ्फरपुर बम कांड (1908 ई.) -• डी.एच. किंग्सफोर्ड कलकत्ता का एक क्रूनर मजिस्ट्रेट था। जिसने अनेक क्रान्तिकारियों को बहुत कठोर सजा दी थी। परिणामस्वरूप किंग्सफोर्ड को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश के पद पर भेजा गया।

  • युगान्तर समिति की एक गुप्त बैठक में किंग्सफोर्ड को मारने का निश्चय हुआ। इस कार्य हेतु खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल कुमार चाकी का चयन किया गया।
  • 30 अप्रैल, 1908 को बोस एवं चाकी ने किंग्सफोर्ड की बग्घी पर बम फेंका। इस बम विस्फोट काण्ड में किंग्सफोर्ड बच गया। किन्तु दुर्भाग्य से उस गाड़ी में राष्ट्रीय आन्दोलन से सहानुभूति रखने वाले मिस्टर कैनेडी की पत्नी एवं पुत्र मारे गये।

🔺भारतीय क्रांतिकारी संगठन

संगठनस्थापनासंस्थापक
1.मित्र मेला1903 ई.विनायक दामोदर सावरकर, गणेश सावरकर
2.भारत माता सोसाइटी1904 ई.अजीत सिंह व अम्बा प्रसाद
3.ढाका अनुशीलन समिति1904 ई.पी. मित्रा व पुलिन दास
4.अभिनव भारत समाज1904 ई.वी.डी. सावरकर
5.अनुशीलन समिति1907 ई.वारीन्द्र कुमार घोष, जतीन्द्रनाथ बनर्जी, प्रबोध मित्र, पुलिन दास, सतीशचन्द्र बोस
6.युगांतर, अंजुमाने मोहिब्बाने वतन1907 ई.वी.के. घोष, भूपेन्द्रनाथ दत्त, सरदार अजीत सिंह
7.हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन1924 ई.शचीन्द्रनाथ सान्याल, रामप्रसाद बिस्मिल, योगेश चन्द्र चटर्जी
8.नौजवान सभा1926 ई.भगत सिंह
9.हिंदुस्तान सोशियलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन1928 ई.चन्द्रशेखर आजाद
  • इस घटना से आहत प्रफुल्ल (चाकी) ने आत्महत्या कर ली और खुदीराम बोस को गिरफ्तार कर 11 अगस्त, 1908 को फांसी दे दी गई।
    🔺खुदीराम बोस सबसे कम उम्र में शहीद होने वाले क्रांतिकारी थे।
  • कलकत्ता के मणिकतुल्ला गार्डन हाउस पर अनेक क्रांतिकारीयों द्वारा बम बनाने और हथियार चलाने का अभ्यास करने के कारण पुलिस द्वारा छापेमारी की गई। अरविंद घोष और उनके भाई बरींद्र कुमार घोष सहित अनेक क्रांतिकारी पकड़े गए।
  • परिणामस्वरूप कुछ क्रांतिकारियों को आजीवन कारावास की सजा दी गई। जबकि अरविंद घोष को रिहा कर दिया गया। जिसके पश्चात् उन्होंने सभी राजनीतिक गतिविधियाँ त्याग दी और पांडिचेरी चले गए।
  • उस समय पांडिचेरी एक फ्रांसीसी उपनिवेश था। वहाँ अरविंद ने ऑरोविले आश्रम की स्थापना की।
  • ढाका के मजिस्ट्रेट और नासिक एवं तिरुन्नवेली के कलेक्टरों की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

हार्डिंग बम कांड ( 1912 ई.)

  • 1912 ई. में वायसराय हार्डिंग की हत्या का प्रयास हुआ। 23 दिसंबर, 1912 को कलकत्ता से दिल्ली में राजधानी स्थानांतरण का दिन निर्धारित किया गया था।
  • इस अवसर पर वायसराय लॉर्ड हार्डिंग अपने परिवार और ब्रिटेन के शाही राजवंश के साथ दिल्ली में प्रवेश कर रहे थे, उसी समय उनके ऊपर बम फेंका गया, जिससे हार्डिंग घायल हो गए।
  • लॉर्ड हार्डिंग पर बम रास बिहारी बोस ने फेंका था। इस सिलसिले में अमीर चन्द्र, अवध बिहारी लाल और भाई बालमुकुंद के ऊपर मुकदमा चलाया गया तथा तीनों को फाँसी दे दी गई।
  • भारतीय क्रांतिकारियों ने लंदन, पेरिस, बर्लिन, उत्तरी अमेरिका तथा एशिया में अपने केंद्र स्थापित किए।
  • भारत के बाहर काम करने वाले कुछ प्रमुख क्रांतिकारी मैडम भीकाजी कामा, एम. बरकतुल्ला, वी.वी.एस. अय्यर, लाला हरदयाल, रासबिहारी बोस, सोहन सिंह भाकना, विनायक दामोदर सावरकर, उबैदुल्ला सिंधी और मानवेंद्रनाथ राय थे।

🔺 प्रमुख क्रांतिकारी घटनाएँ

घटनाएंवर्षस्थलक्रांतिकारी
1.एमहर्स्ट एवं कमिशनर रैण्ड हत्याकांड1897 ई.पुणेचापेकर बंधु
2.अलीपुर षड्यंत्र1908 ई.मुजफ्फरपुरखुदीराम बोस व प्रफुल्लचन्द्र चाकी
3.कर्नल वायली हत्याकांड1909 ई.लंदनमदनलाल धींगरा
4.जैक्सन हत्याकांड1909 ई.नासिकअनन्त कन्हेरे
5.दिल्ली बम कांड1912 ई.दिल्लीबसंत कुमार व रासबिहारी बोस
6.काकोरी ट्रेन डकैती कांड1925 ई.काकोरीरामप्रसाद बिस्मिल, बसंत कुमार
7.सांडर्स हत्याकांड1928 ई.लाहौरसरदार भगत सिंह
8.शस्त्रागार डकैती कांड1930 ई.चटगांवसूर्यसेन
9.जनरल डायर हत्याकांड1940 ई.लंदनऊधमसिंह

विदेशों में क्रांतिकारी संगठन

स्वराज के लिए संघर्ष
  • उत्तरी अमेरीका के भारतीय क्रांतिकारियों ने विभिन्न भारतीय गुजराती, उर्दू, मराठी, हिन्दी आदि भाषाओं में गदर नामक अखबार निकाला तथा गदर पार्टी की स्थापना की।
  • भारत में विद्रोह की तैयारी करने के लिए गदर पार्टी ने अपने सदस्य भेजे। अधिकांश सदस्यों को पकड़ लिया गया और कुछ को फाँसी दे दी गई।

🔰 क्रांतिकारी आंदोलन से सम्बद्ध व्यक्ति

1.दामोदर चापेकर व बालकृष्ण चापेकर• लेफ्टिनेंट एमहर्स्ट और रैण्ड की पूना में हत्या (1897 ई.)
2.विनायक दामोदर सावरकर• अभिनव भारत की स्थापना (1904 ई.)
• महाराष्ट्र में मित्र-मेला की स्थापना (1899 ई.)
3.पुलिन दास• ढाका की अनुशीलन समिति के संस्थापक (1902 ई.)
4.श्याम जी कृष्णवर्मा व एम.एल. ढींगरा• लंदन में इंडियन होमरूल सोसाइटी (1905 ई.) की स्थापना।
5.प्रफुल्लचंद्र चाकी व खुदीराम बोस• मुजफ्फरपुर के न्यायाधीश किंग्सफोर्ड पर बम फेंके (1908 ई.) लेकिन वे बच गए।
6.मदनलाल धींगरा• लंदन में कर्जन वाइली की हत्या (1909 ई.)।
7.रासबिहारी बोस व शचींद्रनाथ सान्याल• दिल्ली में प्रवेश करते समय लाॅर्ड हार्डिंग पर बम (1912 ई.) फेंका।
8.लाला हरदयाल व सोहन सिंह भाकना• सैन फ्रैंसिस्को (अमेरिका) में गदर पार्टी की स्थापना (1913 ई.)
• कामागाटामारू कांड (1914 ई.)।
9.जतिन मुखर्जी• बालासोर (ओडिशा) के बुरीबालम नदी के किनारे स्थित फोर्ट विलियम के अधिग्रहण की योजना, लड़ाई के दौरान मृत्यु।
10.रामप्रसाद बिस्मिल• हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन की स्थापना (1925 ई.), काकोरी षड्यंत्र (1925 ई.)।
11.सूर्यसेन• चटगांव षड्यंत्र (1930 ई.)।
12.चंद्रशेखर आजाद• हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (1928 ई.)
• इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क (चंद्रशेखर पार्क) के समीप पुलिस के साथ संघर्ष में स्वयं को गोली मार ली (1932 ई.)।
13.भगत सिंह• सांडर्स की हत्या (1928 ई.)
• केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका (1929 ई.)
• पंजाब नौजवान भारत सभा (1929 ई.)।
14.राजगुरू• सांडर्स की हत्या (1928 ई.)
15.बटुकेश्वर दत्त• केंद्रीय विधानसभा में बम फेंका (1929 ई.)।
16.जतिन दास• जेल में 64वें दिन भूख हड़ताल से मृत्यु (1929 ई.)।
17.ऊधम सिंह• लंदन में सर माइकल ओ-डायर की हत्या।

🔺 विदेशों में क्रांतिकारी संगठन

संगठनस्थापनासंस्थापक
1.इंडिया होमरूल सोसाइटी1905 ई.श्यामजी कृष्णवर्मा
2.इंडिया इंडिपेंडेंस लीग1907 ई.तारकनाथ दास
3.गदर पार्टी1913 ई.लाला हरदयाल, रामचन्द्र, बरकतुल्ला, सोहन सिंह भाकना
4.हिंद एसोसिएशन1913 ई.सोहन सिंह भाकना
5.इंडियन इंडिपेंडेंस लीग1915 ई.राजा महेन्द्र प्रताप
6.आजाद हिन्द फौज1942 ई.मोहन सिंह
7.इंडियन इंडिपेंडेंस लीग1942 ई.रासबिहारी बोस
8.पेरिस इंडियन सोसाइटी1905 ई.मैडम भीकाजी कामा

✴️ प्रथम विश्व युद्ध (1914-19 ई.) -• प्रथम विश्व युद्ध (1914) की विरोधी शक्तियाँ दो गुटों में विभाजित हुई-
🔘 प्रथम गुट : जर्मनी, ऑस्ट्रिया, इटली और तुर्की।
🔘 दूसरा गुट : फ्रांस, रूस और इंग्लैंड।
⭕ प्रथम गुट : ट्रिपल एलायंस (triple alliance)
⭕ दूसरा गुट : ट्रिपल एन्टेन्ट (triple entente)

  • यूरोप के साम्राज्यवादी देशों के दो विरोधी गुटों के मध्य शत्रुता के कारण 1914 ई. में एक युद्ध आरम्भ हुआ जो 1918 ई. तक चला। इसे प्रथम महायुद्ध कहा गया।
  • प्रथम विश्व युद्ध के समय भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग (1910-1916 ई.) थे। युद्ध के दौरान बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी ने ब्रिटिश सरकार की सहायता के लिए धन व सेना की सहायता हेतु गाँव-गाँव का दौरा किया।
  • युद्ध आरंभ होने के पश्चात् विसंबर, 1914 ई. में काग्रेस का अधिवेशन भूपेन्द्र नाथ बसु की अध्यक्षता में मद्रास में सम्पन्न हुआ। इस अधिवेशन में साम्राज्यवादियों के विजय की कामना की गई। कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में गवर्नर लॉर्ड पेंटलैंड (मद्रास) उपस्थित थे। कांग्रेस के इतिहास में यह प्रथम अवसर था, जब कोई गवर्नर अधिवेशन में उपस्थित हुआ था।
  • श्रीमती एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में होमरूल लीग की स्थापना हुई। 1893 ई. में एनी बेसेंट भारत आई और थियोसोफिकल सोसाइटी की नेता बनीं।
  • 1914 ई. में बाल गंगाधर तिलक बर्मा के निर्वासित जीवन से छूटकर आए और कांग्रेस में शामिल हो गये थे।

होमरूल लीग आंदोलन (1916 ई.)

  • 16 अप्रैल, 1916 में तिलक ने बेलगांव में हुए प्रांतीय सम्मेलन में होमरूल लीग के गठन की घोषणा की, जिसके अध्यक्ष जोसेफ वैपटिस्टा थे। संभवतः वे महाराष्ट्र में अपना आधार बनाये रखना चहते थे।
  • एनी बेसेंट के समर्थकों ने भी इस दिशा में कदम उठाया तथा उनकी अनुमति से पहले होमरूल ग्रुप की स्थापना कर ली। 1916 ई. में जमनादास द्वारकादास, शंकर लाल बैंकर तथा इन्दुलाल यागनिक ने बंबई से एक अखबार यंग इंडिया का प्रकाशन आरम्भ किया।
    🔺1915 ई. में लाला लाजपतराय ने अमेरिका में एक होमरूल लीग का गठन किया था।
  • सितंबर, 1916 में एनी बेसेंट ने होमरूल लीग की स्थापना की तथा जार्ज अरुंडेल को संगठन का सचिव नियुक्त किया। तिलक तथा ऐनी बेसेंट ने किसी प्रकार व्यवधान से बचने के लिए अपने-अपने कार्यक्षेत्रों का निर्धारण कर लिया।
  • 2 जनवरी, 1916 में लंदन में भारतीय होमरूल लीग की स्थापना की गई। इसके महासचिव डी० ग्राहमपोल थे।
  • तिलक की लीग ने मराठी सथा अंग्रेजी भाषा में पर्चे निकालकर अपने विचार एवं प्रचार कार्य गति प्रदान की। बाद में इन पर्चों को गुजराती तथा कन्नड़ भाषा में भी प्रकाशित किया गया।
    🔺तिलक ने कहा कि, भारत उस बेटे की तरह है जो अब जवान हो चुका है। समय का तकाजा है कि, बाप या पालक इस बेटे को उसका वाजिब हक दे दें। भारतीय जनता को अपना हक लेना ही होगा। इसका उन्हें पूरा अधिकार है।
  • तिलक ने क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा तथा भाषाई राज्य की माँग को इस आन्दोलन में शामिल कर दिया। उन्होंने मराठी, तेलुगू, कन्नड़ तथा अन्य भाषाओं के आधार पर प्रांतों के गठन की माँग की। उनकी होमरूल लीग की माँग पूरी तरह धर्मनिपेक्षता पर आधारित थी।
स्वराज के लिए संघर्ष
  • एनी बेसेन्ट अपने पत्र काॅमनवील और न्यू इण्डिया द्वारा तथा तिलक ने मराठा एवं कसेरी के माध्यम से लीग के कार्यक्रमों का प्रचार प्रसार किया।
  • तिलक की लीग पर किये गए मुकदमें की पैरवी मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में की गई। तिलक के साथ एन. सी. केलकर भी शामिल थे।
  • होमरूल आंदोलन में शामिल होने वाले अन्य प्रमुख नेता चितरंजन दास और मोतीलाल नेहरू थे।
  • एनी बेसेंट की लीग के साथ जॉर्ज अरुंडेल, सी. पी. रामास्वामी अय्यर, वी.पी. बाडिया, मोतीलाल नेहरू, तेजबहादुर सप्रू, मदन मोहन मालवीय आदि थे। कालान्तर में पंडित जवाहरलाल नेहरू (इलाहाबाद) तथा वी. चक्रवर्ती एवं जे. बनर्जी (कलकत्ता) भी इसमें शामिल हो गए।
  • एनी बेसेंट के अन्य समर्थकों में मद्रास से सत्यमूर्ति, अलीकुज्जमा, लखनऊ से जमनादास द्वारकादास, उमर शोभानी, शंकर दयाल बैंकर तथा इन्दुलाल यागनिक आदि प्रमुख थे।
  • 1916 ई. में लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में तिलक को कांग्रेस में अधिकारिक रूप से शामिल कर लिया गया। इस सम्मेलन की अध्यक्षता अंबिका चरण मजूमदार कर रहे थे।
  • गोपाल कृष्ण गोखले के सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी के सदस्यों को होमरूल लीग का सदस्य बनने की अनुमति नहीं थी।
  • मद्रास सरकार ने एनी बेसेंट, जॉर्ज अरुंडेल तथा वी.पी. वाडिया को जून 1917 में गिरफ्तार कर लिया। इसके विरोध में सर एस. सुब्रमण्यम अय्यर ने नाइटहुड की सरकारी उपाधि को त्याग दिया।
  • होमरूल लीग की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि, उसने भावी गांधीवादी कार्यक्रमों की आधारशिला रखी तथा राष्ट्रीय आन्दोलन के लिये युवाओं को प्रेरित किया।
  • होमरूल आन्दोलन के संदर्भ में एनी बेसेंट का कहना था कि, मैं बैतालिक का कार्य कर रही हूँ तथा सोये हुए देश को जगा रही हूँ।

लखनऊ समझौता (1916 ई.)

  • 1916 ई. में लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन की अध्यक्षता अम्बिका चरण मजूमदार ने की। मदन मोहन मालवीय ने लखनऊ समझौते का विरोध किया था।
  • 1916 ई. के लखनऊ समझौते पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग, दोनों ने हस्ताक्षर किए। शीघ्र ही स्वराज प्राप्ति की माँग का समर्थन करने के लिए दोनों संगठन एकजुट हुए। इस समझौते में कांग्रेस ने विधान परिषदों में मुसलमानों के पृथक प्रतिनिधित्व को स्वीकार कर लिया।
  • कांग्रेस के सूरत अधिवेशन के नौ साल बाद अब कांग्रेस के गरम दल और नरम दल पुनः एकजुट हुए।
  • भारत-सचिव एडविन मॉण्टेग्यू ने अगस्त, 1917 में यह घोषणा की कि, ब्रिटिश सरकार भारत में उत्तरदायी सरकार स्थापित करने के उद्देश्य से धीरे-धीरे स्वशासित संख्याओं की स्थापना करना चाहती है।
  • दिसंबर, 1917 में कलकत्ता में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। जिसकी अध्यक्षता एनी बेसेंट ने की थी।
    🔺एनी बेसेंट कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली महिला थीं।
  • इस अधिवेशन में 4,000 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। जिसमें लगभग 400 महिलाएँ भीं।

मॉन्टेग्यू घोषणा (अगस्त, 1917 ई.)

  • 8 जुलाई, 1918 में माॅन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट प्रकाशित हुई। इस समय माँन्टेग्यू भारत-सचिव और चेम्सफोर्ड वायसराय था।
  • कांग्रेस ने इसे असंतोषजनक एवं निराशापूर्ण माना। तिलक ने मॉन्टेग्यू घोषणा को सूर्य विहीन उषा काल की संज्ञा दी।
  • नरमपंथी नेताओं ने सुरेन्द्रनाथ बनर्जी के नेतृत्व में 17 अगस्त, 1918 को एक सभा करके इस रिपोर्ट का स्वागत किया और कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रीय उदारवादी संघ (नेशनल लिबरल लीग) का गठन किया। जो बाद में अखिल भारतीय उदारवादी संघ (ऑल इंडिया लिबरल फेडरेशन) के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
  • कांग्रेस के उदारवादियों ने मॉन्टेग्यू घोषणा को भारत का मैग्नाकार्टा कहा। इस प्रकार कांग्रेस का दूसरा विभाजन हो गया।
  • इस रिपोर्ट में उन सुधारों की बात की गई थी, जिन्हें ब्रिटिश सरकार भारत में लागू करना चाहती थी।
  • मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के प्रकाशन के बाद एक और रिपोर्ट प्रकाशित हुई। यह युद्ध के दौरान भारतीयों की सरकार विरोधी गतिविधियों की जाँच करने के लिए स्थापित रॉलेट कमीशन की रिपोर्ट थी।
  • इस रिपोर्ट में दमन के नए तरीके सुझाए गए। इस रिपोर्ट पर आधारित कानून ने देश की राजनीतिक स्थिति को पूरी तरह से बदल दिया।

✴️ मॉन्टेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार (1919 ई.) -• इसे भारत शासन अधिनिमय के नाम से भी जाना जाता है। इसके अन्तर्गत प्रांतीय विधायी परिषदों का आकार बढ़ा दिया गया तथा यह निश्चित किया गया कि, उनके अधिकांश सदस्य चुनाव जीतकर आयेंगे। प्रांतों में पहली बार द्वैध शासन प्रणाली को प्रारम्भ किया गया जिसका जन्मदाता लियोनिश कर्टिश था।

  • 1919 ई. के अधिनियम की सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता प्रांतों में द्वैध शासन प्रणाली थी।
  • इसके अन्तर्गत प्रांतीय विषयों को आरक्षित एवं हस्तांतरित दो भागों में विभाजित कर दिया गया। आरक्षित विषयों में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय जैसे: वित्त, कानून व्यवस्था, अकाल आदि रखे गए।
  • इस अधिनियम के द्वारा भारत में पहली बार लोक सेवा आयोग की स्थापना का प्रावधान रखा गया तथा भारतीय विधानमण्डल को बजट पास करने के सम्बंध में पहली बार सीमित अधिकार दिए गए।
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