रुद्धोष्म विचुम्बकन क्या है, परिभाषा, सूत्र व कार्य-विधि समझाइए | Adiabatic Demagnetisation in Hindi

परम शून्य क्या है

परम शून्य की और परम शून्य के अत्यन्त समीप के ताप द्रव हाइड्रोजन अथवा द्रव हीलियम का अति निम्न दाब पर क्वथन करके प्राप्त किये जा सकते हैं। कैमरलिंग औनेस ने द्रव हीलियम का 0.013 मिनी (पारा) दाब पर क्वथन करके 0.82k का ताप प्राप्त किया। किसोम ने द्रव हीलियम के तल पर बहुत शक्तिशाली पम्प के द्वारा 0.0036 मिमी (पारा) का दाब उत्पन्न करके 0.726k का निम्न ताप प्राप्त किया।

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रुद्धोष्म विचुम्बकन क्या है

वैज्ञानिक सर डिबाई तथा गाइक ने सन् 1926 ई. में वैज्ञानिकों ने पृथक-पृथक यह सुझाव दिया था। कि अनुचुम्बकीय पदार्थों के रुध्दोष्म विचुम्बकन के द्वारा निम्न ताप को प्राप्त किया जा सकता है। इस विधि के प्रयोग द्वारा किसी अनुचुम्बकीय पदार्थ को चुम्बकीत करें, तो उसके अणुओं को चुम्बकन क्षेत्र की दिशा में स्थानांतरित करने में किया बाह्य कार्य के कारण पदार्थ की आन्तरिक ऊर्जा के रूप में स्थापित हो जाता है। यदि पदार्थ का ताप बढ़ा देते हैं। तब यदि पदार्थ को उसके प्रारंभिक ताप तक ठण्डा होने देते हैं। तथा रुद्धोष्म दशा में उसका विचुम्बकन कर दिया जाता है। अर्थात् (चुम्बकन क्षेत्र को हटाकर) तो उसके अणु उलट-पुलट हो जाते हैं। अर्थात् पदार्थों का परम ताप कम हो जाता है तथा यदि पदार्थ का प्रथम ताप 1k है। तो रुध्दोष्म विचुम्बकन के कारण ताप में पतन 1° की कोटि भिन्न होती है।

कार्य-विधि

रुद्धोष्म विचुम्बकन विधि में प्रयोग होने वाले उपकरणों को चित्र में दिखाया गया है। इस प्रयोग में दो डेवार फ्लास्क n व o लगे होते हैं। तथा n में द्रव हिलियम और o में द्रव हाइड्रोजन गैसे भरी रहती है। अर्थात् इस तरह n द्रव हाइड्रोजन से घिरी रहती है तथा अनुचुम्बकीय लवण के पाउडर को एक एल्यूमीनियम के बर्तन p में रख कर भुजा m में लटका देते हैं, तथा भुजा m एक नली के कारण वायु पम्प से संबंधित होती है। और फ्लाक्स n में द्रव हीलियम के अंदर लटका हुआ रहता है। इस पूरे प्रयोग को एक शक्तिशाली विद्युत-चुम्बक के ध्रुवों N व S के बीच में रखा जाता है। तथा इससे 10k ओस्टैंड की कोटि का चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है।

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रुद्धोष्म विचुम्बकन
रुद्धोष्म विचुम्बकन

⇒प्रारंभिक स्थिति में प्रकोष्ठ m में हीलियम गैस भर दी जाती है। अब जिससे कि एक बर्तन p में रखा लवण, फ्लास्क n में भरी द्रव हीलियम के ऊष्मीय संपर्क में आता है। तथा जिससे कुछ देर बाद में लवण का ताप बाहर के द्रव हीलियम के ताप से 1k तक कम हो जाता है।

⇒अब यदि चुम्बकन क्षेत्र को लगा कर लवण को चुम्बकित करते हैं। तथा इसका ताब बढ़ जाता है, अतः उत्पन्न चुम्बकन ऊष्मा जल्द ही हीलियम गैस के द्वारा द्रव हीलियम में चली जाती है तथा लवण 1k ताप पर आ जाती है।

⇒अब यदि प्रकोष्ठ m की हीलियम गैस को वायु पम्प के द्वारा बाहर को निकाल दिया जाता है। तथा जिसके कारण लवण का द्रव हीलियम गैसों से कोई ऊष्मीय संपर्क नहीं रहता है।

⇒आखीर में, चुम्बकीय क्षेत्र को खत्म कर देते हैं जिससे अनुचुम्बकीय लवण रुद्धोष्म दशा में विचुम्बकित हो जाता है। तथा इसका ताप अधिक निम्न मान तक कम हो जाता है।

अर्थात् सन् 1933 ई. में वैज्ञानिक गाइक तथा मैक्डूगल ने अनुचुम्बकीय लवण जैसे गैडोलीनियम सल्फेट का प्रयोग किया था। तथा 8k ओस्टैंण्ड का चुम्बकन क्षेत्र लगा कर 0.25k का ताप प्राप्त किया जा सकता है। अतः सन् 1935 ई. में डीहास तथा वीयर्सन ने क्रोम पोटैशियम ऐलम तथा एल्यूमीनियम पोटैशियम ऐलम के मिश्रणों को प्रयोग किया जाता है। तथा 24,075 ओर्स्टेड के क्षेत्र से 0.0034k का ताप प्राप्त किया जा सकता है। अतः सन् 1956 ई. में वैज्ञानिक क्लैर्क, स्टीनलैंड तथा गोर्टर ने क्रोमियम ऐलम तथा एल्यूमीनियम ऐलम के पाउडर में मिश्रित क्रिस्टलों को प्रयुक्त की करके 0.0014k ताप को प्राप्त किया जा सकता है, जो कि सबसे निम्न ताप प्राप्त होता है।
अब यदि 10-6k के प्रक्रम के तापों में नाभिकीय चुम्बकत्व के आधार पर प्राप्त किए जाते हैं, परंतु जोकि परम शून्य ताप को प्राप्त करना असम्भव है।

चुम्बकीय शीतलन क्या है

“साधारण ताप पर चुम्बकीय शीतलन संभव नहीं होता है।” क्योंकि रुद्धोष्म विचुम्बकन के द्वारा ताप में क्षय परम ताप के व्युत्क्रमानुपाती होता है। यदि जब अनुचुम्बकीय पदार्थों का ताप लगभग 1k ताप होता है, तो ताप में यह न्यूनता 1 केल्विन की भिन्न क्रम में होती है। अतः स्पष्ट है कि साधारण ताप यानी 300k ताप पर यह नगण्य होती है। अतः साधारण तापों पर रुद्धोष्म विचुम्बकन विधि को शीतलन के लिए उपयोग में नहीं किया जा सकता है।

परम शून्य तापों का मापन

परम शून्य के समीप तापों का मापन रुद्धोष्म विचुम्बकन के द्वारा प्राप्त निम्न ताप पर क्यूरी नियम के आधार पर मापते हैं। अर्थात् इस नियमानुसार, अनुचुम्बकीय लवण की चुम्बकीय प्रवृत्ति χ, परम शून्य ताप T के व्युत्क्रमानुपाती होती है।

\footnotesize \boxed{ χ = \frac{C}{T} }

यहां पर C क्यूरी ताप नियतांक है, अतः इससे चुम्बकीय प्रवृत्ति मापकर, ताप की गणना की जाती हैं। अर्थात् इसके लिए प्रकोष्ठ m के चारों तरफ की दो, एक धुरी वाली कुण्डलियां लपेट देते हैं। तथा उसमें से एक में प्रत्यावर्ती धारा को प्रवाहित कर देते हैं। तथा दूसरी कुण्डली में प्रेरित धारा जोकि लवण की चुम्बकीय प्रवृत्ति पर निर्भर रहती है। अर्थात् प्रवर्धित करके इसको माप लेते हैं। तथा यह धारा ही चुम्बकीय प्रवृत्ति की माप होती है। जिसके कारण क्यूरी नियम से, ताप कि गणना कर ली जाती है।

Note – सम्बन्धित प्रश्न –
Q. 1 रुद्धोष्म विचुम्बकन किसे कहते हैं? इसके द्वारा निम्नतम ताप को कैसे प्राप्त कर सकते हैं? तथा इस प्रकार के निम्न तापों को किस प्रकार मापा जाता है?
Q. 2 रुद्धोष्म विचुम्बकन क्या है? प्रयोग तथा कार्यविधि को चित्र की सहायता से समझाइए ? तथा इसमें निम्न ताप को कैसे ज्ञात करते हैं? और इसके द्वारा निम्नतम ताप को किस तरह नापते हैं?

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