राजपूत कालीन प्रशासनिक व्यवस्था, राजपूतों की असफलता के कारण

राजपूत कालीन प्रशासनिक व्यवस्था

सम्राट हर्षवर्धन की मृत्यु के पश्चात् भारत पुनः छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया और सैन्य पद्धति की बागडोर सम्भालने का उत्तरदायित्व राजपूत राजाओं पर पड़ा जिनकी उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद हैं, परन्तु इतना निश्चित है कि राजपूतों के पूर्वज प्राचीन क्षत्रिय वर्ण के थे। उन्होंने भारत में एक लम्बे समय तक युद्ध अभियानों में भाग लिया। 8वीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक भारत पर राजपूतों का शासन रहा। किन्तु बाद में तुर्क, अफगान और मुगलों ने इन्हें राजस्थान के मरुस्थल तथा अरावली की पहाड़ियों तक सीमित कर दिया।

राजपूतों ने भारतीय सैन्य इतिहास की गरिमा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है, उनकी वीरता, साहस, स्वाभिमान, निष्कपट एवं सरल स्वभाव आज भी सैनिकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

राजपूतों की सैन्य पद्धति

राजपूत सैनिक पद्धति मुख्यतः सामंतीय प्रकार की थी राजपूत सेनाओं की रचना और संगठन सामन्तीय आधार पर किया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि सैनिक नेतृत्व पर समाज के एक वर्ग का सामन्तों का एकाधिकार हो गया। इस व्यवस्था में स्थाई एवं नियमित सेना का सर्वथा अभाव था। उस राज्य के सभी जागीरदार आवश्यकता के समय अपनी-अपनी सेना को लेकर राजा की सहायता हेतु उपस्थित हो जाते थे। मेजर डेविड के अनुसार, “राजपूत सेना का मेरुदण्ड अश्वारोही थे। वे राजपूत कालीन प्रशासनिक व्यवस्था को इस गतिशील सेना में अपनी पूर्ण आस्था रखते थे। अश्वारोही सेना हल्के हथियारों से सज्जित रहती थी। इन हथियारों में प्रायः तलवार, कृपाण और भाले होते थे, उन पर कुछ कवचयुक्त धनुर्धर भी रहते थे।”

अश्वारोही स्वयं घोड़े की व्यवस्था करता था। गज सेना की व्यवस्था राज्य की ओर से की जाती थी, साथ ही युद्धकाल में जागीरों द्वारा भी हाथी देने की व्यवस्था थी । युद्ध में गतिशीलता बनाये रखने के लिए अश्वों की तुलना में हाथियों का महत्व गौण ही था। पैदल सेना का भी प्रयोग किया जाता था। सम्पूर्ण सेना छोटी-छोटी टुकड़ियों में संगठित होती थी, जिसका नेतृत्व एक नायक द्वारा किया जाता था। जागीरदारी सेना जगीरदार नायकों के अधीन युद्ध करती थी, किन्तु सर्वोच्च कमाण्डर अथवा प्रधान सेनापति राज्य विशेष का राजा ही होता था।

सैनिकों के वेतन तथा भत्ते

लड़ाई के समय भर्ती किये गये सैनिकों को छोड़कर नकद वेतन की व्यवस्था का अभाव था। सैनिकों को जागीर एवं भूमि लगान की छूट एवं जिन्स (फसल के समय अनाज देने की व्यवस्था) के रूप में वेतन दिया जाता था। इसके साथ ही युद्ध में किसी योद्धा द्वारा विशिष्ट शौर्य प्रदर्शन पर उसे दरबार में सम्मानित करने, जागीर वृद्धि कर उसकी पदोन्नति की भी प्रथा थी।

सैनिकों के शस्त्रास्त्र

राजपूत कालीन प्रशासनिक व्यवस्था द्वारा तलवार और भाले-राजपूतों के प्रमुख हथियार थे। मुठभेड़ की लड़ाई में राजपूत बड़ी कुशलता के साथ तलवार का प्रयोग करते थे। धनुष-बाण एवं बल्लम का प्रयोग भी आक्रमणात्मक हथियार के रूप में होता था। राजपूत सैनिक अपनी रक्षा हेतु ढाल और कवच का प्रयोग करते थे। कवच में लोहे का टोप तथा सीना ढकने वाली लोहे की प्लेट प्रमुख थी।

दुर्ग व्यवस्था

राजपूतों ने सुदृढ़ दुर्गों के निर्माण पर पर्याप्त बल दिया। इन दुर्गों में पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री एवं शस्त्रास्त्र आदि संचित रहते थे। दुर्गों का प्रयोग राजपूत सैनिक अपनी सुरक्षा के लिए करते थे। खुले मैदान में जब योद्धा शत्रु का सामना करने में अपने को असमर्थ पाते थे तो इन दुर्गों में शरण लेते थे। ये दुर्ग इतने मजबूत होते थे कि शत्रु द्वारा इनको तोड़ना दुष्कर होता था ।

राजपूतों की युद्धकला

राजपूत सैनिकों की व्यूह-रचना एवं युद्ध कौशल तत्कालीन परिस्थितियों द्वारा प्रभावित होता रहा। प्रारम्भ में राजपूत आमने-सामने की मुठभेड़ की लड़ाई के समर्थक थे। वे अपनी सम्पूर्ण सेना को तीन भागों (दायाँ, मध्य और बाँया) में बाँटकर खड़ा करते थे तथा आरक्षित सेना नहीं रखते थे। धर्म युद्ध के समर्थक होने के कारण किसी प्रकार की कूटनीतिक चालों का सहारा लिए बिना वे पूरी शक्ति से दुश्मन पर टूट पड़ते थे। दाँये-बाँये भाग की अश्वारोही सेना जो उनका प्रमुख लड़ाकू अंग थी, दुश्मन पर टूट पड़ती और मुठभेड़ की लड़ाई प्रारम्भ हो जाती। यह लड़ाई तब तक चलती रहती जब तक राजपूती सैनिक थककर चूर न हो जाते अथवा उनका राजा या सरदार दिवंगत न हो जाता। राजपूत युद्ध लड़ते-लड़ते मर जाना गौरव की बात मानते थे और । दुश्मन को पीठ दिखाना उतना ही अपमानजनक समझा जाता था। बाद में मुगलों की बारूदी हथियारों से सुसज्जित सेना का मुकाबला करने के लिए राजपूतों ने छापा मार युद्ध विधि को अपनाया।

राजपूतों की असफलता के कारण

राजपूत राजाओं की आपसी फूट, मिथ्याभिमान, अदूरदर्शिता एवं दोषपूर्ण युद्ध कौशल के कारण वे मुस्लिम एवं मुगल आक्रमणकारियों के समक्ष टिक न सके।
संक्षेप में राजपूतों के पतन के निम्नलिखित कारण थे—

(1) आपसी सहयोग व एकता का अभाव – शूरता एवं व्यक्तिगत प्रतिभा के घमण्ड में चूर राजपूतों में शनैः-शनैः वैमनस्य एवं फूट के बीज अंकुरित हो गये, जिसके कारण वे विदेशी आक्रमणकारी के समक्ष एक सम्मिलित शक्ति के रूप में टक्कर लेने में असफल रहे।

(2) नवीन शस्त्रास्त्रों की सामरिकी का अभाव – राजपूत योद्धा परम्परागत हथियारों का ही प्रयोग करते थे। बदली हुई परिस्थितियों के बावजूद भी वे नवीनतम शस्त्रों के प्रयोग के पक्षधर नहीं थे। वस्तुतः उनकी युद्धनीति तत्कालीन परिस्थितियों में पुरानी पड़ चुकी थी। इस कारण आक्रान्ता पराजित करने में सफल हुए।

(3) गतिशीलता का अभाव – राजपूत सेना में गजसेना का प्रयोग होता था। जिनकी गतिशीलता कम थी। अपेक्षाकृत मुस्लिम अश्वारोही सेना पूर्ण प्रशिक्षित एवं गतिशील थी। अतः भारतीय राजाओं की युद्ध विधि में आक्रमणकारियों की तुलना में अपेक्षित गतिशीलता का अभाव स्वाभाविक हो गया था। इस कारण सुरक्षित एवं गतिशील तुर्क अश्वारोही सेना के समक्ष विशाल हिन्दू सेनायें भी सफल न हो सकीं।

(4) कूटनीतिक दाँव-पेचों का अभाव – राजपूत निश्छल, धर्मान्ध तथा धर्म-युद्धों के समर्थक थे अतः ये कूटनीतिक चालों एवं शत्रु को विस्मित करने जैसी सैनिक चालों की अवहेलना करते थे। अतः वे मुस्लिम शासकों की कूटनीतिक गतिविधियों को नहीं समझ पाये।

(5) सफल नायकत्व का अभाव – रूढ़ियों के जकड़े हिन्दू राजा जो सैन्य-नियन्त्रण पर ध्यान न देकर स्वयं आगे लड़कर व्यक्तिगत प्रतिभा के प्रदर्शन में आस्था रखते थे, इसके विपरीत तुर्क कमाण्डर, जो पीछे रहकर अपनी सेना का समुचित नियन्त्रण करने में पटु थे, का अधिक समय तक सामना नहीं कर सके।

(6) प्रतिरक्षा व्यवस्था का अभाव – बाह्य आक्रमणों को पूर्व नियोजित ढंग से विफल करने की कोई ठोस योजना न होने के कारण युद्ध के प्रारम्भ होने के समय सेना के एकत्रण में विलम्ब (स्थायी सेना के अभाव के कारण) होना तो स्वाभाविक ही था, साथ ही विभिन्न जागीरदारों की सेना में एकरूपता स्थापित कर सकना भी एक समस्या बन गयी।

राजपूत कालीन प्रशासनिक व्यवस्था में युद्ध हेतु उपयुक्त स्थल के चयन में असावधानी तथा अपनी पार्श्वों को समुचित सुरक्षा व्यवस्था के अभाव ने यह प्रमाणित कर दिया कि राजपूत राजा युद्ध एवं प्रतिरक्षा के महत्वपूर्ण सिद्धान्तों का निर्णय करने में असफल रहे । समुचित गुप्तचर व्यवस्था एवं रिजर्व सेना के अभाव में राजपूत सेना का अग्रगामी गारद तथा रिजर्व युक्त तुर्क सेना का सामना करने में असफल होना स्वाभाविक ही था।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. राजपूतकालीन सैन्य व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
प्रश्न 2. राजपूतों के काल में देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति की मुख्य विशेषताएं क्या थी?
प्रश्न 3. राजपूत कालीन प्रशासनिक व्यवस्था क्या थी? समझाए कि राजपूतों की असफलता के कारण क्या थे।

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