अलंकार : परिभाषा,भेद, प्रकार व उदाहरण | Alankar in Hindi

Alankar in Hind – इस अध्याय में आपको हिंदी व्याकरण का एक और बहुत ही महत्वपूर्ण टॉपिक ‘अलंकार’ (Alankar in Hindi), अलंकार की परिभाषा, भेद, प्रकार एवं अलंकार के उदाहरण की जानकारी दी जा रही है। यह जानकारी इसलिए आवश्यक है, क्योंकि यह विषय लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाओं एवं बोर्ड परीक्षाओं में पूछा जाता है, तो दोस्तों हमनें आपके लिए यहां अलंकार की परिभाषा, भेद, प्रकार एवं उदाहरण को सरल भाषा में विस्तार से अध्ययन किया है। तो आप इसे पूरा जरूर पढ़ें, तो चलिए शुरू करते हैं।

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अलंकार की परिभाषा (Alankar ki Paribhasha)

अलंकार का शाब्दिक अर्थ ‘आभूषण’ या ‘सजावट’ होता है। जिस प्रकार आभूषण पहनने से स्त्रियों के सौन्दर्य में चार चांद लग जाते हैं, उसी प्रकार अलंकार के प्रयोग से काव्य का सौन्दर्य बढ़ जाता है। अर्थात् अलंकारों के प्रयोग से शब्द और अर्थ में चमत्कार उत्पन्न हो जाता है।

अलंकार में ‘अलम्’ तथा ‘कार’ दो शब्द होते हैं। ‘अलम्’ का अर्थ है- ‘भूषण’ या ‘सजावट’। तथा ‘कार’ का अर्थ है- ‘वाला’; अर्थात् जो अलंकृत या भूषित करें, वह ‘अलंकार’ (Alankar in Hindi) कहलाता हैं।
संक्षेप में अलंकार की परिभाषा – “काव्य के शब्द और अर्थ में चमत्कार उत्पन्न करके काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्वों को ‘अलंकार’ कहते हैं।”

अलंकार के संबंध में प्रथम काव्य शास्त्र ‘आचार्य दण्डी’ ने लिखा है- “काव्यशोभाकरान धर्मान अलंकरान प्रचक्ष्तें।” अर्थात् ‘काव्य के शोभा कारक (अथवा शोभा बढ़ाने वाले) धर्म ‘अलंकार’ है।’

नोट पॉइंट्स:- विद्यार्थी ध्यान दें कि –

  • ‘आचार्य भरतमुनि’ ने सर्वप्रथम ‘नाटकशास्त्र’ में अलंकार को परिभाषित तो नहीं किया है, परन्तु चार अलंकार- (1). उपमा अलंकार, (2). रूपक अलंकार, (3). यमक अलंकार व (4). दीपक अलंकार आदि अलंकारों का उल्लेख किया है।
  • हिंदी साहित्य के कवि ‘केशवदास’ ‘अलंकार वादी’ कवि कहलाते हैं।
  • अलंकार शब्द की अवधारणा बहुत ही प्राचीन है जिसका उपयोग प्रारंभ में हिंदी व्याकरण एवं न्याय शास्त्र में किया जाता था।

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अलंकार के भेद

अलंकार को सर्वप्रथम आचार्य वामन ने वर्गीकृत करने का प्रयास किया था। तथा उन्होंने अलंकार को मुख्य दो भागों में बांटा – शब्दालंकार और अर्थालंकार ।
आज के समय में अलंकार के तीन भाग माने जाते हैं। अलंकार के तीन भेद होते हैं-

  1. शब्दालंकार
  2. अर्थालंकार
  3. उभयालंकार ।
Alankar in Hindi
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शब्दालंकार (ShabdAlankar ki Paribhasha)

जो अलंकार शब्दों के प्रयोग द्वारा कोई चमत्कार उत्पन्न करके काव्य की शोभा बढ़ाते हैं और यदि उन शब्दों के स्थान पर कोई दूसरे पर्यायवाची (समानार्थी) शब्दों का प्रयोग कर देने पर उनका सौन्दर्य समाप्त हो जाता है, तो ऐसे शब्दों को ‘शब्दालंकार’ कहते हैं। उदाहरण
वह बांसुरी की धुन कानि परैं।
कुल-कानि हियों तजिं भाजतिं फिरैं।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘कानि’ शब्द का दो बार प्रयोग किया गया है। यहां पहले ‘कानि’ शब्द का अर्थ ‘कान’ है तथा दूसरे ‘कानि’ शब्द का अर्थ ‘मर्यादा’ है। इस प्रकार एक ही शब्द दो अलग-अलग अर्थ देकर काव्य की शोभा बढ़ा रहा है। अतः यह शब्द प्रयोग ही ‘शब्दालंकार’ कहलाता है। माना यदि ‘कुल-कानि’ की जगह पर ‘कुल-मर्यादा’ या ‘कुल-मान’ का प्रयोग करा जाए तो वैसा चमत्कार नहीं आएगा।

शब्दालंकार के भेद

इस अध्याय में शब्दालंकार के निम्न छः भेदों को प्रदर्शित किया गया है जो इस प्रकार हैं –

  1. अनुप्रास अलंकार
  2. यमक अलंकार
  3. श्लेष अलंकार
  4. वक्रोक्ति अलंकार
  5. वीप्सा अलंकार
  6. पुनरुक्ति अलंकार ।

1. अनुप्रास अलंकार (Anupras Alankar ki Paribhasha)

जहां किसी व्यंजनों की बार-बार आवृत्ति के कारण चमत्कार उत्पन्न हो चाहे उनके स्वर मिलें या न मिलें, वहां ‘अनुप्रास अलंकार’ होता है। उदाहरण
कुल कानन् कुण्डल मोर पंखा, उरपे बनमाल् बिराजीत हैं।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘क’ वर्ण की तीन बार और ‘ब’ वर्ण की दो बार आवृत्ति होने से अलंकार में चमत्कार उत्पन्न हो गया है। अतः यहां अनुप्रास अलंकार है।

अनुप्रास अलंकार के भेद

अनुप्रास अलंकार के भी पांच भेद होते हैं –
(क). छेकानुप्रास अलंकार
(ख). वृत्यानुप्रास अलंकार
(ग). लाटानुप्रास अलंकार
(घ). श्रुत्यानुप्रास अलंकार
(ड़). अन्त्यानुप्रास अलंकार ।

(क). छेकानुप्रास अलंकार – यहां छेक का अर्थ ‘वाक्’ या ‘चातुर्य’ होता हैं। अर्थात् वाक् से परिपूर्ण जहां एक या एक से अधिक वर्णों की आवृत्ति केवल एक बार होती है, तो वहां ‘छेकानुप्रास अलंकार’ होता है। उदाहरण
इस करुणा कलित् हृदय में, क्यों बिकल् रागिनी बजिती हैं।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘क’ वर्ण की आवृत्ति क्रम से एक बार है, अतः यहां छेकानुप्रास अलंकार है।

(ख). वृत्यानुप्रास अलंकार – जहां एक या अनेक वर्णों की स्वरूपता या क्रमता की आवृत्ति दो या दो से अधिक बार होती हैं, तो वहां ‘वृत्यानुप्रास अलंकार’ होता है।
उदाहरण – तरनि तनूजा तट तमाल तरुवर बहु छाए।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘त’ वर्ण की अनेक बार आवृत्ति होने के कारण यहां वृत्यानुप्रास अलंकार है।

(ग). लाटानुप्रास अलंकार – यहां लाट का अर्थ ‘समूह’ है। अर्थात् जब किसी शब्द तथा उसका अर्थ एक जैसा रहता है, केवल बहुत थोड़ा हेर-फेर करने से उसके अर्थ में भेद हो जाए, तो वहां ‘लाटानुप्रास अलंकार’ होता है। उदाहरण
पराधीन जोजन, नहीं स्वर्ग, नरक तो हेतु।
पराधीन जोजन नहीं, स्वर्ग नरक तो हेतु।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में दोनों वाक्य तो समान है केवल अल्पविराम बदल जाने से अर्थ में भिन्नता आ जाने के कारण यहां लाटानुप्रास अलंकार है।

(घ). श्रुत्यानुप्रास अलंकार – जहां एक ही स्थान से बोले जाने वाले व्यंजन की आवृत्ति होती हैं, किंतु समान उच्चारण वाले व्यंजन बार-बार आते हैं, तो वहां ‘श्रुत्यानुप्रास अलंकार’ होता हैं। उदाहरण – तुलसीदास सीदत निसिदिन, देखत् तुम्हारिं निठुराई।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘तुलसीदास’ शब्द में पाॅंच व्यंजन है और पाॅंचों समान उच्चारण वाले हैं। अतः इस प्रकार यहां ‘श्रुत्यानुप्रास अलंकार’ है।

(ड़). अन्त्यानुप्रास अलंकार – जहां चरणों और पदों के अंत में स्वरों और व्यंजनों की समानता होती है, वहां ‘अन्त्यानुप्रास अलंकार’ होता है। उदाहरण
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन।
नयन अमिये दृग दोष विभंजन।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में दोनों चरणों के अंत में ‘अंजन’ और ‘विभंजन’ में समानता होने के कारण यहां अन्त्यानुप्रास अलंकार है।

2. यमक अलंकार (Yamak Alankar ki Paribhasha)

जब एक ही शब्द दो या दो से अधिक बार आए और उसका अर्थ हर बार भिन्न-भिन्न हो, तो वहां ‘यमक अलंकार’ होता है। उदाहरण
काली घटा का घमण्ड घटा, नभ मण्डल तारक वृंदा खिलें।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में शरद के आगमन पर उसके सौन्दर्य का चित्रण किया गया है, जैसे- वर्षा बीत गई है, शरद ऋतु आ गई है। काली घटा का घमण्ड घट गया है। यहां ‘घटा’ शब्द दो बार आया है और दोनों के अलग-अलग अर्थ है। पहले ‘घटा’ शब्द का अर्थ ‘काले बादल’ और दूसरे ‘घटा’ शब्द का अर्थ ‘कम हो गया’ । अर्थात् घटा शब्द ने इन पंक्तियों में सौन्दर्य उत्पन्न कर दिया है। अतः यहां यमक अलंकार है।

3. श्लेष अलंकार (Shlesh Alankar ki Paribhasha)

श्लेष का अर्थ ‘चिपकना’ होता है। अर्थात् जहां एक शब्द एक ही बार प्रयोग होता है। तथा उसके एक से अधिक अर्थ होते हैं, तो वहां ‘श्लेष अलंकार’ होता है। उदाहरण
चरन धरत चिन्ता करत, फिर चितवत् चाॅंहु ओर।
‘सुबरन’ को ढूंढत फिरत, कवि व्यभिचारी चोर।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण की दूसरी पंक्ति में ‘सुबरन’ का प्रयोग किया गया है जिसे कवि, व्यभिचारी और चोर तीनों ढूंढ रहे हैं। अतः इस प्रकार यहां ‘सुबरन’ शब्द के तीन अर्थ हैं। पहले कवि ‘सुबरन’ का अर्थ ‘अच्छे शब्द’, दूसरे व्यभिचारी ‘सुबरन’ का अर्थ ‘अच्छे रूप-रंग’ और तीसरे चोर ‘सुबरन’ का अर्थ ‘स्वर्ण ढूंढ रहा’ हैं। अतः इस प्रकार यहां श्लेष अलंकार है।

4. वक्रोक्ति अलंकार (Vakrokti Alankar ki Paribhasha)

जहां बात किसी एक आशय से कहीं जाएं और सुनने वाला उससे अलग अर्थ निकालें, तो वहां ‘वक्रोक्ति अलंकार’ होता है।
उदाहरण – को तुम? हैं घनश्याम हम, तो बरसों कित जाएं।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में राधा और श्री कृष्ण जी का चित्रण किया गया है। यहां राधा जी ने पूछा कौन हो तुम, तो श्री कृष्ण जी ने बोला मैं ‘घनश्याम’ हूॅं। तो यहां पर राधा ने ‘घनश्याम’ का अर्थ ‘बादलों’ से लगा लिया। और बोली तो बरसों कहीं जाकर। अतः इस प्रकार यहां वक्रोक्ति अलंकार है।

वक्रोक्ति अलंकार के भेद

वक्रोक्ति अलंकार के निम्न दो भेद होते हैं –
(1). काकु वक्रोक्ति अलंकार
(2). श्लेष वक्रोक्ति अलंकार।

(1). काकु वक्रोक्ति अलंकार – जहां कहने वाले के द्वारा कहें गए शब्दों का उसकी कण्ठ ध्वनि के कारण सुनने वाले कुछ और अर्थ निकाले, तो वहां ‘काकु वक्रोक्ति अलंकार’ होता है।
उदाहरण – मैं सुकुमारि नाथ वन् जोगु।

(2). श्लेष वक्रोक्ति अलंकार – जहां श्लेष की वजह से कहने वाले के द्वारा बोले गए शब्दों का अलग अर्थ निकाला जाए, तो वहां ‘श्लेष वक्रोक्ति अलंकार’ होता है।
उदाहरण – केसौ सूधीं बात में बरतन टेढ़ों भाव।

5. वीप्सा अलंकार (Vipsa Alankar ki Paribhasha)

जब अत्यंत आदर शोक के साथ एक ही शब्द की अनेक बार पुनरुक्ति हो, तो वहां ‘वीप्सा अलंकार’ होता है।
उदाहरण – हां! हां! इन्हें रोकन को टोक न लगावों तुम।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में हां! शब्द की पुनरुक्ति के द्वारा गोपियों का बिरह जनित आवेग व्यक्त होने से यहां वीप्सा अलंकार है।

6. पुनरुक्ति अलंकार (Punrukti Alankar ki Paribhasha)

जहां कोई शब्द दो या दो से अधिक बार आए, परंतु उस शब्द का अर्थ एक ही रहें, तो वहां ‘पुनरुक्ति अलंकार’ होता है।
उदाहरण – मधुर-मधुर मेरे दीपक जलैं।

स्पष्टीकरण – यहां मधुर शब्द दो बार आया है, लेकिन अर्थ समान है। अतः यहां पुनरुक्ति अलंकार है।

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अर्थालंकार (Arthalankar ki Paribhasha)

काव्य में जब भाषा का प्रयोग इस प्रकार किया जाए कि अर्थ में समृद्धि और चमत्कार उत्पन्न हो, तो उसे ‘अर्थालंकार’ कहते हैं।दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं। जो अलंकार अर्थों के प्रयोग द्वारा कोई चमत्कार उत्पन्न कर काव्य की शोभा बढ़ाते हैं, वे ‘अर्थालंकार’ कहलाते हैं।

अर्थालंकार के भेद

अर्थालंकार के निम्नलिखित भेद होते हैं। इस अध्याय में तीस का वर्णन किया गया है-

1. उपमा अलंकार11. विरोधाभास अलंकार21. काव्यलिंग अलंकार
2.रूपक अलंकार12. अनन्वय अलंकार22. उपमेयोपमा अलंकार
3. उत्प्रेक्षा अलंकार13. प्रतीप अलंकार23. व्यतिरेक अलंकार
4. अतिशयोक्ति अलंकार14. दृष्टान्त अलंकार24. अर्थान्तरन्यास अलंकार
5. अन्योक्ति अलंकार15. मानवीकरण अलंकार25. स्वभावोक्ति अलंकार
6. संदेह अलंकार16. विनोक्ति अलंकार26. समासोक्ति अलंकार
7. भ्रांतिमान अलंकार17. विशेषोक्ति अलंकार27. पर्याय अलंकार
8. दीपक अलंकार18. असंगति अलंकार28. कारणमाला अलंकार
9. विभावना अलंकार19. अपहृति अलंकार29. व्याजस्तुति अलंकार
10. अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार20. उल्लेख अलंकार30. व्याजनिन्दा अलंकार

1. उपमा अलंकार (Upma Alankar ki Paribhasha)

अधिकांश सादृश्य (या साधर्म्य) के कारण सर्वथा भिन्न होते हुए भी जहां एक वस्तु या प्राणी की तुलना या समानता किसी दूसरी प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाती है, तो वहां ‘उपमा अलंकार’ होता है।
उदाहरण – नीलिमा चंद्रमा जैसीं सुंदरी हैं।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में नीलिमा और चंद्रमा दोनों सुंदर होने पर दोनों में सादृश्यतः को दिखाया गया है। अतः यहां उपमा अलंकार है।

उपमा अलंकार के अंग

उपमा अलंकार के निम्न चार अंग होते हैं, जो इस प्रकार है –
(क). उपमेय,
(ख). उपमान,
(ग). साधारण धर्म
(घ). वाचक शब्द ।

(क). उपमेय – जिसकी उपमा दी जाए अर्थात् जिसका वर्णन करना होता है, उसे ‘उपमेय’ या ‘प्रस्तुत’ कहते हैं। जैसे – ‘चाॅंद-सा सुन्दर चेहरा।’ इस उदाहरण में ‘चेहरा’ उपमेय है।

(ख). उपमान – जिससे उपमा दी जाए अर्थात् वह वर्णनीय वस्तु या प्राणी जिससे उपमेय की तुलना या समानता की जाए, उसे ‘उपमान’ या ‘अप्रस्तुत’ कहते हैं। जैसे – ‘चाॅंद-सा सुन्दर चेहरा।’ इस उदाहरण में ‘चाॅंद’ उपमान है।

(ग). साधारण धर्म – जहां उपमेय और उपमान दोनों में परस्पर समान गुण या विशेषता को व्यक्त करने वाले शब्दों को ‘साधारण धर्म’ कहते हैं। जैसे – ‘चाॅंद-सा सुन्दर चेहरा।’ इस उदाहरण में ‘सुन्दर’ साधारण धर्म को व्यक्त करता है।

(घ). वाचक शब्द – जिन शब्दों की सहायता से उपमेय और उपमान की समानता प्रकट की जाती है, उसे ‘वाचक शब्द’ कहते हैं। जैसे – सम, तुल्य, समान, सा, जैसा, सदृश, सौं, व के समान आदि शब्द वाचक शब्द कहलाते हैं।

उपमा अलंकार के भेद

उपमा अलंकार के निम्न तीन भेद होते हैं –
(1). पूर्णोपमा अलंकार
(2). लुप्तोपमा अलंकार
(3). मालोपमा अलंकार ।

(1). पूर्णोपमा अलंकार – जिसमें उपमा के चारों अंग- उपमेय, उपमान, साधारण धर्म और वाचक शब्द आदि अंग उपस्थित हो, तो वहां ‘पूर्णोपमा अलंकार’ होता है।
उदाहरण – प्रातःकालीन नभ था बहुत नीला शंख जैसें।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में प्रातः कालीन ‘नभ’ उपमेय है, ‘शंख’ उपमान है, ‘नीला’ साधारण धर्म है और ‘जैसें’ वाचक शब्द है। अतः यहां उपमा के चारों अंग उपस्थित हैं। अतः यहां पूर्णोपमा अलंकार हैं।

(2). लुप्तोपमा अलंकार – जिसमें उपमा के चारों अंग में से एक या दो या तीन अंग लुप्त हो, तो वहां ‘लुप्तोपमा अलंकार’ होता है।
उदाहरण – मखमल के झूल पड़े, हाथी-सा टीला।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘टीला’ उपमेय है, मखमल के झूल पड़े ‘हाथी’ उपमान हैं, ‘सा’ वाचक शब्द है, किंतु इसमें साधारण धर्म नहीं है। वह छिपा हुआ है कवि का आशय है- ‘मखमल के झूल पड़े ‘विशाल’ हाथी-सा टीला’। अतः यहां ‘विशाल’ जैसा कोई साधारण धर्म लुप्त है। अतः यहां लुप्तोपमा अलंकार है।

(3). मालोपमा अलंकार – जिस उपमा में एक ही उपमेय के अनेक अपमान हो, तो वहां ‘मालोपमा अलंकार’ होता है। उदाहरण
कुंद, तुषार हार, हीरे के सदृश धवल,
वीणा का वर दण्ड हाथ में शोभित अति उज्जवल।
ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि से पूजनीय शारदा माता,
करें सदा कल्याण ज्ञानक्षा निर्मल बुद्धि विधाता।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘शारदा’ उपमेय है, ‘कुंद, तुषार हार, हीरा’ उपमान है, ‘धवलता’ साधारण धर्म है तथा ‘सदृश’ वाचक शब्द है। अर्थात् एक उपमेय शारदा के तीन उपमान हैं- कुंद, तुषार, हीरा आदि अतः यहां मालोपमा अलंकार है।

2. रूपक अलंकार (Rupak Alankar ki Paribhasha)

जहां उपमेय और उपमान दोनों का एक रूप दिखाकर दोनों में भेद रहित आरोप स्थापित कर दिया जाए, तो वहां ‘रूपक अलंकार’ होता है।
उदाहरण – मन सागर मनसा लहरिं बूढ़े बहें अनेक।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘मन’ पर सागर और ‘मनसा’ पर लहर का आरोप होने से यहां रूपक अलंकार है।

रूपक अलंकार के भेद

रूपक अलंकार के मुख्य तीन भेद होते हैं-
(1). सांगरूपक अलंकार
(2). निरंगरूपक अलंकार
(3). परम्परितरूपक अलंकार ।

(1). सांगरूपक अलंकार – जहां रूपक में उपमेय के अंगों पर उपमान के अंगो का आरोप किया जाए, तो वहां ‘सांगरूपक अलंकार’ होता है।
दूसरे शब्दों में- जहां उपमेय में उपमान का अभेद आरोप हो, तो वहां ‘सांगरूपक अलंकार’ होता है। उदाहरण
उदित उदयगिरि मंच पर, रघुवर बाल-पतंग।
विकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन भृंग।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में उदयगिरी पर ‘मंच’ का, रघुवर पर ‘सूर्य’ का, सन्त पर ‘सरोज’ का तथा लोचन पर ‘भौंर’ का भेद रहित आरोप होने से यहां सांगरूपक अलंकार है।

(2). निरंगरूपक अलंकार – जहां उपमेय पर उपमान का आरोप हो तथा उसके अंगों का आरोप न हो, तो वहां ‘निरंगरूपक अलंकार’ होता है।
उदाहरण – शोक सिंधु बूड़त सबहिं, तुम अवलम्बन दीन्ह।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘सिन्धु’ उपमान का, ‘शोक’ उपमेय में आरोप है अतः यहां निरंगरूपक अलंकार है।

(3). परम्परित रूपक अलंकार – जहां रूपक में एक आरोप दूसरे आरोप का कारण बनता हो, तो वहां ‘परम्परित रूपक अलंकार’ होता है। उदाहरण
महिमा मृगी कौन सुक्रती की, खल वच विसिखिन वाॅंचीं।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ‘महिमा’ में मृगी का आरोप, दुष्ट वचन में वाण के आरोप के कारण करना पड़ा है। अतः यहां परम्परित रूपक अलंकार है।

3. उत्प्रेक्षा अलंकार (Utpreksha Alankar ki Paribhasha)

जहां उपमेय (प्रस्तुत) में (उपमान से भिन्नता जानते हुए भी) उपमान (अप्रस्तुत) की सम्भावना अथवा कल्पना कर ली जाए, तो वहां ‘उत्प्रेक्षा अलंकार’ होता है। उदाहरण
चमचमातीं चंचल नयन, विज घूॅंघट पर छीन।
मानों सुरसरिता विमल, जल उछत जुग-मीन।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में छीने घुंघट में सुरसरिता के निर्मल जल की तरफ चंचल नयनों ने दो उछलती हुई मछलियों की अपूर्व सम्भावना अथवा कल्पना की है। अतः यहां उत्प्रेक्षा अलंकार है।

उत्प्रेक्षा अलंकार के भेद

उत्प्रेक्षा अलंकार में संभावना के आधार पर इसके निम्न तीन भेद होते हैं –
(क). वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार
(ख). हेतूत्प्रेक्षा अलंकार
(ग). फलोत्प्रेक्षा अलंकार ।

(क). वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार – जहां प्रस्तुत (उपमेय) रूप वस्तु में किसी अन्य अप्रस्तुत (उपमान) रूप वस्तु की सम्भावना की जाए, तो वहां ‘वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार’ होता है। उदाहरण
सखि शोहति गोपाल के उर गुंजन की माल।
बाहिर लसति मानों पिये दावानल की जवाल।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में गुंजन की माल उपमेय में दावानल जवाल उपमान की संभावना की गई है। अतः यहां वस्तूत्प्रेक्षा अलंकार है।

(ख). हेतूत्प्रेक्षा अलंकार – जहां हेतु के न होने पर भी अर्थात् जो कारण न हो उसमें हेतु की सम्भावना की जाए, तो वहां ‘हेतूत्प्रेक्षा अलंकार’ होता है। उदाहरण
रवि अभाव लखि रैन में, दिन लखि चंदृ विहीन।
सतत् उदय इहिं हेतु, जन यश प्रताप मुख कीन।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में राजा के यश प्रताप के सतत् होने का हेतु रात्रि में सूर्य का और दिन में चन्द्रमा का अभाव बताया है। अतः इस प्रकार हेतु के न होने पर भी हेतु की संभावना की गई है। अतः यहां हेतूत्प्रेक्षा अलंकार है।

(ग). फलोत्प्रेक्षा अलंकार – जहां अफल में अर्थात् जहां फल न हो उसमें फल की सम्भावना की जाए, तो वहां ‘फलोत्प्रेक्षा अलंकार’ होता है। उदाहरण
तरनि तनूजा तट तमाल, तरुवर बहु छायें।
झुके फूल सो जल, परसन हित मनहुॅं सुहायें।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में तमाल को झुके हुए होने का, जमुना जल का पुण्य लाभ प्राप्त करना, फल व उद्देश्य बताया गया है। अतः इस प्रकार अफल में फल की संभावना की गई है, तो यहां फलोत्प्रेक्षा अलंकार है।

4. अतिशयोक्ति अलंकार (Atishayokti Alankar ki Paribhasha)

जहां किसी वस्तु या व्यक्ति की इतनी अधिक प्रशंसा की जाए कि लोक समाज की सीमा या मर्यादा का अतिक्रमण हो जाए, तो वहां ‘अतिशयोक्ति अलंकार’ होता है। उदाहरण
अब जीवन की हैं, कपि ओस न कोए।
कन गुरियों की, मुंदरी कॅंगना होए।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में जीवन की क्षीणता को व्यंजित करने के लिए अंगूठी को कंगन होना बताया गया है। अतः इस प्रकार यहां अतिशयोक्ति अलंकार है।

5. अन्योक्ति अलंकार (Anyokti Alankar ki Paribhasha)

जहां उपमान (अप्रस्तुत) के द्वारा उपमेय (प्रस्तुत) का व्यंग्यात्मक कथन किया जाए, तो वहां ‘अन्योक्ति अलंकार’ होता है। उदाहरण
जिन-जिन देखें वो कुसुम, गयीं सुबीता बहार।
अब अलि रहें गुलाब में, अपत कॅटीला डार।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में भौंरे के माध्यम से कवि ने किसी गुणवान कवि की और संकेत दिया है जिसका आश्रय दाता अब पतझड़ के गुलाब की तरह पुष्पहीन हो गए हैं। अतः गुलाब और भौंरे के माध्यम से आश्रित कवि और आश्रय दाता का वर्णन किया गया है। अतः यहां अन्योक्ति अलंकार है।

6. संदेह अलंकार (Sandeh Alankar ki Paribhasha)

जहां किसी व्यक्ति या वस्तु में उसी के समान दूसरी वस्तु या व्यक्ति की शंका (संदेह) हो, किंतु निश्चयात्मक ज्ञान न हो, तो वहां ‘संदेह अलंकार’ होता है।
दूसरे शब्दों में- जब किसी व्यक्ति या वस्तु को देखकर संशय बना रहे किंतु निश्चय न हो, तो वहां ‘संदेह अलंकार’ होता है। उदाहरण
स्वाति घटा घहराति, मोक्ष पापिन सौं पूरी।
किथौं आवत मोक्ष, शुभ आभा रुचि रूरी।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में स्वाति घटा को देखकर यह निश्चिय नहीं हो रहा कि यह स्वाति घटा ही है या शुभ्र आभा है। अतः यहां संदेह अलंकार है।

7. भ्रांतिमान अलंकार (Bhrantiman Alankar ki Paribhasha)

जहां किसी एक वस्तु को देखकर उसके समान किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो जाए, तब ‘भ्रांतिमान अलंकार’ होता है।
दूसरे शब्दों में- जहां समानता के कारण भ्रमवश उपमेय में उपमान का निश्चयात्मक ज्ञान हो, तो वहां ‘भ्रांतिमान अलंकार’ होता है। उदाहरण
वृंदावन विहरत फिरें, राधा नंदकिशोर।
नीरद यमिनी जनिं संग, डोलें बोलें मोर।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में वृन्दावन में राधा-कृष्ण विहार कर रहें हैं। और रात में उन्हें सघन मेघ समझकर मोर बोलते हैं और उनके साथ-साथ चलने लगते हैं। अतः भ्रम के कारण यहां भ्रांतिमान अलंकार है।

8. दीपक अलंकार (Deepak Alankar ki Paribhasha)

जहां उपमेय (प्रस्तुत) और उपमान (अप्रस्तुत) दोनों का एक ही धर्म कहा जाए। अर्थात् जिस तरह एक स्थान पर रखा दीपक अनेक वस्तुओं को प्रकाशित करता है। इस प्रकार यह ‘दीपक अलंकार’ कहलाता है। उदाहरण
रहिमन पानी राखियें, बिन पानी सब सून।
पानी गयें न उबरें, मोती मानुष चून।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में पानी को बनाए रखने का आग्रह किया गया है। अतः यहां मानुष उपमेय और मोती तथा चून उपमान है। इस प्रकार यहां मानुष और मोती चून का एक ही धर्म पानी रखिए बताया गया है। अतः यहां दीपक अलंकार है।

9. विभावना अलंकार (Vibhavna Alankar ki Paribhasha)

विभावना शब्द का अर्थ है- ‘विशेष प्रकार की कल्पना’। अर्थात् जहां बिना किसी कारण के ही कार्य हो जाए, तो वहां ‘विभावना अलंकार’ होता है। उदाहरण
दुःख इस मानव आत्मा का, रनित का मधुमेय भोजन।
दुःख के तमको खा-खाकर, भरती प्रकाश से वहां मन।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में तम खा-खाकर प्रकाश से भरने का वर्णन किया है। इस प्रकार विरुद्ध कारण से कार्य का संपादन होता है। अतः यहां विभावना अलंकार है।

10. अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार (Aprastut Prashansa Alankar ki Paribhasha)

जहां उपमान (अप्रस्तुत) का वर्णन करते हुए उपमेय (प्रस्तुत) का कथन होता है, तो वहां ‘अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार’ होता है। उदाहरण
सागर की लेहरों में हैं, ह्रास स्वर्ण किरणों का।
सागर के अंतस्थल मैं, अवशाद अवाक कणों का।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में उपमान (अप्रस्तुत) सागर के वर्णन से उपमेय (प्रस्तुत) में धीर, वीर, गंभीर व्यक्ति आदि का वर्णन किया गया है। अतः यहां अप्रस्तुत प्रशंसा अलंकार है।

11. विरोधाभास अलंकार (Virodhabhs Alankar ki Paribhasha)

जहां किसी वस्तु में कोई वास्तविक विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास प्रतीत हो, तो वहां ‘विरोधाभास अलंकार’ होता है। उदाहरण
या-अनुरागीं चित्त की गति, समझैं नहीं कोय।
ज्यौं-ज्यौं बूढ़ें श्याम रंग, त्यौं-त्यौं उज्जवल होय।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में काले रंग में डूबने से उज्जवल होना एक विरोध कथन है, परंतु इस विरोध का परिहार हो जाता है। अतः जब भक्त ज्यों-ज्यों कृष्ण के प्रति अनुराग करेगा त्यों-त्यों उसमें सात्विक भाव भरता जाएगा। अतः इस प्रकार यहां विरोधाभास अलंकार है।

12. अनन्वय अलंकार (Ananvay Alankar ki Paribhasha)

जब किसी वस्तु को अधिक उत्कृष्ट दिखाना होता है तब यह सुनिश्चित करने के लिए कि उसके समान कोई अन्य वस्तु है ही नहीं। अर्थात् जहां उपमेय को ही उपमान बना लिया जाए, तो वहां अनन्वय अलंकार’ होता है। उदाहरण
राम-से-राम सिया-से-सिया, सिरमोर बिरांचिं विचारिं सॅंवेरे।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में राम और सीता को उपमान माना है। तथा राम और सीता को उपमेय भी मानते है। अतः इस प्रकार यहां अनन्वय अलंकार है।

13. प्रतीप अलंकार (Prateep Alankar ki Paribhasha)

जहां उपमा के अंगों को उलट दिया जाए अर्थात् जहां उपमान को उपमेय तथा उपमेय को उपमान बना दिया जाए, तो वहां ‘प्रतीप अलंकार’ होता है।
उदाहरण – उसी तपस्वी से लम्बें थें, देवगुरु दो-चार खड़ें।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में तपस्वी का वर्णन करना था। यहां तपस्वी उपमेय और देवगुरु उपमान है, किन्तु देवगुरु को उपमेय और तपस्वी को उपमान बना दिया गया है।

14. दृष्टान्त अलंकार (Dristant Alankar ki Paribhasha)

जहां उपमेय और उपमान दो अलग-अलग वाक्य हो अर्थात् जब पहले एक बात कहकर फिर उससे मिलती-जुलती दूसरी बात पहली बात के उदाहरण के रूप में कहीं जाए, अतः दो वाक्यों तथा उनके साधारण धर्म में बिम्ब-प्रतिबिम्ब का भाव दिखाया जाए, तो वहां ‘दृष्टान्त अलंकार’ होता है। उदाहरण
रहिमन अंसुआ नयन ढरिं, जियें दुःख प्रकट होईं।
जाहिं निकारों गेह तें, कसन भेद कहिं दोईं।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण के पहले वाक्य में आंख से निकले आंसू के बारे में कहा गया हैं, दूसरे वाक्य में घर से निकाले गए व्यक्ति के बारे में कहा गया है। अतः दोनों वाक्य मिलते-जुलते हैं। तथा दोनों के साधारण धर्म में भी समानता है। अतः यहां दृष्टान्त अलंकार है।

15. मानवीकरण अलंकार (Manvikaran Alankar ki Paribhasha)

जब काव्य में जड़ वस्तुओं या प्रकृति पर मानवीय चेष्टाओं (भावनाओं) का आरोप किया जाए। अर्थात् जहां प्राकृतिक वस्तुओं को मनुष्य के रूप में दिखाया जाए, तो वहां ‘मानवीकरण अलंकार’ होता है। मानवीकरण में निर्जीव वस्तुओं को भी सजीव मान लिया जाता है।
उदाहरण – फूल हॅंसें, कलियाॅं मुस्काईं।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में फूल हंस रहे हैं और कलियां मुस्कुरा रही हैं, जबकि हंसने और मुस्कुराने की क्रियाएं केवल मनुष्य ही कर सकता है। प्राकृतिक वस्तुएं नहीं। अतः इस प्रकार यहां मानवीकरण अलंकार है।

16. विनोक्ति अलंकार (Vinokti Alankar ki Paribhasha)

जहां किसी व्यक्ति या वस्तु को एक के बिना किसी दूसरे व्यक्ति या वस्तु को शोभित या अशोभित बताया जाए, तो वहां ‘विनोक्ति अलंकार’ होता है। उदाहरण
बिना पुत्र सुना सदन, गतगुनी सुनीं दैंह।
वित्त बिना सब शून्य है, प्रियतम बिना सनेह।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में बच्चों के बिना घर अशोभनीय सा लगता है। और गुणों के बिना भी जीवन अशोभनीय सा लगता है। अतः इस प्रकार यहां विनोक्ति अलंकार है।

17. विशेषोक्ति अलंकार (Visheshokti Alankar ki Paribhasha)

जहां काव्य में प्रबल कारण के उपस्थित (विधमान) रहते हुए भी कार्य का सम्पन्न न होना पाया जाए, तो वहां ‘विशेषोक्ति अलंकार’ होता है।
उदाहरण – दो-दो मेघ बरसतें हैं, पर मैं प्यासी की प्यासी हूं।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में मेघ दो-दो बरस रहे हैं लेकिन प्यास नहीं बुझ रही है। अतः इस प्रकार दो कारण होते हुए भी कार्य नहीं हो रहा है। अतः यहां विशेषोक्ति अलंकार है।

18. असंगति अलंकार (Asangati Alankar ki Paribhasha)

काव्य में जहां कार्य और कारण में संगति न हो। अर्थात् जहां कारण कार्य में विरोध दिखाई दे, तो वहां ‘असंगति अलंकार’ होता है। उदाहरण
मोहीं मिटावन हेतु प्रभु, लीन हों तुम अवतार।
उलटों मोहन रूपिं धरिं, मोहीं सब बृजनार।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में मोह माया को दूर करने के लिए श्री कृष्ण जी ने धरती पर अवतार लिया। किंतु उलटा उन्होंने ही मोहन रूप धारण करके सभी ब्रजवासियों को अपने प्रेम में फंसा लिया। अतः इस प्रकार यहां असंगति अलंकार है।

19. अपहृति अलंकार (Apahnuti Alankar ki Paribhasha)

अपहृति का अर्थ ‘छिपाना’ या ‘गुप्त रखना’ होता है। जहां किसी प्रस्तुत वस्तु को छिपाकर किसी दूसरी वस्तु की स्थापना की जाए, तो वहां ‘अपहृति अलंकार’ होता है।
अर्थात् दूसरे शब्दों में- उपमेय को असत्य करके उपमान को सत्य स्थापित किया जाने पर यहां अपहृति अलंकार है।
उदाहरण – नहिं शाखिं राधा बदन यहां, हैं पूनों का चाॅंद।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में राधा के मुख का निषेध करके उसे चांद बताया गया है। अतः इस प्रकार यहां अपहृति अलंकार है।

20. उल्लेख अलंकार (Ullekh Alankar ki Paribhasha)

जहां किसी एक वस्तु या व्यक्ति का वर्णन भिन्न-भिन्न प्रकार से किया जाए, तो वहां ‘उल्लेख अलंकार’ होता है।
उदाहरण – तू रूप हैं किरण में, सौंदर्य हैं सुमन में।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में ईश्वर की महिमा का वर्णन भिन्न-भिन्न प्रकार से किया है। तथा यहां किरण में और सुमन में ईश्वर की महिमा को दर्शाया गया है। अतः यहां उल्लेख अलंकार है।

21. काव्यलिंग अलंकार (Kavyaling Alankar ki Paribhasha)

जहां किसी युक्ति के समर्थन का कारण बताया जाए, तो वहां ‘काव्यलिंग अलंकार’ होता है। अर्थात् यहां कोई बात के समर्थित होने पर किसी न किसी युक्ति का कारण अवश्य दिया जाता है। उदाहरण
कनक-कनक तें सौ गुनी, मादकता अधिकायें।
बाखायें बौरायें जग, या पायें बौरायें।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में इस बात का समर्थन किया गया है कि धतूरा खाने से नशा होता है, किन्तु स्वर्ण पाने से भी नशा होता है। अतः इस प्रकार यहां काव्यलिंग अलंकार है।

22. उपमेयोपमा अलंकार (Upmeyopma Alankar ki Paribhasha)

जहां उपमेय (प्रस्तुत) और उपमान (अप्रस्तुत) को परस्पर उपमान और उपमेय में बदलने की प्रक्रिया को ही ‘उपमेयोपमा अलंकार’ कहा जाता है।
उदाहरण – राम के सदृश शम्भु साम-राम हैं।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में दोनों उपमाओं के उपमेय और उपमान क्रमशः उपमान और उपमेय में परिवर्तित हो जाते हैं। अतः यहां उपमेयोपमा अलंकार है।

23. व्यतिरेक अलंकार (Vyatirek Alankar ki Paribhasha)

काव्य में जहां उपमेय को उपमान से उत्कृष्ट बताया जाए, अर्थात् गुणों की अधिकता के कारण उपमान की तुलना में उपमेय का श्रेष्ठ वर्णन किया गया हो, तो वहां ‘व्यतिरेक अलंकार’ होता है। उदाहरण
पिये-तिये से हॅंस के कहयों, लखयों डिठौना दीन।
चन्द्रमुखी मुख चन्द्र तें, भलों चन्द्र समकीन।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में उपमेय ‘नायिका’ को उपमान ‘चन्द्रमा’ से अधिक सुन्दर बताया गया है। अतः इस प्रकार यहां व्यतिरेक अलंकार है।

24. अर्थान्तरन्यास अलंकार (Arthantaranyas Alankar ki Paribhasha)

काव्य में जहां किसी सामान्य कथन का विशेष से अथवा विशेष कथन का सामान्य से समर्थन किया जाए, तो वहां ‘अर्थान्तरन्यास अलंकार’ होता है। उदाहरण
बड़े न हूजें गुन-बिनु, बिरद बड़ाई पायें।
कहत धतूरे सो कनक, गहनों गड़ों न जायें।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में किसी सामान्य कथन का समर्थन किसी विशेष बात से किया गया है। अतः किसी सामान्य बाद और उसका समर्थन किसी विशेष बात से करा गया है। अतः इस प्रकार यहां अर्थान्तरन्यास अलंकार है।

25. स्वभावोक्ति अलंकार (Svabhavokti Alankar ki Paribhasha)

जहां किसी व्यक्ति या वस्तु की स्वभाविक क्रियाओं का वर्णन किया जाए, तो वहां ‘स्वभावोक्ति अलंकार’ होता है। उदाहरण
चित बनिं भौंरे भाय की, गौंरे मुख मुस्कानिं।
लगनिं लटकिं आली गिरें, चित खटकति नित आनिं।।

26. समासोक्ति अलंकार (Samasokti Alankar ki Paribhasha)

काव्य में जहां उपमेय (प्रस्तुत) के वर्णन में विशेषणों के द्वारा उपमान (अप्रस्तुत) का बोध कराया जाए, तो वहां ‘समासोक्ति अलंकार’ होता है।
उदाहरण – कुमुदिनीं हूॅं प्रफुल्लित भोई। साॅंझ कलानिधि जोई।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में कुमुदिनीं फूल जब चन्द्रमा निकलता है, तो वह खिल उठता है‌। अतः इस प्रकार कवि ने नायक और नायिका की और निशाना साधा है। अतः यहां समासोक्ति अलंकार है।

27. पर्याय अलंकार (Prayay Alankar ki Paribhasha)

काव्य में जहां एक वस्तुएं अनेकों में हो या अनेक वस्तुएं एक ही क्रम में हो, तो वहां ‘पर्याय अलंकार’ होता है।
उदाहरण – बिच रंति विलासिन्यों, यत्र श्रौणिं भरालसा।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में अनेक वस्तुएं एक ही नगरी में हुई है। अतः इस प्रकार यहां पर्याय अलंकार है।

28. कारणमाला अलंकार (Karanmala Alankar ki Paribhasha)

काव्य में जहां अगली वस्तु के प्रति पहली वस्तु कारण होती जाए, तो वहां ‘कारणमाला अलंकार’ होता है। उदाहरण – श्रुत कृत धियें, सड़ाजायतें विनयें श्रुतात। लोका नुरागों विनयान, किम लोकानुरावत।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में विद्वानों की संग गति से शास्त्र की प्राप्ति होती है और शास्त्र से विनय की प्राप्ति होती है। अतः इस प्रकार यहां कारणमाला अलंकार है।

29. व्याजस्तुति अलंकार (Vyajsatuti Alankar ki Paribhasha)

काव्य में जहां देखनें या सुननें में तो निन्दा सी प्रतीत हो, किन्तु वास्तव में उसकी प्रशंसा (स्तुति) की जाए। अर्थात् जहां निन्दा के बहाने प्रशंसा की जाए, तो वहां ‘व्याजस्तुति अलंकार’ होता है।
उदाहरण – काशीपुरीं की कुरीतिं महें, जहां देह पुनिं देह न पाई।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में काशी नगरी की वास्तव में प्रशंसा की जा रही है चूंकि वहां देह त्यागने पर मुक्ति मिलती है। अतः इस प्रकार यहां व्याजस्तुति अलंकार है।

30. व्याजनिन्दा अलंकार (Vyajninda Alankar ki Paribhasha)

काव्य में जहां प्रशंसा (स्तुति) के बहाने किसी वस्तु या व्यक्ति की निन्दा की जाए, तो वहां ‘व्याजनिन्दा अलंकार’ होता है। उदाहरण
नाक कान विनु, भगिनिं निहारीं।
क्षमा कीह तुम, धर्म बिचारी।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में रावण की स्तुति लग रही है परन्तु वास्तव में यहां उसकी निन्दा की गई है। अतः इस प्रकार यहां व्याजनिन्दा अलंकार है।

उभयालंकार (Ubhayalankar ki Paribhasha)

काव्य में जो अलंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आधारित रहकर दोनों में चमत्कार उत्पन्न करते हैं। अर्थात् वे अलंकार जिसमें शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों का योग हो, तो वहां ‘उभयालंकार’ होता है।
उदाहरण – कजरारी अखियन में कजरारी न लखायें।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में शब्द और अर्थ दोनों आए हैं। अतः इस प्रकार ये शब्दालंकार और अर्थालंकार दोनों में चमत्कार उत्पन्न करता है। अतः यहां उभयालंकार है।

उभयालंकार के भेद

उभयालंकार के निम्न दो भेद होते हैं-
(1). संसृष्टि अलंकार
(2). संकर अलंकार ।

1. संसृष्टि अलंकार (Sansrishti Alankar ki Paribhasha)

जिसमें अनेक अलंकार शब्दालंकार और अर्थालंकार परस्पर मिलें रहते हो, किन्तु उनकी पहचान में किसी प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होती हो, तो वहां ‘संसृष्टि अलंकार’ होता है। उदाहरण
भूपातें भवनु सुमायें सुहावा। सुरपति सदनु न परतर पावा।।
मनिमयें रचित चारू चौबारें। जनु रतिपति निज हाथ सॅंवारे।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण के पहले दो चरण प्रतीप अलंकार को दर्शाते हैं। तथा बाद के दो चरणों में उत्प्रेक्षा अलंकार है। अतः इस प्रकार प्रतीप और उत्प्रेक्षा अलंकार की संसृष्टि होती है। अतः यहां संसृष्टि अलंकार है।

2. संकर अलंकार (Sankar Alankar ki Paribhasha)

जो अलंकार नीर-क्षीर न्याय से परस्पर मिश्रित रहते हैं, उन्हें ‘संकर अलंकार’ कहते हैं। अर्थात् नीर-क्षीर मतलब जैसे पानी और दूध आपस में इस तरह मिल जाते हैं कि उन्हें अलग करना असम्भव होता है, उसी प्रकार संकर अलंकार में अनेक अलंकार आपस में इस प्रकार मिल जाते हैं कि पृथक करना संभव नहीं होता है। उदाहरण
सठ सुधरहिं सत संगति पाई।
पारस परस कुधातु सुहाई।।

स्पष्टीकरण – इस उदाहरण में शब्दालंकार और अर्थालंकार को पृथक करना असम्भव होता है। अतः इस प्रकार यहां संकर अलंकार है।

अलंकार के FAQs

1. अलंकार किसे कहते हैं कितने प्रकार के होते हैं?

कविता के शब्द तथा अर्थ में चमत्कार उत्पन्न करके काव्य की शोभा बढ़ाने वाले तत्त्वों को ‘अलंकार’ (Alankar in Hindi) कहते हैं।
अलंकार के मुख्य दो भेद (प्रकार) होते हैं-
(1). शब्दालंकार,
(2). अर्थालंकार ।
(1). शब्दालंकार – जो अलंकार शब्दों में चमत्कार उत्पन्न करके काव्य का सौन्दर्य बढ़ाते हैं, उन्हें ‘शब्दालंकार’ कहते हैं।
(2). अर्थालंकार – जो अलंकार अर्थों में चमत्कार उत्पन्न करके काव्य का सौन्दर्य बढ़ाते हैं, उन्हें ‘अर्थालंकार’ कहते हैं।

2. अलंकार क्या है अलंकार की परिभाषा?

अलंकार दो शब्दों अलम् + कार से मिलकर बना होता है। अलम् का अर्थ है- ‘आभूषण’ या ‘सजावट’। अर्थात् जो अलंकृत या भूषित करें, वह ‘अलंकार’ कहलाता है।

3. अलंकार का उदाहरण कौन सा है?

अलंकार के संबंध में प्रथम काव्य शास्त्रीय परिभाषा ‘आचार्य दण्डी’ की है।
उदाहरण – ‘काव्यशोभाकरान धर्मानलंकारान प्रचक्ष्ते’। अर्थात् काव्य के शोभा कारक धर्म अलंकार हैं।

4. अलंकार के भेद कौन-कौन से हैं?

भारतीय साहित्य में अलंकार के मुख्य दो भेद हैं- शब्दालंकार तथा अर्थालंकार।
तथा इनके मुख्य भेद हैं- अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, रूपक, अनन्वय, प्रतीप, भ्रांतिमान, संदेह, उत्प्रेक्षा, दृष्टांत व अतिशयोक्ति आदि अलंकार के मुख्य भेद हैं।

5. 3 अलंकार के मुख्यतः कितने भेद होते हैं?

अलंकार के मुख्यतः तीन भेद होते हैं-
(1). शब्दालंकार,
(2). अर्थालंकार,
(3). उभयालंकार ।

6. कनक कनक ते सौ गुनी में कौन सा अलंकार है?

यमक अलंकार ।

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