प्रत्यावर्ती धारा परिपथ

प्रत्यावर्ती धारा परिपथ क्या है?, परिभाषा, सूत्र व इसके प्रकार लिखिए | Alternating Current Circuits in Hindi

प्रत्यावर्ती धारा परिपथ क्या है? – जैसा कि हमनें पिछली कक्षाओं में प्रत्यावर्ती धारा के बारे में पढ़ा है। तथा यहां प्रत्यावर्ती धारा परिपथ के सभी भागों के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे।

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प्रत्यावर्ती धारा परिपथ

विभिन्न प्रकार के प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टेज (अथवा प्रत्यावर्ती विभवांतर) V तथा प्रत्यावर्ती धारा i के बीच कलांतर φ का मान परिपथ की प्रकृति पर निर्भर करता है। प्रत्यावर्ती धारा परिपथ के प्रकार।

1. जब परिपथ में प्रतिरोध R हो

माना एक तार के सिरों को प्रतिरोध R तथा प्रत्यावर्ती-धारा स्त्रोत से जोड़ दें तो तार के सिरों के बीच प्रत्यावर्ती वोल्टेज V स्थापित हो जाता है तथा तार में प्रत्यावर्ती धारा i बहने लगती है।

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जब परिपथ में प्रतिरोध R हो
चित्र-1

अर्थात् ओम का नियम के अनुसार, जब वोल्टेज V अधिकतम होता है तब धारा i भी अधिकतम होती है और जब वोल्टेज V शून्य होता है, तब धारा i भी शून्य होती है। अतः “केवल शुद्ध ओमीय प्रतिरोध R वाले प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टेज V तथा प्रत्यावर्ती धारा i सदैव समान कला में होते हैं।” जैसा कि चित्र-2 में दिखाया गया है।

जब परिपथ में प्रतिरोध R हो
चित्र-2

अतः वोल्टेज V व धारा i के मानों को निम्न समीकरणों से व्यक्त किया जा सकता है।
V = V0 Sinωt तथा i = i0 Sinωt

यदि R = \frac{V}{i} अर्थात् V तथा i समान कला में है। अर्थात् शुद्ध प्रतिरोध R का प्रत्यावर्ती धारा परिपथ के लिए वैसा ही व्यवहार होता है। जैसा कि दिष्ट धारा के लिए होता है।

2. जब परिपथ में धारिता C हो

यदि हम संधारित्र की प्लेटों को किसी प्रत्यावर्ती-धारा स्त्रोत से जोड़ दें तो तारों में प्रत्यावर्ती धारा का प्रवाह बराबर होने लगता है। इस कारण प्रत्यावर्ती स्त्रोत का विभवांतर, परिमाण व दिशा में एक निश्चित आवृत्ति से बदलता रहता है तथा उसी प्रकार संधारित्र की प्लेटों का विभवांतर अर्थात् आवेशन भी बदलता रहता है।
परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि विभवांतर तथा धारा समान कला में नहीं होते हैं।

जब परिपथ में धारिता C हो
चित्र-3

यदि जब विभवांतर V शून्य होता है तो विभवांतर के बदलने की दर अधिकतम, अतः परिपथ में धारा i अधिकतम होती है। और यदि जब विभवांतर V अधिकतम होता है तो विभवांतर के बदलने की दर शून्य, अतः परिपथ में धारा i भी शून्य होती है। अर्थात् “केवल शुद्ध धारिता C वाले प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रत्यावर्ती धारा i, प्रत्यावर्ती वोल्टेज V से कला में 90° (अथवा π/2) अग्रगामी होती है।” जैसा कि चित्र-4 में दर्शाया गया है।

जब परिपथ में धारिता C हो
चित्र-4

अतः प्रत्यावर्ती वोल्टेज V तथा प्रत्यावर्ती धारा i के मानों को निम्न समीकरणों से व्यक्त कर सकते हैं।
V = V0 Sinωt या V = V0 Sin(ωt – π/2)
i = i0 Sin(ωt + π/2) या i = i0 Sinωt
अर्थात् “प्रत्यावर्ती विभव VC, धारा i से कला में 90° (अथवा π/2) पश्चगामी होता है।”
तथा \frac{V_0}{i_0} = XC = \frac{1}{ωC} = \frac{1}{2πfC} .
यहां ” XC संधारित्र की धारितीय प्रतिघात है।”

3. जब परिपथ में प्रेरकत्व L हो

यदि ताॅंबे के एक तार की कुण्डली में प्रत्यावर्ती धारा i प्रवाहित करें तो धारा का परिमाण व दिशा निरंतर बदलते रहने के कारण कुंडली में से गुजरने वाला चुंबकीय फ्लक्स भी उसी के अनुसार बदलता रहता है। यदि कुंडली का प्रतिरोध R नगण्य हो, तो आरोपित विभवांतर V सदैव विरोधी विभवांतर के बराबर व विपरीत होता है। जिससे परिपथ में धारा बनी रहती है।
परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि विभवांतर V तथा धारा i एक ही कला में नहीं होते है।

जब परिपथ में प्रेरकत्व L हो
चित्र-5

यदि जब धारा i शून्य होती है तो धारा के बदलने की दर अधिकतम, अतः विभवांतर V अधिकतम होता है। और जब धारा i अधिकतम होती है तो धारा के बदलने की दर शून्य, अतः विभवांतर V भी शून्य होता है। अर्थात् “केवल शुद्ध प्रेरकत्व L वाले प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रत्यावर्ती वोल्टेज V, प्रत्यावर्ती धारा i से कला में 90° (अथवा π/2) अग्रगामी होता है।” जैसा कि चित्र-6 में दिखाया गया है।

जब परिपथ में प्रेरकत्व L हो
चित्र-6

अब V तथा i के मानों को निम्न समीकरणों से व्यक्त कर सकते हैं।
V = V0 Sin(ωt + π/2) या V = V0 Sinωt
i = i0 Sinωt या i = i0 Sin(ωt – π/2)
अर्थात् “प्रत्यावर्ती धारा i, प्रत्यावर्ती वोल्टेज VL से कला में 90° (अथवा π/2) पश्चगामी होती है।”
तथा \frac{V_0}{i_0} = XL = ωL = 2πfL .
यहां ” XL प्रेरकत्व का प्रेरण प्रतिघात है।”

और पढ़ें.. थेवेनिन प्रमेय का सिद्धांत क्या है? परिभाषा सूत्र तथा सीमाएं लिखिए। (Thevenin’s theorem in Hindi)

4. जब परिपथ में प्रेरकत्व L तथा प्रतिरोध R हो

तब प्रेरकत्व L तथा प्रतिरोध R दोनों में एक ही धारा i प्रवाहित होगी।
प्रतिरोध R के सिरों के बीच विभवांतर VR तथा धारा i समान कला में होंगी, परन्तु “प्रेरकत्व L के सिरों के बीच प्रेरित विभवांतर VL, धारा i से कला में 90° अग्रगामी होगा।”

जब परिपथ में L R हो
चित्र-7

यदि VR तथा VL का परिणामी विभवांतर V हो, तो
V2 = V2R + V2L
परन्तु VR = iR तथा VL = iXL , अतः
V2 = i2R2 + i2X2L
अथवा
\frac{V}{i} = \sqrt{R^2 + X^2_L}
इस प्रकार, L-R परिपथ में प्रतिबाधा
Z = \sqrt{R^2 + X^2_L}
परन्तु XL = ωL , अतः
Z = \sqrt{R^2 + (ωL)^2}
चित्र-7(b) से स्पष्ट है कि ” L-R परिपथ में धारा i, विभवांतर V से पश्चगामी है।”
यदि इनके बीच कलांतर φ हो, तो
tanφ = \frac{V_L}{V_R} = \frac{X_L}{R} = \frac{ωL}{R} = \frac{2πfL}{R} .

अतः स्पष्ट है कि यदि प्रेरकत्व L = 0 हो तो tanφ = 0 अथवा φ = 0 होगा, अर्थात् विभवांतर V व धारा i समान कला में होंगे।
यदि प्रतिरोध R = 0 हो तो tanφ = ∞ अथवा φ = 90° होगा, अर्थात् विभवांतर V व धारा i के बीच कलांतर 90° होगा और धारा i, विभवांतर V से पश्चगामी होगी।

5. जब परिपथ में धारिता C तथा प्रतिरोध R हो

तब प्रतिरोध R के सिरों के बीच विभवांतर VR तथा धारा i समान कला में होंगे, परन्तु “धारिता C के सिरों के बीच विभवांतर VC, धारा i से कला में 90° पश्चगामी होगा।”

जब परिपथ में C R हो
चित्र-8

यदि VR तथा VC का परिणामी विभवांतर V हो तब
V2 = V2R + V2C
परन्तु VR = iR तथा VC = iXC , अतः
V2 = i2R2 + i2X2C
अथवा
\frac{V}{i} = \sqrt{R^2 + X^2_C}
इस प्रकार, C-R परिपथ में प्रतिबाधा
Z = \sqrt{R^2 + X^2_C}
परन्तु XC = \frac{1}{ωC} अतः
Z = \sqrt{R^2 + (1/ωC)^2}
चित्र-8(b) से स्पष्ट है कि ” C-R परिपथ में धारा i, विभवांतर V से अग्रगामी है।” यदि दोनों के बीच कलांतर φ हो, तो
tanφ = \frac{V_C}{V_R} = \frac{X_C}{R} = \frac{1}{ωCR} = \frac{1}{2πfCR} .
अतः स्पष्ट है कि यदि परिपथ में संधारित्र अनुपस्थित हो तो इसकी धारितीय प्रतिघात XC = 1/ωC शून्य होती है, अर्थात् धारिता C का मान ∞ होता है, शून्य नहीं। तब tanφ = 0 अर्थात् φ = 0 । अतः परिपथ में धारा i तथा विभवांतर V समान कला में होते हैं।
यदि परिपथ में प्रतिरोध R अनुपस्थित हो तो R = 0 तथा tanφ = ∞ अर्थात् φ = 90° । अतः परिपथ में धारा i तथा विभवांतर V के बीच कलांतर 90° होता है तथा धारा i, विभवांतर V से कला में 90° अग्रगामी होती है।

6. जब परिपथ में प्रेरकत्व L तथा धारिता C हो

तब प्रेरकत्व L में प्रेरित विभवांतर VL धारा i से कला में 90° अग्रगामी होगा, जबकि धारिता C में प्रेरित विभवांतर VC धारा i से कला में 90° पश्चगामी होगा। इस प्रकार VL तथा VC के बीच कलांतर 180° होगा, अर्थात् ये दोनों परस्पर विपरीत कला में होंगे।

जब परिपथ में L C हो
चित्र-9

अतः L-C परिपथ में परिणामी विभवांतर
V = VL ∼ VC
तथा परिपथ की प्रतिबाधा
Z = XL ∼ XC
यदि परिपथ में XL = XC हो तो प्रतिबाधा Z = 0 होगी।
इस प्रकार, विद्युत् अनुनाद की दशा में,
XL = XC अथवा ωL = \frac{1}{ωC} अथवा 2πfL = \frac{1}{2πfC} अथवा f2 = \frac{1}{4π^2LC}
अर्थात्
f = \frac{1}{2π} \sqrt{ \frac{1}{LC}}
यह परिपथ की ‘अनुनादी आवृत्ति’ कहलाती है।

7. जब परिपथ में प्रेरकत्व L, धारिता C तथा प्रतिरोध R तीनों हो

तब प्रतिरोध R के सिरों के बीच विभवांतर VR तथा धारा i समान कला में होंगे। तथा प्रेरकत्व L में प्रेरित विभवांतर VL, धारा i से कला में 90° अग्रगामी होगा। तथा धारिता C में प्रेरित विभवांतर VC, धारा i से कला में 90° पश्चगामी होगा।

जब परिपथ में L C R हो
चित्र-10

अतः VL तथा VC का परिणामी विभवांतर VL – VC होगा। यदि L-C-R परिपथ में परिणामी विभवांतर V हो, तब
V2 = V2R + (VL – VC)2
परन्तु VR = iR, VL = iXL तथा VC = iXC , अतः
V2 = i2R2 + (iXL – iXC)2
अथवा
\frac{V}{i} = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}
अतः परिपथ की प्रतिबाधा
Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}
परन्तु XL = ωL तथा XC = \frac{1}{ωC} , अतः
Z = \sqrt{R^2 + (ωL - 1/ωC)^2}
चित्र-10(b) से स्पष्ट है कि यदि वोल्टेज V तथा धारा i के बीच कलांतर φ हो, तो
tanφ = \frac{V_L - V_C}{V_R} = \frac{iX_L - iX_C}{i_R} = \frac{X_L - X_C}{R}
अर्थात्
tanφ = \frac{ωL - 1/ωC}{R}

अर्थात् स्पष्ट है कि कलांतर φ का मान R तथा XC व XL के आपेक्षिक मानों पर निर्भर करता है।
(1). यदि ωL > 1/ωC हो, तो φ = धनात्मक होगा, अर्थात् धारा i कला में वोल्टेज V से पश्चगामी होगी।
(2). यदि ωL < 1/ωC हो, तो φ = ऋणात्मक होगा, अर्थात् धारा i कला में वोल्टेज V से अग्रगामी होगी।
(3). यदि 1/ωC = ωL हो, तो tanφ = 0 अथवा φ = 0 होगा, अर्थात् वैद्युत अनुनाद की स्थिति में वोल्टेज V तथा धारा i समान कला में होंगे।

Note – प्रत्यावर्ती धारा तथा दिष्ट धारा में क्या अंतर है?

प्रत्यावर्ती धारा तथा दिष्ट धारा

प्रत्यावर्ती धारादिष्ट धारा
1.प्रत्यावर्ती धारा वह विद्युत् धारा है, जिसका परिमाण एवं दिशा आवर्त रूप से बदलती रहती है।दिष्ट धारा वह विद्युत् धारा है, जिसका परिणाम एवं दिशा समय के साथ नियत रहती है।
2.प्रत्यावर्ती विद्युत् जनित्र अर्थात् A.C. डायनमों द्वारा प्राप्त धारा प्रत्यावर्ती धारा ही होती है।प्राथमिक सेलों, संचायक सेलों तथा D.C. डायनमों द्वारा दिष्ट धारा प्राप्त होती है।

नोट – प्रत्यावर्ती धारा परिपथ से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण परिभाषाएं अथवा प्रशन-उत्तर (FAQs)

Q.1 वाटहीन धारा क्या होती है? एक उदाहरण दीजिए।

Ans. वाटहीन धारा – जब किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में धारा प्रवाहित होने पर कोई शक्ति क्षय न हो तो परिपथ में प्रवाहित धारा को वाटहीन धारा कहते हैं।

उदाहरण – चोक कुंडली में प्रवाहित धारा,
\overline{P} = Vrms.irms Cosφ
शुद्ध प्रेरकत्व में Cosφ = 0 अतः \overline{P} = 0 ।

Q.2 प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में कलांतर की परिभाषा लिखिए?

Ans. कलांतर – जब किसी प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में धारा i तथा विभवांतर V एक साथ अधिकतम तथा एक साथ न्यूनतम मान नहीं प्राप्त करते हैं तब यह कहा जाता है कि दोनों के बीच कलांतर φ है।

Q.3 प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में प्रेरण प्रतिघात और धारितीय प्रतिघात क्या है?

Ans. प्रेरण प्रतिघात – प्रत्यावर्ती धारा के प्रवाह में प्रेरकत्व द्वारा लगाए गए अवरोध को ‘प्रेरण प्रतिघात (induction reactance in Hindi)’ कहते हैं। इसे XL से प्रदर्शित करते हैं प्रेरण प्रतिघात XL = 2πfL होता है दिष्ट धारा के लिए XL का मान शून्य होता है।

धारितीय प्रतिघात – प्रत्यावर्ती धारा के प्रवाह में संधारित्र द्वारा लगाए गए अवरोध को ‘धारितीय प्रतिघात (horizontal response in Hindi)’ कहते हैं। इसे XC से प्रदर्शित करते हैं धारितीय प्रतिघात XC = 1/ωC होता है दिष्ट धारा के लिए XC का मान ω = 0 होने के कारण अनन्त होता है।

Q.4 प्रत्यावर्ती धारा परिपथ की प्रतिबाधा से क्या तात्पर्य है?

Ans. प्रतिबाधा – प्रत्यावर्ती धारा के प्रवाह में प्रेरकत्व, प्रतिरोध अथवा संधारित्र द्वारा लगाए गए संयुक्त अवरोध को ‘प्रतिबाधा (impedance in Hindi)’ कहते हैं। इसे Z से प्रदर्शित करते हैं।
Z = \sqrt{R^2 + X^2_L} अथवा Z = \sqrt{R^2 + X^2_C} अथवा Z = \sqrt{R^2 + (X_L - X_C)^2}

Q.5 प्रत्यावर्ती धारा परिपथ के शक्ति गुणांक की परिभाषा लिखिए?

Ans. शक्ति गुणांक – प्रत्यावर्ती धारा परिपथ में विभवांतर V तथा धारा i के बीच कलांतर φ के Cosine को परिपथ का ‘शक्ति गुणांक (power factor in Hindi)’ कहते हैं। प्रत्यावर्ती धारा परिपथ का शक्ति गुणांक परिपथ के ओमीय प्रतिरोध R तथा परिपथ की प्रतिबाधा Z के अनुपात के बराबर होता है, अर्थात्
शक्ति गुणांक Cosφ = \frac{R}{Z}

निष्कर्ष – हमें उम्मीद है कि यह आर्टिकल आपको पसन्द आया होगा तो इसे अपने दोस्तों में भेजें और यदि कोई सवाल या क्योरी हो, तो आप हमें कमेंट्स कर के बताएं हम जल्द ही उसका हल प्राप्त कर देंगे।

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  1. यान्त्रिकी एवं तरंग गति नोट्स (Mechanics and Wave Motion)
  2. अणुगति एवं ऊष्मागतिकी नोट्स (Kinetic Theory and Thermodynamics)
  3. मौलिक परिपथ एवं आधारभूत इलेक्ट्रॉनिक्स नोट्स (Circuit Fundamental and Basic Electronics)
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