कोणीय संवेग संरक्षण का नियम, मात्रक तथा अनुप्रयोग | Law of Conservation of Angular Momentum in Hindi

कोणीय संवेग – वैसे तो इसके बारे में हम पिछले अध्याय में पड़ चुके हैं। तथा इसमें हम कोणीय संवेग संरक्षण के नियम या सिद्धांत के बारे में विस्तार से अध्ययन करेंगे। ध्यान दें – कोणीय संवेग संरक्षण का नियम या सिद्धांत यह एक ही बात है।

कोणीय संवेग क्या है

“यदि किसी कण के रेखीय संवेग के किसी बिंदु के सापेक्ष आघूर्ण को कोणीय संवेग (Angular Momentum in Hindi) कहते हैं।”
कोणीय संवेग किसी बिंदु O के सापेक्ष (किसी वस्तु का) इसके संवेग के आघूर्ण के बराबर होता हैं। अर्थात्
कोणीय संवेग = रेखीय संवेग × लम्बवत दूरी
\overrightarrow{J} = \overrightarrow{P} × \overrightarrow{r}

कोणीय संवेग

\overrightarrow{J} = Pr sinθ \widehat{n}
\overrightarrow{J} = \overrightarrow{r} × \overrightarrow{P} ….(1)

\overrightarrow{r} कण का O के सापेक्ष स्थिति सदिश है। यदि
\overrightarrow{P} = m \overrightarrow{v}
\overrightarrow{J} = m( \overrightarrow{r} × \overrightarrow{v} ) ….(2)

कोणीय संवेग एक सदिश राशि है। इसका मात्रक किलोग्राम मीटर2/सेकंड होता हैं।

इसे भी पढ़ें.. रेखीय संवेग संरक्षण का सिद्धांत

कोणीय संवेग संरक्षण का नियम या सिद्धांत

“यदि किसी निकाय पर कार्यकारी बाह्य बल-आघूर्ण शून्य हो, तो निकाय का संपूर्ण कोणीय संवेग नियत रहता है। इसे कोणीय संवेग संरक्षण का नियम या सिद्धांत कहते हैं।”

\overrightarrow{ι} = \frac{d \overrightarrow{J}}{dt}
यदि
\overrightarrow{ι} = 0
\frac{d \overrightarrow{J}}{dt} = 0
या
d \overrightarrow{J} = 0
समाकलन करने पर,
\int d \overrightarrow{J} = 0
\overrightarrow{J} = स्थिरांक या नियत

यदि निकाय छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना है। तथा जिनके कोणीय संवेग J1, J2, J3,…., Jn हों, तो कोणीय संवेग संरक्षण के निकाय के अनुसार, बाह्य बल-आघूर्ण की अनुपस्थिति में निकाय का कुल कोणीय संवेग \overrightarrow{J} नियत या संरक्षित रहता हैं।

\overrightarrow{J} = \overrightarrow{J_1} + \overrightarrow{J_2} + \overrightarrow{J_3} + …. = स्थिरांक

अतः “इसी प्रकार किसी कण या निकाय के लिए कोणीय संवेग संरक्षण का नियम कहते हैं।”

और पढ़ें…न्यूटन के गति के नियम

कोणीय संवेग परिवर्तन की दर, उस पर लगने वाले बल-आघूर्ण के बराबर होती है

अत: समीकरण (1) को t सापेक्ष अवकलन करने पर,
\frac{d \overrightarrow{J}}{dt} = \frac{d \overrightarrow{r}}{dt} × \overrightarrow{P} + \overrightarrow{r} × \frac{d \overrightarrow{P}}{dt}
अर्थात्
\frac{d \overrightarrow{J}}{dt} = m( \overrightarrow{v} × \overrightarrow{v} ) + \overrightarrow{r} × \overrightarrow{F}
{चूंकि न्यूटन के द्वितीय नियम से \frac{dP}{dt} = \overrightarrow{F} }
या
\frac{d \overrightarrow{J}}{dt} = 0 + \overrightarrow{r} × \overrightarrow{F}
{चूंकि \overrightarrow{v} × \overrightarrow{v} = 0}
अतः
\frac{d \overrightarrow{J}}{dt} = \overrightarrow{r} × \overrightarrow{F} = \overrightarrow{ι}

अर्थात् “किसी कण के कोणीय संवेग परिवर्तन की दर उस कण पर लगने वाले बल-आघूर्ण के बराबर होती है। यह घूर्णन गति के लिए न्यूटन का द्वितीय नियम है।”

और पढ़ें…केप्लर के ग्रहीय गति के नियम

कोणीय संवेग संरक्षण का उदाहरण (कैपलर का द्वितीय नियम)

यदि केन्द्रीय बल के अंतर्गत गति करते हुए कण का संवेग संरक्षित रहता हैं। केन्द्रीय बल के अंतर्गत एक कण का पथ एक तल में स्थित रहता है।

कोणीय संवेग संरक्षण

माना सूर्य दीर्घ वृत्त के एक फोकस पर है, तथा क्षण t पर ग्रह का O के सापेक्ष स्थिति वेक्टर \overrightarrow{r} हो, तो
\overrightarrow{s} = \frac{1}{2} ( \overrightarrow{r} × ∆ \overrightarrow{r} )
दोनों और ∆t से भाग देने पर,
\frac{∆ \overrightarrow{s}}{∆} = \frac{1}{2} ( \overrightarrow{r} × \frac{∆ \overrightarrow{r}}{∆} )
{चूंकि Lim सीमा ∆t → 0 }, अतः
\frac{d \overrightarrow{s}}{dt} = \frac{1}{2} ( \overrightarrow{r} × \frac{d \overrightarrow{r}}{dt} )
\frac{d \overrightarrow{s}}{dt} = \frac{1}{2}
( \overrightarrow{r} × \overrightarrow{v} )
जहां \frac{d \overrightarrow{s}}{dt} को ग्रह का क्षेत्रफलीय वेग कहते हैं। चूंकि ग्रह का कोणीय संवेग –
\overrightarrow{J} = \overrightarrow{r} × m \overrightarrow{v}
\overrightarrow{r} × \overrightarrow{v} = \frac{\overrightarrow{J}}{m}

\frac{d \overrightarrow{s}}{dt} = \frac{\overrightarrow{J}}{2m}

चूंकी केंद्रीय बल के अंतर्गत \overrightarrow{J} नियत रहता है। अतः
\frac{d \overrightarrow{s}}{dt} = स्थिरांक

अतः ग्रहीय गति में जोकि केन्द्रीय बल के अन्तर्गत होती है। क्षेत्रफलीय वेग नियत रहता है। तथा ग्रह का त्रिज्या वेक्टर समान समय में समान क्षेत्रफल पार करता है। इसे “केप्लर का ग्रहीय गति का द्वितीय नियम भी कहते हैं”

Note – कोणीय संवेग संरक्षण नियम से सम्बन्धित प्रश्न-
Q.1 किसी कण के कोणीय संवेग की परिभाषा दीजिए तथा निम्न को समझाइए। तथा उदाहरणों को प्रदर्शित कीजिए?
Q.2 दिखाइए की कोणीय संवेग के परिवर्तन की दर उस वस्तु पर लगने वाले बल आघूर्ण के समान या बराबर होती है?
Q.3 यदि किसी कण पर बल आघूर्ण का मान शून्य हो तो कोणीय संवेग संरक्षित रहता है?

Q.4 ग्रहों तथा उपग्रहों की गति कोणीय संवेग संरक्षण के नियम के अच्छे उदाहरण होते हैं?
Q.5 कोणीय संवेग संरक्षण क्या है। तथा इसके लिए सूत्र को समझाइए?
Q.6 कोणीय संवेग किसे कहते है? तथा कोणीय संवेग संरक्षण का सिद्धांत क्या है?

Share This Post

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *