खानवा का युद्ध, कब और किसके बीच हुआ, कारण व परिणाम | Battle of Khanwa in Hindi

खानवा का युद्ध (सन् 1527 ई.)

इब्राहीम लोदी को पराजित करने के पश्चात् मुगल सम्राट बाबर ने दिल्ली और आगरा पर अधिकार करने के साथ ही आगरा को अपनी राजधानी बनाया और ‘बयाना के किले’ पर कब्जा कर उसकी प्रतिरक्षा हेतु अपेक्षित सेना तैनात कर दी। इधर मेवाड़ के वीर शासक राणा सांगा, जो देहली सल्तनत और मालवा के साथ हुए कई युद्धों में सफलता प्राप्त कर उत्तरी भारत में अपनी धाक जमा चुका था, बाबर के इस आधिपत्य को सहन न कर सका। फलतः उसने हिन्दू-मुस्लिम शासकों को मिलाकर बाबर का डटकर मुकाबला करने का संकल्प लिया और एक विशाल सेना संगठित कर उसने बयाना के किले को घेर लिया। दूसरी ओर किले की रक्षा के लिए एक के बाद एक नवीन सैनिक टुकड़ियाँ भेजने के बावजूद भी जब बाबर को सफलता प्राप्त होती दिखाई नहीं दी तो वह स्वयं 16 फरवरी, 1527 ई. में आगरे की ओर राणा सांगा से टक्कर लेने के लिए चल दिया और सीकरी के निकट पहुँचकर अपना पड़ाव डाल दिया।

उधर राणा सांगा बयाना के किले का घेरा उठाकर बाबर से भिड़ने के लिए आगरे की ओर चल दिया, किन्तु अज्ञात कारणों से वह एक माह तक भुसावर (सीकरी के उत्तर-पश्चिम) के निकट पड़ाव डालकर रुक गया, जिससे बाबर को अपनी सैन्य तैयारी पूर्व एवं सुदृढ़ करने का सुअवसर मिल गया। यह और बात थी कि बाबर के गश्ती दस्ते राणा सांगा की सेना द्वारा इसी बीच परास्त कर दिये गये और मुगल सैनिक राजपूती शौर्य से आतंकित एवं हतोत्साहित भी हो गये, किन्तु अपने जोशीले भाषणों, कुशल निर्देशन एवं नेतृत्व द्वारा बाबर ने उन्हें युद्ध हेतु तैयार कर लिया। इतना ही नहीं, इसी बीच वह राणा सांगा से दिखावटी सन्धि का नाटक भी रचता रहा, अन्ततोगत्वा जिसके स्पष्ट होते ही राजपूत सेनानी ने बाबर से टक्कर लेने का निर्णय कर लिया और उसके पड़ाव की ओर चलकर खानवा के निकट पहुँचकर उसने अपना पड़ाव डाल दिया। इस प्रकार दोनों विपक्षी सेनायें खानवा में भारत के भविष्य के निर्णायक संग्राम हेतु एक-दूसरे के सामने आ डटीं।

खानवा का युद्ध की तुलनात्मक सैन्य व्यवस्था

राणा सांगा की सेना में लगभग एक लाख सैनिक और 1,000 हाथी थे और उसकी सेना में तोपखाने का सर्वथा अभाव था। दूसरी ओर बाबर की कुल सैन्य संख्या 30,000 से अधिक न थी और उसकी सेना में हाथियों का सर्वथा अभाव था, किन्तु मुगल सेना तोपखाने से भली प्रकार सज्जित थी। इसके अतिरिक्त मुगल अश्वारोही सैनिक एक साल पहले ही पानीपत के संग्राम में अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर चुके थे। अतः बाबर सैन्य संख्या की दृष्टि से राणा सांगा की तुलना में कमजोर स्थिति में था, किन्तुं राणा सांगा की तुलना में उसे सैन्य गुण की सामरिक श्रेष्ठता प्राप्त थी।

सामरिक फैलाव

इस संग्राम में बाबर ने अपनी सेना को पानीपत के युद्ध की रचना से खड़ा किया। सम्भवत: वह खुली लड़ाई (Open battle) में राजपूतों को पराजित करने में अपने को असमर्थ पा रहा था। अतः उसने अपनी सेना के मोर्चे को गाड़ियाँ लगाकर सुरक्षित किया और पानीपत के युद्ध की भाँति गाड़ियों के पीछे तिपाइयों और ढालों के पीछे बन्दूकची एवं तोप तथा पार्श्व में अश्वारोही खड़े किये। आरक्षित अश्व सेना मध्य में और उसके पीछे अपने नियन्त्रण में मुख्य सेना को खड़ा किया। एक-दूसरे से बँधी गाड़ियों के बीच में 40-40 गज के फासले पर पीछे की अश्वारोही सेना को आक्रमण हेतु बाहर निकलने के लिए अपेक्षित रिक्त • स्थान भी छोड़ा गया, जबकि दूसरी ओर राणा सांगा ने अपनी व्यूह रचना में सबसे ‘आगे हाथियों को खड़ा कर उनके पीछे अश्व एवं पैदल सेना को मध्य, दोनों पाव एवं पृष्ठ भाग में खड़ा कर दिया।

युद्ध-योजनायें

बाबर द्वारा राणा सांगा को पहले आक्रमण का अवसर देने और उसके आक्रमण को आग्नेयशास्त्रों के प्रयोग द्वारा विफल करने की योजना बनायी गयी। इतना ही नहीं, शत्रु सेना के थक जाने अथवा तोपों द्वारा आहत हो जाने पर अश्वारोही सेना मोर्चे पर लगायी गयी गाड़ियों के मध्य रखे गये फासले से आगे बढ़कर राजपूत सेना पर टूट पड़ेगी और आरक्षित सेना (तोलकामा दल) शत्रु की बाजुओं से घूमते हुए (Turning Movement) पीछे से आक्रमण कर उसे नष्ट कर देगी। दूसरी ओर राणा सांगा ने मुगल सेना पर सामने से आक्रमण की सफलता में सन्देह के कारण शत्रु की किसी एक बाजू को आक्रमण द्वारा कुचलने तथा उसी ओर से शत्रु सेना में प्रवेश की योजना बनायी । तदनन्तर उसने पार्श्व एवं पृष्ठ आक्रमण करने तथा अन्तिम व्यवस्था में सामने से शत्रु पर अश्वारोही आक्रमण करने का भी निर्णय लिया।

वास्तविक संघर्ष का श्रीगणेश

17 मार्च, 1527 की प्रातः वास्तविक संघर्ष का श्रीगणेश राजपूतों के आक्रमण द्वारा हुआ। राजपूत सेना ने मुगल सेना के मध्य भाग पर आक्रमण का निर्णय लेकर आगे बढ़ना प्रारम्भ किया, किन्तु जैसे ही वह बाबर की गाड़ियों के निकट पहुँची मुगल सेना को तोपों और बन्दूक तथा उस्ताद अली के मोर्टार के फायर द्वारा उसका सीधे बढ़ना असम्भव हो गया। ऐसी स्थिति में राजपूतों को मुगल सेना को दाहिनी ओर बायीं बाजुओं, जहाँ तोपों का अभाव था, पर लड़ने का निर्णय लेना पड़ा।

राजपूतों का प्रथम प्रभावकारी आक्रमण मुगल सेना के दाहिने पार्श्व पर हुआ । बाबर द्वारा वहाँ तुरन्त सेना भेजने के बावजूद भी राजपूत सफलता पाने वाले थे कि बाबर ने मुस्तफा खाँ की कमान के तोपचियों को राजपूतों पर जोरदार फायर डालने का आदेश दिया। इतना ही नहीं, आगे की ओर बढ़ रहे राजपूतों को रोकने के लिए उसने केन्द्रीय सैनिक दस्ते भी बारी-बारी से भेजने प्रारम्भ कर दिये ।

उपर्युक्त स्थिति में राणा सांगा ने शत्रु सेना को विभाजित करने के उद्देश्य से उसके बायें पार्श्व पर भी आक्रमण कर दिया, जिसे विफल करने के लिए बाबर ने तुरन्त केन्द्रीय सैन्य दस्ते भेजे। परिणामस्वरूप, दोनों पार्श्वो पर गुत्थमगुत्था की लड़ाई प्रारम्भ हो गयी, जिसने अपरान्ह एक बजे तक घमासान संघर्ष का रूप ले लिया। इसी समय सिल्हदी (जो राजपूत से मुसलमान बन गया था और जो राजपूत सेना के अग्र भाग के वामपक्ष को कमान कर रहा था) 600 सैनिकों के साथ बाबर की ओर जा मिला, जिससे राजपूत सेना के बायें बाजू का कमजोर पड़ जाना स्वाभाविक हो गया तथापि राणा सांगा ने धैर्यपूर्वक अपनी व्यूह रचना में अपेक्षित हेर-फेर कर उसे रिक्त स्थान को भर लिया और उसने इस प्रकार ‘मुगल सेना पर अपने आक्रमण में अनावश्यक गतिरोध न आने दिया।

खानवा का युद्ध के परिणाम

इस प्रकार जब बाबर ने सोचा कि राजपूत का दबाव उसके पार्श्वो पर बढ़ता जा रहा है, किन्तु मध्य में वे तितर-बितर अथवा अस्त-व्यस्त हैं तो उसने अपने कवचयुक्त अश्वारोही सैनिकों को अपनी गाड़ियों के मध्य में छोड़े गये रिक्त स्थानों से आगे बढ़कर राजपूत सेना के मध्य भाग पर प्रभावशाली आक्रमण करने का आदेश दिया। राजपूत सेना इस नये आक्रमण का जी-तोड़ सामना करने में जुट गयी। अतः पार्श्वों की ओर से उनका आगे बढ़ना रुक-सा गया और उन्हें मुगल सेना के फायर द्वारा पर्याप्त क्षति उठानी पड़ी। उनका बहादुर सेनापति राणा सांगा बुरी तरह घायल होकर बेहोश हो गया, जिसे तुरन्त कुशलतापूर्वक युद्ध स्थल से पीछे हटा लिया गया और उसके स्थान पर झाला सरदार द्वारा राजपूत सेना की कमान सम्भाल ली गयी। अपने जीवन की बाजी लगा देने वाले राजपूत सैनिक लड़ते-लड़ते थक चुके थे। अपने सेनानायक के घायल होने की खबर ने उनके मनोबल को झकझोर दिया था। अतः राजपूत सेना द्वारा मुगल सेना के दाहिने व बायें पार्श्व की ओर से आगे बढ़ने का लगाया गया अन्तिम जोर प्रभावशाली न हो सका। उस्ताद अली के प्रभावकारी फायर से असंख्य राजपूतों के शहीद होने के बावजूद उन्हें अन्ततोगत्वा पीछे हटने एवं पराजय के स्वीकार करने के लिए विवश होना पड़ा।

बाबर ने शत्रु राजपूतों का शिविर तक पीछा किया। शाम हो जाने तथा अपनी सेना के थके होने के कारण यद्यपि वह इस कार्य में पूर्णतः सफल नहीं हो पाया तथापि यह मानना ही पड़ेगा कि बाबर ने कभी शत्रु को पुनः शक्ति संचय करने का अवसर नहीं दिया। देहली पर शासन करने की राजपूतों की लालसा कई शताब्दियों तक दिवास्वप्न बनकर रह गयी। हिन्दुओं के संगठन के क्रमिक क्षय से भारत में मुगल साम्राज्य की जड़ें क्रमशः गहरी होती गयीं। वस्तुतः वीर सेनानी राणा सांगा ने शत्रु के सन्धि के प्रस्ताव पर भरोसा कर अपनी आक्रमणात्मक कार्यवाही में एक महीने का विलम्ब कर बहुत बड़ी गलती की। इतना ही नहीं, सैन्य संख्या के अधिक होने के बावजूद शत्रु के हथियारों की श्रेष्ठता (विशेषकर तोपखाना) के समक्ष राजपूत सेना का शौर्य निष्फल प्रमाणित हुआ। इसके साथ ही विभिन्न राजाओं की मिली-जुली सेना के नियन्त्रण में एकरूपता समुचित व्यवस्था एवं पारस्परिक सहयोग को बनाये रखना दुष्कर हो गया, जिसने राणा सांगा के नेतृत्व पर भी एक प्रश्नचिह्न लगा दिया दूसरी ओर बाबर अपनी दूरदर्शिता, उच्च मनोबल, उचित योजना और सर्वाधिक अपने नेतृत्व द्वारा शानदार विजय अर्जित करने में सफल हुआ।

B. N. Majumdar के शब्दों में, “Babur’s supremacy over all his rivals and over India was decided in the battle of Khanwa in 1527.”

खानवा का युद्ध में बाबर की विजय के कारण

राजपूतों में यद्यपि साहस और पौरुष का अभाव नहीं था तथा उन्होंने युद्ध में बड़ी वीरता तथा अदम्य साहस का परिचय दिया, किन्तु वे युद्ध में मुगलों की सेना से पराजित हो गये। इस युद्ध मैं बाबर की विजय के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे—

(1) बाबर की सेना का संगठन एक उच्च सैनिक संगठन था ।
(2) बाबर ने तोपों तथा बन्दूकों का प्रयोग किया जिनका राजपूतों के पास अभाव था।
(3) बाबर ने ‘तुलुगामा’ समरतन्त्र का प्रयोग किया जिसके कारण राजपूतों की सेना को चारों ओर से घेर लिया गया।
(4) राजपूतों की सेना विभिन्न सरदारों तथा सामन्तों की सम्मिलित सेना थी जिसके कारण उसमें आपसी तालमेल की कमी थी।
(5) मुगल सेना में गतिशीलता थी, जबकि राजपूतों की सेना में इसका अभाव था।
(6) बाबर की विजय का प्रमुख कारण सलादी का राणा सांगा के साथ विश्वासघात था जिसने महत्त्वपूर्ण अवसर पर राणा सांगा को छोड़कर बाबर की ओर से युद्ध किया।

नोट – परीक्षाओं में पूछे जाने वाले प्रश्न —
प्रश्न 1. खानवा के संग्राम (1527) का सचित्र वर्णन करते हुए इस युद्ध की समीक्षा लिखें।
प्रश्न 2. खानवा का युद्ध कब और किसके बीच हुआ इस युद्ध के कारण व परिणाम लिखिए?
प्रश्न 3. खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा की सेना में कौन-कौन शामिल नहीं था?

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