द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर क्या है, परिभाषा, प्रकार व नियतांक लिखिए | Bipolar Junction Transistor in Hindi

संधि ट्रांजिस्टर (JT) क्या है

जिस प्रकार ट्रायोड वाल्व निर्वात में संधि डायोड पर निर्भर होता है उसी प्रकार अर्द्धचालक संधि डायोड के संगत विस्तार ट्रायोड वाल्व ‘संधि ट्रांजिस्टर (Junction Transistor in Hindi)’ पर निर्भर होता है, जिसमें दो p-n संधि डायोड उपस्थित होते हैं। संधि ट्रांजिस्टर शब्द का निर्माण Transfer + Resistor = Transistor शब्द के मिलने पर होता है।
सामान्यतः दो प्रकार के संधि ट्रांजिस्टर होते हैं –
(1). द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर (Bipolar Junction Transistor),
(2). एकध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर (Unipolar Junction Transistor) ।

नोट – विद्यार्थी ध्यान दें कि द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर का कार्य बहुसंख्यक एवं अल्पसंख्यक दोनों प्रकार के आवेश वाहकों की गति के कारण होता है। तथा यह एक वास्तविक संधि ट्रांजिस्टर है अतः इसका उपयोग अधिकतः से होता है।

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द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर (BJT) क्या है

द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर (BJT) में सिलिकॉन Si (अथवा जर्मेनियम Ge) का क्रिस्टल होता है जिसमें p-प्रकार की दो पर्तों के बीच एक n-प्रकार के सिलिकॉन Si की पतली पर्त को सैंडविच करने पर pnp संधि ट्रांजिस्टर बनता है। अतः इसके विपरीत n-प्रकार की दो पर्तों के बीच एक p-प्रकार के सिलिकॉन Si की पतली पर्त को सैंडविच करने पर npn संधि ट्रांजिस्टर बनता है।
यदि बाह्य परिपथ जोड़ने के लिए प्रत्येक बाह्य पट्टी पर एक कम प्रतिरोध का सम्पर्क बनाया जाता है, तो यह केन्द्रीय “आधार” कहलाता है। तथा एक बाह्य भाग “उत्सर्जक” और दूसरा बाह्य भाग “संग्राहक” कहलाता है।
जब आधार क्षेत्र से होकर आवेश वाहक से गुजरता हैं तो यह बहुत ही पतला (लगभग 10-3 मीटर) से भी कम की मोटाई का बनाया जाता है जिससे प्रभावी द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर की क्रिया होती है।

बीजेटी को द्विध्रुवी क्यों कहा जाता है?

चूॅंकि p-n संधि डायोड की भांति npn ट्रांजिस्टर के दो सिरों वाले भागों में अधिक संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं तथा मध्य p-भाग में अधिक संख्या में कोटर (होल) होते हैं। इसी प्रकार pnp ट्रांजिस्टर में दो बाह्य भागों में अधिक संख्या में कोटर उपस्थित होते हैं तथा मध्य n-भाग में अधिक संख्या में मुक्त इलेक्ट्रॉन होते हैं। अर्थात् p-n संधि डायोड की भांति प्रत्येक संधि पर अवक्षय पर्त बनती है। अतः कम विभव पर्तें उत्पन्न होती है यह तदान्तर में आरोपित बाह्य विभव द्वारा संशोधित होता है।

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द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर परिपथ

npn व pnp ट्रांजिस्टर परिपथ संकेत द्वारा यह स्पष्ट है कि उत्सर्जक को संग्राहक से भिन्न करने के लिए एक तीर का निशान लगाया जाता है और इसकी दिशा वास्तविक धारा की दिशा अथवा इलेक्ट्रॉन की गति की दिशा के विपरीत होती है।
इसके अनुसार npn ट्रांजिस्टर में तीर की दिशा आधार से दूर की और होती है चूंकि अग्र अभिनति में इलेक्ट्रॉन उत्सर्जक से आधार की ओर चलते हैं। तथा pnp ट्रांजिस्टर में तीर की दिशा आधार की और होती है चूंकि अग्र अभिनति में कोटर उत्सर्जक से आधार की ओर चलते हैं। अर्थात् प्रत्येक स्थिति में तीर की दिशा p से n की और होती है।

द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर के नियतांक

यदि जब उभयनिष्ठ आधार परिपथ में संग्राहक धारा उत्सर्जक धारा में परिवर्तन द्वारा नियंत्रित की जाती है और यदि अग्र अभिनति उत्सर्जक परिपथ में धारा परिवर्तित होती है तो संग्राहक धारा भी परिवर्तित होगी। अर्थात् नियत संग्राहक-आधार वोल्टेज (VCB) पर संग्राहक धारा में परिवर्तन (δIC) तथा उत्सर्जक धारा में परिवर्तन (δIE) के अनुपात को धारा प्रवर्धन (α) कहते हैं। इसे गणितीय रूप में लिखने पर,
α = ( \frac{δI_C}{δI_E} )VCB …(1)
अतः α को कभी-कभी अग्र धारा स्थानान्तरण अनुपात भी कहते हैं तथा इसे hfb द्वारा भी प्रदर्शित करते हैं।

अब यदि उभयनिष्ठ आधार समायोजन में संग्राहक धारा उत्सर्जक धारा से बहुत थोड़ी-सी कम मात्रा होती है। चूंकि कुछ आवेश वाहक पतले आधार में पुर्नसंयोजन द्वारा क्षय हो जाते हैं। अतः α एकांक से कुछ कम होता है। वास्तविक ट्रांजिस्टर के लिए α का प्रायोगिक मान 0.95 से 0.995 के बीच होता है इसका अर्थ है कि 95% से 99.5% तक उत्सर्जक धारा संग्राहक धारा परिपथ में से गुजरती है। अर्थात् “आदर्श द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर के लिए α का मान 1 होता है।”

अब यदि उभयनिष्ठ उत्सर्जक परिपथ में निवेशी सिग्नल आधार पर आरोपित किया जाता है तो नियत संग्राहक-उत्सर्जक वोल्टेज (VCB) पर संग्राहक धारा में परिवर्तन (δIC) और आधार धारा में परिवर्तन (δIB) के अनुपात को धारा प्रवर्धन β कहते हैं। इसे गणितीय रूप में लिखने पर,
β = ( \frac{δI_C}{δI_B} )VCE …(2)
अतः h पैरामीटर के पदों में β के लिए संकेत hfe होता है। चूंकि आधार धारा में अत्यन्त सूक्ष्म परिवर्तन के लिए संग्राहक धारा में बहुत अधिक परिवर्तन होता है। वास्तविक ट्रांजिस्टर के लिए β का मान 200 से 500 के बीच होता है इसका अर्थ होता है कि 2% से 5% तक संग्राहक धारा उत्सर्जक धारा परिपथ में से होकर जाती है। अतः “द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर के लिए β का मान सदैव 1 से बड़ा होता है।”

द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर के नियतांक α तथा β के मध्य संबंध

चूॅंकि α तथा β एक विशिष्ट ट्रांजिस्टर के अभिलक्षण होते हैं अतः इनके बीच एक पारस्परिक संबंध होना आवश्यक है। यदि उत्सर्जक धारा प्रभावी रूप से आधार क्षेत्र में दो घटकों में समायोजित होती है। इसका अधिकांश भाग संग्राहक क्षेत्र से गुजरता है एवं संग्राहक धारा के रूप में संग्राहक धारा से बाहर निकलता है। तथा शेष सूक्ष्म भाग बाह्य आधार धारा का निर्माण करता है और यह आधार धारा में कुछ प्रतिशत जैसे 2% से 5% तक पुर्नसंयोजन क्षय के परिणाम स्वरूप प्राप्त होता है।
अतः इसी प्रकार,
IE = IB + IC …(3)
संग्राहक धारा में सूक्ष्म परिवर्तन के लिए,
δIE = δIB + δIC
इसमें δIC से दोनों और भाग देने पर,
\frac{δI_E}{δI_C} = \frac{δI_B}{δI_C} + 1 …(4)
माना समीकरण (1) से,
\frac{δI_E}{δI_C} = \frac{1}{α}
तथा समीकरण (2) से,
\frac{δI_B}{δI_C} = \frac{1}{β}
अब इन दोनों मानों को समीकरण (4) में रखने पर,
\frac{1}{α} = \frac{1}{β} + 1
या \frac{1}{α} = \frac{1 + β}{β}
या \footnotesize \boxed{ α = \frac{β}{1 + β} } …(5)
अथवा α + αβ = β या α = β(1 – α)
या \footnotesize \boxed{ β = \frac{α}{1 + α} } …(6)
अतः समीकरणों से स्पष्ट है कि α, 1 की ओर अग्रसर होता है तो β बढ़ता जाता है। और यदि α = 0.98 या β = 98, किन्तु यदि α = 0.99 हो तो β = 99 होगा।

Note – द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर से संबन्धित प्रशन –
Q.1 द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर क्या होता है? pnp तथा npn ट्रांजिस्टर नियताकों को परिभाषित कीजिए और इनमें संबंध स्थापित कीजिए।
Q.2 बीजेटी क्या है? इसके मुख्य तीन विन्यास को समझाइए। तथा द्विध्रुवीय संधि ट्रांजिस्टर परिपथ आरेख की सहायता से वर्णन कीजिए इसके नियतांकों के मध्य संबंध लिखिए।

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