आदर्श कृष्णिका क्या है, फेरी व वीन की कृष्णिका | Blackbody Radiation in Hindi

आदर्श कृष्णिका

“आदर्श कृष्णिका वह वस्तु होती है जो अपने पृष्ठ पर आपतित सम्पूर्ण विकिरण को पूर्णतः अवशोषित कर लेती है, चाहे विकिरण की तरंगदैर्ध्य कुछ भी क्यों न हो।”
इस प्रकार, आदर्श कृष्णिका के लिए λ के सभी मानों के लिए aλ = 1
अतः आदर्श कृष्णिका के लिए अवशोषण क्षमता का मान a = 1
अर्थात् आदर्श कृष्णिका पूर्ण अवशोषक होने के साथ-साथ पूर्ण उत्सर्जक या विकिरक भी होती है। अतः आदर्श कृष्णिका को ऊंचे ताप तक गर्म करने पर यह सभी सम्भव तरंगदैर्ध्य के विकिरण उत्सर्जित करती है। आदर्श कृष्णिका से उत्सर्जित होने वाले विकिरण को ‘कृष्णिका विकिरण’ कहते हैं।

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व्यावहारिक कृष्णिका

व्यवहार में कोई भी वस्तु आदर्श कृष्णिका नहीं है। प्रायोगिक कार्य हेतु लगभग आदर्श कृष्णिका का निर्माण किया जाता है। माना किसी एक समान ताप वाले बन्द बर्तन के भीतर विकिरण में सभी संभव तरंगदैर्ध्य होती हैं। इसे “सम्पूर्ण विकिरण” कहते हैं। अतः यदि इसके भीतर एक आदर्श कृष्णिका रखी हो, तो वह इस विकिरण का पूर्णतः अवशोषण करेगी। परन्तु बर्तन के भीतर विकिरण का परिमाण तथा गुण उसमें रखी किसी भी वस्तु की प्रकृति पर निर्भर नहीं करते हैं। अतः आदर्श कृष्णिका द्वारा उत्सर्जित विकिरण परिमाण व गुण में बन्द बर्तन के भीतर उपस्थित विकिरण के समान होगा।
अर्थात् यदि किसी समतापी कोष्ठ के भीतर विकिरण की प्रकृति आदर्श कृष्णिका विकिरण के समान होती है। तो इस सिद्धांत के आधार पर ‘फेरी (Fery) एवं वीन (Wien)’ ने आदर्श कृष्णिका का निर्माण किया है जो इस प्रकार है।

फेरी की कृष्णिका

फेरी की कृष्णिका चित्र में दिखाई गई है। इसमें दोहरी दीवार वाला धातु का एक खोखला गोला होता है जिसमें संकीर्ण छिद्र O होता है। गोले की भीतरी दीवारों पर कालिख पुती होती है जबकि बाहरी दीवारों पर निकिल की पॉलिश होती है। दीवारों के बीच खाली स्थान में निर्वात् उत्पन्न कर दिया जाता है। छिद्र O के ठीक सामने गोले की भीतरी दीवार पर एक शंक्वाकार उभार N होता है।
जब ऊष्मा विकिरण छिद्र O में होकर गोले के भीतर प्रवेश करती है, तो वह भीतर की दीवारों पर उत्तरोत्तर परावर्तित होते हैं और इस प्रकार अवशोषित हो जाते हैं। जैसा की चित्र-1(a) में दिखाया गया है।

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फेरी की आदर्श कृष्णिका
फेरी की आदर्श कृष्णिका
चित्र-1

यदि शंक्वाकार उभार N न होता तो दीवार के इस भाग से कुछ विकिरण सीधे परावर्तित होकर छिद्र O से होकर बाहर जा सकते थे। शंक्वाकार उभार N के होने से यह संभावना समाप्त हो जाती है। इस प्रकार छिद्र O से अन्दर जाने वाली सभी तरंगदैर्ध्यों के विकिरण गोले के भीतर पूर्णतः अवशोषित हो जाते हैं। अतः छिद्र O आदर्श कृष्णिका की भांति कार्य करता है। जब इस गोले को विकिरण स्त्रोत की भांति प्रयुक्त करना होता है तब इसको नियत ताप पर एक ऊष्मक में रखा जाता है जिससे छिद्र O से ऊष्मा विकिरण बाहर निकलने लगते हैं जैसा की चित्र-1(b) में स्पष्ट है कि छिद्र O से बाहर निकलने वाले विकिरण कृष्णिका विकिरण ही होंगे।

वीन की कृष्णिका

वीन की कृष्णिका को चित्र-2 में दिखाया गया है। इसमें पीतल या प्लैटिनम का एक बेलनाकार खोखला कक्ष MM होता है जिसकी भीतरी दीवारों पर कालिख पुती होती है। कक्ष के ऊपर चारों और प्लैटिनम के तार लिपटे रहते हैं जिसे तापन कुण्डली NN कहते हैं। इसे चित्र में छोटे-छोटे वृत्तों द्वारा दर्शाया गया है।

वीन की आदर्श कृष्णिका
वीन की आदर्श कृष्णिका
चित्र-2

इस कुंडली में निश्चित मान की विद्युत धारा प्रवाहित करके कक्ष को गर्म किया जाता है। अतः कक्ष के केन्द्रीय भाग का ताप वैधुत् युग्म द्वारा मापा जाता है। कक्ष चारों ओर से पोर्सलीन की नलियों PP से घिरा होता है। कक्ष को गर्म करने पर इससे उत्सर्जित विकिरण डायाफ्रामों में बने छिद्रों से होकर गुजरते हैं और अन्त में छिद्र O से बाहर निकलते हैं। अर्थात् स्पष्ट है कि छिद्र O से बाहर निकलने वाला विकिरण कृष्णिका विकिरण होता है।

Note – आदर्श कृष्णिका से सम्बन्धित प्रशन –
Q. 1 आदर्श कृष्णिका क्या होती है ? इसे व्यवहार में किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है ?
Q. 2 आदर्श कृष्णिका किसे कहते हैं ? इसके लिए अवशोषण क्षमता का मान कितना होता है ?
Q. 3 आदर्श कृष्णिका की परिभाषा दीजिए ? तथा व्यवहारिक कृष्णिका की सहायता से फेरी तथा वीन की कृष्णिका को परिभाषित कीजिए ?

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